NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
विज्ञान
अंतरराष्ट्रीय
बड़े शहरों के विकसित होने के साथ पैदा हुआ था खसरे का वायरस
पुराने शोधों में पता चला था कि इस वायरस का इतिहास 11वीं और 12वीं शताब्दी ईसापूर्व में शुरू हुआ था। पर अब एक नई तस्वीर उभरी है।
संदीपन तालुकदार
10 Jan 2020
virus

खसरा दुनिया की सबसे ज़्यादा फैलने वाली बीमारी है। अकेले 2017 में खसरा ने 1,42,000 लोगों की जान ले ली। हर साल दुनिया की एक बड़ी आबादी खसरा के वायरस हमले से प्रभावित होती है। लेकिन एक अहम बात है कि खसरा का वायरस रोगी में जीवन भर के लिए प्रतिरोधक क्षमता का निर्माण कर देता है।

इसका मतलब है कि खसरा के वायरस को जिंदा रहने के लिए एक बड़ी इंसानी आबादी को संक्रमित करना पड़ता है। एक वक्त में खसरा करीब 2,50,000 लोगों को संक्रमण का शिकार बनाकर ही खुद को विलुप्त होने से बचा सकता है। यहीं पैथोलॉजिस्ट, संक्रमणकारी बीमारियों का अध्ययन करने वाले इतिहासकार और एपिडेमिओलॉजिस्ट की दिलचस्पी बढ़ जाती है। वे सवाल उठाते हैं कि कब खसरा का वायरस एक मानवीय रोगाणु बनकर उभरा?

एक हालिया रिसर्च पेपर में खसरा वायरस की रोगजन्यता के इतिहास और इसके विकास पर प्रकाश डाला गया है। यह पेपर 'प्री प्रिंट सर्वर bioRxiv' में प्रकाशित हुआ है। इसके मुताबिक़ चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में यह वायरस इंसानी आबादी में पहुंचा। पहले के शोध में इस अवधि को 11वीं और 12वीं शताब्दी ईसापूर्व बताया जाता था।

शोधार्थियों ने रिसर्च में बर्लिन म्यूज़ियम ऑफ मेडिकल हिस्ट्री में 1912 से रखे फेंफड़ों से आरएनए निकाला और उसका विश्लेषण किया। 3 जून, 1912 को दो साल की बच्ची को निमोनिया हुआ। उसके बाद चैरिट यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल में बच्ची की खसरे से ग्रसित होकर मौत हो गई। डॉक्टर ने उसके फेफड़ों को फॉर्मेलिन में संरक्षित कर लिया। एक शताब्दी बाद रॉबर्ट कोच इंस्टीट्यूट के बॉयोलॉजिस्ट कालविग्लनैक स्पेंस और उनकी टीम ने फेंफड़ों से सैंपल लिया औऱ इससे आरएनए निकाला।  

यूनिवर्सिटी ऑफ एरिज़ोना के बॉयोलॉजिस्ट माइक वोरोबी के मुताबिक़, 'तकनीकी तौर पर यह शानदार काम है। पुराने और गीले स्पेशीमेन से खसरे का वायरस निकालना अद्भुत है। इससे आगे शानदार काम का आधार बना है।'

इससे पहले खसरे के वायरस की उम्र का अंदाजा जापान के शोधार्थियों ने लगाया था। उन्होंने 2010 में बताया था कि यह वायरस 11वीं और 12वीं शताब्दी ईसापूर्व में पैदा हुआ। खसरे का वायरस, रिंडरपेस्ट वायरस से निकला है, यह रिंडरपेस्ट वायरस जानवरों- गायों, भैसों, बकरियों आदि में पाया जाता है।

रिंडरपेस्ट सीधे इंसानों को प्रभावित नहीं करता। इसलिए अगर किसी वायरस के पुराने वायरस से अलग होने का पता लगा लिया जाए, तो उम्र का पता लगाया जा सकता है। जापानी शोधार्थियों का विश्लेषण उस वक्त तक मौजूद खसरे के जीनोम और रिंडरपेस्ट वायरस पर निर्भर था। उन्होंने एक फायलोजेनेटिक ट्री बनाया। यह कुछ स्पेशीज़ के इतिहास के निर्माण और उनके अपने पुरखे वायरस से अलग होने के वक्त का विश्लेषण करता है।

खसरे के वायरस का मानव रोगजन्य बनने के इतिहास में सबसे बड़ी बाधा इसके जीनोम की बेहद कम उपलब्धता थी। 1990 से पहले के केवल तीन जीनोम ही मौजूद थे। जिनमें सबसे पुराना 1954 का था। इसे ही पहले खसरे के टीके के तौर पर विकसित किया गया था। अब जो स्पेंसर ने अलग किया है, वो सबसे पुराना बन चुका है।

स्पेंसर की टीम ने एक नया फायलोजेनेटिक ट्री बनाया। इसमें 1912 और 1960 से लेकर अभी तक के सभी जीनोम को शामिल किया गया। इससे पता चला कि खसरे का वायरस पहली बार इंसानी आबादी में 345 ईसा पूर्व में घुसा होगा। यह वह वक्त था, जब इंसानी आबादी अपनी क्रिटिकल साइज में पहुंच चुकी थी, अनुमान है कि खसरे को विलुप्त होने से बचने के लिए इतनी ही आबादी की जरूरत थी।

फॉर्मेलिन में डूबे फेंफडों के टिशू से आरएनए निकालना आसान काम नहीं था। फॉर्मेलिन से अलग-अलग प्रोटीन और दूसरे बड़े बॉयोमोलेक्यूल, जैसे आरएनए की क्रास लिकिंग हो जाती है। इसके ज़रिए यह कोशिकाओं को जोड़ता है और संबंधित अंग को लंबे समय तक सुरक्षित रखता है। टीम को इसे 15 मिनट के लिए 98 डिग्री पर रखना पड़ा था। इस गर्मी से क्रास लिकिंग टूट जाती है। लकिन इससे आरएनए कण भी टूटते हैं। टीम ने इन टूटे कणों को इकट्ठा कर क्रम बनाया।

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

Measles Virus
Rinderpest Virus
Measles Virus Branching from Rinderpest
How Measles Virus Became Human Pathogen

Related Stories


बाकी खबरें

  • omicron
    भाषा
    दिल्ली में कोविड-19 की तीसरी लहर आ गई है : स्वास्थ्य मंत्री
    05 Jan 2022
    ‘‘ दिल्ली में 10 हजार के करीब नए मामले आ सकते हैं और संक्रमण दर 10 प्रतिशत पर पहुंच सकती है.... शहर में तीसरी लहर शुरू हो चुकी है।’’
  • mob lynching
    अनिल अंशुमन
    झारखंड: बेसराजारा कांड के बहाने मीडिया ने साधा आदिवासी समुदाय के ‘खुंटकट्टी व्यवस्था’ पर निशाना
    05 Jan 2022
    निस्संदेह यह घटना हर लिहाज से अमानवीय और निंदनीय है, जिसके दोषियों को सज़ा दी जानी चाहिए। लेकिन इस प्रकरण में आदिवासियों के अपने परम्परागत ‘स्वशासन व्यवस्था’ को खलनायक बनाकर घसीटा जाना कहीं से भी…
  • TMC
    राज कुमार
    गोवा चुनावः क्या तृणमूल के लिये धर्मनिरपेक्षता मात्र एक दिखावा है?
    05 Jan 2022
    ममता बनर्जी धार्मिक उन्माद के खिलाफ भाजपा और नरेंद्र मोदी को घेरती रही हैं। लेकिन गोवा में महाराष्ट्रवादी गोमंतक पार्टी के साथ गठबंधन करती हैं। जिससे उनकी धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत पर सवाल खड़े हो…
  • सोनिया यादव
    यूपी: चुनावी समर में प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री का महिला सुरक्षा का दावा कितना सही?
    05 Jan 2022
    सीएम योगी के साथ-साथ पीएम नरेंद्र मोदी भी आए दिन अपनी रैलियों में महिला सुरक्षा के कसीदे पढ़ते नज़र आ रहे हैं। हालांकि ज़मीनी हक़ीक़त की बात करें तो आज भी महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध के मामले में उत्तर…
  • मुंबईः दो साल से वेतन न मिलने से परेशान सफाईकर्मी ने ज़हर खाकर दी जान
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    मुंबईः दो साल से वेतन न मिलने से परेशान सफाईकर्मी ने ज़हर खाकर दी जान
    05 Jan 2022
    “बीएमसी के अधिकारियों ने उन्हें परेशान किया, उनके साथ बुरा व्यवहार किया। वेतन मांगने पर भी वे उस पर चिल्लाते थे।"
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License