NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
डराये-धमकाये जा रहे मीडिया संगठन, लेकिन पलटकर लड़ने की ज़रूरत
अगर मीडिया अपनी ज़मीन पर खड़ा रहे, तो भारत में लोकतंत्र का संकट कम विकट होगा, ख़ासकर जिस समय हुकूमत की तरफ़ से या उसके संरक्षण में पत्रकारों पर हमला किया जा रहा हो।
सुहित के सेन
18 Apr 2022
media

भारत की मौजूदा हुकूमत ने तमाम तरह के आलोचनात्मक स्वरों के ख़िलाफ़ जंग छेड़ी हुई है। मुख्यधारा के मीडिया के अहम तबक़ों को डराने-धमकाने या फिर अधीन कर लिए जाने के बावजूद यह स्थिति टेलीविजन में बड़े पैमाने पर है। सबसे हालिया हमलों में मुखर आलोचक राणा अय्यूब के ख़िलाफ़ किया गया हमला है। राणा अय्यूब खोजी रिपोर्टर और स्तंभकार हैं। उन्हें 29 मार्च को यूनाइटेड किंगडम और इटली की यात्रा करने से रोक दिया गया। उन्हें जाने की अनुमति तबतक नहीं दी गयी, जब तक कि एक अदालत ने उनके ख़िलाफ़ आरोपों को खारिज नहीं कर दिया।

लेकिन,,आकार पटेल इतने ख़ुशनसीब नहीं थे। केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की ओर से जारी लुकआउट सर्कुलर के आधार पर व्याख्यान देने के लिए इस पूर्व पत्रकार और एमनेस्टी इंडिया के प्रमुख को 6 अप्रैल को संयुक्त राज्य की यात्रा करने से रोक दिया गया था। आख़िरकार, दिल्ली की एक अदालत ने उन्हें उस यात्रा की अनुमति दे दी और अधिकारियों से कहा कि वे उनसे माफ़ी मांगे। अपील किये जाने पर पटेल को फिर से यात्रा करने से रोक दिया गया, और 12 अप्रैल को केंद्र ने सीबीआई को विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम से जुड़े एक मामले में मुकदमा चलाने की अनुमति दे दी। पटेल ने कहा है कि उन्हें सर्कुलर के बारे में सूचित नहीं किया गया था और उनकी हालिया किताब, ‘प्राइस ऑफ़ द मोदी इयर्स’ के कारण उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। इस किताब में इस हुक़ूमत की आलोचना की गयी है।

इससे भी कम भाग्यशाली वह पत्रकार था, जिसके ट्विटर हैंडल के ख़िलाफ़ दिल्ली पुलिस ने 6 अप्रैल को बुराड़ी, दिल्ली में एक अनधिकृत बैठक की रिपोर्टिंग करते हुए उनके साथ और छह अन्य पत्रकारों के साथ मारपीट के बाद मामला दर्ज कर लिया था। ग़ाज़ियाबाद में रहने वाले एक उकसाने वाले शख़्स यति नरसिंहानंद सरस्वती सहित कई लोगों ने उस बैठक में मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत भरे भाषण दिये थे। सरस्वती और अन्य के ख़िलाफ़ प्राथमिकी दर्ज कर ली गयी है, लेकिन कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है।

कश्मीर के पत्रकार आसिफ़ सुल्तान का मामला तो शायद और भी दुर्भाग्यपूर्ण है। तीन साल आठ महीने जेल में बिताने के बाद राष्ट्रीय जांच एजेंसी की एक विशेष अदालत ने 5 अप्रैल को उन्हें ज़मानत दे दी । अदालत ने कहा है कि उनके ख़िलाफ़ लगाये गये आतंकवादियों को पनाह देने के आरोप का समर्थन में कोई सबूत नहीं है। हालांकि, अधिकारियों ने उन्हें रिहा नहीं किया। 10 अप्रैल को जम्मू और कश्मीर में लागू सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम, 1978 के कड़े प्रावधानों के तहत आरोपित किये जाने के बाद उन्हें "फिर से गिरफ़्तार" कर लिया गया। इस तरह, उन्हें चार दिनों के लिए ग़ैर-क़ानूनन क़ैद में रखा गया।

जो पत्रकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व वाले शासन के घुटनों पर चलने के लिए कहने के बावजूद रेंग नहीं रहे थे, उनके ही ख़िलाफ़ कार्रवाई की गयी है। ‘ज़मानत मानक हो और जेल अपवाद हो’ जैसी दिल को भीतर तक छू देने वाली बातों के बावजूद, यह सिद्धांत महज़ हुकूमत से माफ़ी मांगने वालों और पक्षपात करने वालों के पक्ष में काम करता प्रतीत होता है। मसलन, एक मलयालम मीडिया संगठन के लिए काम करने वाले पत्रकार सिद्दीक़ी कप्पन ग़ैरक़ानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम, 1967 के तहत डेढ़ साल से ज़्यादा समय से जेल में हैं। उन्हें अक्टूबर, 2020 में उत्तर प्रदेश की 19 साल की महिला के साथ हुए सामूहिक बलात्कार और उनकी हत्या पर रिपोर्ट करने को लेकर हाथरस दौरे के दौरान गिरफ़्तार कर लिया गया था।

व्यावहारिक रूप से सभी सत्तावादी/बहुसंख्यक लोकलुभावन नेता और समूहों का यही कहना होता है कि वे पीड़ित हैं और उनके साथ "जागृत" पूर्वाग्रहों से ग्रस्त वाम/उदार शासन और/या मीडिया समूहों की ओर से भेदभाव बरता जाता है।

इसमें कोई शक नहीं कि यह एक बहुत बड़ा झूठ है। भारत में तो बहुसंख्यक हिंदुत्व का कारोबार करने वाले वे लोग ही हमलावर हैं, जो नाज़ियों की याद दिलाती रणनीति के साथ अल्पसंख्यकों को डराने-धमकाने की कोशिश कर रहे हैं। मीडिया मुख्य रूप से मौजूदा हुक़ूमत और उन आपराधिक तत्वों का समर्थन करता है, जो इसे प्रोत्साहित और सुविधा मुहैया कराते हैं। एंग्लो-अमेरिकन जगत में जब व्यवस्थागत नस्लवाद के अकाट्य आरोपों का सामना करना पड़ता है, तो श्वेत प्रतिष्ठान प्रतिष्ठानों और मीडिया की उस जागृति का जोखिम भरा हौवा खड़ा कर देता है। हालांकि, यही वह प्रतिष्ठान है, जिसे मीडिया के उन बड़े तबक़ों की ओर से समर्थन किया जाता है, जो कि नस्लवादी है। हंगरी, तुर्की, बेलारूस, श्रीलंका, फिलीपींस और ब्राजील जैसे विविध स्थानों में "क्रूर लोगों " के बारे में भी यही सच है, जो अति-राष्ट्रवादी बहुसंख्यकवादी नारे लगाते हैं और जो कहते रहते हैं कि बहुसंख्यक समुदाय ख़तरे में हैं।

जैसा कि ऊपर बताये गये उदाहरणों से पता चलता है कि भारतीय मीडिया में भी अधिकारियों ने इसी तरह के ख़तरे की बातों को आगे बढ़ाने की नीति बनायी है। अय्यूब के मामले में यह उत्पीड़न मनी लॉन्ड्रिंग मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की ओर से जारी लुकआउट सर्कुलर पर आधारित था। अय्यूब को दिल्ली हाई कोर्ट ने यात्रा करने के लिए हरी झंडी दे दी थी। अदालत ने उस सर्कुलर को रद्द कर दिया और कहा था कि ईडी अय्यूब के इस दावे का खंडन करने में विफल रहा कि जब भी उन्हें बुलाया गया, वह एजेंसी के सामने पेश हुईं। अदालत ने कहा कि यह सर्कुलर उनके मानवाधिकारों का उल्लंघन करता है और यह "आधारहीन" है।

पटेल के मामले में दिल्ली के अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट पवन कुमार ने सीबीआई के ख़िलाफ़ कड़ी टिप्पणी की। उन्होंने इस एजेंसी से उस सर्कुलर के लिए पटेल से माफ़ी मांगने को कहा, इसे उनके अधिकारों को प्रतिबंधित करने का एक जानबूझकर किया गया प्रयास बताया। अदालत ने कहा कि बिना पर्याप्त दिमाग़ इस्तेमाल किये ही इसे जारी कर दिया गया।

जहां तक बुराड़ी और कप्पन मामलों की बात है,तो बुराड़ी मामले में गंभीर हमले के शिकार लोगों को क़ानून लागू करने वाले देश की सबसे कुख्यात एजेंसियों में से एक,यानी दिल्ली पुलिस की ओर से पर्याप्त सुरक्षा नहीं दी गयी थी। और कप्पन मामले में अपने क़ानूनी कार्य को लेकर हाथरस जाने वाले इस पत्रकार को 18 महीने से ज़्यादा समय से जेल में बिताने के लिए मजबूर कर दिया गया, जबकि दूसरी तरफ़ हत्या के मामले में आरोपी एक व्यक्ति - केंद्रीय मंत्री का बेटा आशीष मिश्रा - लगभग चार महीने में ही ज़मानत पर बाहर चला आया। सुल्तान की अवैध हिरासत और "फिर से की गयी गिरफ़्तारी" उस संस्थागत गिरावट को दिखाती है, जिसे जनता दुर्भाग्य से स्वीकार करने लगी है।

यह हमें अमेरिकी विदेश मंत्री एंथनी ब्लिंकन की ओर से 12 अप्रैल को '2 + 2' बैठक के बाद हुई उस मीडिया ब्रीफ़िग की याद दिला देता है,जिसमें रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और अमेरिकी रक्षा सचिव लॉयड ऑस्टिन भी शामिल थे। ब्लिंकन ने अपनी उस टिप्पणी में यूक्रेन केंद्रित एजेंडा के अलावा भारत के मानवाधिकार रिकॉर्ड को लेकर भी चिंता जतायी है और नेहरू के "लोकतंत्र के लिए एक साथ खड़े होने और साझे मूल्यों की हिफ़ाज़त के लिए एक स्वर में बात करने के आह्वान” का ज़िक्र किया।

नई दिल्ली ने भारत में सरकार,पुलिस और जेल अधिकारियों की ओर से मानवाधिकारों के उल्लंघनों में बढ़ोत्तरी सहित उस पर निगरानी को लेकर उस अमेरिकी टिप्पणी को नज़रअंदाज़ कर दिया, जिसमें एक हल्के संदर्भ को देते हुए बताया गया है कि यह दुर्व्यवहार और ख़तरा व्यवस्थागत है और शीर्ष राजनीति से प्रेरित है। नई दिल्ली आमतौर पर अपने उन रिकॉर्ड के अहम संदर्भों पर लगाम लगाती है, जो देश के "आंतरिक मामलों" का सावधानी के साथ बचाव करती हो।

हालांकि, जब अमेरिका अपने संस्थागत नस्लवाद का हवाला देकर भी संदेश देता है, तो ऐसे में उसे खारिज कर पाना मुमकिन है। हक़ीक़त यही है कि ख़ासकर डोनाल्ड ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने के बाद से अमेरिकी दक्षिणपंथी मतदान के अधिकारों को प्रतिबंधित करने वाले कई प्रांतीय कानूनों के ज़रिये गर्भपात विरोधी क़ानूनों और अल्पसंख्यक अधिकारों के रूप में महिलाओं के अधिकारों पर हमला करने में बेहद सक्रिय रहा है।

फिर भी, यहां भारत में हमें दो बातों पर ग़ौर करना चाहिए। एक तो अमेरिका में बड़े पैमाने पर संस्थागत कब्ज़ा कर पाना संभव नहीं है। इसका सबूत कई ऐसे न्यायाधीशों ने दे दिया है, जिन्होंने ट्रम्प के हमलों के ख़िलाफ़ अपने संवैधानिक रुख़ बरक़रार रखा है, जबकि इन न्यायाधीशों को ट्रम्प ने ही नियुक्त किया है। हालांकि, यहां ज़्यादा अहम बात अमेरिकी मीडिया के एक बड़े तबक़े का राजनीतिक प्रतिष्ठान का साथ दिये जाने से इनकार करना है। एक तरफ़ ऐसे मीडिया चैनल भी रहे हैं, जिन्होंने शर्मनाक रूप से अमेरिकी दक्षिणपंथियों के अनैतिक झूठ को बढ़ावा दिया, वहीं कई मीडिया संगठनों ने इसके ख़िलाफ़ आवाज़ भी बुलंद की।

अगर मीडिया अपनी ज़मीन पर खड़ा रहे, तो भारत में लोकतंत्र का संकट कम विकट होगा, ख़ासकर जिस समय हूक़ूमत की तरफ़ से या उसके संरक्षण में पत्रकारों पर हमला किया जा रहा हो।

लेखक स्वतंत्र पत्रकार और शोधकर्ता हैं। इनके विचार निजी हैं।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें
Media Organisations Have Been Intimidated but Need to Fight Back

Indian media
journalists arrests
Attacks on Media
Burari arrest
freedom of expression
Narendra modi
Amit Shah
Indian democracy
Siddique Kappan
Aakar Patel
Rana Ayyub

Related Stories

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

भाजपा के लिए सिर्फ़ वोट बैंक है मुसलमान?... संसद भेजने से करती है परहेज़

हिमाचल में हाती समूह को आदिवासी समूह घोषित करने की तैयारी, क्या हैं इसके नुक़सान? 


बाकी खबरें

  • china
    अनीश अंकुर
    चीन को एंग्लो-सैक्सन नज़रिए से नहीं समझा जा सकता
    24 Oct 2021
    आख़िर अमेरिका या पश्चिमी देशों के लिए चीन पहेली क्यों बना हुआ है? चीन उन्हें समझ क्यों नहीं आता? ‘हैज चाइना वॉन' किताब लिखने वाले सिंगापुर के लेखक किशोर महबूबानी के अनुसार "चीन को जब तक एंग्लो-सैक्सन…
  • Rashmi Rocket
    रचना अग्रवाल
    रश्मि रॉकेट : महिला खिलाड़ियों के साथ होने वाले अपमानजनक जेंडर टेस्ट का खुलासा
    24 Oct 2021
    फ़िल्म समीक्षा: किसी धाविका से यह कहना कि वह स्त्री तो है, लेकिन उसके शरीर में टेस्टोस्टेरोन की मात्रा अधिक होने के कारण वह स्त्री वर्ग में नहीं आ सकती अपने आप में उसके लिए असहनीय मानसिक यातना देने…
  • hafte ki baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    शाह का कश्मीर दौरा, सत्ता-निहंग संवाद और कांग्रेस-राजद रिश्ते में तनाव
    23 Oct 2021
    अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी किये जाने के बाद गृहमंत्री अमित शाह पहली बार कश्मीर गये हैं. सुरक्षा परिदृश्य और विकास कार्यो का जायजा लेने के अलावा कश्मीर को लेकर उनका एजेंडा क्या है?…
  • UP Lakhimpur
    अब्दुल अलीम जाफ़री
    ‘अस्थि कलश यात्रा’: लखीमपुर खीरी हिंसा में मारे गए चार किसानों की अस्थियां गंगा समेत दूसरी नदियों में की गईं प्रवाहित 
    23 Oct 2021
    12 अक्तूबर को लखीमपुर खीरी से यह कलश यात्रा शुरू हुई थी, यह देश के कई राज्यों में फिलहाल जारी है। उत्तर प्रदेश में ये यात्रा पश्चिमी यूपी के कई जिलों से निकली, जिनमें मुझफ्फरनगर और मेरठ जिले शामिल थे…
  • Fab and Ceat
    सोनिया यादव
    विज्ञापनों की बदलती दुनिया और सांप्रदायिकता का चश्मा, आख़िर हम कहां जा रहे हैं?
    23 Oct 2021
    विकासवादी, प्रगतिशील सोच वाले इन विज्ञापनों से कंपनियों को कितना फायदा या नुकसान होगा पता नहीं, लेकिन इतना जरूर है कि ये समाज में सालों से चली आ रही दकियानुसी परंपराओं और रीति-रिवाजों के साथ-साथ…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License