NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
नेताओं के बिगड़े बोल: इतना सब हार के क्या जीतोगे नेताजी!
इस चुनाव में राजनेताओं के हर भाषण ने राजनीतिक विमर्श के पतन का नया कीर्तिमान रचा है।
अमित सिंह
21 May 2019
फाइल फोटो
(फोटो साभार: दहिंदू)

चौकीदार चोर है, गोडसे देशभक्त है, राजीव गांधी भ्रष्टाचारी नंबर वन हैं, मोदी उस दुल्हन की तरह हैं जो रोटी कम बेलती है और चूड़ियां ज्यादा खनकाती है, खुद को दलित बताने वालीं मायावती फेशियल कराती हैं, बाबर की औलाद को देश सौंपना चाहते हो, पीएम दुर्योधन नहीं जल्लाद हैं, बीजेपी नेताओं को दस-दस जूते मारो, अनारकली, खाकी अंडरवियर, कंकड़ के लड्डू, लोकतंत्र का थप्पड़...ये एक बानगी है। इस बार के आम चुनाव में हमारे नेताओं द्वारा दिए भाषणों की। 

अब जब देश में चुनावी अभियान खत्म हो गया है तो हम अपने प्रिय नेताओं द्वारा दिए गए भाषणों पर बात कर लें। इन बयानों को देखने और सुनने के बाद यह बात साफ तौर पर कही जा सकती है कि भारत की सियासत में भाषा की ऐसी गिरावट शायद पहले कभी नहीं देखी गयी। ऊपर से नीचे तक सड़कछाप भाषा ने अपनी बड़ी जगह बना ली है। इस चुनाव में राजनेताओं के हर भाषण ने राजनीतिक विमर्श के पतन का नया कीर्तिमान रचा है।

इस बार का चुनाव व्यक्तिगत हमलों, विषाक्त चुनाव प्रचार और दलों-नेताओं के हर तरह की मर्यादा को ताक पर रख देने के लिए जाना जाएगा। हैरान करने वाली बात तो ये है कि इस तरह की अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करने में पक्ष और विपक्ष दोनों तरफ के नेताओं में होड़ लगी रही।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी, प्रज्ञा ठाकुर, योगी आदित्यनाथ, ममता बनर्जी, प्रियंका गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, नवजोत सिद्धू समेत तमाम दूसरे नेताओं ने भाषा की मर्यादा का बार-बार उल्लंघन किया। 

कैमरों की चकाचौंध और पल-पल की कवरेज करने वाली मीडिया या कहें सोशल मीडिया की मौजूदगी के बावजूद हमारे चुनाव अभियानों से गंभीरता गायब रही। जनता से जुड़े मुद्दे गायब रहे।

समस्या यह रही कि लंबा चुनावी कार्यक्रम होने के कारण हमारे नेताओं ने बहुत सारे भाषण दिए। वो खूब बोले लेकिन बोलने की मर्यादाएं टूटती रहीं और भाषणों से संवेदनाएं गायब रहीं। सारी बहस आरोप-प्रत्यारोप पर टिकी रही और खुद को दूसरे से बेहतर बनाने पर खत्म हो गईं। 

वैसे भारतीय राजनीति में भाषा का पतन कोई नई परिघटना नहीं है। इसलिए इसका श्रेय सिर्फ इस बार के चुनावी अभियान को नहीं दिया जा सकता। इससे पहले कई नेता और चुनाव हो चुके हैं जो राजनीतिक विमर्श या संवाद का स्तर गिराने में अपना योगदान दे चुके हैं।

लेकिन इससे पहले के चुनावों में एक योगी या एक आज़म खान होते थे जिन्हें हम फ्रिंज एलीमेंट कहके खारिज कर देते थे। इंतेहा इस बार रही कि मोर्चा प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री जैसे संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों ने संभाल लिया था। 

इससे चौतरफा गिरावट आई। बड़े राजनेताओं ने रास्ता दिखाया और छोटे व नए लोगों ने इसको सफलता का सूत्र मान लिया। अखबार, टीवी और सोशल मीडिया इस तरह की अभद्र भाषा का प्रचारक और विस्तारक बना। 

चुनावी अभियान के दौरान न पद का लिहाज किया गया और न ही उम्र का ख्याल रखा गया और न ही भाषा की मर्यादा रखी गई। हमाम में सब नंगे होने को आतुर नजर आए। चुनावी भाषणों से हास परिहास, व्यंग्य, चुटीलापन सब गायब रहा, इसकी जगह गालियां और सड़कछाप शब्दों ने ली।

दरअसल इस बार के चुनावी अभियान से यह साफ है कि राजनेताओं ने अपनी कर्कश भाषा और भाषण शैली को ही अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी और अपनी सफलता का सूत्र मान लिया है। 

एक पक्ष यह भी गौर फरमाने वाला है कि जिन जनसभाओं में नेता संबोधित करने पहुंचते हैं, वहां हर तरह की भीड़ इकट्ठा होती है। महिलाएं होती हैं, बच्चें होते हैं तो बड़े बूढ़े भी शरीक होते हैं। इसके बावजूद नेता अमार्यादित बयान देकर जाने क्या जताना चाहते हैं। 

दरअसल राजनीति जिसे देश चलाना है और देश को रास्ता दिखाना है, वह खुद गहरे भटकाव की शिकार है। हमारे नेता बार बार यह भूल जाते हैं कि उनका काम सिर्फ सत्ता हासिल करना नहीं है, देश और बेहतर समाज के निर्माण की जिम्मेदारी भी उनकी ही है। 

कितना अच्छा होता अगर हमारे नेता भाषा और संवाद के मामले भी उतने ही नफासत पसंद या सुरुचिपूर्ण होते, जितने वे पहनने-ओढ़ने के मामले में हैं।

loksabha elcetion 2019
loksabha election
BJP
Narendra modi
Congress
Rahul Gandhi
MAYAWATI
AZAM KHAN
mamata banerjee

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति


बाकी खबरें

  • ganguli and kohli
    लेस्ली ज़ेवियर
    कोहली बनाम गांगुली: दक्षिण अफ्रीका के जोख़िम भरे दौरे के पहले बीसीसीआई के लिए अनुकूल भटकाव
    19 Dec 2021
    दक्षिण अफ्रीका जाने के ठीक पहले सौरव गांगुली बनाम विराट कोहली की टसल हमारी टीवी पर तैर रही है। यह टसल जितनी वास्तविक है, यह इस तथ्य पर पर्दा डालने के लिए भी मुफ़ीद है कि भारतीय टीम ऐसे देश का दौरा कर…
  • modi
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    चुनावी चक्रम: लाइट-कैमरा-एक्शन और पूजा शुरू
    19 Dec 2021
    सरकार जी उतनी गंभीरता, उतना दिमाग सरकार चलाने में नहीं लगाते हैं जितना पूजा-पाठ करने में लगाते हैं। यह पूजा-पाठ चुनाव से पहले तो और भी अधिक बढ़ जाता है। बिल्कुल ठीक उसी तरह, जिस तरह से किसी ऐसे छात्र…
  • teni
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे : जयपुर में मौका चूके राहुल, टेनी को कब तक बचाएगी भाजपा और अन्य ख़बरें
    19 Dec 2021
    सवाल है कि अजय मिश्र को कैसे बचाया जाएगा? क्या एसआईटी की रिपोर्ट के बाद भी उनका इस्तीफा नहीं होगा और उन पर मुकदमा नहीं चलेगा?
  • amit shah
    अजय कुमार
    अमित शाह का एक और जुमला: पिछले 7 सालों में नहीं हुआ कोई भ्रष्टाचार!
    19 Dec 2021
    यह भ्रष्टाचार ही भारत के नसों में इतनी गहराई से समा चुका है जिसकी वजह से देश का गृह मंत्री मीडिया के सामने खुल्लम-खुल्ला कह सकता है कि पिछले 7 सालों में कोई भ्रष्टाचार नहीं हुआ।
  • A Critique of Capitalism’s Obscene Wealth
    रिचर्ड डी. वोल्फ़
    पूंजीवाद की अश्लील-अमीरी : एक आलोचना
    19 Dec 2021
    पूंजीवादी दुनिया में लगभग हर जगह ग़ैर-अमीर ही सबसे ज़्यादा कर चुकाते हैं और अश्लील-अमीरों की कर चोरी के कारण सार्वजनिक सेवाओं में होने वाली कटौतियों की मार बर्दाश्त करते रहते हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License