NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
नौकरशाही में सीधी नियुक्ति : एक नहीं सौ सवाल, सोशल जस्टिस भी दांव पर
“यह साफ है कि एक देश चलाना कंपनी चलाने से अलग बात है। एक कम्पनी का अधिकारी हमेशा यह चाहता है कि वह मुनाफा कैसे कमा ले। यह बात एक देश पर लागू नहीं होती है।”
अजय कुमार
15 Jun 2019
Lateral Entry
फोटो साभार: Scroll.in

क्या भारतीय प्रशासनिक सेवा की मांग ऐसे दौर में पहुँच चुकी है जिसकी भरपाई सिविल सेवा परीक्षा से नहीं हो पा रही है? ये सवाल इसलिए उठा क्योंकि नौकरशाही का हिस्सा बनने के लिए अब लेटरल एंट्री से पदों को भरने का नियम निकल चुका है। जुलाई 2017 में सरकार ने ब्यूरोक्रेसी में सिविल सेवाओं में परीक्षा के जरिए होने वाली नियुक्ति के अलावा लेटरल एंट्री (Lateral Entry) यानी अन्य क्षेत्रों से सीधी नियुक्ति करने की बात कही थी। सरकार चाहती है कि निजी क्षेत्र के अनुभवी उच्चाधिकारियों को विभिन्न मंत्रालयों और विभागों में डिप्टी सेक्रेटरी, डायरेक्टर और जॉइंट सेक्रेटरी स्तर के पदों पर नियुक्त किया जाए। इसके लगभग एक साल बाद केंद्र सरकार ने लेटरल एंट्री की अधिसूचना जारी करते हुए 10 विभागों में संयुक्त सचिव (Joint Secretary) पदों के लिये आवेदन आमंत्रित किये थे। 

इसके बाद डिपार्टमेंट ऑफ़ पर्सोनेल एंड ट्रेनिंग से 10 मंत्रालयों के विभागों में लेटरल एंट्री भर्ती की पहली अधिसूचना जारी हुई। इस अधिसूचना के तहत तकरीबन 6077 आवेदन प्राप्त हुए। जब संघ लोक सेवा आयोग के पास यह पहुंचें तो आयोग ने यह देखा कि आवेदन बहुत अधिक है और आवेदनकर्ता में से बहुत कम लोग इस जरूरी योग्यता को पूरा कर पा रहे हैं। मंत्रालय की तरफ से पदों को भरने के लिए जिस तरह की योग्यताओं की मांग की गयी थी, वह बहुत अस्पष्ट और हल्की किस्म की थी जैसे - शैक्षणिक योग्यता के तौर पर केवल स्नातक की योग्यता की मांग की गयी थी। उसके बाद यूपीएससी ने 10 मंत्रालयों के साथ बैठक की और फिर से नई भर्ती के लिए नई अधिसूचना जारी की। नई अधिसूचना के तहत अपेक्षित योग्यता का एक उदाहरण देखते हैं-

वित्त मंत्रालय के डिपार्टमेंट ऑफ़ रेवन्यू सर्विस के ज्वाइंट सेक्रेटरी के पद पर आवेदन के लिए जरूरी योग्यता इस प्रकार होनी चाहिए - 1. आवेदक की उम्र 55 साल से अधिक नहीं होनी चाहिए, 2. किसी मान्यताप्राप्त यूनिवर्सिटी से आवदेक के पास अर्थशास्त्र,बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन या इंजीनियरिंग की डिग्री होनी चाहिए, 3 . इंफ़्रास्ट्रक्चर के प्रोजेक्ट जैसे रोड, रेलवे, शिपिंग,टेलिकम्युनिकशन, एयर एविशन जैसे प्राइवेट या पब्लिक सेक्टर के प्रोजेक्ट के ऊँचे स्तर के प्रबंधन में कम से कम पांच साल का अनुभव, 4 . मानव संसाधन, बजट या एकाउंट्स के क्षेत्र में कम से कम 15 साल का अनुभव, 5. आवेदन करने से पहले के पिछले दो साल का कम से कम सालाना मेहनताना 20  लाख से ऊपर हो।

अधिसूचना जारी करते हुए यह कहा कि अगर आवेदन कर्ताओं की संख्या अधिक होगी तो पहले कॉमन टेस्ट होगा, उसके बाद इंटरव्यू से सेलेक्शन किया जाएगा।  नई अधिसूचना के तहत केवल तकरीबन 3000 के आसपास यानी पुरानी वाली अधिसूचना से आधे लोगों ने आवेदन किया। इसमें से यूपीएससी ने डिटेल्ड एप्लीकेशन फॉर्म के तहत ऑनलाइन मांगी गयी सूचनाओं से केवल 89 लोगों को सेलेक्ट किया और अंत में  इंटरव्यू के जरिये केवल 9 लोगों को चुना। 

इस पूरी प्रक्रिया के तहत एक सवाल यह उठता है कि क्या लेटरल एंट्री के तहत नौकरशाही को भरा जाना सही है? क्या निजी क्षेत्र के लोगों को सरकारी नौकरशाही में शामिल करना सही हो सकता है? इस सवाल के बहुत सारे पक्ष-विपक्ष हैं। एक धड़े का मानना है कि निजी क्षेत्र के लोग प्रॉफिट मोटिव (मुनाफे की मंशा) के तहत काम करते हैं। इनका कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट हो सकता है। यानी बहुत लंबे समय तक निजी क्षेत्र में रहने के बाद सरकार का हिस्सा बनने पर ये लोग ऐसी नीतियां बनाएं या ऐसा सरोकार या व्यवहार करे जिससे निजी क्षेत्र को फायदा पहुंचना पहला मकसद हो और जनकल्याण करना दूसरा मकसद। इसमें यह भी हो सकता कि इस समय की सरकारें चूंकि क्रोनी सिस्टम का हिस्सा है और पूंजीपतियों और निजी क्षेत्र के दम पर चलती हैं, इसलिए एक दूसरे के बीच अच्छा सहयोग बनाए रखने के लिए ऐसा नियम बना रही हो।

अगर ऐसा है तो इसका सीधा मतलब है कि लोकतांत्रिक सरकार के नाम पर काम कर रहा क्रोनी सिस्टम हमारे समाज का गहरा हिस्सा बनाता जाएगा। लूट हमारे समाज के ऊंचे पदों की सामान्य प्रवृत्ति बनती जाएगी।

लेकिन इस मसले पर दूसरे पक्ष की राय भी गौर करने लायक है। वैश्वीकृत होते हमारे समाज की चुनौतियां बहुत जटिल हैं। इन चुनौतियों का सामना करने के लिए पॉलिसी बनाने के स्तर पर विशेषज्ञता की जरूरत होती है। यहां समझने वाली बात है कि अर्बन डेवलपमेंट, सिविल एविएशन, रेवेन्यू डिपार्मेंट, टेलीकम्युनिकेशन जैसे क्षेत्रों में विजन और पॉलिसी बनाने के स्तर पर जिस तरह की विशेषज्ञता की जरूरत होती है वह तभी आ सकती है जब किसी के पास इन क्षेत्रों में काम करने  का लंबा अनुभव हो। टेक्निकलटी और एडमिनिस्ट्रेशन लेवल पर यह लंबा अनुभव अभी हाल-फिलहाल की जिस तरह की सिविल सेवा की प्रकृति है,उससे मिलना असंभव होता है। एक व्यक्ति मानविकी के विषयों पर आधारित जटिल परीक्षा पास कर सिविल सेवक बनता है। सिविल सेवाओं के तौर पर अमूमन कई तरह के पद भरे जाते हैं लेकिन हम आम तौर पर आईएएस ऑफिसर या ज़िला अधिकार को ही सिविल सेवक समझते है।

इन पदों के लिए मुश्किल से 100-150 लोगों को ही चुना जाता है। उसके बाद जिस तरह के कामों के लिए सिविल सेवकों का चयन होता है, वह सारे क्षेत्र एडमिनिस्ट्रेशन के साथ टेक्निकल विशेषज्ञता की भी मांग करते हैं जैसे रेवेन्यू सर्विस, एकाउंट सर्विस, रेलवे सर्विस आदि। और जैसे - जैसे कैरियर का सफर लंबा होता जाता है यह पद और अधिक विशेषज्ञता की मांग करने लगते हैं। ऐसी विशेषज्ञता उनके पास अच्छी खासी होती है जो इस तरह के विशिष्ट क्षेत्र में ही लंबे समय तक काम कर चुके होते है। साधारण सी बात है कि रेवेन्यू डिपार्टमेंट के मौजूदा जटिल पेच की जानकारी 20 साल तक किसी कंपनी में हाई लेवल के मैनेजमेंट पर चार्टेड एकाउंटेंट या इकनॉमिस्ट के तौर पर काम कर चुके व्यक्ति के पास, उस सरकारी अफसर से ज्यादा होगी जो 20 साल तक कई तरह के मंत्रालयों में कई तरह के काम कर चुका है। यहां एक जवाब यह भी मिलता है कि विशेषज्ञता केवल एक परीक्षा पास करने से नहीं आती है, इसके लिए लंबे अनुभव की भी जरूरत होती है।

इसलिए लेटरल स्कीम से पहले भी भारतीय प्रशासनिक सेवा के कई क्षेत्रों में निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों की सेवाएं ली जाती रही हैं। फिर भी लेटरल भर्तियाँ तभी सफल हैं जब इन ऊंचे पदों को भरने की प्रक्रिया सही हो। इसमें सरकार और निजी क्षेत्र मिलकर घालमेल करना न चाहे। लेकिन अभी तक का इतिहास तो यही बताता है कि ऐसा हुआ नहीं और आगे भी शायद ऐसा ना हो। घालमेल तय है और लूट भी तय।  

लेकिन इन सबके साथ एक और विवाद खड़ा हो चुका है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर मुताबिक लेटरल एंट्री से भरे गए इन नौ पदों पर किसी भी एक पद को आरक्षण से नहीं भरा गया है। यानी किसी भी पद के लिए sc/st/obc का कोटा तय नहीं किया गया। यह सरकारी नौकरी में नियुक्ति के चले आ रही अभी तक के नियम से अलग नियम है। इस पर कार्मिंक मंत्रालय का कहना है कि चूँकि सभी मंत्रालयों के लिए केवल ज्वाइंट सेक्रेटरी के एक पद के लिए नियुक्ति अनुबंध के आधार पर किया गया है। इसलिए इन पदों को कोटे से नहीं भरा गया गया है। लेकिन जब यह बात यहां तक पहुँच चुकी है कि नीति आयोग के 50 पद भी लेटरल एंट्री से भरे जाएंगे और सरकार इनके लिए अधिसूचना भी जारी करने वाली है। इसके अलावा ज्वाइंट सेक्रेटरी के 60 फीसदी पद भी इसी नीति के तहत भरे जाने की बात सामने आई है, तो इनके लिए भी अगर कोटा निर्धारित नहीं किया गया तो सोशल जस्टिस का पूरा सिस्टम ही गड़बड़ा जायेगा। यह सब ऊपर के पदों पर शुरू हुआ तो ये नीति नीचे भी पहुँच सकती है। 

इस तरह लेटरल एंट्री के तहत होने वाली नियुक्तियां बहुत सारे सवाल पैदा कर रही है।

इस विषय पर एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी कहते हैं कि लेटरल एंट्री का यह फॉर्मूला सैद्धांतिक तौर पर तो सही है लेकिन व्यवहारिक तौर पर गलत। विकसित होते लोकतंत्र के लिए एक जायज फॉर्मूला लगता है। लेकिन हमारे जैसे अधर में चल रह रहे लोकतंत्र के लिए नहीं। हमारे देश में नौकरशाही दो आधार पर चलती है। पोलिटिकल कंडिशन्ड से चल रही नौकरशाही और शक्तियों के बंटवारा के आधार पर चल नौकरशाही। पोलिटिकल कंडिशन्ड वाली नौकरशाही का मतलब है कि नौकरशाही हमेशा अपने राजनीतिक आकाओं की बात मानेगी। क्योंकि राजनीतिक तौर पर चुनकर आया हुआ व्यक्ति जनता का प्रतिनिधि होता है, उसकी बात माननी जरूरी है। शक्तियों के बंटवारे के आधार पर चल रहे नौकरशाही का मतलब है कि नौकरशाही को संवैधानिक शक्ति मिली है कि वह अपने राजनीतिक आकाओं की बात वही तक मानें, जहां तक वह गैरक़ानूनी न हो।

लेकिन लेटरल एंट्री से होने वाली भर्तियों से केवल पोलिटिकल आधार पर चलने वाली नौकरशाही रह जाएगी। यानी जिस तरह की हमारी ख़राब राजनीतिक संस्कृति है उसमें केवल वही लोग नौकरशाही में ऊँचे पद का हिस्सा बन पाएंगे जो नेताओं की बात मानेंगे। हमारी नौकरशाही में अब भी पोस्टिंग  ट्रांसफर और बढ़ते हुए रैंकिंग के आधार पर नियुक्तियाँ राजनीतिक तौर पर होती है। ऐसी स्थिति में लेटरल एंट्री से क्या हाल होगा? हम समझ सकते है। सारी नियुक्तियां केवल राजनीतिक तौर पर होंगी। जिस तरह की विसंगतियों से हमारा समाज चलता है, जिसमे जातिवाद जैसी प्रवृतियाँ हावी हैं, भाई भतीजावाद हावी है, यह सारी विसंगतियां ऊपर के पदों पर हमारे नौकरशाही में हावी हैं। अगर आप ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि पोस्टिंग के समय सवर्ण जातियों से जुड़े बहुत सारे लोगों को शहरी इलाके में नियुक्तियां मिल जाती हैं।

लेटरल एंट्री से यह संस्कृति टूटने वाली नहीं है बल्कि दूसरे रूप में गहरी होने वाली है। कॉर्पोरेट के उन लोगों की भर्ती होगी जो राजनेताओं से खरीद बिक्री करते रहते हैं और एक दूसरे का काम करते रहते है। कॉर्पोरेट अपने लोगों के जरिये अपने हितों की लॉबिंग  करवाएंगे। कॉर्पोरेट की लॉबिंग तो हो जाएगी लेकिन किसानों की लॉबिंग कौन करेगा। या कमजोर लोगों या क्षेत्रों  की लॉबिंग कौन करेगा। हमारी मौजूदा नौकरशाही चाहे जितनी भ्रष्ट हो लेकिन फिर भी भारत के मौजूदा एलीट पॉवर की संरचना सबसे कारगर संरचना है। यहाँ अपनी सीमित क्षमताओं में भी यह कोशिश की जाती है कि सारे हितधारकों का प्रतिनिधिव हो सके। लेटरल एंट्री से यह प्रतिनिधित्व टूटेगा। और भारत जैसे अधर में चल रहे लोकतंत्र के लिए यह अच्छी बात नहीं है। 

इस मुद्दे पर न्यूज़क्लिक के वरिष्ठ पत्रकार सुबोध का कहना है कि बुनियादी तौर पर भी सोचा जाए तो यह साफ है कि एक देश चलाना  कम्पनी चलाने से अलग बात है। एक कम्पनी का अधिकारी हमेशा यह चाहता है कि वह मुनाफा कैसे कमा ले। यह बात एक देश पर लागू नहीं होती है। इसलिए यह नीति उपयुक्त नहीं लगती है।   

एक और वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी कहते हैं कि साल 1950 के बाद बनी नौकरशाही कुछ मूल्यों पर बनी थी जैसे ज्ञान,पारदर्शिता, जवाबदेही, सत्यनिष्ठ जैसे मूल्यों को अपनाने वाली नौकरशाही। अगर कुछ भी ऐसा होता है जिससे इन मूल्यों में मौजूद कमी को दूर किया जाए तो बात समझ में आती है लेकिन ऐसा नहीं है। उनके मुताबिक “ज्ञान और विशेषज्ञता में थोड़ा बहुत बदलाव हो भी जाए लेकिन और किसी मूल्य में कोई बदलाव नहीं होगा, केवल भाई भतीजावाद बढ़ेगा। लोगों को विचरधारत्मक तौर पर लिया जाएगा। इससे क्या लूट रुकेगी? मुझे लगता है बिल्कुल नहीं।”

lateral entry
delhi bureaucracy
bureaucracy
diplomats
Narendra modi
Modi Govt
BJP

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति


बाकी खबरें

  • ganguli and kohli
    लेस्ली ज़ेवियर
    कोहली बनाम गांगुली: दक्षिण अफ्रीका के जोख़िम भरे दौरे के पहले बीसीसीआई के लिए अनुकूल भटकाव
    19 Dec 2021
    दक्षिण अफ्रीका जाने के ठीक पहले सौरव गांगुली बनाम विराट कोहली की टसल हमारी टीवी पर तैर रही है। यह टसल जितनी वास्तविक है, यह इस तथ्य पर पर्दा डालने के लिए भी मुफ़ीद है कि भारतीय टीम ऐसे देश का दौरा कर…
  • modi
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    चुनावी चक्रम: लाइट-कैमरा-एक्शन और पूजा शुरू
    19 Dec 2021
    सरकार जी उतनी गंभीरता, उतना दिमाग सरकार चलाने में नहीं लगाते हैं जितना पूजा-पाठ करने में लगाते हैं। यह पूजा-पाठ चुनाव से पहले तो और भी अधिक बढ़ जाता है। बिल्कुल ठीक उसी तरह, जिस तरह से किसी ऐसे छात्र…
  • teni
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे : जयपुर में मौका चूके राहुल, टेनी को कब तक बचाएगी भाजपा और अन्य ख़बरें
    19 Dec 2021
    सवाल है कि अजय मिश्र को कैसे बचाया जाएगा? क्या एसआईटी की रिपोर्ट के बाद भी उनका इस्तीफा नहीं होगा और उन पर मुकदमा नहीं चलेगा?
  • amit shah
    अजय कुमार
    अमित शाह का एक और जुमला: पिछले 7 सालों में नहीं हुआ कोई भ्रष्टाचार!
    19 Dec 2021
    यह भ्रष्टाचार ही भारत के नसों में इतनी गहराई से समा चुका है जिसकी वजह से देश का गृह मंत्री मीडिया के सामने खुल्लम-खुल्ला कह सकता है कि पिछले 7 सालों में कोई भ्रष्टाचार नहीं हुआ।
  • A Critique of Capitalism’s Obscene Wealth
    रिचर्ड डी. वोल्फ़
    पूंजीवाद की अश्लील-अमीरी : एक आलोचना
    19 Dec 2021
    पूंजीवादी दुनिया में लगभग हर जगह ग़ैर-अमीर ही सबसे ज़्यादा कर चुकाते हैं और अश्लील-अमीरों की कर चोरी के कारण सार्वजनिक सेवाओं में होने वाली कटौतियों की मार बर्दाश्त करते रहते हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License