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राजनीति
मोदी Vs गडकरी : संघ और भाजपा के भीतर भी चल रही है बदलाव की हवा
संघ और भाजपा में एक धड़ा ऐसा है जो गडकरी को अगला प्रधानमंत्री बनाना चाहता है। अब सवाल यह उठता है कि ये लोग मोदी से नाराज क्यों हैं? जबकि मोदी ने संघ और भाजपा के पसंदीदा मुद्दों को ही उठाया है...।
परन्जॉय गुहा ठाकुरता
23 Jan 2019
फाइल फोटो
Image Courtesy: National Herald

2013 के जनवरी महीने में भारतीय जनता पार्टी के उस वक्त के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी का बतौर अध्यक्ष दूसरा पूर्ण कार्यकाल पूरी तरह से तय लग रहा था। वे 2009 में भाजपा अध्यक्ष बने थे। 2009 के लोकसभा चुनावों में भाजपा की हार के बाद उन्होंने पार्टी की कमान राजनाथ सिंह के बाद संभाली थी। शुरुआत में वे राजनाथ सिंह के बचे हुए कार्यकाल के लिए अध्यक्ष रहे और अपने पहले पूर्ण कार्यकाल के लिए वे जनवरी, 2010 में अध्यक्ष चुने गए।

नितिन गडकरी को बतौर अध्यक्ष लगातार दो पूर्ण कार्यकाल देने के मकसद से भाजपा ने अपने संविधान में संशोधन किया था। 2013 में अध्यक्ष पद पर उनका चुनाव महज औपचारिकता माना जा रहा था। लेकिन इस औपचारिकता की पूर्व संध्या पर आयकर विभाग के अधिकारियों ने नितिन गडकरी की कंपनियों पर छापेमारी कर दी। गडकरी पर यह आरोप लगा कि उनके पूर्ति समूह ने 14 शेल कंपनियां बनाई हैं और इनके जरिए वित्तीय अनियमितताओं को अंजाम दिया। इस मामले में मुंबई में गडकरी की कंपनियों से संबंधित 11 ठिकानों पर छापेमारी की गई। मुंबई में इस छापेमारी से इधर दूर दिल्ली में गडकरी को अध्यक्ष बनाने के सारे समीकरण गड़बड़ हो गए। उस वक्त राजनाथ सिंह दिल्ली से कहीं दूर थे। आनन-फानन में उन्हें दिल्ली बुलाया गया और जिस नितिन गडकरी को पार्टी की कमान उनसे लेकर सौंपी गई थी, उन्हीं नितिन गडकरी से पार्टी की कमान लेकर राजनाथ सिंह को वापस सौंप दी गई।

उस वक्त यह माना गया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चहेते नितिन गडकरी का राजनीतिक भविष्य अधर में लटक गया है। क्योंकि संघ के हस्तक्षेप से ही 2009 में गडकरी भाजपा अध्यक्ष बनाए गए थे। जबकि उस वक्त तक गडकरी के पास महाराष्ट्र के बाहर की राजनीति का कोई अनुभव नहीं था। 2004 के बाद 2009 लोकसभा चुनावों में भी भाजपा की हार के बाद पार्टी का नेतृत्व करने के लिहाज से उनका कद छोटा माना जा रहा था। इसके बावजूद पार्टी अध्यक्ष के तौर पर उन्होंने अपनी पहचान बनाई और संघ के समर्थन से उन्होंने खुद को एक कड़क और साफ-साफ बोलने वाले नेता के तौर पर स्थापित किया।

जब यह स्पष्ट हो गया कि नितिन गडकरी 2014 के लोकसभा चुनावों में पार्टी का नेतृत्व करने की दौड़ से बाहर हो गए हैं तो लोगों को इस बात का स्पष्ट अंदेशा हो गया कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के उभार के बाद गडकरी के लिए भाजपा में ताकतवर बने रहना और मुश्किल हो जाएगा। नरेंद्र मोदी भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनाए गए और पार्टी को लोकसभा चुनावों में जीत हासिल हुई। इसके बाद जब केंद्र में भाजपा की सरकार बनी तो चार ताकतवर मंत्रालयों गृह, वित्त, विदेश और रक्षा में से कोई भी गडकरी को नहीं सौंपा गया।

केंद्र की सत्ता में आने के तकरीबन छह महीने में ही भाजपा महाराष्ट्र में सरकार बनाने की स्थिति में आ गई। पार्टी के कई नेता अपनी पहचान उजागर नहीं करने की शर्त पर बताते हैं कि नितिन गडकरी उस वक्त मुख्यमंत्री के तौर पर महाराष्ट्र वापस जाने के पक्ष में थे। इसके बावजूद नरेंद्र मोदी ने गडकरी से काफी जूनियर माने जाने वाले देवेंद्र फड़णवीस को महाराष्ट्र में भाजपा का पहला मुख्यमंत्री बनने का अवसर दिया। इस घटना को गडकरी के लिए बड़े झटके के तौर पर लिया गया।

लगातार राजनीतिक झटके खाने वाले गडकरी की संघ के प्रति वफादारी कम नहीं हुई। इससे हुआ यह कि गडकरी केंद्र सरकार में अपने मंत्रालयों में स्वतंत्र तौर पर काम करते रहे। केंद्रीय मंत्री के तौर पर उन्होंने प्रतिष्ठा कमाई। इन सबका असर यह हुआ कि अब यह माना जा रहा है कि अगर नरेंद्र मोदी और अमित शाह की अगुवाई में भाजपा अगले लोकसभा चुनावों में 200 सीटों के आसपास सिमट जाती है तो गडकरी अगले प्रधानमंत्री बन सकते हैं।

ऐसी राजनीतिक स्थिति बनने पर प्रधानमंत्री पद पर दावेदारी को लेकर नाम तो केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह का भी चल रहा है लेकिन संघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों के करीबी लोग यह दावा कर रहे हैं कि सत्ताधारी पार्टी के पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शीर्ष नेता गडकरी के पक्ष में हैं। अब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर नितिन गडकरी ही क्यों?

कई चीजें हैं जो नितिन गडकरी के पक्ष में जाती हैं। पहली बात यह कि वे सर संघचालक मोहन भागवत समेत संघ के शीर्ष नेतृत्व के सबसे विश्वस्त बताए जाते हैं। संघ का मुख्यालय भी नागपुर में है और गडकरी भी यहीं के हैं। इस वजह से अब तक के अपने राजनीतिक सफर में गडकरी संघ के बड़े पदाधिकारियों से नजदीकी बनाए रखने में सफल रहे हैं।

उनके पक्ष में दूसरी बात यह जाती है कि नरेंद्र मोदी के मुकाबले उन्हें भाजपा का उदार चेहरा माना जाता है। उनकी यह छवि सिर्फ भाजपा और संघ में नहीं बल्कि पार्टी के बाहर भी है। अगर अगले संसदीय चुनावों के बाद भाजपा को बहुमत नहीं मिलता है तो गडकरी की यह छवि भाजपा को छोटी क्षेत्रीय पार्टियों को अपनी ओर आकर्षित करके केंद्र में सरकार बनाने में मददगार साबित होगी।

गडकरी के पक्ष में तीसरी बात उनकी कार्यशैली है। नरेंद्र मोदी और गडकरी की कार्यशैली में काफी फर्क है। मोदी का नेतृत्व व्यक्तिकेंद्रित माना जाता है। उनके बारे में यह माना जाता है कि वे सरकार के मुखिया तो हैं ही लेकिन पार्टी पर वे अमित शाह के जरिए पूरा नियंत्रण रखते हैं। यह भी कहा जाता है कि वे दूसरे पार्टी नेताओं से खास राय-सलाह नहीं करते। भाजपा के वरिष्ठ नेता और अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री रहे संघप्रिय गौतम ने इस मसले को हाल ही में अपने एक खुले पत्र में उठाया था। उन्होंने यह भी कहा कि गडकरी को तत्काल उपप्रधानमंत्री बना देना चाहिए और अमित शाह को भी पार्टी अध्यक्ष के पद से हटा देना चाहिए। इसके पहले भी कई नेता मोदी की कार्यशैली पर सवाल उठा चुके हैं। बिहार के बेगूसराय से भाजपा सांसद रहे भोला सिंह का निधन कुछ महीने पहले हुआ। उन्होंने भी मोदी और शाह की कार्यशैली पर सवाल उठाए थे।

मोदी और शाह के मुकाबले गडकरी के मामले में यह माना जाता है कि वे सामूहिक नेतृत्व में विश्वास करने वाले नेता हैं। इसे 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में टिकट बंटवारे के उदाहरण के जरिए समझा जा सकता है। उस चुनाव में पार्टी के सर्वेक्षण के हिसाब से वे टिकट नहीं बांट पाए थे। उन्होंने टिकट वितरण में उत्तर प्रदेश के प्रमुख भाजपा नेताओं की इच्छाओं का पूरा ध्यान रखा था। हालांकि, वह चुनाव भाजपा बुरी तरह से हारी लेकिन इसके बावजूद पार्टी नेताओं में गडकरी की छवि ‘व्यावहारिक नेता’ की बनी और यह माना गया कि दूसरे नेताओं की जरूरत के साथ चलने में वे सक्षम हैं। यह रवैया भले ही पार्टी के लिए सांगठनिक तौर पर फायदेमंद नहीं हो लेकिन पार्टी नेताओं के निजी हितों के लिए यह नेतृत्व शैली अनुकूल मानी जाती है।

गडकरी के पक्ष में एक बात यह भी है कि कॉरपोरेट जगत में उनके बेहद मजबूत संबंध हैं। जब वे पार्टी अध्यक्ष थे तो उस वक्त चुनाव लड़ने को लेकर पार्टी को जरूरी संसाधनों की कोई समस्या नहीं थी। इसका मतलब यह हुआ कि अगर कोई ऐसी स्थिति बनती है कि मोदी की जगह गडकरी को आगे बढ़ाना हो तो पार्टी को संसाधनों की कोई दिक्कत नहीं आएगी। यह बात भी गडकरी के पक्ष में जा रही है।

मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भाजपा की हार के बाद नितिन गडकरी ने सधे अंदाज में पार्टी की स्थिति को लेकर अपनी बात कहनी शुरू की है। उन्होंने पार्टी नेतृत्व के बारे में सवाल उठाए और कहा कि पार्टी की नाकामी की जिम्मेदारी नेतृत्व को लेनी चाहिए। मोदी और शाह अक्सर जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी की आलोचना करते रहते हैं। लेकिन गडकरी ने इन दोनों की तारीफ की।  गडकरी के कुछ बयानों से विवाद भी पैदा हुए लेकिन इन बयानों पर गडकरी यह कहकर बच निकले कि मीडिया ने उनका बयान ‘तोड़-मरोड़कर’ पेश किया। मीडिया में कुछ खबरें ऐसी भी आई हैं जिनमें यह कहा गया है कि मोदी और शाह ने अपने संदेशवाहक के जरिए गडकरी को विवादास्पद बयान देने से बचने को कहा है। गडकरी इतने राजनीतिक परिपक्व हैं कि उन्हें मालूम है कि अभी की स्थिति में सीधे-सीधे मोर्चा खोलना ठीक नहीं है लेकिन सधे अंदाज में सवाल उठाना इसलिए जरूरी है क्योंकि पार्टी नेताओं और पार्टी कार्यकर्ताओं के मन में उनके पक्ष में गोलबंद होने और मोदी-शाह की जोड़ी से दूरी बनाने का आत्मविश्वास आए।

संघ और भाजपा में एक धड़ा ऐसा है जो गडकरी को अगला प्रधानमंत्री बनाना चाहता है। अब सवाल यह उठता है कि ये लोग मोदी से नाराज क्यों हैं? मोदी ने संघ और भाजपा के पसंदीदा मुद्दों को उठाया है। चाहे वह आक्रामक हिंदुत्व का मसला हो या फिर राम मंदिर और गो रक्षा का। इसके बावजूद संघ और भाजपा का एक धड़ा मोदी से नाखुश है।

संघ बार-बार यह कह रहा है कि अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनाने के काम को वह और टालने के पक्ष में नहीं है। मोहन भागवत ने अपने विजयादशमी संबोधन में यह कहा कि सरकार को राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाते हुए कानूनी रास्ता अपनाते हुए राम मंदिर निर्माण शुरू करना चाहिए। संघ के करीब माने जाने वाले सुब्रमण्यम स्वामी जैसे नेता बगैर किसी देरी के राम मंदिर निर्माण शुरू करने की वकालत कर रहे हैं। लेकिन 1 जनवरी, 2019 को एएनआई को दिए साक्षात्कार में नरेंद्र मोदी ने यह स्पष्ट कर दिया कि मामला सर्वोच्च न्यायालय के विचाराधीन है, इसलिए सरकार राम मंदिर पर कोई कानून नहीं ला सकती।

राम मंदिर के मसले पर मोदी के इस रुख से भाजपा और संघ के कई लोग खुश नहीं हैं। इन्हें लगता है कि मंदिर के मसले पर आम जनता सवाल पूछ रही है और मोदी सरकार के विकास कार्य इतने प्रभावी नहीं हैं कि वे भाजपा को फिर से सत्ता में वापस ला सकें। ऐसे में उन्हें लगता है कि अगर राम मंदिर का निर्माण शुरू होता है तो इससे चुनावों में भाजपा को फायदा होगा। खास तौर से उत्तर प्रदेश में। उत्तर प्रदेश में 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा अपनी सहयोगी अपना दल के साथ मिलकर 80 में से 73 सीटें जीतने में कामयाब हुई थी। लेकिन धुर विरोधी समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच गठबंधन होने के बाद संघ और भाजपा के कई नेताओं को यह लगता है कि राम मंदिर का निर्माण शुरू होने से सपा-बसपा गठबंधन से होने वाले नुकसान को काम किया जा सकता है।

मोदी को लेकर संघ की चिंता की वजह उनकी तानाशाही कार्यशैली है। 9 मार्च, 2018 को नागपुर में संघ की सर्वोच्च नीति निर्धारक संस्था अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की तीन दिन की बैठक शुरू हुई। इस बैठक में संघ के नए सरकार्यवाह का चुनाव होना था। यह कहा जाता है कि मोदी और शाह ने सरकार्यवाह के पद पर भैयाजी जोशी की जगह अपने चहेते दत्तात्रेय होसबोले को इस पद पर लाने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन प्रतिनिधि सभा ने जोशी को दूसरा कार्यकाल देने के पक्ष में निर्णय लिया। लेकिन जोशी को हटाकर होसबोले को लाने की मोदी और शाह की कोशिश को संघ में कई लोगों ने गंभीरता से लिया। इसे संघ के आंतरिक कामकाज में दखल माना गया। इससे संघ के अंदर मोदी को लेकर नकारात्मकता का माहौल बना।

इससे संघ नेतृत्व और भाजपा नेतृत्व में विश्वास की कमी पैदा हुई। राम मंदिर के मसले ने इस संकट को और गहराया है। संघ से भाजपा में आकर राष्ट्रीय पदाधिकारी के तौर पर काम कर रहे एक नेता अपनी पहचान नहीं उजागर करने की शर्त पर बताते हैं कि तानाशाही कार्यशैली वाले मजबूत मोदी की संघ और अन्य सहयोगी संगठनों में अपने वफादारों को अहम पदों पर बैठाने की कोशिश को संघ और भाजपा के एक बड़े धड़े में बहुत नकारात्मक तौर पर लिया जा रहा है। उनका कहना है कि इस रवैये से नाखुश नेता भले ही अभी मोदी के खिलाफ नहीं बोल रहे हों लेकिन वे बोलने के लिए राजनीतिक तौर पर सही समय के इंतजार में हैं। इनका यह भी मानना है कि ‘मजबूत मोदी’ के बजाय ‘कमजोर मोदी’ पार्टी के अधिक अनुकूल है क्योंकि कई राज्यों में विधानसभा चुनाव जीतने के बावजूद मोदी की नेतृत्व शैली से पार्टी की जमीनी कार्यकर्ता भी नाखुश हैं क्योंकि पार्टी का मौजूदा ढांचा ऐसा बन गया है जिसमें उनकी बात सुनी नहीं जा रही है।

भाजपा और संघ के कुछ नेताओं से बातचीत करने के बाद यह लगता है कि उन्हें अगले लोकसभा चुनावों के बाद कुछ क्षेत्रीय दलों के सहयोग से नितिन गडकरी को प्रधानमंत्री बनाने में ज्यादा खुशी होगी। गडकरी के बारे में यह भी माना जाता है कि उनकी उदार छवि की वजह से उन दलों को अपने पाले में लाया जा सकता है जो इस तरह की राजनीति में यकीन करते हैं। गडकरी के बारे में यह भी कहा जाता है कि विभिन्न पार्टियों में उनके संबंध हैं और अगर उनके प्रधानमंत्री बनने की स्थिति पैदा होती है तो उनके इन संबंधों का फायदा मिलेगा। उनके पक्ष में एक बात यह भी जाती है कि महाराष्ट्र के किसी नेता को प्रधानमंत्री बनाने के नाम पर शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी भी उनके पक्ष में आ सकती है। पिछले कुछ दिनों में महाराष्ट्र के व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनाने की मांग तेजी से उठी है। इसमें हैरान करने वाली बात यह है कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस ने भी इस सोच का समर्थन किया है।

अगर किसी वजह से गडकरी प्रधानमंत्री नहीं बन पाते हैं तो संघ और भाजपा का एक बड़ा धड़ा यह चाहेगा कि मोदी कमजोर हों और अगली सरकार में और पार्टी संगठन में नितिन गडकरी की बेहद महत्वपूर्ण भूमिका रहे। ताकि पार्टी में सामूहिक नेतृत्व की स्थिति रहे और महत्वपूर्ण मुद्दों पर सभी प्रमुख नेता अपनी बात कह सकें।

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