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मोदी सरकार ने कॉर्पोरेट को दिया 1.45 लाख करोड़ का "तोहफ़ा"
कॉर्पोरेट घरानों को ये इनाम ऐसे समय में दिया गया है जब आम लोग मंदी की चपेट में आ रहे हैं और बेरोज़गारी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है साथ ही आमदनी भी स्थिर है।
सुबोध वर्मा
21 Sep 2019
corporate tax cut's by modi govt

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का एक के बाद एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस करना कॉर्पोरेट के लिए ख़ज़ाना तलाशने जैसा बनता जा रहा है। सीतारमण ने शुक्रवार को कॉर्पोरेट टैक्स घटाने का ऐलान किया है। वर्तमान में ये टैक्स लगभग 30% है जो सेस/सरचार्ज सहित घटकर 25.17% हो जाएगा। वास्तव में अगर कोई दूसरी छूट नहीं मिलती है तो प्रभावी कर की दर 22% तक कम हो जाएगी। इस भारी छूट के अलावा वित्त मंत्री ने नई कंपनियों, शेयर बायबैक, पूंजीगत लाभ आदि के करों के उपायों में ढील की भी घोषणा की।

कुल मिलाकर ये छूट 1 करोड़ 45 लाख रुपये तक हो जाती है जिसे सीतारमण ने अर्थव्यवस्था के लिए "प्रोत्साहन" के तौर पर बताया है लेकिन वास्तव में इसका मतलब है करों का भारी नुक़सान।

इस नई घोषणा के साथ मोदी सरकार ने कॉर्पोरेटों को मुफ़्त उपहार देने का एक अविश्वसनीय रिकॉर्ड बनाया है। सरकार ने महज़ 120 दिनों में पिछले वर्ष की तुलना में 33% अधिक छूट देने की घोषणा की है। वर्ष 2014 के बाद से नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के साढ़े पांच साल के कार्यकाल में मुफ़्त कॉर्पोरेट उपहारों के रूप में 5.76 लाख करोड़ रुपये की घोषणा की गई है।

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सीतारमण ने पहले ही उपहारों की एक श्रृंखला की घोषणा कर दी है, जिसमें निर्यात को बढ़ावा देने के लिए 50,000 करोड़ रुपये की योजना, अधूरे घरों को पूरा करने में रियल एस्टेट डेवलपर्स की मदद करने के लिए 10,000 करोड़ रुपये की योजना, स्टार्ट-अप के लिए एंजेल टैक्स की कटौती, विदेशी पोर्टफ़ोलियो निवेशकों पर सुपर-सेस में कटौती, बैंकों का विलय, विदेशी पूंजी को कोयला खनन में 100% तक निवेश करने का निमंत्रण, निवेश के लिए और अधिक धन प्रदान करने के लिए बैंक क्रेडिट नियमों में ढील आदि शामिल हैं।

इन क़दमों के पीछे मनगढ़ंत तर्क यह है कि कॉर्पोरेट भारत को इस कठिन समय में मदद की आवश्यकता है। ऐसा तर्क दिया जाता है कि कर रियायतों के रूप में इस तरह की मदद से उनकी गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा जिससे उन्हें विस्तार का एक बेहतर अवसर मिलेगा और इस तरह रोज़गार में मदद मिलेगी।

इस दृष्टिकोण के साथ एक मूलभूत समस्या है। मांग में गिरावट के चलते आ रही मंदी की सच्चाईयों को यह दृष्टिकोण नज़रअंदाज़ करता है। इस मांग की कमी में वृद्धि होने की वजह लोगों के पास ख़रीदने की शक्ति का नहीं होना है। 8% से अधिक कामकाजी उम्र की आबादी बेरोज़गार है, औद्योगिक मज़दूरी, न्यूनतम मज़दूरी के लिए स्वीकृत मानदंड से आधे से भी कम है, कृषि मज़दूरी मुद्रास्फ़ीति समायोजित शर्तों में घट रही है (वे दो वर्षों में लगभग 4% तक बढ़े हैं!)। ऐसी स्थिति में अधिक उत्पादन करना बेकार होगा क्योंकि ख़रीदार नहीं हैं।

इसका सबसे अंतिम उदाहरण यह है कि भारत में वर्तमान में खाद्यान्न का रिकॉर्ड स्टॉक (अगस्त में 713 लाख टन) है फिर भी देश में लगभग 20 करोड़ भूखे लोग हैं! ये डरावनी विसंगति मौजूद है क्योंकि खुले बाज़ार में अनाज के लिए कोई ख़रीदार नहीं हैं और सरकार "सामान्य" ख़रीदारी होने के अलावा रियायती क़ीमतों पर अनाज बेचने से इनकार करती है।

ऐसी विकट परिस्थिति में ये प्रोत्साहन आम लोगों को ही देने की ज़रूरत है। उन्हें मज़दूरी में वृद्धि, किसानों की उपज के लिए क़ीमतों को बेहतर करने, एक मज़बूत सार्वजनिक वितरण प्रणाली, शिक्षा और स्वास्थ्य पर सरकार के ख़र्च बढ़ाने के माध्यम से दिया जा सकता है।

हालांकि, मोदी सरकार पूरी चीजों के अपने सिर पर लिए खड़ी है। यह करों को कम (वर्तमान में कॉर्पोरेट कर में कटौती और पहले हुई अन्य कटौती) करके प्रत्यक्ष (जैसे कि कॉर्पोरेट के आधे अधूरे मकानों को पूरा करने के लिए रियल एस्टेट टायकून की मदद करने में 10,000 करोड़ रुपये ख़र्च करके या कॉर्पोरेट्स की एनपीए में छूट देकर) या अप्रत्यक्ष रूप से कॉर्पोरेट्स को अधिक से अधिक धन दे रही है।

लोगों के लिए बहुत इसके हानिकारक परिणाम होंगे। मंदी के कारण कर राजस्व पहले से ही कम हो रहा है। ऐसे में कर दरों में कटौती का मतलब कर राजस्व में और भी अधिक गिरावट होगी। इसका मतलब साफ़ है कि सरकार के पास लोगों के लिए विभिन्न कल्याणकारी कार्यों पर ख़र्च करने के लिए काफ़ी कम पैसा होगा।

संक्षेप में, कॉर्पोरेट्स को जितनी ज़्यादा रियायतें दी जाती हैं उतने ही कम लोगों को सरकार से मिलती है। इसके विपरीत, कॉर्पोरेट्स को जितना अधिक मुफ़्त उपहार दिया जाता है उतना ही अधिक उनका निजी लाभ होगा क्योंकि अधिक से अधिक वस्तु निर्माण करने और बेचने के लिए उनके लिए कोई रास्ता बंद नहीं है। ऊपर दिए गए चार्ट से पता चलता है कि पिछले पांच वर्षों में कॉर्पोरेट्स को भारी रियायतें दी गई थीं फिर भी देश आज मंदी के दौर में धीरे-धीरे समा गया है। उनको चाहिए कि लोगों पर पैसा ख़र्च करें न कि कॉर्पोरेट घरानों पर। ऐसा करने से यह स्वतः पूरी अर्थव्यवस्था को एक प्रोत्साहन देगा। अन्यथा वह ग़लत तरीक़े से सिर्फ़ बड़े अमीरों की जेब भर रहे हैं।

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