NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
मोदीजी, 200 रुपया पकौड़ा की आमदनी रख लो, मुझे नौकरी दे दो
एक पकौड़े वाली की जुबानी मोदी का ‘पकौड़ा‘ रोजगार... साहू बताते हैं कि काफी कोशिश के बाद भी नौकरी नहीं मिली, क्योंकि जीएसटी के बाद काम कम हो गया है।
सुनील कुमार
12 Feb 2018
Pakoda Stall

आज कल पकौड़े बेचने की चर्चा काफी हो रही है। छात्र विरोध स्वरूप पकौड़े का स्टाल लगा रहे हैं। इस तरह की चर्चा की शुरूआत भारत के प्रधानमंत्री के उस बयान से हुआ जिसमें उन्होंने कहा कि कोई पकौड़ा बेच कर 200 रूपये कमा लेता है, वह भी रोजगार है।

आखिर मोदी को इस तरह का बयान क्यों देना पड़ा ?

हम सभी जानते हैं कि भारत के ‘प्रधान सेवक उर्फ फकीर उर्फ मजदूर उर्फ चौकीदार’, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब भारत के प्रधानमंत्री बनने के लिए चुनाव मैदान में थे तो अपने चुनावी सभाओं में घोषणा किए थे कि अगर उनकी सरकार बनाती हैं तो वे हर साल 2 करोड़ लोगों को रोजगार देंगे। लेकिन मोदी काल में रोजगार प्रदान करने की दर मनमोहन सरकार के दोनों कार्यकाल से भी कम रही है।

2013 में मनमोहन सरकार 19 लाख रोजगार उत्पन्न कर पाई थी वहीं 2015 में मोदी सरकार मात्र 1.35 लाख रोजगार ही उत्पन्न कर सकी है। रोजगार उत्पन्न नहीं होने के कारण देश में बेरोजगार युवाओं की कतार लम्बी होती जा रही है। ऐसे प्रश्नों से बचने के लिए मोदी ने पकौड़े बेचने व चाय बेचने को भी रोजगार की श्रेणी में रख दिया है।

मोदी जी कहने लगे कि ‘स्टार्ट अप’ करो ताकि लोगों को रोजगार मिले। इसी तरह की मनमोहनी बात सुना-सुना कर मोदी जी लोगों को असली मुद्दों से भटकाते रहे हैं।
भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने राज्य सभा में अपने पहले भाषण के दौरान कांग्रेस पर बरसते हुए (भाजपा के लोग बात नहीं रखते दूसरे पर बरसते हैं) पकौड़े बेचने के बयान पर कहा-

‘‘कोई बेरोजगार पकौड़ा बना रहा है तो उसकी दूसरी पीढ़ी आगे आएगी। एक चाय वाला प्रधानमंत्री बन कर इस सदन में बैठा है।’’

हम लोगों को पता करना चाहिए कि 2014 के बाद कितने चाय वाले के अच्छे दिन आ गए हैं। हमने मोदी जी के बयान के बाद एक पकौड़े बेचेने वाले से बात की, जो दिल्ली-हरियाणा बॉर्डर पर उद्योग विहार में 15 जनवरी, 2018 से पकोडे बेच रहा है। अगर मोदी जी जनता से बहुत सरलता से मिलते तो हम यह सोच सकते थे कि उनके 19 जनवरी, 2018 के साक्षात्कार में पकौड़े वाले रोजगार का आइडिया शायद इसी व्यक्ति से मिला हो।

म. प्र. के पन्ना जिले के रहने वाले सिद्धशरण साहू कई साल पहले गांव छोड़कर दिल्ली, हरियाणा, महाराष्ट्र में कभी परिवार के साथ तो कभी अकेले, परिवार के पेट पालने के लिए निकले। सिद्धशरण साहू का कच्चा मकान था वह भी दो साल पहले बारिश में गिर चुका है। उनकी पत्नी भी उनके साथ कभी कंस्ट्रक्शन में साथ-साथ मजदूरी करती है तो कभी एक्सपोर्ट लाईन में हेल्पर का काम करती है। इसी तरह के रोजगार की तलाश में साहू के दो बच्चों की पढ़ाई भी नहीं हो पाई।

आखिर 2013 में सिद्धशरण साहू ने सभी अनुभवों के बाद तय किया कि वह उद्योग विहार में ही काम करेंगे। उन्होंने हरियाणा के डुंडाहेड़ा गांव को अपना बसेरा़ बनाया। काम के अनुभव के बल पर सिद्धशरण साहू एक्सपोर्ट में चेकर बन गए और कई कम्पनियों में काम करने लगे। वहीं उनकी पत्नी इमरती बाई एक्सपोर्ट में धागा कटिंग का काम करने लगी। घर और कम्पनी में काम के दबाव के कारण इमरती बाई ने काम छोड़ दिया। दबाव के कारण इमरती बाई के स्वभाव में चिड़चिड़ापन आने लगा था। साहू चेकर का काम करते रहे लेकिन एक साल पहले नोटबंदी के समय उनका भी काम छूट गया। वे उद्योग विहार फेस 1 में सिक्युरिटी गार्ड का काम करने लगे, जिसके लिए उन्हें 9,334 रूपये ईएसआई और पीएफ काट कर मिलता था। साहू की पहले तो आठ घंटे की ड्यूटी थी, बाद में उसे बदल कर 12 घंटे का कर दिया गया और तनख्वाह वही रही। इसी बीच उनकी सिक्यूरिटी एजेंसी का नाम भी चेंज हो गया। उनका पीएफ कटने के बावजूद कभी भी उनकी सिक्यूरिटी एजेंसी ने उनको पीएफ एकाउंट नहीं दिया और ना ही काम छोड़ने के बाद उनका पीएफ फार्म भरा जा रहा है। साहू फिर से कम्पनी में लग गए, लेकिन उनकी नौकरी छूट गई।

साहू बताते हैं कि काफी कोशिश के बाद भी नौकरी नहीं मिली, क्योंकि जीएसटी के बाद काम कम हो गया है।

सिद्धशरण साहू काम नहीं मिलने के बाद ठेले (रेहड़ी) पर चाय, समौसे, पकौड़े बेचने लगे। दुकान लगाने के लिए दस-बारह हजार रू. खर्च कर रेहड़ी, बर्तन, गैस का छोटा सिलेण्डर, चूल्हा और दुकानदारी के लिए समान खरीदा। सिद्धशरण सुबह 5 बजे जाग कर दुकानदारी के लिए सारे सामान तैयार करते थे। सुबह अपने ठेहा (दुकान लगाने की जगह) पर 9 बजे पहुंच जाते थे और वहां शाम 7 बजे तक रहते थे। 7 बजे घर आने के बाद दूसरे दिन की दुकानदारी के लिए बाजार जाते थे और बाजार से लौटने के बाद लहसून, धनिया की चटनी तैयार करते थे। इस तरह से रोज रात के 9-10 बज जाया करता था। इन कामों में उनकी पत्नी और बच्चे भी हाथ बंटाते थे। 16-17 घंटे परिश्रम कर 15 दिन दुकान लगाए, जिसमें 2,000 रूपये घाटा उठाना पड़ा।

इसके बाद वे उद्योग विहार फेस 1 में 24 कम्पनी के पास रोड के किनारे रेहड़ी लगाने लगे। रोड के किनारे रेहड़ी लगाने के लिए भी सिद्धशरण को 24, फेस 1, एल्युबिल्ड इंजिनियर के मालिक, डब्ल्यूएफएम के सिक्युरिटी सुपरवाईजर, मुकेश शर्मा के द्वारा 2,500 रूपये एडवांस में लिया गया। इसके अलावा लोकल दादा, पुलिस और गुड़गांव अॅथोरिटी को पैसे देने पड़ते हैं (सिद्धशरण के पास अभी तो यह लोग नहीं आए हैं क्योंकि दुकान नई है, लेकिन दूसरे दुकानदार इन लोगों को पैसा देते हैं)। यहां की दुकानदारी से 300-400 रूपये की रोजना बचत होने लगी। इस बचत के लिए सिद्धशरण साहू को सुबह 5 से रात के 10 बजे तक काम करना पड़ता है और पत्नी का पहले से अधिक समय लगने लगा।

सिद्धशरण साहू से 20 दिन बाद सिक्युरिटी सुपरवाईजर ने कहा - ‘‘मालिक 4000 रूपये प्रति माह मांग रहा है, इतना पैसा दोगे तो दुकान लगाओ नहीं तो अपनी रेहड़ी हटा लो।’’

सि़द्धशरण साहू बताते हैं कि 15 फरवरी तक के लिए एडवांस पैसे दे रखे हैं तबतक दुकान लगाएंगे, उसके बाद वह अपनी दुकान बंद कर देंगे। वे सोचते हैं कि अब जब शहर में नौकरी नहीं है, रेहड़ी लगा कर पकौड़े, समौसे नहीं बेच सकते तो गांव जाकर मजदूरी करेंगे। एल्युबिल्ड इंजिनियर (फेस 1, 24 उद्योग बिहार) कम्पनी आज के ‘देश प्रेम’ में अभिभूत होकर कम्पनी के ऊपर तिरंगा फहरा रहा है।

मोदी जी ने बहुत आसानी से यह बता दिया कि पकौड़ा बेचने वाला 200 रूपये कमा लेता है, लेकिन उनको यह पता नहीं कि इस 200 रूपये में से भी कितना बंदर बांट होता है।

सिद्धशरण साहू ने नौकरी नहीं मिलने पर अपना स्टार्ट अप किया, जो अब उन्हें गांव की तरफ लौटने पर मजबूर कर रहा है। गांव से उजड़ कर शहर आने वाले सिद्धशरण को क्या वापस गांव जाने पर काम मिल पाएगा? क्या केवल तिरंगा फहराने से ही देश भक्ति आ जाती है? एल्युब्लिड इंजिनियरि जैसे कितने भूठे देश प्रेम में अभिभूत होकर सरकारी जमीन का भी किराया वसूल रहे होंगे।

Courtesy: Hastakshep,
Original published date:
12 Feb 2018
Pakoda Stall
Narendra modi
Jobs
GST

Related Stories

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

भाजपा के लिए सिर्फ़ वोट बैंक है मुसलमान?... संसद भेजने से करती है परहेज़

हिमाचल में हाती समूह को आदिवासी समूह घोषित करने की तैयारी, क्या हैं इसके नुक़सान? 


बाकी खबरें

  • न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 975 नए मामले, 4 मरीज़ों की मौत  
    16 Apr 2022
    देश की राजधानी दिल्ली में कोरोना के बढ़ते मामलो ने चिंता बढ़ा दी है | दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा है कि सरकार कोरोना पर अपनी नजर बनाए रखे हुए हैं, घबराने की जरूरत नहीं। 
  • सतीश भारतीय
    मध्यप्रदेश: सागर से रोज हजारों मरीज इलाज के लिए दूसरे शहर जाने को है मजबूर! 
    16 Apr 2022
    सागर के बुन्देलखण्ड मेडिकल कॉलेज में सुपर स्पेशियलिटी की सुविधा नहीं है। जिससे जिले की आवाम बीमारियों के इलाज के लिए नागपुर, भोपाल और जबलपुर जैसे शहरों को जाने के लिए बेबस है। 
  • शारिब अहमद खान
    क्या यमन में युद्ध खत्म होने वाला है?
    16 Apr 2022
    यमन में अप्रैल माह में दो अहम राजनीतिक उथल-पुथल देखने को मिला, पहला युद्धविराम की घोषणा और दूसरा राष्ट्रपति आबेद रब्बू मंसूर हादी का सत्ता से हटना। यह राजनीतिक बदलाव क्या यमन के लिए शांति लेकर आएगा ?
  • ओमैर अहमद
    मंडल राजनीति को मृत घोषित करने से पहले, सीएए विरोध प्रदर्शनों के दौरान अंबेडकर की तस्वीरों को याद करें 
    15 Apr 2022
    ‘मंदिर’ की राजनीति ‘जाति’ की राजनीति का ही एक दूसरा स्वरूप है, इसलिए उत्तर प्रदेश के चुनाव ने मंडल की राजनीति को समाप्त नहीं कर दिया है, बल्कि ईमानदारी से इसके पुनर्मूल्यांकन की ज़रूरत को एक बार फिर…
  • सोनिया यादव
    बीएचयू: लाइब्रेरी के लिए छात्राओं का संघर्ष तेज़, ‘कर्फ्यू टाइमिंग’ हटाने की मांग
    15 Apr 2022
    बीएचयू में एक बार फिर छात्राओं ने अपने हक़ के लिए की आवाज़ बुलंद की है। लाइब्रेरी इस्तेमाल के लिए छात्राएं हस्ताक्षर अभियान के साथ ही प्रदर्शन कर प्रशासन पर लड़कियों को शिक्षा से वंचित रखने का आरोप…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License