NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
मराठवाड़ा में 1972 के बाद सबसे बड़ा सूखा, किसान और मवेशी दोनों संकट में
#महाराष्ट्र_सूखा : मौजूदा सूखा इतना भीषण है कि किसानों ने न केवल अपनी फसल खो दी है, बल्कि वे मवेशियों को भी खो रहे हैं – यानी आय का वैकल्पिक स्रोत भी डूब रहा है।
अमय तिरोदकर
05 Mar 2019
Translated by महेश कुमार
maharashtra drought
उस्मानाबाद के पखरुद गांव में चारे के बिना मवेशी।

महाराष्ट्र सन् 1972 के बाद से सबसे गंभीर सूखे का सामना कर रहा है। राज्य सरकार 350 में से 180 तहसीलों में सूखे की घोषणा कर रही है। संपूर्ण मराठवाड़ा (दक्षिणी और पूर्वी महाराष्ट्र में फैला हुआ) क्षेत्र अब गंभीर स्थिति में है।

Maharashtra Drought2.jpg

(दत्ता असालकर ने अपनी छह गायों को महज 25,000 रुपये प्रति गाय के हिसाब से बेच दिया।)

उस्मानाबाद : उस्मानाबाद जिले की भूम तहसील के लीत गांव के दत्ता असालकर (57) ने नवंबर 2018 में दो गाय खरीदी थीं। उस वक्त प्रत्येक गाय की कीमत 70,000 रुपये थी। हालाँकि, आज़ चारे की कमी के कारण, उनके पास उन्हें बेचने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। और सिर्फ दो ही नहीं। बल्कि उन्होंने अपनी सभी छह गायों को बेच दिया।

“मुझे छह गायों को केवल 1,35,000 रुपये में बेचना पड़ा। दत्ता ने कहा कि प्रति गाय लगभग 25,000 रुपये मिले और जिसका अर्थ है 40,000-50,000 रुपये का नुकसान।” उन्होंने पांच लाख रुपये खर्च करके एक गौशाला भी बनवाई थी, लेकिन यह भी खाली है।

यह सूखाग्रस्त मराठवाड़ा से आने वाली ऐसी कई कहानियों में से एक है। उस्मानाबाद जिले की भूम तहसील वैसे तो एक बरसाती क्षेत्र है, और साथ ही, यह एक तहसील है जिसने सबसे ज्यादा दूध का संग्रह किया है।

इस संकट को समझने के लिए दुग्ध संग्रह और वर्षा क्षेत्र के विरोधाभास को समझने की जरूरत है।

Maharashtra Drought3.jpg

जब किसानों को अपनी फसलों के लिए पानी की कमी सहित कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है, तो वे 'साइड बिजनेस' की ओर मुड़ जाते हैं। डेयरी उत्पादन उनके लिए सबसे अच्छी आय के स्रोतों में से एक है। राज्य सरकार के पास उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार अकेले भूम तहसील में 89,000 मवेशी हैं। लेकिन मौजूदा सूखा इतना भीषण है कि किसानों ने न केवल अपनी फसल खो दी है, बल्कि वे मवेशियों को भी खो रहे हैं – यानी आय का वैकल्पिक स्रोत भी डूब रहा है।

“मैंने अपनी दो गायों को बेच दिया। प्रत्येक को 70,000 रुपये में बेचा जा सकता था। लेकिन मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। मुझे उन्हें इस बार सिर्फ 30,000 रुपये प्रति गाय बेचना पड़ा”, लीत के शंभुराज देशमुख ने कहा।

गंभीर स्थिति के बावजूद, महाराष्ट्र सरकार सूखाग्रस्त क्षेत्रों में चारा शिविर खोलने में विफल रही है। स्थानीय पत्रकार समधन डोक ने कहा, “अकेले भूम तहसील में 187 चारा शिविरों की मांग थी। हालांकि, अभी तक एक भी नहीं खुला है।”

भूम मराठवाड़ा के सबसे बड़े दूध पैदा करने वाली तह्सील में से एक है जिसका उत्पादन प्रतिदिन 3,50,000 लीटर से अधिक दूध के संग्रह से होता है। लीत गांव के सामाजिक कार्यकर्ता प्रतापभैया देशमुख ने कहा “किसान इस व्यवसाय को केवल उपलब्ध आय स्रोत के रूप में देख रहे थे। लेकिन अब वे असहाय हो रहे हैं।”

चारा शिविर किसानों को सूखे से लड़ने के लिए आवश्यक समर्थन प्रदान करते हैं। सूखे के कारण, किसानों को खुले बाजार में घास के बंडलों पर निर्भर होने के लिए मजबूर किया जा रहा है। फरवरी के अंतिम सप्ताह में, घास का एक बंडल 40 रुपये की कीमत पर बेचा जा रहा था। एक गाय को हर दिन कम से कम छह बंडल घास की आवश्यकता होती है। तो, प्रत्येक गाय के लिए सिर्फ घास की लागत प्रति दिन 240 रुपये तक बढ़ जाती है। फिर गायों के लिए आवश्यक अन्य भोजन की लागत भी आती है, जो प्रति दिन 50 रुपये तक हो सकती है। प्रत्येक गाय के रखरखाव पर लागत प्रति दिन 10 रुपये है। तो, कुल लागत प्रति दिन 300 रुपये तक बढ़ जाती है।

दूसरी ओर, किसानों का कहना है कि औसतन प्रति गाय दूध का उत्पादन 15 लीटर है। अभी तक, गाय के दूध की बाजार दर 20 रुपये प्रति लीटर है। इसलिए, किसानों की कुल दैनिक आय केवल 300 रुपये है। ''बताओ हमरे पास  बचता क्या है? मात्र 300 रुपैया कमाते है, 300 रुपये ही लागत है, फिर हम क्या कहे?” (हम इससे कुछ भी कैसे बचा सकते हैं? हम 300 रुपये कमाते हैं और 300 रुपये खर्च करते हैं। हम जीवित रहने के लिए आखिर क्या करें?), भूम तहसील के पाखरौद गाँव के एक किसान शिवाजी बरहाते ये सब पूछते हैं।

किसानों का मानना है कि अगर राज्य सरकार ने जिले में चारा शिविर खोले, तो पानी के लिए चारे के साथ-साथ श्रम की लागत भी कम हो जाएगी, जो अंततः किसानों के लिए राहत होगी।

न्यूज़क्लिक ने पखरुड़ गांव के 52 वर्षीय किसान अप्पासाहेब चव्हाण से मुलाकात की। उन्होंने अपनी दो जर्सी गायों और एक भैंस को खिलाने के लिए अपनी ज्वार की फसल काट ली। "मैं और क्या कर सकता हूं? उस ज्वार से बाज़ार में कोई पैसा नहीं कमाया, और मेरे पास अब मैदान में घास भी नहीं बची है। मेरे पास बाजार से घास के बंडलों को खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं। इसलिए, मैंने ज्वार को काट दिया, और मैं इसे अपनी गायों को खिला रहा हूं, " अप्पासाहेब ने कहा।

न्यूज़क्लिक ने चारा शिविरों के खुलने में देरी का कारण खोजने की कोशिश की। वरिष्ठ स्थानीय पत्रकार महावीर जालान ने कहा, "हाल ही में, जिला पशु चिकित्सा अधिकारी ने सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी है, जिसमें कहा गया है कि जिले में हरी घास है, और यह 15 मार्च तक ही पर्याप्त होगी। इसीलिए चारा शिविरों के प्रस्ताव पर कोई कार्रवाई नहीं की गई है।"  हालांकि, रिपोर्ट में दावे के विरुद्ध जमीनी हकीकत बिल्कुल उलट है।

असालकर ने न्यूज़क्लिक को बताया: “पहले, राज्य सरकार नवंबर के अंत तक चारा शिविरों की शुरुआत करती थी। यह पशुओं की कम कीमतों पर पशुओं की बिक्री को रोक देती थी। अब यह बदल गया है। ”

दिलचस्प बात यह है कि असालकर सत्ताधारी पार्टी शिवसेना के कट्टर समर्थक हैं। उन्होंने 2017 में शिवसेना के टिकट पर जिला परिषद का चुनाव भी लड़ा था। हालांकि, वे अपनी खाली गौशाला में बैठे हैं - सरकार की उदासीनता का खामियाजा भुगत रहे हैं- उनके पास शिवसेना-भाजपा राज्य सरकार की विफलता को स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

Maharashtra drought
agrarian crisis
farmer crises
Fodder Camp
Dairy
milk production
Shiv sena
BJP
Devendra Fednavis
marathwada

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

गुजरात: भाजपा के हुए हार्दिक पटेल… पाटीदार किसके होंगे?


बाकी खबरें

  • itihas ke panne
    न्यूज़क्लिक टीम
    मलियाना नरसंहार के 35 साल, क्या मिल पाया पीड़ितों को इंसाफ?
    22 May 2022
    न्यूज़क्लिक की इस ख़ास पेशकश में वरिष्ठ पत्रकार नीलांजन मुखोपाध्याय ने पत्रकार और मेरठ दंगो को करीब से देख चुके कुर्बान अली से बात की | 35 साल पहले उत्तर प्रदेश में मेरठ के पास हुए बर्बर मलियाना-…
  • Modi
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे: मोदी और शी जिनपिंग के “निज़ी” रिश्तों से लेकर विदेशी कंपनियों के भारत छोड़ने तक
    22 May 2022
    हर बार की तरह इस हफ़्ते भी, इस सप्ताह की ज़रूरी ख़बरों को लेकर आए हैं लेखक अनिल जैन..
  • न्यूज़क्लिक डेस्क
    इतवार की कविता : 'कल शब मौसम की पहली बारिश थी...'
    22 May 2022
    बदलते मौसम को उर्दू शायरी में कई तरीक़ों से ढाला गया है, ये मौसम कभी दोस्त है तो कभी दुश्मन। बदलते मौसम के बीच पढ़िये परवीन शाकिर की एक नज़्म और इदरीस बाबर की एक ग़ज़ल।
  • diwakar
    अनिल अंशुमन
    बिहार : जन संघर्षों से जुड़े कलाकार राकेश दिवाकर की आकस्मिक मौत से सांस्कृतिक धारा को बड़ा झटका
    22 May 2022
    बिहार के चर्चित क्रन्तिकारी किसान आन्दोलन की धरती कही जानेवाली भोजपुर की धरती से जुड़े आरा के युवा जन संस्कृतिकर्मी व आला दर्जे के प्रयोगधर्मी चित्रकार राकेश कुमार दिवाकर को एक जीवंत मिसाल माना जा…
  • उपेंद्र स्वामी
    ऑस्ट्रेलिया: नौ साल बाद लिबरल पार्टी सत्ता से बेदख़ल, लेबर नेता अल्बानीज होंगे नए प्रधानमंत्री
    22 May 2022
    ऑस्ट्रेलिया में नतीजों के गहरे निहितार्थ हैं। यह भी कि क्या अब पर्यावरण व जलवायु परिवर्तन बन गए हैं चुनावी मुद्दे!
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License