NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
नौकरियों के आंकड़ों की दर्दनाक हंसी
सरकार ने ईपीएफ और ईएसआई की ताजा आंकड़ों को जारी किया है, इससे उधोगों में नौकरी की स्थिति नहीं बल्कि गड़बड़ी उजागर हुई है ।
सुबोध वर्मा
27 Aug 2018
Translated by महेश कुमार
employment

प्रधानमंत्री मोदी से लेकर सरकार में नीचे तक सभी लोगों  द्वारा  पाखंड के समर्थन की वजह से पिछले साल शुरू की गयी जनमत की परख अब मजाक बन गयी है। कल,सरकार ने अपनी तीन सामाजिक सुरक्षा योजनाओं -भविष्य निधि (ईपीएफ), कर्मचारियों की स्वास्थ्य बीमा (ईएसआई) और पेंशन (एनपीएस) में कितने लोगों नामांकित हुए, पर नए आंकड़ें जारी किये। इन आँकड़ों से पता चलता है कि ईपीएफ में 1 करोड़ से अधिक, ईएसआई में 1.19 करोड़ और एनपीएस में 6.1 लाख  नए सदस्य जुड़े हैं ।
 
पिछले साल इन सभी आंकड़ों को जोड़कर बड़े पैमाने पर नौकरियों की पैदावारी का दावा किया गया था. इस दावे की हर जगह आलोचना हुई और इसे गलत बताया गया। अभी हाल में ही जारी किये गए नए आंकड़ें प्रदर्शित कर रहे हैं कि "ये औपचारिक क्षेत्र में रोजगार के स्तर पर विभिन्न दृष्टिकोण हैं और समग्र स्तर पर रोजगार को नहीं मापते हैं. "

इस चेतवानी को इसलिए शामिल करना जरूरी है क्योंकि इन योजनाओं में होने वाले नामांकन नए मिलने वाले रोजगार को नहीं दर्शातें हैं  क्योंकि एक ही व्यक्ति तीनों  योजनाओं में भी नामांकन कर सकता है; सिर्फ नया नामांकन नई नौकरी के समान नहीं है क्योंकि अन्य लोग नौकरियां भी छोड़ रहे होते हैं  इसलिए नौकरियों की असल रचना से मिले आंकड़ें ही अधिक प्रासंगिक हो सकते हैं। और, योजनाओं की अपनी सीमाएं हैं (जैसे आय  की सीमा,योजनाओं के पात्र लिए कर्मचारियों की संख्या आदि) इसलिए ये आंकड़ें औपचारिक क्षेत्र की सभी नौकरियों को संभवतः प्रतिबिंबित नहीं कर सकते हैं, सामान्य नौकरियों की तो बात ही दूर है। 

सरकार अब नए नामांकन को प्रदर्शित कर रही है साथ ही साथ योजनाओं को छोड़ने वाले लोगों की संख्या को भी बता रही है । उदाहरण के लिए, जबकि ईपीएफ में 107.5 लाख नए सदस्य नामांकित हुए, लेकिन 60.4  लाख मौजूदा सदस्यों ने इस योजना को छोड़ भी दिया है। तो इसमें शुद्ध जोड़ केवल  47.1 लाख का हुआ है।

graph

लेकिन यह भी सवालों से मुक्त नहीं है। ये 47.1 लाख लोग पहले से कार्यरत हो सकते हैं, जो इस योजना में अब शामिल हो रहे हैं। इसे स्पष्ट करने के लिए कोई डेटा नहीं है। कुछ ने तर्क दिया है कि छोटे उम्र के लोग यानि 25 वर्ष तक की आयु के लोगों  को पहली बार कर्मचारियों के रूप में माना जा सकता है। यह अनिश्चित है, और नौकरियों की कमी की स्थिति में यह  नामुमकिन जैसा लगता  है। खासकर लड़के 16-17 साल की उम्र से ही काम करना शुरू कर देते हैं । यह भी नहीं कहा जा सकता है कि ये नए नामांकन नौकरियों के औपचारिकरण के उपाय हैं क्योंकि कौन जानता है कि कोई औपचारिक नौकरी में काम कर रहा था या नहीं, वह भी ईपीएफओ का नवीनतम सदस्य बनने से पहले?

इसलिए, एकमात्र चीज जिसे वास्तव में पूर्ण निश्चितता के साथ कहा जा सकता है कि इन दस महीनों में, 60.4 लाख कर्मचारी इस योजना से बाहर चले गए। इनमें वे लोग शामिल होंगे जो मर गए थे, जो सेवानिवृत्त हुए थे,जो लोग अपनी नौकरियां खो चुके थे और नौकरी से स्थानांतरित होकर वहां चले गए थे जहां  कोई ईपीएफ कवरेज नहीं है (जैसे आकस्मिक नौकरी या अनुबंध नौकरी)।

दूसरे शब्दों में कहा जाए ये आंकड़ें अस्थिरता दिखाती हैं, औद्योगिक रोजगार और इसकी सामाजिक सुरक्षा कवरेज की  गड़बड़ी की असलियत बताती हैं। अन्य प्रमुख योजना जैसे कि  ईएसआई के बारे में ये आंकड़ें  और भी चिंताजनक हैं। पिछले दस महीनों में इस योजना में शामिल होने वाले लोगों से (1119 .7 लाख) अधिक ,इस योजना को छोड़ने वाले लोगों (130.1) की संख्या है । इसका मतलब है कि इस अवधि में नौकरियों की संख्या में 10.4 लाख की शुद्ध  गिरवाट आई है।

बेशक, ईपीएफ की तरह ही, ईएसआई छोड़ने वाले लोगों में मरने वाले, सेवानिवृत्त वाले लोग आदि भी शामिल होंगे, लेकिन क्या इन आकस्मिकताओं में 1.3 करोड़ से ज्यादा लोग हो सकते हैं? अधिक संभावना है, कवरेज से बाहर एक बड़ा हिस्सा आसानी से बाहर हो गया है।

 

graph

ये दोनों योजनाएं भारत में रोजगार के रेत के महल को प्रदर्शित कर रही हैं - सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के भीतर और बाहर नौकरियों के तेजी से बदलने  परिणामस्वरूप आंकड़ों में गजब की अनियमितता आती है। ध्यान दें कि इन सभी को 'अस्थायी' आंकड़े के रूप में वर्णित किया गया है। जैसा कि न्यूजक्लिक ने पहले बताया था, सरकार का अनुमान भी समय के साथ खुद बदल जाता है।

बेरोजगारी के बढ़ते गुस्से से खुद को बचाने  के लिए  सरकार द्वारा जो तथाकथित 'रोजगार आउटलुक' रखा गया है वह सरकार  की वेबसाइट मेगाबाइट के लायक भी  नहीं है। यह इस समय की गंभीर वास्तविकता के बीच एक भद्द मज़ाक होगा, सिवाय इसके कि यह एक बड़ी त्रासदी को दर्शाता है - बेरोजगारों की विशाल आंकड़ों की त्रासदी। याद रखें, सीएमआईई के नवीनतम अनुमान के तहत वर्तमान में बेरोजगारी की दर 6.5 प्रतिशत की ऊंचे स्तर  पर  है ।
 

Employment
EPF
ESI
BJP
Narendra modi

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति


बाकी खबरें

  • सत्यम कुमार
    उत्तराखंड : ज़रूरी सुविधाओं के अभाव में बंद होते सरकारी स्कूल, RTE क़ानून की आड़ में निजी स्कूलों का बढ़ता कारोबार 
    28 Apr 2022
    उत्तराखंड राज्य में विद्यालयों की स्थिति के आंकड़े दिखाते हैं कि सरकारी स्कूलों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है जिसके चलते विद्यार्थियों का नामांकन कम हो रहा है, और अंत में कम नामांकन के चलते स्कूल बंद…
  • प्रेम कुमार
    ‘जनता की भलाई’ के लिए पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के अंतर्गत क्यों नहीं लाते मोदीजी!
    28 Apr 2022
    अगर पेट्रोल-डीजल जीएसटी के दायरे में लाए जाते हैं तो कीमत में 30 से 40 रुपये प्रति लीटर तक की कमी हो जाएगी। जनता केंद्र और राज्यों के दोहरे कराधान से भी बच जाएगी। जनता की भलाई के लिए बीजेपी की सरकार…
  • वी. श्रीधर
    एलआईसी की आईपीओ: बड़े पैमाने का घोटाला
    28 Apr 2022
    एलआईसी को लिस्टेड करने की इस बेबुनियाद हड़बड़ी में दिग्गज "निवेशकों" के पैसे बनाने की सनक को बढ़ावा देते हुए लोगों के हितों की भयानक अनदेखी नज़र आती है। आईपीओ की क़ीमत से यह संकेत मिलता है कि यह शायद…
  • सुभाष गाताडे
    दलित जननेता जिग्नेश को क्यों प्रताड़ित कर रही है भाजपा? 
    28 Apr 2022
    ‘क्या अपने राजनीतिक आकाओं के फायदे के लिए एक जननेता को प्रताड़ित और आतंकित किया जा रहा है’?
  • अनीस ज़रगर
    कश्मीर में एक आर्मी-संचालित स्कूल की ओर से कर्मचारियों को हिजाब न पहनने के निर्देश
    28 Apr 2022
    पूर्व मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ़्ती ने भाजपा पर महिलाओं की आजादी पर अंकुश लगाने का आरोप लगाया है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License