NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
फिलिस्तीन
अमेरिका
नक़बा डे के 71 साल: फ़िलिस्तीन के लिए मातम का दिन
दिल्ली स्थित इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेन्टर में आयोजित 71वें ‘नक़बा डे’ पर "इंडियन नेशनल अलायंस फ़ॉर पैलेस्टाइन" द्वारा एक परिचर्चा आयोजित की गई। जिसमें फ़िलिस्तीन के लिए विनाश के दिन "नक़बा डे" पर चर्चा हुई।
फ़र्रह शकेब
16 May 2019
यक़बा डे के 71 साल: फ़िलिस्तीन के लिए मातम का दिन

"पूरी दुनिया जानती है के फ़िलिस्तीन के लिए अमेरिका कभी भी एक बेहतर मध्यस्थ नहीं रहा है बल्कि उसने हमेशा इज़राइली हितों का ध्यान रखा है लेकिन अमेरिका को पता होना चाहिए कि हमारी लड़ाई एक सदी पुरानी है और इसे हम यूँ ही नहीं छोड़ देंगे। जेरूसलेम पर हमारा हक़ है, बैतूल मुक़ददस हमारा है और फ़िलिस्तीन हमारी मातृभूमि है, हम इस पर किसी भी तरह का समझौता नहीं कर सकते।"

ये बातें 15 मई को नई दिल्ली स्थित इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेन्टर में आयोजित 71वें ‘नक़बा डे’ पर "इंडियन नेशनल अलायंस फ़ॉर पैलेस्टाइन" द्वारा आयोजित एक परिचर्चा में भारत में फ़िलिस्तीनी राजदूत अदनान अबू अल हैजा ने कही हैं। 

इस कार्यक्रम में बतौर वक्ता दिल्ली विश्विद्यालय के प्रोफ़ेसर अपूर्वानन्द ने कहा, "ये सबसे बड़ा झूठ है जो आप तक पहुँचाया गया है कि फ़िलिस्तीनी अपने वतन वापस नहीं लौट सकते, जबकि ये संभव है अगर ईमानदारी से इसका प्रयास किया जाये। अगर फ़िलिस्तीन पर हो रहे अत्याचार को दुनिया स्वीकार करती है तो ये दुनिया पर दाग़ है, फ़िलिस्तीन पर नहीं।" 

इसी कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार व मानव अधिकार कार्यकर्ता फ़ादर जॉन दयाल ने कहा कि आज से 35 साल पहले भारत का ये हाल नहीं था,जो अब है। आलम तो ये है कि फ़िलिस्तीन के ख़िलाफ़ हो रही हिंसा की बात करना तो दूर बल्कि इसे यहाँ के कुछ लोग सेलिब्रेट करने लगे हैं और उन्हें सत्ता का संरक्षण प्राप्त है।" 

वरिष्ठ पत्रकार सीमा मुस्तफ़ा ने भी इस परिचर्चा में अपने विचार रखते हुए कहा के क्योंकि एक वक़्त पर भारत भी ब्रिटिश हुकूमत का गुलाम था। और ग़ुलामी की पीड़ा भारत जानता है इसलिए भारत हमेशा फ़िलिस्तीन के साथ खड़ा रहा है और इज़राइल से हमारे संबंध कोई ख़ास नहीं थे लेकिन अब हमारी सरकार फ़िलिस्तीन से दूर और इज़रायल के क़रीब होती जा रही है जो कि बहुत ही दुखद है।" 

इस कार्यक्रम के दौरान ‘इंडिया-फ़िलिस्तीन फ्रेंडशिप फ़ोरम’ से जुड़ी सबा डावे ने ‘नॉट इन माई होम’ कैम्पेन के बारे में बताया और वहाँ उपस्थित लोगों से अपील की कि आप कोका कोला, लोरियल, नेस्ले, नाईकी और जॉनसन एंड जॉनसन जैसी कम्पनियों के उत्पादों का बहिष्कार करें क्योंकि इन कंपनियों को आपका दिया हुआ पैसा निर्दोष फ़िलिस्तीनियों के लिए के लिए गोली का काम करता है। सबा ने अपील की कि हमें उन तमाम कंपनियों का बायकॉट करना चाहिए, जो इज़राईल जैसे असभ्य और क्रूर देश का समर्थन करती हैं। 
इस परिचर्चा में यूनाइटेड अगेंस्ट हेट से नदीम ख़ान, ख़ालिद सैफ़ी, इंडो पाल फ़ाउंडेशन के कर्ता-धर्ता गौहर इक़बाल इत्यादी ने भी अपने विचार रखे। ग़ौरतलब है कि 15 मई 1948 के दिन ही फ़िलिस्तीन की ज़मीन पर अरब-इज़रायल युद्ध के दौरान अरबों की ज़मीन पर क़ब्ज़े के साथ इज़राइल अस्तित्व में आया और उसी दिन से फ़िलिस्तीनियों पर अत्याचार और निर्ममता की शुरुआत हुई। 

उसके साल भर बाद 1949 की शुरुआत में, इज़राइल राज्य की स्थापना के लगभग एक साल बाद, 15 मई को पूर्वी तट के कई शहरों (जॉर्डन के शासन में) को प्रदर्शनों, हड़ताल, काले झंडे उठाने, और दौरान मारे गए लोगों की क़ब्रों की यात्रा के रूप में चिह्नित किया गया और फ़िलस्तीनियो ने अपनी ज़मीन पर जबरन बसाए गए इज़रायल के ख़िलाफ आवाज़ उठानी शुरू की। विरोध प्रदर्शनों के ये कार्यक्रम मानवाधिकार कार्यकर्ता और छात्र संघों, सांस्कृतिक संस्थाओं और स्पोर्ट्स क्लबों, स्काउट्स क्लबों, शरणार्थियों की समितियों और मुस्लिम ब्रदरहुड द्वारा आयोजित किए जाने लगे।  

1950 के दशक के उत्तरार्ध में, 15 मई को अरब दुनिया में फ़िलिस्तीन दिवस के रूप में जाना जाने लगा जिसका उल्लेख अरब और मुस्लिम देशों में मीडिया ने फ़िलिस्तीन के साथ अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता के दिन के रूप में किया है और तब से ये दिन पूरी दुनिया में ‘आपत्ति दिवस’ के रूप में तथा इज़रायल के ज़ुल्म के ख़िलाफ़ काला दिवस के रूप में मनाया जाता है, जिसे अरबी में ‘अल-नक़बा’ कहा जाता है। 15 मई को फ़िलिस्तीनी जनता साल का सबसे दुखद दिन मनाती है जिसे वो 'नक़बा' कहती है। नक़बा का अर्थ है 'विनाश', या 'तबाही' ये वो दिन था जब फ़िलिस्तीनियों से उनकी ज़मीन छिन गई और विगत 71 साल से वे अपने मातृभूमि की स्वाधीनता के लिऐ संघर्ष कर रहे हैं। नक़बा यानी विनाश के दिन की शुरुआत विधिवत रूप से 1998 में फ़िलस्तीनी क्षेत्र के तत्कालीन राष्ट्रपति यासिर अराफ़ात ने की थी। 15 मई 1948 के दिन साढ़े सात लाख फ़िलस्तीनी,इज़राइली सेना के बढ़ते क़दमों की वजह से घरबार छोड़ कर भागे या जबरन हिंसा के बल पर भगाए गए थे। कइयों ने ख़ाली हाथ ही अपना घरबार छोड़ दिया था। कुछ घरों पर ताला लगाकर भाग निकले। यही चाबियां बाद में इस दिन के प्रतीक के रूप में सहेज कर रखी गईं।

उस दुनिया के सामने मानवता पर एक ऐसा प्रहार हुआ था जिसकी टीस आज भी दुनिया भर के मानवता प्रेमी और मानवाधिकार के नैतिक मूल्यों को समझने वाले महसूस करते हैं जब भूमध्य सागर के पूर्वी तट पर स्थित पश्चिमी एशिया के फ़िलिस्तीन से उसके मूल निवासियों को बेघर कर के नस्ल परस्ती की बुनियाद पर स्थापित एक ज़ायोनिस्ट राज्य की अवैध स्थापना की गयी थी फ़िलस्तीनियों को हिंसा के बल पर उनके ही देश से निकाल दिया गया और बेघर फ़िलिस्तीनी पूर्वी तट, ग़ाज़ा पट्टी और फ़िलिस्तीन के पड़ोसी देशों में शरणार्थी बना दिए गए। इस वीभत्स घटना को वैश्विक इतिहास में फ़िलिस्तीनियों द्वारा अपने घरों से निर्मम विस्थापन के स्मरणोत्सव के तौर पर दर्ज कर दिया गया। 
यूँ तो फ़िलिस्तीनियों के कैलेंडर में कई दिन प्रतीकात्मक महत्व रखते हैं जैसे 30 मार्च को भूमि दिवस के रूप में याद किया जाता है जिसकी एक अलग कहानी है और पवित्र रमज़ान में अंतिम शुक्रवार को यौम अल क़ुदस मनाया जाता है, लेकिन नक़बा दिवस का इतिहास फ़िलिस्तीनियों के अतीत की वो कहानी है कि इज़रायल के संस्थापकों में से एक और फ़िलिस्तीन के प्रथम प्रधानमंत्री डेविड बेन गोरियन ने कहा था फ़िलिस्तीनी बूढ़े मर जाएंगे और उनकी नई पीढ़ियाँ इसे भूल जाएंगी लेकिन फ़िलिस्तीनियों ने अपने इतिहास को कभी भुलाया नहीं और न ही उनके हौसले कभी पस्त हुए हैं और वो अपने अधिकारों के लिए निरंतर संघर्ष कर रहे हैं। विगत 70 सालों से अधिक समय से अपनी ही धरती पर फ़िलिस्तीनी जनता यहूदियों और सह्यूनियों के अत्याचार और ज़ुल्म का शिकार हो रहे हैं जिसका सबसे बड़ा कारण शहर येरूशलम पर इस्राइलियों का कब्ज़ा है और फ़िलिस्तीनियों के द्वारा न केवल स्वतंत्र फ़िलिस्तीनी राष्ट्र का अस्तित्व मायने रखता है बल्कि येरुशलम में मस्जिद ए अक़सा की हिफ़ाज़त भी वो अपना नैतिक दायित्व समझते हैं क्यूंकि पूरी दुनिया के मुसलामानों की आस्था उससे है।  

फ़िलिस्तीन की तरफ़ एक बार नज़र उठाइये जहाँ सात दशकों से अधिक का समय बीत चूका है और 1948 में जब ब्रिटेन अमेरिका और कुछ अन्य यूरोपीय देशों की साम्राज्यवादी पूंजीवादी शक्तियों ने सत्ता और दौलत अहंकार के नशे में चूर हो कर अरब शहंशाहों की ख़ामोश हिमायत के साथ पूरी दुनिया से यहूदियों को जबरन पूरी दुनिया से जमा कर के अरब की सरज़मीं पर अवैध रूप से क़ब्ज़ा कर बसा दिया और उस भू भाग को इज़राइल का नाम दिया गया।

उससे पहले फ़िलिस्तीन एक सार्वभौमिक राष्ट्र था जो ऑटोमन साम्राज्य के पतन के बाद ब्रिटेन के अधीन हो गया था। ग्रेट ब्रिटेन ने फ़िलिस्तीन में अपने अधिकारों का उपयोग दोहरी राजनीति के अन्तर्गत किया। एक तरफ़ उसने उसने प्रथम विश्व-युद्ध के समय अरबों से यह वायदा किया कि युद्ध में विजय के बाद फ़िलिस्तीन को अरब राष्ट्रों के साथ मिला दिया जायेगा और अरब तुर्क शासन से मुक्त हो सकेंगे और इसी वादे के आधार पर ऑटोमन साम्राज्य के विरुद्ध अरबों का इस्तमाल किया और दूसरी तरफ़ पूरी दुनिया यहूदी समाज को भी ग्रेट बिटेन ने फिलिस्तीन में बसने का निमन्त्रण दे दिया क्योंकि उस पर संयुक्त राज्य अमरीका की सरकार व उसके यहूदी समाज का दबाव पड़ रहा था। विश्व के यहूदियों ने इस आमंत्रण रुपी घोषणा को फिलिस्तीन उन्हें सौंपने का ब्रिटिश वायदा मान लिया और दुनिया भर से यहूदी फिलिस्तीन में आकर बसने व बसाये जाने लगे। 

यहीं से इस्राईल को अरबों की ज़मीन पर जबरन स्थापित करने की प्रष्ठभूमि की शुरुआत हुई। पहले विश्व युद्ध के बाद फ़िलिस्तीन में एक नई सरकार का गठन हुआ, इस दौरान बड़ी संख्या में फ़िलिस्तीन में यहूदी शरण लेने लगे, यहाँ इस समय यहूदियों की कुल आबादी सिर्फ 3 फ़ीसदी थी, लेकिन अगले तीस साल में यह बढ़कर 30 फीसदी तक पहुंच गई और जर्मनी में होलोकास्ट के बाद तो सारे विश्व से यहूदी फिलिस्तीन की ओर भागने लगे, क्योंकि उन्हें लगने लगा था अगर उन्हें जीवित रहना है तो फ़िलिस्तीन ही उन्हें आसरा दे सकता है। 

लेकिन उस आसरे को फ़िलिस्तीनियों की कमज़ोरी समझ कर उन्हें ही उनकी ज़मीन से बेदख़ल करने वाले इज़राइलियों के ख़िलाफ़ आज पूरी दुनिया में घृणा और नफ़रत है। पूरी दुनिया में निरंतर फ़लस्तीनियों के हिमायतियों का दायरा बढ़ रहा है संयुक्त राष्ट्र संघ में अमेरिका और इज़रायल कोशिशों के बावजूद फ़िलिस्तीन समर्थक देशों की संख्या बढ़ रही है और आज जहाँ फ़िलिस्तीन और इज़रायल से संबंधित किसी मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र संघ में वोटिंग होने पर फ़िलिस्तीन को मिलने वाली वोटों की संख्या सैकड़ों में होती है तो इज़रायल को मिले मत तीस चालीस से अधिक नहीं होते। पूरी दुनिया में अमेरिका और इज़रायल की साम्राज्य वादी और पूंजीवादी नीतियों के विरुद्ध विरोध के स्वर मुखर हो रहे हैं और अब तक स्तिथि यहाँ तक हो चुकी है की ख़ुद अमेरिका और इज़रायल की धरती पर फ़िलिस्तीन समर्थकों की संख्या में वृद्धि होती जा रही है वहाँ अपने ही शासकों के विरुद्ध आमजनमानस में असंतोष पनप रहा है लेकिन अंकल साम और अन्य यूरोपीय पूंजीवादी शक्तियाँ अमन और शान्ति की ठेकेदारी का बीड़ा उठाये फ़िलिस्तीनियों के उजड़ते आशियानों को देख कर अट्टहास लगा रही हैं।  

Palestine
Israel Occupied Palestine
Yaqba Day
America and izrael
Israel
israel america

Related Stories

फ़िनलैंड-स्वीडन का नेटो भर्ती का सपना हुआ फेल, फ़िलिस्तीनी पत्रकार शीरीन की शहादत के मायने

न नकबा कभी ख़त्म हुआ, न फ़िलिस्तीनी प्रतिरोध

अल-जज़ीरा की वरिष्ठ पत्रकार शिरीन अबु अकलेह की क़ब्ज़े वाले फ़िलिस्तीन में इज़रायली सुरक्षाबलों ने हत्या की

अमेरिका ने रूस के ख़िलाफ़ इज़राइल को किया तैनात

फ़िलिस्तीन पर इज़राइली हिंसा और यूक्रेन-रूस में ख़ूनी जंग कब तक

इज़रायली सुरक्षाबलों ने अल-अक़्सा परिसर में प्रार्थना कर रहे लोगों पर किया हमला, 150 से ज़्यादा घायल

लैंड डे पर फ़िलिस्तीनियों ने रिफ़्यूजियों के वापसी के अधिकार के संघर्ष को तेज़ किया

अमेरिका ने ईरान पर फिर लगाम लगाई

ईरान नाभिकीय सौदे में दोबारा प्राण फूंकना मुमकिन तो है पर यह आसान नहीं होगा

शता ओदेह की गिरफ़्तारी फ़िलिस्तीनी नागरिक समाज पर इस्राइली हमले का प्रतीक बन गया है


बाकी खबरें

  • hunger crisis
    डॉ. राजू पाण्डेय
    चिंता: ग्लोबल हंगर इंडेक्स को लेकर भी असहिष्णु सरकार
    29 Oct 2021
    पिछले कुछ समय से सरकार ऐसे हर आकलन को खारिज करती रही है जो उसकी असफलताओं को उजागर करता है।
  • climate
    टिकेंदर सिंह पंवार
    जलवायु परिवर्तन का संकट बहुत वास्तविक है
    29 Oct 2021
    भविष्य में आने वाली अधिक आपदाओं का मुक़ाबला करने के लिए आपदा जोखिम को कमतर करने वाले सिद्धांतों को मज़बूत करने की ज़रूरत है।
  • Supreme Court on Pegasus
    अजय कुमार
    पेगासस जासूसी कांड पर सुप्रीम कोर्ट की खरी-खरी: 46 पन्नों के आदेश का निचोड़
    29 Oct 2021
    केवल राष्ट्रीय सुरक्षा का जिक्र कर सरकार को निजता के अधिकार के उल्लंघन से जुड़े सवालों के जवाब देने से छूट नहीं मिल सकती है।
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटे में 14,348 नए मामले, 805 मरीज़ों की मौत
    29 Oct 2021
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या बढ़कर 0.47 फ़ीसदी यानी 1 लाख 61 हज़ार 334 हो गयी है।
  • exxon
    इलियट नेगिन
    प्रतिबंधित होने के बावजूद एक्सॉनमोबिल का जलवायु विज्ञान को ख़ारिज करने वालों को फंड देना जारी
    29 Oct 2021
    अमेरिकी तेल और गैस की प्रमुख कंपनी एक्सॉनमोबिल ने जलवायु विज्ञान को लेकर संदेह पैदा करने के लिए 39 मिलियन डॉलर से ज़्यादा ख़र्च किए हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License