NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
मोदी सरकार बढ़ती बेरोज़गारी से अनजान बन रही है
नई नौकरियों के बारे में भ्रम पैदा करने के बेताब प्रयासों और दर्ज़न भर 'योजनाओं' के बावजूद बेरोज़गारी दो साल के सबसे ऊँचे स्तर पर पहुंच गई है और प्रधानमंत्री को जैसे इसकी खबर ही नहींI
सुबोध वर्मा
10 Nov 2018
Translated by महेश कुमार
unemployment

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के नये अनुमानों के मुताबिक, जनवरी 2017 और अक्टूबर 2018 के बीच एक करोड़ से अधिक लोगों ने अपनी नौकरियाँ खो दी और अनुमानत: 2.95 करोड़ लोग सक्रिय रूप से नौकरियों की तलाश कर रहे हैं। ये अनुमान सीएमआईई द्वारा किए गए मासिक सर्वेक्षण के आधार पर तय किए गए हैं। नौकरियों के आँकड़ों के किसी भी अन्य आधिकारिक या अनौपचारिक स्रोत की अनुपस्थिति में, हमें देश में रोज़गार सम्बन्धी गंभीर स्थिति की पड़ताल के लिए इन्हीं आँकड़ों का सहारा लेना पड़ेगाI

अक्टूबर 2018 के नतीजे बताते हैं कि एक साल पहले, अक्टूबर 2017 में, 40 करोड़ 70 लाख बेरोज़गार लोगों की तुलना में देश में 39 करोड़ 70 लाख 20 हज़ार लोग काम कर रहे थे। यदि इन नवीनतम आँकड़ों की तुलना जनवरी 2017 के आँकड़ों से की जाये तो हम पाएँगे कि रोज़गार प्राप्त लोगों की संख्या में लगभग 1.12 करोड़ की भारी गिरावट आईI

unemployment 1.jpg

अक्टूबर 2018 में, बेरोज़गारी की दर 6.9 प्रतिशत के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई, भले ही श्रम भागीदारी दर 42.4 प्रतिशत कम हो गई, जो अक्टूबर 2016 से अब तक के दो साल में सबसे कम है। श्रम भागीदारी दर का मतलब है कि काम करने वाले या काम करने की इच्छा रखने वाली व्यक्तियों की संख्या। महिलाओं की उच्च दर की गैर-भागीदारी के चलते भारत की श्रम भागीदारी दर आमतौर पर कम होती है।

एक साल पहले, नौकरियों की तलाश में लगे बेरोज़गार व्यक्तियों की संख्या 2.1 करोड़ थी, जो बाद में 2.95 करोड़ हो गई यानि बेरोज़गारों की सेना में 85 लाख लोग और जुड़ गए।

इस बीच, नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली बीजेपी सरकार गंभीर संकट के मामले में मूर्च्छित अवस्था में चली गई है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) हाई कमांड और सरकार के शीर्ष स्तर जिस विशेषज्ञ टोली को अपने मनपसंद आँकड़ें तैयार करने के लिए गठित किया गया था, लगता है उनके पास भी अब कोई उपाय नहीं बचे। पिछले एक साल से, उन्होंने ईपीएफओ (कर्मचारी भविष्य निधि संगठन) और ईएसआई (कर्मचारी राज्य बीमा) नामांकन आँकड़ों से 'नौकरी निर्माण' डेटा को लिया था, जिन्हें भ्रम को बनाने के लिए स्पष्ट रूप से इस्तेमाल किया गया था। हालांकि, इस तरह की हरकतों के लिए चारों तरफ से आलोचना के बाद, अब आधिकारिक तौर पर यह स्वीकार किया गया है कि ये आँकड़ें नौकरी निर्माण का प्रतिनिधित्व नहीं करते बल्कि औपचारिकरण का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह अपने आप में पैंतरेबाज़ी से भरा प्रस्ताव है, लेकिन यह एक अलग कहानी है। तथ्य यह है कि अब ईपीएफओ और ईएसआईसी में नामांकन डेटा को नौकरी के रूप में इस्तेमाल करने फिल्हाल दफन दिया गया है।

सरकार ने जो अभी तक स्वीकार नहीं किया है वह यह कि नौकरी निर्माण मुख्य रूप से दिवालिया और मूर्ख नीतियों के कारण विफल रहा है। असल में, यह इस दौर से गुजर रहा है कि अर्थव्यवस्था कितनी अच्छी तरह से काम कर रही है जबकि सभी संकेतकों से स्थिति इसके विपरीत है।

आयात बढ़ रहे हैं, निर्यात नीचे हैं। इंडेक्स ऑफ इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन (आईआईपी) स्थिर है। क्षमता का उपयोग नीचे है। क्रेडिट वृद्धि स्थिर या कमज़ोर है। सरकारी खर्च कम है। निवेश में कमी आई है। जीएसटी (माल और सेवाओं कर) संग्रह लक्ष्य से कम चल रहा हैं। कृषि उत्पादन अच्छा है लेकिन कृषि की किसानों ने आदोलन जारी रखा हुआ है क्योंकि सरकार ने राष्ट्रीय किसान आयोग की सिफारिशों के अनुसार समर्थन मूल्यों में वृद्धि करने से इंकार कर दिया है।

यहां तक कि अर्थव्यवस्था घुटनों के बल चल रही है, तेल की कीमतों में वृद्धि और डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट आई है, जिससे आयात लागत बढ़ रही है। इसके जवाब से, सरकार अनजान बनी हुयी है और राजकोषीय घाटे में सुधार के लिए एक गुमराह प्रयास में अपने खर्च को कम करने की कोशिश कर रही है। यह चिंता एक नव उदारवादी सिद्धांत है जिसने कभी भी गिरती अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने या नौकरियां बढ़ाने या आय बढ़ाने में मदद नहीं की है। 50,000 करोड़ रुपये खर्च कम करने के मौजूदा प्रयास से  अर्थव्यवस्था ओर खराब स्थिति में पहुंच जाएगी और निजी निवेश को हतोत्साहित होगा।

दूसरे शब्दों में, मोदी और अन्य की इस स्थिती से अनजानपन एक अपमानजनक लक्षण है जो आगे ओर भी बदतर रुप में सामने आयेगा।

unemployment
Modi government
BJP
Joblessness

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया


बाकी खबरें

  • Modi
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे: गुजरात में मोदी के चुनावी प्रचार से लेकर यूपी में मायावती-भाजपा की दोस्ती पर..
    03 Apr 2022
    हर हफ़्ते की तरह इस बार भी कुछ ज़रूरी राजनीतिक ख़बरों को लेकर हाज़िर हैं लेखक अनिल जैन
  • न्यूज़क्लिक डेस्क
    इतवार की कविता : आग़ा हश्र कश्मीरी की दो ग़ज़लें
    03 Apr 2022
    3 अप्रैल 1879 में जन्मे उर्दू शायर, अफ़सानानिगार और प्लेराइट आग़ा हश्र कश्मीरी की जयंती पर पढ़िये उनकी दो ग़ज़लें...
  • april fools
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    एप्रिल फूल बनाया, हमको गुस्सा नहीं आया
    03 Apr 2022
    अभी परसों ही एक अप्रैल गुजरा है। एप्रिल फूल बनाने का दिन। अभी कुछ साल पहले तक एक अप्रैल के दिन लोगों को बेवकूफ बनाने का काफी प्रचलन था। पर अब लगता है लोगों ने यह एक अप्रैल को फूल बनाने का चक्कर अब
  • ज़ाहिद खान
    कलाकार: ‘आप, उत्पल दत्त के बारे में कम जानते हैं’
    03 Apr 2022
    ‘‘मैं तटस्थ नहीं पक्षधर हूं और मैं राजनीतिक संघर्ष में विश्वास करता हूं। जिस दिन मैं राजनीतिक संघर्ष में हिस्सा लेना बंद कर दूंगा, मैं एक कलाकार के रूप में भी मर जाऊंगा।’’
  • hafte ki baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    CBI क्यों बनी 'तोता', कैसे हो सकती है आजाद, CJI ने क्यों जताई चिंता
    02 Apr 2022
    दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेन्ट एक्ट-1946 के तहत सन् 1963 में स्थापित सीबीआई और देश की अन्य जांच एजेंसियों को क्यों सरकारी नियंत्रण से मुक्त होना चाहिए? एक सुसंगत लोकतंत्र के लिए इन संस्थाओं का…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License