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भारत
राजनीति
मोदी सरकार ने दिखाया है कि हमें विभाजन के दर्द को किस तरह याद नहीं करना चाहिए
भारत को विभाजन को याद करने की जरूरत है, लेकिन मोदी सरकार ने इसके लिए ऐसी तारीख़ चुनी, जिसका मक़सद ध्रुवीकरण को बढ़ावा देना और उनकी पार्टी को चुनावी फायदा दिलाना है। ना कि इसके ज़रिए शांति और सौहार्द्र बनाने की कोशिश है।
स्मृति कोप्पिकर
21 Aug 2021
मोदी सरकार ने दिखाया है कि हमें विभाजन के दर्द को किस तरह याद नहीं करना चाहिए

मेरी परदादी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थीं, जिन्होंने 1947 में राजनीतिक नियुक्तियों को ठुकरा दिया। 1930 और 40 के दशक में उनके द्वारा लिखे गए ख़तों को कराची में रहने वाली उनकी बेहद करीबी दोस्त ने संभालकर पुलिंदा बनाकर रखा हुआ था। यह ख़त दो संवेदनशील और प्रबुद्ध महिलाओं के बीच का करीबी संबंध बताता है, ऐसी महिलाएं जो कम उम्र में ही विधवा हो गईं, लेकिन उन्होंने अपने शहर बॉम्बे और कराची की तरह, अपनी ऊर्जा आज़ादी के आंदोलन में लगाई। 1946 के अंत तक दोनों के ख़तों में भयावहता आ जाती है; इनमें से कुछ ख़तों में आज़ादी और विभाजन से जुड़ी घटनाओं का जिक्र किया गया है। 

कुछ ख़तों में दादी की दोस्त नए-नए बने पाकिस्तान में शरणार्थी कैंपों में रह रहे लोगों की कहानियों के ज़रिए विभाजन की त्रासदी को बयां करती हैं, वे ऐसे परिवारों के बारे में बताती हैं, जिन्हें वो दोनों जानती थीं। उन्होंने अपने समुदाय द्वारा अंजाम दिए जा रहे कृत्यों पर खेद जताया और एक मुस्लिम होने के नाते माफ़ी मांगी। मेरी दादी कभी भारत में 15 अगस्त को बिना दर्द और उदासी के नहीं रह पाईं। 1947-48 की उनकी कहानियां हिंदू-मुस्लिम तनाव की पृष्ठभूमि को छूती थीं और उनमें विभाजन से पैदा हुए दर्द का जिक्र था, जहां ज़मीन को बांट दिया गया और लोगों के साथ नृशंता की गई। यह वह वक़्त था जब एक पागलपन ने लोगों को किसी भी विश्वास से परे जाकर बेदर्द बना दिया था। वह कहती हैं कि हमारी आज़ादी पर खून के छींटे हैं, लेकिन हम एक नया राष्ट्र बनाने के लिए इसे पीछे छोड़ चुके हैं।

करीब एक करोड़ बीस लाख लोग विस्थापित हुए, बीस लाख की मौत हुई, हज़ारों महिलाओं का रेप हुआ या उनका जबरदस्ती अपहरण कर लिया गया और पुरुषों ने इनका धर्म परिवर्तन अपने हिसाब से करवा लिया। घर सूने रह गए और खेत बर्बाद हो गए- विभाजन वह कहानी जिसे कभी पूरे तरीके से नहीं खोजा और बताया गया। यह एक ऐसा दाग था, जिसे छुपाने पर जोर दिया गया। एक ऐसा झटका, जिसके बारे में कम ही बात की गई। मेरी परदादी की दोस्त की तरफ से आए ख़तों में बड़ी भूराजनीतिक कहानियों और उनके किरदारों से इतर, हमेशा एक मानवीय पहलू की कहानी होती थी, ऐसी कहानियां जो विभाजन की ज़्यादती और मानवीयता के बारे में बयां करती थीं।

1984 के दंगों में इसी तरह की कहानियों से अंदर तक हिलने के बाद, लेखक-प्रकाशक उर्वशी बुटालिया ने विभाजन के पीड़ितों को खोजा और उनसे बेहद ताकतवर "द अदर साइड ऑफ़ साइलेंस" लिखवाई। बाद में बुटालिया ने बताया कि लोग उस विभीषिका की घटनाओं को याद नहीं करना चाहते थे, क्योंकि "विभाजन में कोई भी अच्छे या बुरे नागरिक नहीं थे, लगभग हर परिवार में हिंसा के पीड़ित और उसमें हिस्सा लेने वाले लोग शामिल थे।"

भीष्म साहनी को भी उस दर्द भरे वक़्त को फिर से जीवंत करने में 25 साल लगे, जब उन्होंने "तमस" लिखा, जिसके लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया। भारत में "पार्टिशन म्यूज़ियम" एक निजी पहल है, सोशल मीडिया पर लिखी जाने वाली यादों के बारे में भी ऐसा ही है, यह सारी चीजें एक राष्ट्र की सामूहिक याद से इतर, लोगों का अपने परिवारे के अतीत के बारे में जानने की जिज्ञासा का परिणाम हैं। इस बेइंतहा दर्द का इस्तेमाल एक सेकुलर और आगे देखने वाले देश के निर्माण के बड़े उद्देश्य में किया गया। 

यह वही छुपा हुआ दर्द है, जिसके ऊपर प्रधानमंत्री ने तब दांव लगाया, जब 14 अगस्त को उन्होंने "विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस" के रूप में मनाने का ऐलान किया। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने प्रधानमंत्री को उनके "संवेदनशील फ़ैसले" के लिए धन्यवाद दिया, उनके मंत्रालय ने उसी दिन इसकी संसूचना जारी कर दी। इस हिला देने वाले मुद्दे पर फ़ैसला लेने वाले इन दोनों लोगों का सांप्रदायिक सौहार्द्रता पर बेहद खराब इतिहास रहा है, दोनों का मत उस वैचारिक संगठन से निर्मित हुआ है, जिसने स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के बजाए अंग्रेजों और बंगाल में मुस्लिम लीग का साथ दिया। इससे ज़्यादा खराब और क्या हो सकता था?

मोदी के शब्दों की मिठास में लिपटी इस घोषणा को चुनावी पृष्ठभूमि में देखना होगा। आपको नवंबर 2016 का नोटबंदी का फ़ैसला याद होगा, जिसके बारे में विश्लेषकों का कहना था कि इसने 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बीजेपी को मदद पहुंचाई थी। अब राज्य में अगला चुनाव होना है। पहले ही धार्मिक ध्रुवीकरण की हांडी चढ़ चुकी हैं, ऐसे में "विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस" से इस विभाजनकारी एजेंडे में मदद मिलेगी।

मोदी ने यहां निर्दोष लगने वाले विचार में अपनी सहूलियत से एक छुपा हुआ संदेश देने की कोशिश की। भले ही उन्होंने एक समुदाय का नाम ना लिया हो, पर उन्होंने इस घोषणा के लिए पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस को चुना, इस तरह से इस विचार को पुख़्ता किया गया कि विभाजन के दौरान मुस्लिम क्रूरता करने वाले थे। लेकिन जैसा इतिहासकारों ने हमें बताया है कि सच्चाई कहीं ज़्यादा जटिल है। हिंदू, मुस्लिम, सिख- सभी धर्मों के लोग पीड़ित भी थे और हिंसा में शामिल भी थे। पड़ोसी और दोस्त एक दूसरे के खिलाफ़ हो गए थे। फिर इसी दौरान सभी धर्मों के कई लोगों ने एक दूसरे को बचाया भी और पीड़ितों की मदद भी की। विभाजन के दौरान किसी को भी सीधे तौर पर नायक और खलनायक में नहीं बाटा जा सकता। लेकिन जानबूझकर एक समुदाय की तरफ विभाजन की त्रासदी के लिए इशारा करने से भक्त ब्रिगेड को अपनी नफ़रत की गाड़ी धकेलने में मदद मिलेगी। एक बीजेपी नेता को यह चालाकी समझ आती है, लेकिन एक भारतीय के लिए यह ख़तरनाक है। 

फिर यह पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस को भद्दा करने का तरीका भी था। इसमें कोई शक नहीं है कि पहले विभाजन और उसके बाद पाकिस्तान से बांग्लादेश को अलग करने की घटनाओं ने भारत के अपने पड़ोसियों के साथ संबंधों को तय करने में अहम भूमिका निभाई है। विभाजन के तुरंत बाद के साल सबसे मुश्किल थे। इसके बावजूद भारत ने नई वास्तविकताओं को स्वीकार किया और राष्ट्रों की मंडली में अपने आप को स्थापित किया। लेकिन अब जानबूझकर पाकिस्तन के स्वतंत्रता दिवस के दिन "विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस" मनाना अपरिपक्वता की निशानी है। जबकि विभाजन के बाद भारत की सरकार ने कहीं ज़्यादा परिपक्वता दिखाई थी। 

मोदी ने यहां एक और नकारात्मक उद्देश्य को हासिल कर लिया। विभाजन से पूरे भारत को दर्द हुआ, लेकिन इसकी सबसे ज़्यादा पीड़ा पंजाब और बंगाल में हुई, जहां आज भी 75 साल बाद हर परिवार में इसका दर्द मौजूद है। विंध्य के दक्षिण में मुंबई में दर्द एक बार को ख़त्म हो चुका है, क्योंकि कुछ परिवार ख़त्म हो गए या उनके पास जो था, उन्होंने सब खो दिया। बॉम्बे में शरणार्थी आए और व्यापार को बहुत झटका लगा, लेकिन वहां उत्तरी भारत, खासकर पंजाब और बंगाल की तरह अमानवीयता नहीं हुई थी। लेकिन अब केंद्र सरकार का विभाजन की भयावहता को याद करने के लिए पूरे भारत में एक दिन की घोषणा करना, उसके अंदरूनी सांप्रदायिक एजेंडे को साफ़ करता है। 

क्या इसका मतलब यह हुआ कि हमें विभाजन के दर्द को याद नहीं करना चाहिए? ऐसा बिल्कुल नहीं है। विभाजन के बाद के सालों में गलतियां की गईं, जब गुप्त तरीके से विभाजन के दर्द या भयावहता को छुपाया गया, लोगों की आपबीती को ठीक से दर्ज किए बिना राजनीतिक विमर्श गढ़े गए और लाखों लोगों के कड़वे अनुभव को लेकर कोई भी मेमोरियल बनाने से बचा गया। मोदी ने ऐसे दिखाया, जैसे वह एक ऐतिहासिक गलती ठीक कर रहे हैं, लेकिन उन्होंने दरअसल यहां गलती खुद कर दी है। उन्होंने पुराने घावों को कुरेद दिया है और यह नहीं बताया कि राष्ट्र इनपर कैसे मलहम लगाए। इतिहासकार साज अग्रवाल लिखते हैं कि विभाजन रेप-हत्या-लूट से कहीं ज्यादा था। इससे बड़े पैमाने पर प्रवास हुआ, लोगों का अपने पुरखों की ज़मीन से नाता टूट गया, संस्कृति जैसी कई चीजों का नुकसान हुआ।

मोदी नई पीढ़ी की पाकिस्तान के खिलाफ़ नफ़रत बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, इसके लिए वे “द्विराष्ट्र सिद्धांत” का सहारा लेते हुए चयनित ढंग से एक समुदाय द्वारा की गई क्रूरताओं को सामने रख रहे हैं। जब मोदी की लोकप्रियता कम हो रही है और सरकार की गलतियों के चलते चुनावों में एंटी-इंकमबेंसी बड़ा मुद्दा बन रहा है, तब पाकिस्तान के खिलाफ़ इस गुस्से का इस्तेमाल चुनावों में फायदे के लिए किया जा सकता है। विभाजन विभीषिका दिवस विभाजन के पीड़ितों तक पहुंचने से ज़्यादा भारत के हिंदुओं को खासकर युवाओं को यह बताते हुए नज़र आ रहा है कि अखंड भारत को मुस्लिमों ने तोड़ा।

नकारात्मकता और संकीर्ण राजनीतिक उद्देश्य एक अच्छे प्रयास को मैदान में धूमिल कर सकते हैं। ऐसा तब होता है, जब लाखों लोगों की यादें और भावनाएं किसी संवेदनशील मुद्दे से जुड़ी होती हैं, जो एक राष्ट्र की सीमा के परे चली जाती हैं, हमारे यहां इस मामले में यह पाकिस्तान और बांग्लादेश के साथ है। जो देश विभीषिकाओं के शिकार होते हैं, वे पवित्र ढंग से उन घटनाओं को याद करते हैं और जो चीज खो चुकी है, उसे आदरांजलि देते हैं। इसका बड़ा उदाहरण जर्मनी और इज़रायल द्वारा यहूदी नरसंहार को याद करना, जापान द्वारा हिरोशिमा-नागासाकी की भयावहता का स्मरण करना है।

यहां यह उद्देश्य होता है कि इस भयावहता को इसलिए याद रखा जाए जिससे उसका दोहराव ना हो।

विभाजन का सामूहिक या राष्ट्रीय स्मरण जरूरी है। सबसे जरूरी मंशा और भावना है। अगर यह नफ़रत, घृणा और अन्याय से जन्म लेती है, जैसा मोदी के विचार से लग रहा है, तो बेहतर होता है कि इन भयावह यादों को लोगों के घरों और व्यक्तिगत बातचीत तक छोड़ दिया जाए। लोग पछतावे के तरीके खोज लेते हैं, जैसे मेरी परदादी की दोस्त ने खोजे थे।

लेखक मुंबई आधारित पत्रकार और स्तंभकार हैं। वे राजनीति, शहर, मीडिया और लैंगिक मुद्दों पर लिखती हैं।

इस लेख को मूल अंग्रेजी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

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