NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
मोदी पर लटकी है बढ़ती बेरोजगारी की तलवार
सीएमआईई का अनुमान है कि दिसंबर 2018 के अंत तक भारत में बेरोजगारों की संख्या बढ़कर 6.9 करोड़ हो गई है, जबकि कार्य सहभागिता दर घटकर महज 42.5 प्रतिशत रह गई।
सुबोध वर्मा
15 Jan 2019
Translated by महेश कुमार
सांकेतिक तस्वीर
Image Courtesy : Avenue Mail

बेरोजगारी एक हजारों घाव की मौत है। न केवल यह मौजूदा भयंकर गरीबी का स्रोत है जो परिवारों को इंच दर इंच नष्ट कर रही है, बल्कि यह सामाजिक और राजनीतिक अशांति का भी केंद्र है। नरेंद्र मोदी शासन के तहत, बेरोजगार लोगों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुयी है - विशेष रूप से युवाओं में यह अभूतपूर्व अनुपात तक पहुँच गयी है। सेंटर ऑफ मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के नवीनतम अनुमानों के अनुसार, बेरोजगारों की संख्या 6.9 करोड़ की है, जो कि कार्यशील आयु की आबादी का लगभग 7.4 प्रतिशत है। ज्यादातर बेरोजगार युवा हैं, ज्यादातर ग्रामीण क्षेत्रों में हैं। महिलाओं में बेरोजगारी काफी ऊंचे स्तर पर हैं।

Unemployment1.jpg

सीएमआईई ने यह अनुमान लगभग 1.4 लाख घरों के नमूना सर्वेक्षण के माध्यम से लगाया है, समय-समय पर बड़े स्लाइस सर्वेक्षण (जिसे लहरें कहा जाता है) वह अगले महीने की फरवरी से होगा। तो, इस अनुमान में कुछ त्रुटियां हो सकती हैं। लेकिन सरकार द्वारा नियमित आवधिक सर्वेक्षणों के अभाव में, और नौकरियों पर गलत या गलत आधिकारिक ‘डेटा’ की बाढ़ के कारण सीएमआईई ही एकमात्र वैध अनुमान है। इसके द्वारा दिखाया गया रुझान काफी स्पष्ट है - कि जुलाई 2017 के बाद से बेरोजगारी लगातार बढ़ रही है। वास्तव में, यह तब से अभी तक दोगुना बढ़ गई प्रतीत होती है।

अंडर-इम्प्लॉयमेंट 

इस डेटा में जो कवर या रिकॉर्ड नहीं किया गया है, वह अंडर-इम्प्लॉयमेंट की पूरक घटना है, जो कि शुद्ध बेरोज़गारी की तुलना में कहीं अधिक प्रचलित है। यह दो प्रकार की है - बहुत कम मजदूरी पर काम करने वाले लोग या अनियमित रूप से काम करने वाले लोग। (बेशक, ये दोनों सह-अस्तित्व में भी हो सकते हैं)।

कोई भी व्यक्ति बस इधर-उधर बैठकर मौत के घाट नहीं उतर सकता है। इसलिए लोग मौका मिलने पर कोई रोज़गार करना चाहेंगे, भले ही वह चंद रुपयों के लिए ही क्यों न हो। इसलिए, हमने योग्य और शिक्षित लोगों को मैनुअल मजदूरी के रूप में या कम-भुगतान वाली नौकरियों में काम करने के लिए, कंप्यूटर-प्रशिक्षित युवाओं को डेटा एंट्री ऑपरेटर या क्लर्क के रूप में काम करने वाले एमए और पीएचडी के युवाओं को देखा है।

फिर सीमांत श्रमिक हैं जो कुल कार्यबल का लगभग एक तिहाई हैं। वे साल में एक या दो महीने से लेकर 6-8 महीने के बीच कोई भी काम करते हैं। उनमें से कई मौसमी कृषि कार्य करते हैं, ग्रामीण नौकरी गारंटी योजना (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना या MGNREGS) में थोड़ा जो मिलता है वह काम करते हैं। यह सब छिपी हुयी या प्रच्छन्न बेरोजगारी है।

गिरती हुई काम की सहभागिता

नौकरियों के संकट का एक और आयाम है लगातार गिरती हुई कार्य सहभागिता दर, जो कि कार्यशील जनसंख्या (15 वर्ष से अधिक आयु) की प्रतिशत हिस्सेदारी है, जो वास्तव में कम हो रही है और उनमें भी जो काम करने के इच्छुक हैं, लेकिन नौकरी नहीं पा रहे हैं (बेरोजगार)। जो लोग रह गए हैं वे काम करने के लिए अनिच्छुक हैं - छात्र, घरेलू कर्तव्यों के लिए बाध्य महिलाएं, बुजुर्ग आदि।

अजीब बात है, भारत में काम की भागीदारी दर भी लगातार गिर रही है। सीएमआईई के आंकड़ों के मुताबिक, यह जनवरी 2016 में 47.6% से घटकर दिसंबर 2018 में यह 42.47% हो गयी है।

Unemployment2.jpg

इसका क्या मतलब है? इसका मतलब यह है कि बड़ी संख्या में लोग नौकरियों की कमी से हतोत्साहित हैं, नौकरी पाने के अपने प्रयासों में निराश हैं और इसलिए कुछ अवसर के लिए इंतजार में (शायद अस्थायी रूप से) बैठे रहते हैं। यह कृषि मौसम के साथ निकटता से जुड़ा हुआ मामला है। महिलाएं ऐसे श्रमिकों का सबसे बड़ा हिस्सा हैं क्योंकि वे पहले झटके में ही उस अर्थव्यवस्था में अपनी नौकरी खो देते हैं जो धीमी पड़ रही है।

लेकिन लगातार घटती काम की भागीदारी एक खतरनाक अवस्था है। इसका मतलब न केवल यह है कि लोगों का जीवन गरीबी में ज्यादा गहरे धंसता जा रहा है, बल्कि बड़ी संख्या में ऐसे लोगों (ज्यादातर युवाओं) के अस्तित्व का भी संकेत देता है जो एक दयनीय स्थिति में हैं। यह ऐसे युवा हैं जो हर तरह के पाखंड और विनाशकारी आंदोलनों के लिए चारा बन जाते हैं, जैसे कि गौ रक्षा दस्ते और ‘मंदिर वहीं बनाएंगे’(मंदिर निर्माण) सेना आदि।

राजनीतिक पतन – आरक्षण

नौकरियों के संकट पर देश भर में बहुत असंतोष है, खासकर इसलिए कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने 2014 के चुनाव अभियान के दौरान युवाओं को प्रसिद्ध आश्वासन दिया था कि वह हर साल एक करोड़ नौकरियां प्रदान करेंगे। सरकारी नौकरियों में आरक्षण के लिए मांग के कई आंदोलनों ने इस संकट को प्रतिबिंबित किया है - पटेलों और मराठों से लेकर जाटों और गुर्जरों तक, सभी आरक्षणों के लिए आंदोलन करते रहे हैं। यह उनके लिए कोई मायने नहीं रखता है कि वास्तव में सरकारी नौकरियां किसी भी तरह से गंभीर नौकरियों के संकट को कम नही कर सकती हैं। इस बेचैनी का असर राज्य के विधानसभा चुनावों में नज़र आया है, उदाहरण के लिए, गुजरात में, पाटीदार भाजपा के खिलाफ हो गए।

इस सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि सरकारें नई नौकरियों की कमी पर उपज़े गुस्से को मोड़ने के लिए आरक्षण लागू करने की कोशिश करती हैं। महाराष्ट्र सरकार ने मराठों के लिए आरक्षण की घोषणा की, हरियाणा और गुजरात ने गरीब उच्च जाति के लोगों के लिए आरक्षण की घोषणा की। और, मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने खुद ही 'गरीब' लोगों के लिए 10 प्रतिशत कोटा घोषित करके नौकरियां पैदा करने में अपनी विफलता को स्वीकार किया, हालांकि इन गरीबों को बड़े ही उदारवादी ढंग से परिभाषित किया गया है, वे गरीब जो कि प्रति माह 66,000 रुपये से कम आय वाले हैं, जो 95 प्रतिशत आबादी को कवर करते हैं।

लेकिन, नौकरियों के संकट का सबसे बड़ा नतीजा संभवत: आगामी आम चुनावों में दिखाई देगा जब मोदी और उनकी पार्टी भारतीय जनता पार्टी को नौकरियों के मोर्चे पर अपने झूठे वादों के लिए ललकारा जाएगा।

unemployment
Employment
CMIE
job loss
Jobless growth
JOB CRISIS
10% Quota
Reservation Policy

Related Stories

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

उत्तर प्रदेश: "सरकार हमें नियुक्ति दे या मुक्ति दे"  इच्छामृत्यु की माँग करते हजारों बेरोजगार युवा

मोदी@8: भाजपा की 'कल्याण' और 'सेवा' की बात

UPSI भर्ती: 15-15 लाख में दरोगा बनने की स्कीम का ऐसे हो गया पर्दाफ़ाश

मोदी के आठ साल: सांप्रदायिक नफ़रत और हिंसा पर क्यों नहीं टूटती चुप्पी?

जन-संगठनों और नागरिक समाज का उभरता प्रतिरोध लोकतन्त्र के लिये शुभ है

ज्ञानव्यापी- क़ुतुब में उलझा भारत कब राह पर आएगा ?

वाम दलों का महंगाई और बेरोज़गारी के ख़िलाफ़ कल से 31 मई तक देशव्यापी आंदोलन का आह्वान

महंगाई की मार मजदूरी कर पेट भरने वालों पर सबसे ज्यादा 

सारे सुख़न हमारे : भूख, ग़रीबी, बेरोज़गारी की शायरी


बाकी खबरें

  • omicron
    भाषा
    दिल्ली में कोविड-19 की तीसरी लहर आ गई है : स्वास्थ्य मंत्री
    05 Jan 2022
    ‘‘ दिल्ली में 10 हजार के करीब नए मामले आ सकते हैं और संक्रमण दर 10 प्रतिशत पर पहुंच सकती है.... शहर में तीसरी लहर शुरू हो चुकी है।’’
  • mob lynching
    अनिल अंशुमन
    झारखंड: बेसराजारा कांड के बहाने मीडिया ने साधा आदिवासी समुदाय के ‘खुंटकट्टी व्यवस्था’ पर निशाना
    05 Jan 2022
    निस्संदेह यह घटना हर लिहाज से अमानवीय और निंदनीय है, जिसके दोषियों को सज़ा दी जानी चाहिए। लेकिन इस प्रकरण में आदिवासियों के अपने परम्परागत ‘स्वशासन व्यवस्था’ को खलनायक बनाकर घसीटा जाना कहीं से भी…
  • TMC
    राज कुमार
    गोवा चुनावः क्या तृणमूल के लिये धर्मनिरपेक्षता मात्र एक दिखावा है?
    05 Jan 2022
    ममता बनर्जी धार्मिक उन्माद के खिलाफ भाजपा और नरेंद्र मोदी को घेरती रही हैं। लेकिन गोवा में महाराष्ट्रवादी गोमंतक पार्टी के साथ गठबंधन करती हैं। जिससे उनकी धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत पर सवाल खड़े हो…
  • सोनिया यादव
    यूपी: चुनावी समर में प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री का महिला सुरक्षा का दावा कितना सही?
    05 Jan 2022
    सीएम योगी के साथ-साथ पीएम नरेंद्र मोदी भी आए दिन अपनी रैलियों में महिला सुरक्षा के कसीदे पढ़ते नज़र आ रहे हैं। हालांकि ज़मीनी हक़ीक़त की बात करें तो आज भी महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध के मामले में उत्तर…
  • मुंबईः दो साल से वेतन न मिलने से परेशान सफाईकर्मी ने ज़हर खाकर दी जान
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    मुंबईः दो साल से वेतन न मिलने से परेशान सफाईकर्मी ने ज़हर खाकर दी जान
    05 Jan 2022
    “बीएमसी के अधिकारियों ने उन्हें परेशान किया, उनके साथ बुरा व्यवहार किया। वेतन मांगने पर भी वे उस पर चिल्लाते थे।"
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License