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 नागा विवाद में मणिपुर की कहानी
मणिपुर के नेता क्यों कह रहे हैं कि नागा समझौता की वजह से टेरिटोरियल इंटिग्रिटी यानी सीमाओं पर कोई प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए? मणिपुर की तरफ से यह क्यों कहा जा रहा है कि नागा समझौता के बाद नागाओं की तरफ से किये जाने वाले जबरिया वसूली और गैर क़ानूनी करों की उगाही बंद कर दी जाए?
अजय कुमार
06 Nov 2019
manipur

नागा शांति समझौता की खबरों के साथ मणिपुर का भी जिक्र आता है। आप पूछेंगे कि  नागा और नागालैंड से जुड़े मुद्दे पर मणिपुर कहाँ से आ गया? मणिपुर के नेता क्यों कह रहे हैं कि नागा समझौता की वजह से टेरिटोरियल इंटिग्रिटी यानी सीमाओं पर कोई प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए? मणिपुर की तरफ से यह क्यों कहा जा रहा है कि नागा समझौता के बाद नागाओं की तरफ से किये जाने वाले जबरिया वसूली और गैर क़ानूनी करों की उगाही बंद कर दी जाए ? अभी कांग्रेस का यह बयान क्यों आया है कि नागा समझौता के दौरान मणिपुर की सीमाओं में बदलाव नहीं किया जाना चाहिए? और नागा समझौता के लिए निर्धारित दिन से पहले  प्रशासन से आम जनता को डराने वाले आदेश क्यों आये ? जिसकी वजह से मणिपुर और नागा लोग रोजमर्रा की जरूरी सामानों की जमाखोरी करने लगे। साधारण शब्दों में कहा जाए तो इन सारे सवालों से यह जिज्ञासा उठती  है कि नागा आंदोलन से मणिपुर कैसे जुड़ता है ?

नागा आंदोलन की आजादी से पहले से ग्रेटर नागालिम की मांग रही है।  ग्रेटर नागालिम यानी वह पूरी ज़मीन, जिसपर पूरी तरह से नागाओं का हक हो।  इसमें आज के नागालैंड सहित अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, असम और म्यांमार के इलाके आते हैं। नागा गुटों ने अब म्यांमार में रहने वाले नागाओं के साथ वाले ग्रेटर नगालिम  का सपना छोड़ दिया है। साथ में नागालैंड के अलावा दूसरे राज्यों में रहने वाले नागाओं को भी एक साथ रखने की अपील कमजोर हुई है। फिर भी एक ऐसे जमीन की मांग तो हमेशा से रही है जो नागाओं के लिए हो।

यहीं से नागा आंदोलन से मणिपुर का जुड़ाव समझ में आता है। भारत के मानचित्र में अगर  हम नागालैंड की जियोग्राफी देखें तो मणिपुर का किस्सा खुलकर सामने आता है। मणिपुर का उत्तरी सिरा नागालैंड से जुड़ता है। मणिपुर का उत्तरी सिरा पहाड़ीनुमा इलाका है ,जहां नागा जनजाति रहती है। यहाँ रहने वाले लोग भी नागा आंदोलन से खुद को जुड़ा हुआ मानते हैं। यानी नागा गुटों से मणिपुर के नागाओं के अच्छे खासे सम्बन्ध है।  नेशनल सोसलिस्ट कौंसिल ऑफ़ नागालैंड ( इसाक मुईवा)  के एक अगुआ मुईवा मणिपुर के पहाड़ी वाले इलाके से आते हैं।  अब, जब नागाओं में आपस में  लगाव वाला सम्बन्ध है तो किसी दूसरे के सहारे इनके लगाव को खाद पानी दिलवाने का काम किया जाता है।  और यह दूसरे हैं, मणिपुर में रहने वाले मैतेयी जनजाति के लोग।

मणिपुर में घाटी में रहने वाली आबादी पहाड़ी आबादी की तुलना में ज़्यादा है। नागा जनजातियाँ ईसाई धर्म को मानती हैं तो घाटी में रहने वाले अधिकतर लोग हिंदू हैं जो मैतेयी समुदाय के हैं। माना जाता है कि तनाव व टकराव की जड़ दोनों समुदायों के बीच लंबे समय से उपजे अविश्वास में छिपी है। सरकार, पुलिस और नौकरशाही में घाटी के हिंदुओं का बहुमत है। पहाड़ों पर रहने वाली नागा और दूसरी जनजातियों को लगता है कि सरकार उनकी ज़मीन पर कब्ज़ा न कर ले या कोई ऐसा कानून न ले आए, जिससे उनकी स्वायत्तता और जीवन-शैली पर संकट आ जाए। इसी आशंका से उपजा अविश्वास कई बार हिंसा का रूप ले चुका है।

इसे भी पढ़ें : नागा विवाद और शांति समझौता : ग़ुलाम भारत से लेकर आज़ाद भारत तक

अब सवाल यही है कि मणिपुर को ग्रेटर नागालिम से परेशानी क्या है? क्यों मणिपुर की सरकार सहित पंद्रह प्रमुख दलों ने सीमाओं की फेरबदली करने से केंद्र सरकार को आगाह किया है और इस पर केंद्र को ज्ञापन पत्र भी सौंपा है तो इसका जवाब यह है कि मणिपुर का तकरीबन 92 फीसदी इलाका पहाड़ी है और 8 फीसदी में घाटी है।  अगर ग्रेटर नगालिम के तहत सीमाओं को बदला जाता है तो आशंका है कि मणिपुर को बहुत अधिक नुकसान सहना पड़ सकता है।  

इसके अलावा दूसरा कारण है मणिपुर का शेष भारत से जुड़ने का रास्ता। शेष भारत से मणिपुर को जोड़ने वाले दो ही रास्ते हैं और दोनों मणिपुर के नागा बहुल पहाड़ी इलाकों से गुजरते हैं। पहला है नागालैंड के दीमापुर से मणिपुर के उत्तरी सिरा की तरफ आने वाला रास्ता (N H 37) और दूसरा है असम के सिल्चर के सहारे मणिपुर के दक्षिण सिरे की तरफ आने वाला रास्ता ( N H 2 ) । आरोप रहा है कि नागा गुटों ने मणिपुर के लिए मौजूद इस भौगोलिक परेशानी का खूब फायदा उठाया है। रास्ते पर नाकेबंदी कर जरूरी सामानों को रोक दिया है। जबरिया वसूली का धंधा चलाया है। गैरक़ानूनी कर वसूले हैं।  इसलिए मणिपुर ने नागा समझौता की आवाज उठते ही यह बात कहनी शुरू कर दी है कि इस समझौते के साथ गलत तरह के धंधे भी बंद कर दिया जाए।  

यह है नागा आंदोलन में जुड़ा मणिपुर का पक्ष। इस पूरी कहानी को जानने के बाद फिर से वही सवाल उठता है कि क्या ग्रेटर नगालिम के लिए सीमाएं बदली जानी  चाहिए ? अभी हाल-फिलहाल ग्रेटर नागालिम के तौर पर एक नया राज्य बनाने की कमजोर हुई है। जिस एग्रीमेंट ऑफ़ फ्रेमवर्क के तहत भारत सरकार नागा गुटों के बीच बातचीत हो रही है, उसके तहत ग्रेटर नागालिम की बात नहीं मानी गयी है।  फिर भी नागा आंदोलन के मूल में ग्रेटर नागालिम की बात है।  तो इसके बहुत सारे जवाब है। अगर समय के लम्बे इतिहास में सोचा जाए तो एक तथ्य यह है कि आजाद भारत के समय 500 से अधिक रियासतें थी, उन सबको एक कर तकरीबन 15 राज्य बनाये गए। तब से लेकर अब तक भारत के कुल राज्यों की संख्या 28 हो गयी है।

लेकिन जानकरों का यह भी कहना है कि पहचान के नाम पर एक राज्य बनाना अब कहीं से भी जायज़ नहीं लगता।  खासतौर से पूर्वी भारत में जहां पर जनजातीय विविधता की बाढ़ है। इसे बचाये रखने के लिए बकायदे संविधान में व्यवस्था भी की जा चुकी है कि बिना जनजातियों से सलाह मशविरा किये ऐसा कोई भी कानून नहीं बनाया जाएगा, जो उनकी परम्पराओं और संस्कृतियों से जुड़ा हो। साथ में और भी बहुत सारे प्रावधान हैं जिससे पूर्वी भारत में प्रशासनिक इकाई के तौर पर क्षेत्रीय समितियां बनती हैं। ऐसे में अलग राज्य बनाये जाने की मांग न ही  प्रभावी लगती है और न ही व्यवहारिक।

इस मुद्दे के जानकर कहते हैं कि अगर  असम, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों के भौगोलिक एकीकरण को मंज़ूरी दी गई तो यहाँ सांप्रदायिक संघर्ष आरंभ हो सकता है। नागा विरोध को खत्म करने के लिये कोई भी समाधान नागालैंड राज्य तक ही सीमित नहीं होना चाहिये, बल्कि अन्य राज्यों की चिंताओं को भी ध्यान में रखना चाहिये। केंद्र को किसी विशेष समुदाय को "व्यवस्थित" करने की कोशिश नहीं करनी चाहिये, क्योंकि नागालैंड की सीमा से लगे राज्य मणिपुर में 30 से अधिक विभिन्न जातीय समूह निवास करते हैं। किसी एक समुदाय को महत्व देना भी हिंसा बढ़ाने का काम करेगा। 

 

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story of manipur in naga peace accord
naga and meiyati conflict
nscin
manipur in naga conflict

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