NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
नए भारत में महिला श्रमिक होने के ख़तरे  
महाराष्ट्र का  गर्भाशय प्रकरण तो यह दर्शाता है कि असंगठित क्षेत्र में कार्यरत श्रमिक महिलाओं के लिए तो सामंत युगीन बर्बरता कायम है अंतर केवल इतना है कि यंत्रणा के तरीके अब आधुनिक ज्ञान विज्ञान के प्रयोग से जरा और क्रूर हो गए हैं।
डॉ. राजू पाण्डेय
22 Jun 2019
woman worker
सांकेतिक तस्वीर साभार : APN Live

श्रम कानूनों को कमजोर कर निजीकरण को बढ़ावा दिए जाने के इस दौर में असंगठित मजदूरों का शोषण अमानवीय रूप लेता जा रहा है। असंगठित महिला मजदूरों के साथ होने वाले अत्याचारों की दास्तान और भी भयानक है। पुरुष प्रधान समाज में परिवार के भीतर और बाहर कार्यस्थल में इनके साथ होने वाला भेदभाव यह दर्शाता है कि इन्हें केवल एक साधन के रूप में देखा जा रहा है जिससे मनमाना काम लिया जा सके, मुनाफा कमाया जा सके, किसी मशीन के कल पुर्जों की भांति उसके कोमल और महत्वपूर्ण अंगों के साथ इस प्रकार की छेड़छाड़ की जाए कि वह बिना रुके ज्यादा आउटपुट दे सके और जब वह अनुपयोगी हो जाए तो उसे कंडम घोषित कर खारिज कर दिया जाए। महिला श्रमिकों के शोषण का नवीनतम वाकया महाराष्ट्र में सामने आया है।

महाराष्ट्र के बीड जनपद में पिछले 3 वर्ष में4605 महिलाओं के गर्भाशय इस कारण निकाल दिए गए कि उनका रजोधर्म (माहवारी) बन्द हो जाए और इस तरह उनके बार बार छुट्टी लेने के कारण गन्ना कटाई का कार्य बाधित न हो। फर्स्ट पोस्ट की 16 जून 2019 की एक रिपोर्ट बताती है कि 2018 में बीड की जिन200 महिलाओं का सर्वेक्षण किया गया था उसमें से 72 का गर्भाशय निकाला गया। 36 प्रतिशत की यह दर अचंभित कर देती है। महाराष्ट्र के लिए यह औसत 2.3 प्रतिशत और पूरे भारत के लिए 3.2 प्रतिशत है। बीड प्रशासन के अनुसार अधिकांश गर्भाशय निकालने वाली सर्जरी11 अस्पतालों द्वारा की गई थी और 2018 तथा 2019 में हुए कुल ऑपरेशनों  के 85 प्रतिशत ऑपेरशन निजी अस्पतालों में हुए हैं। वैसे बीड जिले के सिविल सर्जन की अध्यक्षता में बनी एक समिति इस प्रकरण में 99 निजी अस्पतालों की संलिप्तता का उल्लेख करती है। इस समिति के अनुसार जिन महिलाओं का गर्भाशय निकाला गया है उनमें एक उल्लेखनीय संख्या उन महिलाओं की भी है जो गन्ना कटाई के कार्य से संबंधित नहीं हैं।

इसे भी पढ़ें : इन औरतों से किस मुंह से वोट मांगोगे ‘साहेब’?

महाराष्ट्र महिला आरोग्य हक, पार्षद एकल महिला संगठन, महिला किसान अधिकार मंच, जन आरोग्य अभियान तथा नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वीमेन ने इस मामले को उजागर किया है। इन संगठनों ने गन्ना कटाई में लगी  महिला श्रमिकों की दयनीय दशा को उजागर किया है। इन महिलाओं को टेंटों में रहना पड़ता है। इन्हें रजोधर्म के दौरान कपड़े बदलने तक के लिए अवकाश नहीं दिया जाता। नहाने-धोने के लिए पानी उपलब्ध नहीं होता। इनमें से अधिकांश मूत्र जनन तंत्र के संक्रमण से पीड़ित रहती हैं, इलाज के अभाव में यह घोर कष्ट सहते हुए काम करने को विवश होती हैं। इन्हें खाना बनाना, दूर से पानी लाना और बच्चों की देखरेख जैसे कार्य भी करने पड़ते हैं। इस प्रकार परिवार के भीतर भी इन पर कार्य का दबाव रहता है। ये गन्ना कटाई के सीजन में रात रात भर सो नहीं पाती हैं। इन्हें कटाई प्रारंभ करने के लिए रात्रि के 2 बजे उठना पड़ता है। मजदूरी कम है। बीमा और स्वास्थ्य सुविधाओं की चर्चा भी ठेकेदारों द्वारा बदजुबानी के तौर पर ली जाती है और इन्हें कार्य से हटा दिया जाता है। कार्य की दशाएं अमानवीय और बर्बर हैं। रजोधर्म के दौरान अवकाश लेने पर प्रतिदिन 500 रुपये से लेकर 1000 रुपये तक पगार में से काटे जाते हैं। ठेकेदारों द्वारा इन महिलाओं पर गर्भाशय निकलवाने हेतु दबाव बनाया जाता है।

यदि वे दबाव के आगे झुक जाती हैं तो सर्जरी में होने वाला खर्च एडवांस के रूप में ठेकेदार द्वारा इन्हें दिया जाता है और बाद में यह पगार में से वसूला जाता है। अपने पेशे की नैतिकता से समझौता कर चुके डॉक्टरों का एक समूह इस आपरेशन को अंजाम देता है। हो सकता है कि इनमें से अनेक डॉक्टर खुद पर होने वाले हमलों के ख़िलाफ़ जारी राष्ट्र व्यापी विरोध प्रदर्शनों का एक भाग रहे होंगे। महाराष्ट्र के अनेक भागों में अकाल के हालात हैं। रोजगार की तलाश में निकले पूरे परिवार के परिवार मराठवाड़ा, पश्चिमी महाराष्ट्र और कर्नाटक में अक्टूबर नवम्बर से मार्च तक चलने वाले गन्ना कटाई कार्य में जुट जाते हैं। यहां पति पत्नी को एक इकाई के रूप में शामिल किया जाता है। इन दंपत्तियों को एक टन गन्ना कटाई के लिए 250 रुपए दिए जाते हैं। पूरे सीजन में एक दंपत्ति लगभग 300 टन गन्ने की कटाई कर लेते हैं। इस प्रकार जो आय होती है उसमें उनको साल भर घर चलाना पड़ता है क्योंकि अकाल के कारण काम उपलब्ध नहीं है। ऐसी दशा में रजोधर्म के दौरान लिया गया अवकाश इन पर भारी पड़ता है। यह अमानवीय परिस्थितियां गर्भाशय रहित महिलाओं के  अभागे ग्रामों का सृजन करती हैं।

हिन्दू बिज़नेस लाइन की 11 अप्रैल 2019 की रिपोर्ट में तथापि नामक एनजीओ द्वारा कराए गए एक अध्ययन का उल्लेख है जिसमें बताया गया है कि ठेकेदारों का निरन्तर दबाव, डॉक्टरों द्वारा दी जा रही भ्रामक जानकारी और स्वयं की शोचनीय आर्थिक दशा जैसे कारक 20 से 35 वर्ष तक आयु की महिलाओं (जो प्रायः अशिक्षित होती हैं) को गर्भाशय निकलवाने के लिए बाध्य कर देते हैं। कालांतर में इनका जीवन रोगों की गिरफ्त में आ जाता है। ये हार्मोनल असंतुलन, वजन में वृद्धि, मधुमेह और मानसिक  रोगों का शिकार हो जाती हैं। कार्य क्षेत्र में इनका जमकर यौन शोषण भी किया जाता है जो इन्हें अर्द्ध विक्षिप्त सा बना देता है। इस एनजीओ का अध्ययन यह दर्शाता है कि धीरे धीरे महिलाओं का गर्भाशय रहित होना इन गन्ना कटाई क्षेत्रों में काम पाने की आवश्यक शर्त बन गया है। दो या तीन बच्चों की युवा माताओं के गर्भाशय निकालने का एक रिवाज सा बन गया है।

अनेक एनजीओज़ के पास ऐसे ढेरों डॉक्यूमेंटेड केसेस मौजूद हैं जिनसे गर्भाशय निकाले जाने के बाद महिलाओं के गंभीर रूप से बीमार होने और भारी रकम इलाज में खर्च करने का पता चलता है। यह खर्च इन्हें ऋण ग्रस्त बना देता है।

मामला उजागर होने के बाद महाराष्ट्र सरकार ने एक विस्तृत गाइडलाइन जारी की है जिसके अनुसार गर्भाशय निकालने से पूर्व कागजी कार्रवाई पूर्ण की जाए, महिला मरीज की फ़ाइल बनाई जाए, इस फ़ाइल में पूरी मेडिकल हिस्ट्री अंकित की जाए। फिर गर्भाशय निकालने की आवश्यकता बताने वाले कारणों का उल्लेख करते हुए यह फ़ाइल डिस्ट्रिक्ट मेडिकल ऑफिसर को भेजी जाए जहां से अप्रूवल मिलने पर सर्जरी की जाए। अस्पतालों में गर्भाशय निकालने से होने वाले हानिकारक परिणामों की जानकारी पोस्टरों के रूप में चस्पा की जाए। 

राष्ट्रीय महिला आयोग ने मामले का संज्ञान लेते हुए महाराष्ट्र सरकार के प्रमुख सचिव को नोटिस जारी किया है। आयोग ने इस मामले पर त्वरित और प्रभावी कार्रवाई करने हेतु  कहा  है। राज्य सरकार ने इस घटना की जांच के लिए एक पैनल का गठन किया है, जिसका नेतृत्व स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव करेंगे। इस पैनल में तीन स्त्री रोग विशेषज्ञ चिकित्सक एवं कुछ महिला विधायक भी सम्मिलित होंगी। यह पैनल दो माह में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप देगा। किंतु वर्षों से चल रहे इस भयंकर कारोबार को राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण प्राप्त न होगा यह सोचना अतिशय भोलापन है। पीड़ित पक्ष भी बहुत कमजोर और हताश है। यही कारण है कि आशंका होती है कि इन उपायों और जांच का प्रयोग मामले को रफा दफा करने एवं इस कारोबार को संगठित रूप से चलाने के लिए भी किया जा सकता है।

महिलाओं को रजोधर्म के दौरान अवकाश देने की मांग लंबे समय से की जाती रही है। इस संबंध कुछ याचिकाएं भी लगाई गईं किंतु मामला किसी परिणाम तक नहीं पहुंचा। बिहार ही एकमात्र राज्य है जो 1992 से महिलाओं को दो दिन का रजोधर्म अवकाश देता है। इस अवकाश के समर्थक यह तर्क देते हैं कि रजोधर्म के प्रारंभिक दिनों में महिलाओं की उत्पादकता कम होती है इसलिए उन्हें अवकाश देने पर उत्पादन में कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा। नियोक्ताओं को उत्पादकता से मतलब रखना चाहिए न कि लंबे कार्य घण्टों के पीछे भागना चाहिए। बहरहाल यह चर्चा संगठित क्षेत्र और सरकारी- अर्द्ध सरकारी कार्यालयों में कार्यरत महिलाओं के अधिकारों को लेकर है।

महाराष्ट्र का  गर्भाशय प्रकरण तो यह दर्शाता है कि असंगठित क्षेत्र में कार्यरत श्रमिक महिलाओं के लिए तो सामंत युगीन बर्बरता कायम है अंतर केवल इतना है कि यंत्रणा के तरीके अब आधुनिक ज्ञान विज्ञान के प्रयोग से जरा और क्रूर हो गए हैं। पिछले कुछ दिनों से यह चर्चा जोरों पर है कि भारत विश्व गुरु बनने की ओर अग्रसर है। महाराष्ट्र की इन घटनाओं को देखने पर ऐसा लगता है कि वह कोई और भारत होगा जो विश्व गुरु बनने जा रहा है। शायद उस भारत में इन और इन जैसी लाखों पीड़ित शोषित महिलाओं के लिए कोई स्थान न होगा। यह दावा भी किया जा रहा है कि भारत आने वाले समय में आर्थिक महाशक्ति का रूप ले लेगा। शायद इस आर्थिक महाशक्ति की बुलंद गर्जना में इन महिलाओं का करुण क्रंदन अनसुना रह जाएगा।

रजोधर्म के पुरुषवादी विमर्श ने पूरी दुनिया में महिलाओं को सामाजिक और धार्मिक अस्पृश्यता तथा तिरस्कार की ओर धकेला है। रजोधर्म के कारण वे कार्यक्षेत्र में भी उपेक्षित हुई हैं। लेकिन मुनाफे के लालच में कार्यकुशलता के नाम पर असहाय, अशिक्षित महिलाओं को शारीरिक रूप से क्षति पहुंचाने का यह संभवतः इकलौता मामला है जिस पर यदि हम असंवेदनशील बने रहेंगे तो हम नारी के दमन के एक भयंकर युग को आमंत्रण देने के अक्षम्य अपराध में सहभागी बनेंगे।

सरकार श्रम सुधारों को क्रियान्वित करने के लिए पूरा जोर लगा रही है। सरकार और उसके समर्थक विशेषज्ञ इन श्रम सुधारों को मजदूर हितैषी बता रहे हैं। किंतु इनका वास्तविक उद्देश्य निजीकरण और कॉरपोरेट आवश्यकताओं के अनुरूप श्रमिक कानून तैयार कर उसे जल्द से जल्द लागू करना है। इस घटना के परिप्रेक्ष्य में हमें सोचना होगा कि क्या अब श्रमिक वर्ग को सामंती दमन और कॉरपोरेट शोषण दोनों का सामना करना होगा। 

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

woman worker
female workers
ncw
Maharashtra
Devendra Fednavis
BJP Govt

Related Stories

महाराष्ट्र में गन्ने की बम्पर फसल, बावजूद किसान ने कुप्रबंधन के चलते खुदकुशी की

महामारी का दर्द: साल 2020 में दिहाड़ी मज़दूरों ने  की सबसे ज़्यादा आत्महत्या

27 सितंबर को भारत बंद का समर्थन करने के लिए महाराष्ट्र में 200 संगठन एक साथ आए

EXCLUSIVE: मोदी सरकार ने मिर्ज़ापुर के किसानों पर डाल दी अकाल की काली छाया!

दिल्ली : राशन को लेकर सरकारों के आपसी झगड़े में ग़रीबों के लिए क्या है?

क्या सरकार किसान आंदोलन को बलपूवर्क खत्म करने की ओर बढ़ रही है?

इस बार हापुस आम पर भी कोरोना की मार! उत्पादक किसानों को भारी नुक़सान

महाराष्ट्र: किसान पहुंचे मुंबई, जारी रहेगा आंदोलन

फिर चल पड़ा है महाराष्ट्र के किसानों का जत्था

किसान आंदोलन का 14वां दिन : सरकार ने किसानों को लिखित प्रस्ताव भेजा


बाकी खबरें

  • मेनका गांधी
    भाषा
    मेनका गांधी की कथित अपमानजनक टिप्पणी के ख़िलाफ़ पशु चिकित्सकों ने किया प्रदर्शन
    24 Jun 2021
    एसोसिएशन ने मांग की कि भाजपा सांसद अपनी टिप्पणी वापस लें और सार्वजनिक तौर पर काफी मांगे। शर्मा ने कहा कि कोविड-19 के संकट के दौरान देश भर में 150 से अधिक पशु चिकित्सक और एक हजार से अधिक पैरा मेडिक्स…
  • CNN न्यूज़ 18 ने बंगाल चुनाव के बाद हुई हिंसा की ख़बर में कई साल पुरानी तस्वीरों का इस्तेमाल किया
    प्रियंका झा
    CNN न्यूज़ 18 ने बंगाल चुनाव के बाद हुई हिंसा की ख़बर में कई साल पुरानी तस्वीरों का इस्तेमाल किया
    24 Jun 2021
    मालूम चला कि ये तस्वीर 2018 की है और आसनसोल में रामनवमी के समय भड़की हिंसा की है. द न्यू इंडियन एक्सप्रेस ने इस तस्वीर का क्रेडिट PTI को दिया है और लिखा है, “रानीगंज के बर्धमान में रामनवमी के जुलूस के…
  • दो-बच्चों की नीति राजनीतिक रूप से प्रेरित, असली मक़सद मतदाताओं का ध्रुवीकरण
    नीलांजन मुखोपाध्याय
    दो-बच्चों की नीति राजनीतिक रूप से प्रेरित, असली मक़सद मतदाताओं का ध्रुवीकरण
    24 Jun 2021
    दरअसल दक्षिणपंथ की ओर से इस नीति की वकालत करने वालों का निहित संदेश यही है कि हिंदुओं के मुक़ाबले मुसलमानों के ज़्यादा बच्चे हैं और सरकार ने दो से ज़्यादा बच्चों वाले परिवारों को दंडित करके साहस…
  • ईएमएस स्मृति 2021 और केरल में वाम विकल्प का मूल्यांकन
    अज़हर मोईदीन
    ईएमएस स्मृति 2021 और केरल में वाम विकल्प का मूल्यांकन
    24 Jun 2021
    इस वर्ष के पैनल ने इस बात की तरफ़ इशारा किया कि केरल की वर्तमान एलडीएफ़ सरकार अगले पांच वर्षों में कैसे आगे बढ़ने की योजना बना रही है, जिसमें सार्वजनिक शिक्षा और ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था, जन-योजना और…
  • CPM
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    मध्य प्रदेश रेत खनन पर माकपा ने कहा शिवराज सरकार रेत माफियों की है
    24 Jun 2021
    मंगलवार को सरकार ने रेत व्यपारियों को राहत देने का ऐलान किया। जिसमें रेत व्यपारियों को चार माह की रोयल्टी का 50 फीसद माफ करने और बाकी का 50 फीसद अगले साल जमा करने का  निर्णय किया गया है। जिसका अब…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License