NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
मोदी सरकार में सबसे ज़्यादा ख़तरे में रही राष्ट्रीय सुरक्षा!
भाजपा जिस राष्ट्रीय सुरक्षा को अपने संकल्प पत्र में नंबर एक पर रखती है। उस पर भाजपा के पांच साल का नतीजा शून्य अंक से भी नीचे जाकर निगेटिव में अटकता है।
अजय कुमार
10 Apr 2019
NATIONAL SECURITY

भारतीय जनता पार्टी की हर बात की शुरुआत राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे से होती है। घोषणापत्र या संकल्प पत्र राष्ट्रवाद के प्रति पूरी प्रतिबद्धता होने की घोषणा करता है और यह बताता है कि आतंकवाद के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई है।

हम बार-बार यही देखते हैं कि मौजूदा सरकार अपनी किसी भी तरह की नाकामी छिपाने के लिए भावुक तरह से राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा उछाल देती है। आज जब नई सरकार के लिए चुनाव होने जा रहा है, एनडीए सरकार के पांच साल का भी हिसाब होना चाहिए। इस दौरान इस सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जिम्मेवार घरेलू कारकों को किस तरह संभाला, इसकी भी जाँच परख की जरूरत है। 

जम्मू-कश्मीर की स्थिति और बिगड़ी

surakshit haath 5.jpg

कार्टून - विकास ठाकुर 

शुरुआत जम्मू-कश्मीर से करते हैं। इसी साल प्रेम के दिन यानी 14 फरवरी को ही कश्मीर में नफरत की सबसे ख़ौफ़नाक घटना हुई। पुलवामा के सड़क पर हुई आत्मघाती हमले में तकरीबन 40 से अधिक सेंट्रल रिज़र्व पुलिस बल के जवानों को अपनी जान गंवानी पड़ी। यह तकरीबन 19 साल के बाद हुए  आत्मघाती हमले का परिणाम था। इसके बाद की प्रतिक्रिया यह हुई और इतना उन्माद पैदा किया गया कि भारत और पाकिस्तान युद्ध के कागार पहुँच गए। अब हमले से बचने के लिए हफ्ते में दो दिन हाई-वे को बंद करने का फैसला किया गया है। नागरिक पहले से ही परेशानी में थे,अब और अधिक परेशानी में डाल दिया गया है। यह सारी स्थितियां बताती हैं कि कश्मीर की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है।

एक ओर, सरकार कहती है कि आतंकवादी की संख्या में लगातार होने वाली बढ़ोतरी  को "बेअसर" कर रही है जबकि दूसरी ओर जम्मू-कश्मीर कोलिशन ऑफ़ सिविल सोसाइटी के आंकड़े देखे जाएं तो 2014 में मारे गए 114 आतंकवादियों की तुलना में यह साल-दर-साल बढ़कर 276 हो गया। अभी मार्च 2019 में यह संख्या बढ़कर 160 तक पहुँच गयी है।

साउथ एशिया टेररिज्म पोर्टल के आंकड़ें बताते हैं कि  2014 में 28 नागरिकों ने अपनी जान गंवाई थी, यह संख्या पिछले साल 2018 में 86 हो गई। इसी तरह 2014 में सुरक्षा बलों के 46 जवान शहीद हुए जबकि 2018 में दोगुने से बढ़कर 95 हो गए।

इतनी बुरी स्थिति है कि कश्मीर और शेष भारत के साथ अलगाव की खाई बढ़ती जा रही है। इधर से जितना अधिक कट्टर हिन्दुत्व की आग भड़काई जाती है उधर से उतना ही अधिक अलगाव की स्थिति उत्पन्न होती है। इधर से जितना अधिक अनुच्छेद370 और 35 (A) पर हमला किया जाता है, उधर से उतना ही अधिक भरोसा टूटता है। इस तरह से यह कहा जाए कि जनसंघ के विचार से जन्मी भाजपा अपने हालिया संकल्प पत्र में अनुच्छेद 370 और 35 (A) को ख़ारिज करने की बात कर देशद्रोह कर रही है और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर रही है तो यह गलत बात नहीं होगी। 

कश्मीर का नौजवान नौकरी की खोज में अपनी जमीन की तकलीफ को छोड़कर शेष भारत की तरफ आता है, उसे किराये पर कमरा देने में कोताही की जाती है, कश्मीर में कोई घटना हो जाती है तो उसे दोषी मानने लग जाया जाता है। पुलवामा हमले के बाद देशभर में कश्मीरी छात्रों और व्यापारियों पर हमले इसी बात का सुबूत हैं। शेष भारत और कश्मीर के बीच की इस खाई को पाटने की बजाय मौजूदा सरकार की नीति ऐसी हैं, जिससे यह अलगाव की खाई बढ़ती  ही जाती है।

ऐसी स्थिति आने पर बहुत सारे कारणों को दोष दिया जा सकता है।  लेकिन सबसे बड़े दोषी इस दौरान सरकार में बने रहने वाले लोग हैं।  जिनके हाथों में कश्मीर में शांति स्थापित करने की जिम्मेदारी सौंपी गयी, जिन्होंने शांति स्थापित करने के इरादे से भाजपा और पीडीपी की साझा सरकार बनाई लेकिन इस तरह से सरकार चलाई और सरकार तोड़ी  कि  शांति स्थापित करने के सारे प्रयास रखे के रखे रह गए।  

पंजाब

अब बात करते हैं, पंजाब के खालिस्तानी आतंकवाद से उभरी हल्की फुल्की चिंता की। साल 2007 में खालिस्तानी आतंकवाद एक बार उभरा था, जब लुधियाना में एक बम धमाके में सात जानें चलीं गयीं  और 40 लोग घायल हो गए। खालिस्तानी आतंकवादी अगले आठ वर्षों तक एक दम शांत रहे। साउथ एशिया टेर्रोरिज्म पोर्टल (SATP) के तहत  खालिस्तानी आतंकवादी  2008-15  के बीच पंजाब में एक भी  हमला को अंजाम नहीं दे पाए। हालांकि इसके  बाद के तीन वर्षों में 17 हिंसक हमले हुए हैं, जिसकी वजह से 82खालिस्तानी संदिग्धों की गिरफ्तारी हुई है। इसके साथ पिछले साल वैश्विक सिख समुदाय द्वारा खालिस्तानी   आंदोलन को फंडिंग देने का मामला उठा। जिसमें कनाडा में रह रहे कुछ सिख लोगों का नाम आया। 

पूर्वोत्तर की स्थिति

पूर्वोत्तर के सभी आठ राज्य सैन्य बालों के अजीब सी स्थिति से गुजरे रहे हैं। एसएटीपी पर असम रायफ़ल और नेशनल सिक्योरिटी गार्ड के भूतपूर्व प्रमुख जे.एन चौधरी लिखते हैं कि पूर्वोत्तर के  राज्यों में वसूली, वसूली के लिए अपहरण और किसी दूसरे तरह के रैकेट के लिए सैन्य बल एक तरह के शरण उद्योग की तरह काम करती है।  यह पैसा कमाने का सबसे आसान जरिया है। 

अकेले असम में, पुलिस रिकॉर्ड में अपहरण और जबरन वसूली के हजारों मामले हैं। आरोप है कि नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड (NSCN) से अलग हुए  गुट स्थनीय लोगों से टैक्स वसूली करते हैं और यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) द्वारा जबरन वसूली की जाती है, जिसकी मौजूदगी अब अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड में नागा बहुल क्षेत्रों तक ही सिमित है।   

यहां तक कि मणिपुर जो उग्रवाद से अछूता पूर्वोत्तर का अकेला क्षेत्र है। वहां भी नागा और कुकी जनजातियों के मध्य हिंसक झड़पें होती रहती हैं और अब भी जारी हैं। यहां की मेइती समुदाय में पनपी असुरक्षा की भावना ग्रेटर नागालैंड की मांग की वजह से और अधिक बढ़ रही है।    

व्यापक स्तर पर, उत्तर-पूर्व उग्रवाद और अलगाववाद के साथ बढ़ते असंतोष  से गुजर रहा है। खासकर अधिक से अधिक उत्तर-पूर्वी लोग बड़े शहरों की ओर  अपना रुख कर रहे हैं और रोजगार के लिए  सेवा उधोग का  हिस्सा बन रहे हैं। यह जंगलों से निकलकर नई दुनिया देख रहे हैं और अपने हक के बारें में सोचकर खुद को अलग-थलग महसूस कर रहे हैं।  फिर भी भारत की मौजूदा सत्ता ने इतना बड़ा आर्थिक और सामजिक नरेटिव नहीं बनाया कि  इस अलगाव को शांत कर पाए। 

लेकिन इन सबके साथ कट्टर हिन्दुत्व की स्थिति भयानक रूप ले रही है। हमारी बहुत सारी सामजिक परेशानियों के साथ अगर बरोजगारी की जंगल में भटकते करोड़ों नौजवानों को बाहर नहीं निकाला गया तो स्थिति और भी भयानक हो सकती है। 

समझौता एक्सप्रेस, अजमेर शरीफ दरगाह और 2008 में मालेगाँव बम धमाके इसी हिन्दुत्व वादी आतंकवाद की तरफ इशारा करते हैं।इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) ने तक इसे बहुसंख्यक आतंकवाद  माना है।  यह अलग बात है कि भाजपा भगवा आतंकवाद को नकारते रहती है। अगर कथित हिन्दुत्ववादी समूहों पर लगाम नही कसी गई तो हम एक ऐसे जाल में फंस जायेंगे, जिससे निकलना मुश्किल होगा। 

 सुरक्षा विशेषज्ञ बेरोजगारी से उपजी स्थितियों को बहुत अधिक गंभीरता से देख रहे हैं। बेरोजगारी से छुटकारा पाने के लिए आरक्षण की मांग का लगतार उठना और इनका हिंसा में तब्दील होते रहना इसी की उदाहरण हैं। हाल के सालों में, पटेलों, मराठों, जाटों और गुर्जर समुदायों ने अपनी मांगों के लिए  हिंसक रास्ता अख्तियार किया। इन्होंने  छह घंटे के भीतर  एक ट्रेन, तीन पुलिस स्टेशनों और80 गाड़ियों को जला दिया था।  यह सारी हकीकतें राष्ट्रीय सुरक्षा पर आने वाले दिनों में  गंभीर सेंध लगा सकती हैं।  

 

इस तरह से भाजपा जिस राष्ट्रीय सुरक्षा को अपने संकल्प पत्र में नंबर एक पर रखती है।  उसके कारणों में घरेलू स्थितियों के सामजिक ताने बाने  से लेकर लोगों के बीच पनपी अशांति शामिल है।  इस पर भाजपा के पांच साल का नतीजा शून्य अंक से  भी नीचे जाकर निगेटिव में अटकता है।  इसे अगर निगेटिव से बाहर निकालकर शून्य स्तर से शुरुआत नहीं की गयी तो समझिये भारत की हर परेशानी राष्ट्रीय सुरक्षा को तबाह करेगी। 

ELECTION LOKSABHA 2019
National Security
NORTH EAST INSURGENCY
KASHMIR ISSUE
punjab ISSUE

Related Stories

ग़ैरक़ानूनी गतिविधियां (रोकथाम) क़ानून और न्याय की एक लंबी लड़ाई

भारत को अब क्वाड छोड़ देना चाहिए! 

पंजाब विधानसभा चुनाव: प्रचार का नया हथियार बना सोशल मीडिया, अख़बार हुए पीछे

एक तरफ़ PM ने किया गांधी का आह्वान, दूसरी तरफ़ वन अधिनियम को कमजोर करने का प्रस्ताव

आतंकवाद को सालों तक भुनाया जा सकता है : हिलाल अहमद

“मज़हब और सियासत से हल नहीं होगा कश्मीर का मसला”

रिलायंस जियो में विदेशी निवेश: एक सुरक्षा चिंता ?

वीरेनियत-4 : निदा-शुभा ने साझा किया कश्मीर का दु:ख, हुक्मरां से पूछा- तुम बीच में कौन हो?

तिरछी नज़र : ऐसे भोले भाले हैं हमारे मोदी जी...

वर्धा विश्वविद्यालय : देशव्यापी विरोध के बाद छात्रों का निष्कासन रद्द, छात्रों ने कहा- हम चुप नहीं रहेंगे


बाकी खबरें

  • तिरछी नज़र: सो सॉरी, सेल नहीं, रेंट
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    तिरछी नज़र: सो सॉरी, सेल नहीं, रेंट
    29 Aug 2021
    अब देश की संपत्तियां सेल पर हैं, बेची जा रही हैं, सॉरी! मतलब, किराये पर दी जा रही हैं। सरकार जी खुद ही दे रहे हैं। और हम भी उम्मीद से हैं कि कभी ना कभी हमारा भी मौका आएगा और हम भी कुछ खरीद पाएंगे।
  • गुजरात: धर्म-परिवर्तन क़ानून को लेकर हाईकोर्ट और सरकार के बीच क्या विवाद है?
    सोनिया यादव
    गुजरात: धर्म-परिवर्तन क़ानून को लेकर हाईकोर्ट और सरकार के बीच क्या विवाद है?
    29 Aug 2021
    धर्म-परिवर्तन के नए क़ानून पर हाईकोर्ट की सख़्ती से गुजरात सरकार सकते में है। कानून के कई प्रावधानों पर हाईकोर्ट की रोक के ख़िलाफ़ राज्य की विजय रुपाणी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट जाने की घोषणा की है।
  • 200 हल्ला हो: अत्याचार के ख़िलाफ़ दलित महिलाओं का हल्ला बोल
    रचना अग्रवाल
    200 हल्ला हो: अत्याचार के ख़िलाफ़ दलित महिलाओं का हल्ला बोल
    29 Aug 2021
    "जाति के बारे में क्यों ना बोलूं सर जब हर पल हमें हमारी औक़ात याद दिलाई जाती है..."
  • रोटी के लिए जद्दोजहद करते खाना पहुंचाने वाले हाथ
    समृद्धि साकुनिया
    रोटी के लिए जद्दोजहद करते खाना पहुंचाने वाले हाथ
    29 Aug 2021
    नई श्रम सुधार संहिता के दायरे में गिग वर्कर्स को लाए जाने और उन्हें सामाजिक सुरक्षा के लाभ प्रदान करने के बावजूद फुड डिलीवरी कर्मचारियों का शोषण बदस्तूर है, खासकर महामारी के बाद से। समृद्धि साकुनिया…
  • अफ़गानिस्तान: ‘ग्रेट गेम’  खेलने की सनक में अमेरिका ने एक देश को तबाह कर दिया
    जॉन पिलगर
    अफ़गानिस्तान: ‘ग्रेट गेम’  खेलने की सनक में अमेरिका ने एक देश को तबाह कर दिया
    29 Aug 2021
    कुछ दशक पहले अफ़गानिस्तान की अवाम ने अपनी आज़ादी ली थी, लेकिन अमेरिका, ब्रिटेन और उनके सहयोगी देशों की महत्वाकांक्षाओं ने उसे तबाह कर दिया
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License