NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
नींव की शिलायें दो महिलायें, जिन्होंने खामोश कर दिए मौन को मुखर बना दिया
मई दिवस की महिला नेत्रियां जिन्होंने इतिहास रचने में अपना योगदान दिया I
बादल सरोज
30 Apr 2018
may day

मई दिवस दुनिया को बेहतर बनाने का सपना देखने वालों का त्यौहार है।  एकमात्र ऐसा पर्व जिसे देश-धर्म-रंग-भाषा-जाति-सम्प्रदाय और नस्लों से ऊपर उठकर पृथ्वी के हर कोने में साथ मनाया जाता है।  आठ घंटे काम की मांग को लेकर 1 मई को अमरीका के शिकागो शहर के हे मार्किट स्क्वायर पर हुई मजदूर रैली पर दमन की याद एक सुखद समाज बनाने की जद्दोजहद बन गयी। 

दुनिया और पृथ्वी दोनों ही स्त्रीलिंग शब्द हैं। इसी तरह  हिंदी में क्रान्ति और अंगरेजी में रेवोल्यूशन ये दोनों भी स्त्रीलिंग शब्द हैं। लिहाजा स्त्रियों की भागीदारी के बिना किसी क्रान्ति की कल्पना करना ही अशुध्दि होगी - और यह सिर्फ भाषायी अशुध्दि भर  नहीं होगी।  1886 के मई दिवस की लड़ाई में भी अनेक शानदार नेत्रियां थीं।  फिलहाल इनमे से दो के बारे में ;

लूसी पार्सन्स  (1853-1942)

लूसी 1853 में काले, स्पैनिश और इंडियन पुरखों के परिवार में टैक्सास की जान्सन काउंटी में जन्मी थीं। उनकी शुरूआती पृष्ठभूमि के बारे में मालूमात बहुत कम है। मगर बाद के  वर्षों में रोजर परिवार ने दावा किया था कि लूसी असल में उनकी पुरानी गुलाम, मैलिन्डा है जो गृहयुद्ध के वक्त उन्हें छोड़ गई थी। दक्षिण में लूसी जरूर रिपब्लिकन थी। मगर वे और अल्बर्ट जब 1873 में शिकागों आये तो उन्होंने पाया कि यहां के रिपब्लिकन्स नस्लीय व स्थानीय समूहों तथा अल्पसंख्यकों की समस्याओं के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैया रखते है। 1877 में वे दोनों सोशलिस्टिक लेबर पार्टी में शामिल हो गए। लूसी ‘द अलार्म’ अखबार  की नियमित लेखिका बन गई। अनगिनत रैली और सभाओं में बोलने वाली लूसी अपने पति और  बच्चों के साथ 1 मई 1886 को शिकागो में हुई 80 हजार मजदूरों की विराट रैली के अगले जत्थे में थीं। 

अल्बर्ट पार्सल्स को सजा सुनाये जाने के बाद लूसी ने पूरे अमरीका में घूम घूमकर हेमार्केट चौराहे की सच्चाई लोगों को बताई। वह यूरोप और लंदन के दौरों पर भी गईं जहां जार्ज बॉर्नार्ड शॉ और आस्कर वाइल्ड जैसे बुद्धिजीवियों को भी इस अभियान से जोड़ा। 

शिकागो लौटकर खुद लूसी ने मई दिवस मुकदमें की परतें खोलने वाली पुस्तिका ‘‘ क्या यह सच्चा इंसाफ था : गर्वनर के नाम अपील’’ की पांच हजार प्रतियां, बार बार पुलिस के द्वारा पकड़े जाने के बाद भी बेची। अल्बर्ट की फांसी के बाद लूसी ने उसकी जिंदगी पर किताब लिखी जिसके समर्पण में उसने लिखा कि ‘‘जिसका एक मात्र अपराध यह था कि वह अपने वक्त से काफी पहले हुआ..’’

त्रासदी ने लूसी के साथ नहीं छोड़ा। उसके दोनों बच्चे लुलू और अल्बर्ट जूनियर जल्दी ही मर गए। उनकी कब्र की मिट्टी उसने हमेशा अपने साथ सहेज कर रखी। बाकी पूरा जीवन लूसी ने सामाजिक न्याय के लिए समर्पित कर दिया। बहुत कम लोग जानते है कि यह लूसी थी जिसने ‘हड़ताली धरने’ के हथियार को खोजा था। 1905 में हुए औद्योगिक मजदूरों के विश्व सम्मेलन में बोलते हुए उसने कहा था कि -  ‘‘भविष्य की हड़तालों के बारे में मेरी धारणा, हड़ताल करके बाहर चले जाने और भूखों मरने की नहीं है। बल्कि हमें हड़ताल करके अंदर ही धरना देकर बैठना चाहिए और उत्पादन से जुड़ी जरूरी संपत्तियों को अपने आधिपत्य में लेना चाहिए।’’

7 मार्च 1942 शनिवार को दोपहर में लूसी के मकान में आग लग गई। वह अब अंधी हो चुकी थी, इसलिए बिल्डिंग से बाहर नहीं निकल सकी और उसी आग में भस्म हो गई उसे बचाने की असफल कोशिश में 32 साल से साथ रह रहे जॉर्ज मार्कशाल की भी मौत हो गई। उसकी व दोनों बच्चों की भस्म के साथ उसे अल्बर्ट पार्सन्स की कब्र के पास ही दफना दिया गया। 

उसके मरते ही 2500 से 3000 किताबों वाली उसकी लाइब्रेरी अमरीकी पुलिस ने गायब कर दी। लूसी ने अपना मकान और जमीन बेचकर उस राशि को शहीदों के आंदोलन को दिए जाने की वसीयत  की थी। इस तरह उसने अपनी मुहिम अपनी मौत के बाद भी जारी रखी। 

नीना वान जांट स्पाइज

खाये पीये परिवार की उत्सुकता के चलते आगस्ट स्पाइज के मुकदमें को सुनने अदालत पहुंची नीना वान बाद में न केवल उसकी दोस्त बन गई बल्कि आगस्ट के जेल में रहते ही उससे शादी कर उसकी पत्नी भी बन गई। एक दवा कंपनी के मालिक की बेटी नीना का पूरा नाम रोजेनिया क्लार्क वान जांट था। 1883 में उसने स्नातक की डिग्री ली। रईसी उसे सिर्फ पिता की ओर से ही नहीं मिली थी। उसकी मौसी ने उसके लिए पांच लाख डॉलर इस उम्मीद से रख छोड़े थे कि वह अमीर सोसायटी में रहेगी और ‘अच्छी’ शादी करेगी। सजायाफ्ता ऑगस्ट स्पाइज से शादी करने के नतीजे में यह दौलत भी नीना से छिन गई। 

मुकदमें के दौरान सुबह और शाम दोनों वक्त अलग-अलग  शानदार गाउन पहनकर अदालत में बैठने वाली यह नवयुवती उस वक्त के अखबारों के आकर्षण का केन्द्र बनी रही। उसके और आगस्ट  स्पाइज के प्रेम के किस्से आम होते रहे। उसकी लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि एक अजायब घर में उसकी मोम की मूर्ति तक रख दी गई। जिस पर मुकदमा ठोक कर नीना ने हरजाना वसूला और हे मार्केट के मुकदमें को लडऩे वाली कमेटी को वह राशि सौंप दी। आगस्ट की आत्मकथा लिखने में भी नीना ने उसकी मदद की। 

जब फांसी का वक्त नजदीक आया और जेल अधिकारियों ने नीना की ऑगस्ट से मुलाकात पर रोक लगा दी और कहा कि वह न रिश्तेदार है न पत्नी तो उसने ऑगस्ट से शादी की पेशकश की। तत्कालीन प्रशासन ने जब जेल में शादी की अनुमति नहीं दी तो नीना ने बाहर ही एवजी विवाह कर खुद के लिए आगस्ट की पत्नी का दर्जा हासिल कर लिया। बाद के बर्षों में जब उसने लूसी पार्सन्स के साथ अनगिनत जुलूसों में भाग लिया।

मई दिवस के शहीदों के साथ अपने इस अनूठे और अपरिमित लगाव और समर्पण के चलते उसने बाकी जिंदगी गरीबी में गुजारी। मगर न अपने पिता से पैसा मांगा न मौसी के पास गई। अप्रैल 1936 में उसकी मौत हो गई। उसकी अंतिम इच्छा के अनुरूप लूसी पार्सन्स ने उसके अंतिम संस्कार में भाषण दिया। 

एक सहृदय नारी-नीना-ने अपने घर में अनेक बेजुबान जानवर पाल रखे थे। वह खुद गरीबी में रही मगर अपनी मौत के बाद तीन हजार डॉलर इन जानवरों की देखरेख के लिए एक संस्था के नाम छोड़ गई थी। यह बात अलग है कि बाद में इस संस्था ने नीना की कब्र पर स्मृति पत्थर लगाने के लिए 10 डॉलर देने से भी मना कर दिया। 

लूसी पार्सन्स और नीना स्पाइज का जिक्र इसलिए कि ये दोनों ही मई दिवस के शहीदों की पत्नियां थीं। मगर ऐसी सैंकड़ों महिलायें और भी हैं जो ‘हे मार्केट’ शिकागो से लेकर दुनिया के हर कोने में लड़ रही है। इस विश्वास के साथ कि ‘‘लड़ेेगी तो जीतेंगी जरूर’’ इस यकीन के साथ कि आने वाली दुनिया इतनी निर्मम नहीं होगी I

lucy parsons
नीना वान जांट स्पाइज
May Day
मज़दूर दिवस
मई दिवस

Related Stories

श्रम मुद्दों पर भारतीय इतिहास और संविधान सभा के परिप्रेक्ष्य

मज़दूर दिवस : हम ऊंघते, क़लम घिसते हुए, उत्पीड़न और लाचारी में नहीं जियेंगे

दिन-तारीख़ कई, लेकिन सबसे ख़ास एक मई

ज़रूरी है दलित आदिवासी मज़दूरों के हालात पर भी ग़ौर करना

मई दिवस: मज़दूर—किसान एकता का संदेश

इतवार की कविता : मज़ूर

नींव की शिलायें दो महिलायें, जिन्होंने खामोश कर दिए मौन को मुखर बना दिया

मुफ्त टीकाकरण की मांग को लेकर मई दिवस पर ट्रेड यूनियनों का विरोध प्रदर्शन

साल 2020 का मई दिवस : श्रमिक महज़ वायरस से ही नहीं लड़ रहे, बल्कि एक निर्दयी पूंजीवादी व्यवस्था से भी लड़ रहे हैं

दिल्ली के मजदूर एकजुट


बाकी खबरें

  • putin
    एपी
    रूस-यूक्रेन युद्ध; अहम घटनाक्रम: रूसी परमाणु बलों को ‘हाई अलर्ट’ पर रहने का आदेश 
    28 Feb 2022
    एक तरफ पुतिन ने रूसी परमाणु बलों को ‘हाई अलर्ट’ पर रहने का आदेश दिया है, तो वहीं यूक्रेन में युद्ध से अभी तक 352 लोगों की मौत हो चुकी है।
  • mayawati
    सुबोध वर्मा
    यूपी चुनाव: दलितों पर बढ़ते अत्याचार और आर्थिक संकट ने सामान्य दलित समीकरणों को फिर से बदल दिया है
    28 Feb 2022
    एसपी-आरएलडी-एसबीएसपी गठबंधन के प्रति बढ़ते दलितों के समर्थन के कारण भाजपा और बसपा दोनों के लिए समुदाय का समर्थन कम हो सकता है।
  • covid
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 8,013 नए मामले, 119 मरीज़ों की मौत
    28 Feb 2022
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 1 लाख 2 हज़ार 601 हो गयी है।
  • Itihas Ke Panne
    न्यूज़क्लिक टीम
    रॉयल इंडियन नेवल म्युटिनी: आज़ादी की आखिरी जंग
    28 Feb 2022
    19 फरवरी 1946 में हुई रॉयल इंडियन नेवल म्युटिनी को ज़्यादातर लोग भूल ही चुके हैं. 'इतिहास के पन्ने मेरी नज़र से' के इस अंग में इसी खास म्युटिनी को ले कर नीलांजन चर्चा करते हैं प्रमोद कपूर से.
  • bhasha singh
    न्यूज़क्लिक टीम
    मणिपुर में भाजपा AFSPA हटाने से मुकरी, धनबल-प्रचार पर भरोसा
    27 Feb 2022
    मणिपुर की राजधानी इंफाल में ग्राउंड रिपोर्ट करने पहुंचीं वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह। ज़मीनी मुद्दों पर संघर्षशील एक्टीविस्ट और मतदाताओं से बात करके जाना चुनावी समर में परदे के पीछे चल रहे सियासी खेल…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License