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नौटंकी की विविधता
रामलीला का मंचन यूँ लगता है जैसे हम किसी मेले में गए हैं, और वहाँ लोग ज़मीन पर बैठ कर अपनी चीज़ें बेच रहे हैं। ठीक इसी तरह से 'नौटंकी' की जाती थी।
न्यूज़क्लिक टीम
09 Oct 2019

रामलीला का मंचन यूँ लगता है जैसे हम किसी मेले में गए हैं, और वहाँ लोग ज़मीन पर बैठ कर अपनी चीज़ें बेच रहे हैं। ठीक इसी तरह से 'नौटंकी' की जाती थी। हमारे देश की मशहूर सांस्कृतिक कलाओं में कोई विभाजन हो ही नहीं सकता, क्योंकि ऐसी कलाओं को बनाने में हर किसी का बराबर हाथ होता है। एक अदाकार की जाति क्या है, इससे कला पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ना चाहिये। कला महत्वपूर्ण है। एक अदाकार का मज़हब क्या है, इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ना चाहिये।

हमारे बीच इतने विभाजन हो चुके हैं कि होली, ईद और अन्य त्योहार साथ में मनाने का जुनून ग़ायब ही हो गया है। जब हम कला का एक समाज के तौर पर एक साथ जश्न मनाते हैं, तो हमें समझ में आता है कि हमारे आसपास के लोग एलियन नहीं हैं, वो हमारे जैसे ही लोग हैं।

Unity in Diversity
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CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License