NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
मुद्रा लोन से 7 करोड़ स्वरोज़गार पैदा हुआ, अमित शाह को ये डेटा कहां से मिला मोदी जी ?
देश में नौकरियों को लेकर डेटा नहीं है। फिर उन्हें अमित शाह से पूछना चाहिए कि जनाब आपको यह डेटा कहां से मिला था कि मुद्रा लोन के कारण 7 करोड़ 28 लाख लोग स्वरोज़गार से जुड़े हैं। 12 जुलाई 2017 को अमित शाह का यह बयान कई जगह छपा है।
रवीश कुमार
04 Jul 2018
मोदी शाह
Image Courtesy:youtube.com

यह न तंज है और न व्यंग्य है। न ही स्लोगन बाज़ी के लिए बनाया गया सियासी व्यंजन है। रोज़गार के डेटा को लेकर काम करने वाले बहुत पहले से एक ठोस सिस्टम की मांग करते रहे हैं जहां रोज़गार से संबंधित डेटा का संग्रह होता रहा हो। लेकिन ऐसा नहीं है कि रोज़गार का कोई डेटा ही नहीं है। चार साल बीत जाने के बाद प्रधानमंत्री को ध्यान आया है कि देश में नौकरियों को लेकर डेटा नहीं है। फिर उन्हें अमित शाह से पूछना चाहिए कि जनाब आपको यह डेटा कहां से मिला था कि मुद्रा लोन के कारण 7 करोड़ 28 लाख लोग स्वरोज़गार से जुड़े हैं। 12 जुलाई 2017 को अमित शाह का यह बयान कई जगह छपा है।

अब अगर बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह ने मन में कोई खिचड़ी पकाई हो तो बेहतर है उन्हें प्रधानमंत्री से माफी मांग लेनी चाहिए । साथ ही किसी को उन्हें याद दिलाना चाहिए कि सर बहुत सारा अपन के पास डेटा है, बस जो भी डेटा आप देते हैं न उसे लेकर सवाल उठ जाते हैं। इसके अला्वा कोई समस्या नहीं है क्योंकि सवाल उठने के बाद भी हम चुनाव तो जीत ही जाते हैं। प्रधानमंत्री चाहें तो मुद्रा लोन का डेटा ले सकते हैं कि कितना प्रतिशत मुद्रा लोन एनपीए हो चुका है और होने के कगार पर है।

भारत में बेरोज़गारी भयंकर स्तर पर है। नोटबंदी और जीएसटी के बाद हालत ख़राब होती चली गई है। रोज़गार देने वाले दो प्रमुख शहर सूरत और त्रिशूर की हालत आप जाकर देख लें। डेटा की ज़रूरत नहीं होगी। प्रधानमंत्री को डेटा होने या नौकरियां होने का ख्याल तब क्यों नहीं आया जब ज़ी न्यूज़ को पकौड़ा बेचने को भी रोज़गार बता रहे थे और उनके मुख्यमंत्री पान दुकान खोलने को रोज़गार गिनाने में लगे थे।

स्वराज पत्रिका को दिए इंटरव्यू में प्रधानमंत्री दोनों बात करते हैं। पहले कहते हैं कि नौकरियां हैं मगर नौकरियों को लेकर डेटा नहीं है। फिर कहते हैं कि 
EPFO के डेटा को लेकर अध्ययन हुआ है जिसके अनुसार पिछले साल संगठित क्षेत्र में 70 लाख नौकरियां सृजित की गई हैं। यह 70 लाख असंगठित क्षेत्र में सृजित नौकरियों के अलावा है जहां 80 फीसदी लोग काम करते हैं। प्रधानमंत्री को याद नहीं होता है।

वैसे EPFO के डेटा को लेकर भी कई सवाल उठाए गए हैं। श्रम मंत्रालय का डेटा संग्रह बंद कर दिया गया क्योंकि उसमें वो तस्वीर नहीं दिख रही थी जो दिखाना चाह रहे थे और साथ ही रोज़गार सृजन को लेकर सरकारी डेटा कम दिखे वो और भी ठीक नहीं लग रहा होगा। मीडिया और धारणा प्रबंधन के चक्कर में सरकार भूल गई कि अगर ज़मीन पर रोज़गार होता तो नौजवान उनका डेटा नहीं देख रहे होते, अपनी नौकरी में व्यस्त हो गए होते।

प्रधानमंत्री ने रोज़गार को लेकर यह बात ठीक कही कि अलग अलग राज्य रोज़गार देने का अपना दावा करते हैं। क्या यह मुमकिन है कि राज्यों में रोज़गार पैदा हो और देश में न हो। अब तो ज़्यादातर राज्यों में उनकी ही पार्टी की सरकार है और मुख्यमंत्री भी उन्हीं की पसंद के हैं। अगर वे वाकई गंभीर हैं तो रोज़गार को लेकर कम से कम सरकारी आंकड़ा विश्वसनीय तरीके से दिया जा सकता है और वो भी एक हफ्ते के भीतर।

प्रधानमंत्री अपने श्रम मंत्री को कहें कि सभी मंत्रालयों, विभागों, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों और चयन आयोगों से कहें कि 2014 से जून 2018 तक उन नौकरियों की संख्या निकालें जिनका विज्ञापन निकला। फिर उनमें से यह संख्या बताएं कि कितनी नौकरियों की परीक्षा हो गई, कितनों के नतीजे निकले और कितने लोगों को नियुक्ति पत्र दे दिया गया। कम से कम केंद्र सरकार इतना तो बता दे कि उसने नौकरियां कम की है या ज़्यादा की है। सेना की भर्ती कम हो गई है या बढ़ गई है। रेलवे की भर्ती बढ़ गई है या कम हो गई है। जो कंपनियां केंद्र सरकार के साथ मिलकर प्रोजेक्ट में काम कर रही हैं वो सूची हफ्ते भर में सौंप दें कि किस प्रकृति की नौकरियां लोगों को मिली हैं।

इन सबको जोड़ने में कुछ वक्त लग सकता है कि मगर 15 दिन के भीतर मोदी सरकार अपना डेटा दे सकती है कि उसके आने के बाद केंद्र सरकार में कितने लोग भर्ती हुए। कितने लोग भर्ती के नाम पर चार साल परीक्षा ही देते रहे। रेलवे की स्थाई समिति बताती है कि दो लाख तीस हज़ार नौकरियां ख़ाली हैं। मगर विज्ञापन निकला है करीब एक लाख का। इनका इम्तहान कब होगा, रिज़ल्ट कब आएगा और नियुक्ति पत्र कब मिलेगा किसी को पता नहीं।

प्रधानमंत्री कम से कम उत्तर प्रदेश के एक लाख अठहत्तर हजार शिक्षा मित्रों की समस्या का समाधान कर रोज़गार का अपना डेटा मज़बूत कर सकते हैं। पौने दो लाख शिक्षा मित्रों की सैलरी 40,000 से 10,000 कर दी गई, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहीं ऐसा नहीं कहा है। सरकार चाहे तो आराम से अलग काडर बनाकर इन पौने दो लाख शिक्षा मित्रों को तत्काल नौकरी दे सकती है। इनकी समस्या का समाधान यूपी बीजेपी के संकल्प पत्र में भी है। तीन महीने में समाधान की बात थी, एक साल बीत गए।

शिक्षा मित्रों को लेकर 2015 में प्रधानमंत्री मोदी ने लंबा भाषण दिया था कि वे प्रयास करेंगे। सांसद रहते हुए योगी आदित्यनाथ ने भाषण और आश्वासन दिया था। घोषणा पत्र में भी है। इसके बाद भी कुछ नहीं हुआ। प्राइवेट का छोड़िए, आप अपनी सरकार का डेटा दीजिए। अगर मोदी सरकार और योगी सरकार 1,78000 लोगों की नौकरी और सैलरी के सवाल पर सुस्त और पस्त है तो फिर वो रोज़गार को लेकर गंभीर है ही नहीं।

इसी तरह की समस्या मध्य प्रदेश के शिक्षा मित्रों की है। वहां अलग नाम से बुलाया जाता है। मगर वहां दो लाख से अधिक शिक्षको को रेगुलर करने के लिए कैबनिट ने फैसला कर लिया है। एक ही पार्टी की सरकार हर जगह है। एक जगह फैसला कुछ है और एक जगह फैसला कुछ है। कायदे से मोदी और योदी सरकार को मिलकर इस पर दस दिनों के भीतर फैसला कर लेना चाहिए और सभी 1 लाख 78000 शिक्षा मित्रों की नौकरी पक्की हो जानी चाहिए। या फिर वे दिखाएं कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहां लिखा है कि इनकी सैलरी 40,000 से घटा कर 10,000 कर दीजिए। योगी जी ने ऐसा क्यों किया?

योगी जी ने 12460 शिक्षकों को नियुक्ति पत्र देने का वादा किया था। ये लोग भी कोर्ट से केस जीत चुके हैं। दो दो बार इसके बाद भी नियुक्ति पत्र नहीं मिला है। करीब 5000 शिक्षकों को नियुक्ति पत्र मिला है, मगर करीब 8000 फिर लटक गए। कोर्ट के नाम पर इनलोगों को मजबूरन धरने पर बैठना पड़ा है। ये 8000 रोज़गार के डेटा का इंतज़ार नहीं कर रहे हैं, सरकार की नीयत साफ होने का इंतजार कर रहे हैं। अगर मोदी जी और योदी जी इन नौजवानों को नौकरी दे देते कह सकते थे कि अकेले यूपी में दो लाख से अधिक लोगों को भर्ती किया है।

इसलिए प्रधानमंत्री का यह कहना कि नौकरी को लेकर डेटा नहीं है, सही नहीं है। वे चाहेंगे तो डेटा मिल जाएगा। वे नहीं चाहेंगे क्योंकि उसमें उनकी सरकार का रिकार्ड अच्छा नहीं दिखेगा। इसलिए वे अभी से ही डेटा न होने की बात कहकर नौकरियों को लेकर होने वाली हर बहस को संदिग्ध बना देना चाहते हैं।

नौकरी की सवाल चुभ रहा है। उन्हें पता है कि हालत ख़राब है। नौकरियां नहीं हैं। सरकारों ने नौकरियां बंद कर दी हैं। ठेके पर रख कर ठगा जाता है। खुद पेंशन लेते हैं और सरकारी कर्मचारियों को पेंशन नहीं देते हैं। ठेके वालों को तो कुछ नहीं मिलता है। चार सालों में रोज़गार के फ्रंट पर सरकार का रिकार्ड खराब रहा है। वो अपना डेटा चेक कर सकती है और उसके पास उसके डेटा है।

 

 

 

ये रवीश कुमार के फेसबुक वाल से ली गई है 

 

Modi Govt
मुद्रा लोन
BJP
Amit Shah

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 


बाकी खबरें

  • srilanka
    न्यूज़क्लिक टीम
    श्रीलंका: निर्णायक मोड़ पर पहुंचा बर्बादी और तानाशाही से निजात पाने का संघर्ष
    10 May 2022
    पड़ताल दुनिया भर की में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने श्रीलंका में तानाशाह राजपक्षे सरकार के ख़िलाफ़ चल रहे आंदोलन पर बात की श्रीलंका के मानवाधिकार कार्यकर्ता डॉ. शिवाप्रगासम और न्यूज़क्लिक के प्रधान…
  • सत्यम् तिवारी
    रुड़की : दंगा पीड़ित मुस्लिम परिवार ने घर के बाहर लिखा 'यह मकान बिकाऊ है', पुलिस-प्रशासन ने मिटाया
    10 May 2022
    गाँव के बाहरी हिस्से में रहने वाले इसी मुस्लिम परिवार के घर हनुमान जयंती पर भड़की हिंसा में आगज़नी हुई थी। परिवार का कहना है कि हिन्दू पक्ष के लोग घर से सामने से निकलते हुए 'जय श्री राम' के नारे लगाते…
  • असद रिज़वी
    लखनऊ विश्वविद्यालय में एबीवीपी का हंगामा: प्रोफ़ेसर और दलित चिंतक रविकांत चंदन का घेराव, धमकी
    10 May 2022
    एक निजी वेब पोर्टल पर काशी विश्वनाथ मंदिर को लेकर की गई एक टिप्पणी के विरोध में एबीवीपी ने मंगलवार को प्रोफ़ेसर रविकांत के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया। उन्हें विश्वविद्यालय परिसर में घेर लिया और…
  • अजय कुमार
    मज़बूत नेता के राज में डॉलर के मुक़ाबले रुपया अब तक के इतिहास में सबसे कमज़ोर
    10 May 2022
    साल 2013 में डॉलर के मुक़ाबले रूपये गिरकर 68 रूपये प्रति डॉलर हो गया था। भाजपा की तरफ से बयान आया कि डॉलर के मुक़ाबले रुपया तभी मज़बूत होगा जब देश में मज़बूत नेता आएगा।
  • अनीस ज़रगर
    श्रीनगर के बाहरी इलाक़ों में शराब की दुकान खुलने का व्यापक विरोध
    10 May 2022
    राजनीतिक पार्टियों ने इस क़दम को “पर्यटन की आड़ में" और "नुकसान पहुँचाने वाला" क़दम बताया है। इसे बंद करने की मांग की जा रही है क्योंकि दुकान ऐसे इलाक़े में जहाँ पर्यटन की कोई जगह नहीं है बल्कि एक स्कूल…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License