NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
म्यांमार के प्रति भारतीय विदेश नीति अब भी अस्पष्ट बनी हुई है
भले ही नियामक चिंताएं भारतीय विदेश नीति को संचालित नहीं करती हैं, पर म्यांमार भारत की लुक/एक्ट ईस्ट नीति और उत्तर-पूर्वी राज्यों के लिए योजनाओं के लिहाज से अहम है।
चेतन राणा
25 Nov 2021
myanmar india
म्यांमार और भारत के राष्ट्रीय ध्वज 

म्यांमार में लोकतांत्रिक सरकार के तख्तापलट के बाद उत्पन्न संघर्ष एक महत्त्वपूर्ण बिंदु के करीब पहुंच रहा है, क्योंकि सेना और उसकी प्रतिरोधी शक्तियां दोनों ने ही इस बीच अपनी ताकत बढ़ा ली हैं। एंथोनी डेविस ने 19 अक्टूबर 2021 को एशिया टाइम्स में इरावदी घाटी से लेकर सीमावर्ती इलाकों तक, पूरे देश में जन प्रतिरोध को कुचलने के लिए सेना के ऑपरेशन अनावराता (बर्मीज़ साम्राज्य के योद्धा संस्थापक के नाम पर) का एक विवरण जारी किया था। इस बीच, म्यांमार के चिन प्रांत के थंतलांग में सेना द्वारा शहर में की गई गोलाबारी के बाद जले हुए घरों की तस्वीरें म्यांमार-भारतीय सीमा पर नागरिकों के खिलाफ हिंसा की वृद्धि की गवाही देती हैं। इसने मिजोरम में शरणार्थियों के आंदोलन की एक नई लहर पैदा कर दी है। हालांकि, म्यांमार को लेकर भारतीय राष्ट्र-राज्य की स्थिति अभी तक निस्पंदित बनी हुई है, वह आसियान की पांच-सूत्रीय सहमति के पीछे छिपी हुई है, और इस तरह संघर्ष को होने दे रही है। 

क्षितिज पर अधिक हिंसा

यद्यपि म्यांमार सेना के ऑपरेशन अनावराता का उद्देश्य पूरे क्षेत्र पर अपना नियंत्रण करना प्रतीत होता है और सेना दशकों के आतंकवाद विरोधी अभियानों के अपने अनुभवों के बल पर जानती है कि ऐसा करना उसके लिए बहुत आसान है। इसलिए उसके इस ऑपरेशन का अधिक व्यावहारिक उद्देश्य लोगों में सेना का भय फैलाना हो सकता है। हालांकि, नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट (एनयूजी) के नेतृत्व में लोकतांत्रिक प्रतिरोध, जिसने 7 सितंबर 2021 को लोगों के रक्षा युद्ध की घोषणा की, उसने सेना से लड़ने के लिए एथनिक आर्म्ड ऑर्गनाइजेशन (एफएओ) के साथ-साथ अब एक सेंट्रल कमांड एंड कोऑर्डिनेशन कमेटी (सी3सी) का भी गठन किया है। यह सेना के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष को संगठित करने और देश भर में कई अनुभवहीन पीपुल्स डिफेंस फोर्सेज (पीडीएफ) को नेतृत्व प्रदान करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। संघर्ष को कम करने के लिए अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय समुदायों की तरफ से पहल की सामान्य कमी का मतलब यह है कि सीमित बाहरी कारक (यदि कोई हो) तो वे ही मानव त्रासदी की अगली लहर को रोक सकते हैं।

उदासीन और निष्क्रिय नीति

म्यांमार में जारी सेना की हिंसक कार्रवाई के मामले में भारत का दामन भी साफ नहीं हैं। भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के एक प्रस्ताव पर मतदान करने से परहेज किया जिसमें म्यांमार पर गैर-बाध्यकारी हथियार प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी। भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल) ने सरकार के तख्तापलट के बाद भी तटीय निगरानी में मदद करने वाले रडार घटकों को म्यांमार को भेजना जारी रखा है। इस तरह के दोहरे मानदंड दर्शाते हैं कि भारत सरकार म्यांमार में लोकतांत्रिक परिवर्तन के समर्थन का केवल दिखावा कर रही है और वास्तव में उसने मिन आंग हलिंग (एमएएच) के तहत सेना का ही पक्ष लिया है। 

भारतीय दूतावास के सैन्य अताशे ने मार्च में सशस्त्र सेना दिवस परेड में भाग लिया, जो संघर्ष में अब तक का सबसे खूनी महीना था। हालांकि यह महज संयोग हो सकता है और उसके द्वारा तख्तापलट का समर्थन करना नहीं हो सकता है, पर यह भारत के खराब कूटनीतिक व्यवहार का संकेत देता है। इसके अलावा, भारत आने वाले शरणार्थियों को शरण देने से इनकार करने के केंद्र सरकार के निर्देश और लंबे समय से चल रहे रोहिंग्या संकट के प्रति उसकी सामान्य उदासीनता ने इस मुद्दे पर भारत के नियामक रुख को नष्ट कर दिया है। इस तरह का रुख उन रिश्तेदारी संबंधों की भी अनदेखी करता है, जो सीमा के इस-उस पार निबाहे जाते हैं, खासकर भारत के मिजोरम और म्यांमार के चिन राज्य के बीच।

आसियान-दृष्टिकोण की सीमाएं 

अब तक भारत सरकार की नीति आसियान की पांच सूत्री योजना की पिछली सीट पर बैठने और उसके पीछे खड़े रहने की रही है। आसियान ने हथियार प्रतिबंध पर संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव के खिलाफ पैरवी की और यहां तक कि सेना को इसकी बैठकों में भाग लेने की अनुमति दी। हालाँकि, हाल ही में इसमें एक बदलाव आया है, भले ही इसकी प्रासंगिकता बहुत कम है। एमएएच की बजाय म्यांमार से केवल एक 'गैर-राजनीतिक प्रतिनिधि' को अनुमति देने के आसियान के फैसले को सेना के लिए एक अपमान के रूप में देखा जाता है। यह आसियान दूत को आंग सान सू की से मिलने का अवसर न देने के एमएएच के फैसले का जवाब माना जा रहा है। हालांकि आसियान की पंच-सूत्रीय योजना के कमजोर होने और उसका म्यांमार में जो हो रहा है, उसके लिए सेना को जिम्मेदार न ठहराने के कारण वह योजना जांच के दायरे में आ गई है। विशेष दूत (ब्रुनेई के एरीवान युसूफ) की नियुक्ति में देरी, उसके बाद उनकी यात्राओं पर प्रतिबंध लगा दिया जाना और अब एक नई नियुक्ति की पहल की फुसफुसाहट उसके खोखलेपन को सामने लाती है। भारत ने म्यांमार के मुद्दे पर इस पहल के लिए लगातार अपना समर्थन दिया है। 

क्या किया जाना चाहिए? 

म्यांमार में लोगों की कई पीढ़ियों को सैन्य शासन और जातीय संघर्षों के चलते बहुत कुछ सहना-भुगतना पड़ा है। यहां तक कि थिन सीन और नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी के तहत लोकतांत्रिक संक्रमण की संक्षिप्त अवधि में भी, रोहिंग्या संकट काफी व्यापक हो गया और नई गलतियों ने पुरानी की जगह ले लीं। संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप ने म्यांमार के विरुद्ध आर्थिक और व्यापारिक प्रतिबंध लगाने का पारंपरिक व्यवहार किया, जिसने यहां के जनजीवन को बुरी तरह से प्रभावित किया था। थका देने वाला अनियंत्रित व्यापार, नशीले पदार्थों, मनुष्यों और वन्यजीवों की तस्करी और पुलिस-सेना से संघर्ष में तो आम जीवन की हानि में वृद्धि होना तय है। भले ही नियामक चिंताएं भारतीय विदेश नीति को संचालित नहीं करती हैं, पर म्यांमार भारत की लुक/एक्ट ईस्ट नीति और इसके उत्तर-पूर्वी राज्यों की योजनाओं के लिहाज से अहम है जबकि दिल्ली में निर्णय लेने वालों के लिए म्यांमार को चीनी चश्मे के बिना देखना चुनौतीपूर्ण होगा। यहां भारत के लिए चीन की तुलना में रणनीतिक उपायों को आजमाने और कूटनीतिक संबंधों में गहराई देने की अपनी एक हद है। इसी का प्रमाण है, अडानी समूह द्वारा हाल ही में म्यांमार में अपने निवेश समाप्त करने की घोषणा। इसके अलावा, आसियान की योजना के पीछे खड़े रहने से भारत को वह लक्ष्य भी हासिल नहीं होता है।

भारत को एनयूजी को एक हितधारक के रूप में मान्यता देनी चाहिए और इसके साथ सक्रिय रूप से जुड़ना चाहिए। एनयूजी और ईएओ के बीच बढ़ता अभिसरण दशकों पुराने विश्वास घाटे को पाटने और भविष्य के लिए एक एकीकृत राजनीतिक समुदाय बनाने का एक अवसर प्रदान करता है। यह एक ऐसा क्षण हो सकता है, जो पैंगलोंग शांति प्रक्रिया की भावना को व्यावहारिक आकार प्रदान करे। भारत को अभी के अभी म्यांमार की सेना को प्रौद्योगिकी और हथियारों की बिक्री पर रोक लगा देनी चाहिए। प्रतिभागियों को एक मेज पर लाने के लिए शर्तें तैयार की जा सकती हैं। इसके अलावा, जैसा कि म्यांमार को अंतरराष्ट्रीय राजनीति की उच्च प्राथमिक सूची से एक बार फिर हटा दिया गया है, तो भारत को आगे बढ़ कर वहां के लोगों की चिंताओं को दूर करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय उसके प्रति निरंतर जुड़ाव महसूस करे। हालांकि रणनीतिकार म्यांमार को अपनी नीतिगत उपेक्षा से खो सकते हैं, लेकिन यदि भारत इसी तरह की उदासीन और निष्क्रिय नीति का पालन करना जारी रखता है तो उसे इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। 

(चेतन राणा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय राजनीति, संगठन और निरस्त्रीकरण केंद्र (CIPOD) में कूटनीति और निरस्त्रीकरण में पीएच.डी.स्कॉलर हैं। उन्हें@ChetanRana96 पर ट्विट किया जा सकता है। लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं।)

अंग्रेजी में मूल रूप से प्रकाशित लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

Myanmar in Indian Foreign Policy’s Blindspot

India
Myanmar
ASEAN
Myanmar military
Min Aung Hlaing
Indian Foreign Policy

Related Stories

भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल

भारत में तंबाकू से जुड़ी बीमारियों से हर साल 1.3 मिलियन लोगों की मौत

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में आईपीईएफ़ पर दूसरे देशों को साथ लाना कठिन कार्य होगा

UN में भारत: देश में 30 करोड़ लोग आजीविका के लिए जंगलों पर निर्भर, सरकार उनके अधिकारों की रक्षा को प्रतिबद्ध

वर्ष 2030 तक हार्ट अटैक से सबसे ज़्यादा मौत भारत में होगी

लू का कहर: विशेषज्ञों ने कहा झुलसाती गर्मी से निबटने की योजनाओं पर अमल करे सरकार

वित्त मंत्री जी आप बिल्कुल गलत हैं! महंगाई की मार ग़रीबों पर पड़ती है, अमीरों पर नहीं

रूस की नए बाज़ारों की तलाश, भारत और चीन को दे सकती  है सबसे अधिक लाभ

प्रेस फ्रीडम सूचकांक में भारत 150वे स्थान पर क्यों पहुंचा

‘जलवायु परिवर्तन’ के चलते दुनियाभर में बढ़ रही प्रचंड गर्मी, भारत में भी बढ़ेगा तापमान


बाकी खबरें

  • jammu and kashmir
    अजय सिंह
    मुद्दा: कश्मीर में लाशों की गिनती जारी है
    13 Jan 2022
    वर्ष 2020 और वर्ष 2021 में सेना ने, अन्य सुरक्षा बलों के साथ मिलकर 197 मुठभेड़ अभियानों को अंजाम दिया। इनमें 400 से ज्यादा कश्मीरी नौजवान मारे गये।
  • Tilka Majhi
    जीतेंद्र मीना
    आज़ादी का पहला नायक आदिविद्रोही– तिलका मांझी
    13 Jan 2022
    ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना के बाद प्रथम प्रतिरोध के रूप में पहाड़िया आदिवासियों का यह उलगुलान राजमहल की पहाड़ियों और संथाल परगना में 1771 से लेकर 1791 तक ब्रिटिश हुकूमत, महाजन, जमींदार, जोतदार और…
  • marital rape
    सोनिया यादव
    मैरिटल रेप को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट सख्त, क्या अब ख़त्म होगा महिलाओं का संघर्ष?
    13 Jan 2022
    गैर-सरकारी संगठनों द्वारा दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि मैरिटल रेप के लिए भी सज़ा मिलनी चाहिए। विवाहिता हो या नहीं, हर महिला को असहमति से बनाए जाने वाले यौन संबंध को न कहने का हक़…
  • muslim women
    अनिल सिन्हा
    मुस्लिम महिलाओं की नीलामीः सिर्फ क़ानून से नहीं निकलेगा हल, बडे़ राजनीतिक संघर्ष की ज़रूरत हैं
    13 Jan 2022
    बुल्ली और सुल्ली डील का निशाना बनी औरतों की जितनी गहरी जानकारी इन अपराधियों के पास है, उससे यह साफ हो जाता है कि यह किसी अकेले व्यक्ति या छोटे समूह का काम नहीं है। कुछ लोगों को लगता है कि सख्त कानूनी…
  • up elections
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    यूपी चुनाव 2022: बीजेपी में भगदड़ ,3 दिन में हुए सात इस्तीफ़े
    13 Jan 2022
    सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने दावा किया है कि रोजाना राज्य की योगी आदित्यनाथ सरकार के एक-दो मंत्री इस्तीफा देंगे और 20 जनवरी तक यह…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License