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भारत
राजनीति
नोटबन्दी का फुस्स धमाका,सवाल दूसरे हैं और गहरे हैं
इस तबाही, विनाश और मौतों का जिम्मा भी कोई लेगा क्या ? या इसे भी एक जुमला - इस मर्तबा जानलेवा जुमला - करार दे दिया जाएगा। 
बादल सरोज
30 Aug 2018
RBI

कल रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया की वार्षिक रिपोर्ट के बाद अंतत: देश ने  इत्मीनान की सांस ली कि भले पूरे पौने दो साल लगे, मगर आखिरकार वापस लौटे नोटों की गिनती पूरी हो गई । हालांकि रिपोर्ट से पहले ही रिज़र्व बैंक के सूत्रों से छनकर यह जानकारी बाहर आ चुकी थी - यह अलग बात है कि वास्तविक गिनती उस लीक सूचना से भी कहीं अधिक निकली । अब स्थिति यह है कि 8 नवम्बर 2016 को प्रतिबंधित किये गए 1000 और 500 के 15 लाख 41 हजार करोड़ रुपयों के मूल्य वाले नोटों में से 15 लाख 31 हजार करोड़ रुपयों की कीमत वाले नोट वापस बैंकों में आकर जमा हो चुके हैं । मतलब इन नोटों का 99.3 प्रतिशत साबुत सलामत लौट आया ।

काला धन दफनाने, आतंकवाद की कमर तोड़ने , नकली नोटों का प्रचलन रुक जाने, भ्रष्टाचार के निर्मूलन और 50 दिन में सफलता न दिखने पर फांसी पर लटका देने जैसे लोकप्रिय जुमलों को -एक के साथ एक मुश्किल फ्री मानकर- छोड़ भी दिया जाये तो भी यह आंकड़ा बेहद चौंकाने वाला है । इससे कुछ सवाल उठते हैं और ये सवाल गहरे हैं ।

जैसे, मुद्रा के प्रचलन के बाद से ही अर्थशास्त्रियों का अध्ययन इस बात पर एकमत है कि जितनी मुद्रा जारी होती है उसका 2.5 से 3.5 प्रतिशत व्यवहार के दौरान खराब हो जाता है । यहां इसका मतलब है कि वह वापसी योग्य नही रहता । इसी तरह भारत के हर तीसरे परिवार में हजार-पांच सौ के कुछ न कुछ नोट्स आज भी पड़े हुए हैं जिन्हें वे या तो समय पर लौटा नही पाये या उन्हें वे कपड़ों, किताबों, बक्सों में सफाई के दौरान तब मिले जब जमा कराने की अवधि बीत चुकी थी । (इन पंक्तियों के लेखक के विस्तारित परिवार में -अब तक- 25 हजार रुपये मूल्य के ऐसे नोट्स मिल चुके हैं। ) फिर प्रधानमंत्री ने जापान में दावा किया था कि उनके डर के मारे लोग नोटों को नदियों मे बहा रहे हैं, भट्टी में जला रहे हैं, लुगदी बना रहे हैं । इन सबको बहुत ही कम - कोई 2 प्रतिशत - मान लेते हैं । अब इनमे पड़ोसी देशों से छपकर आने वाले नकली  नोटों को भी जोड़ और उनकी तादाद उतनी -10 से 15 प्रतिशत- ही माने जितनी विपक्ष में रहते भाजपा सांसद लोकसभा राज्य सभा मे बताते रहे हैं तो कुल होते हैं 15 से 20 प्रतिशत । 

सवाल यह उठता है कि ये 15 - 20 प्रतिशत नोट कहां गए ? 
इसके दो ही जवाब हो सकते हैं एक : भारतीय जनता नोटों के रखरखाव में इतनी सजग हो गई है कि बाढ़ हो या आग खुद डूबे या जले नोट को सलामत रखती है और जो बचे पड़े हैं वे आंखों का भरम हैं । दो : यह वे नकली नोट हैं जिन्हे हमारी मेहरबान सरकार ने असली बना दिया । अगर ऐसा है तो इसे राष्ट्रद्रोही मूर्खत्व के सिवा और भला क्या कहा सकता है !!

दूसरा सवाल काले धन का है । प्रायः हरेक अनुमान के हिसाब से काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था आकार और परिमाण में वास्तविक अर्थव्यवस्था के लगभग बराबर होती है । चलिये मान लिया कि यह कुछ अतिरंजना है । मगर इतना तय है कि ये मात्र 0.7 प्रतिशत 10720 हजार करोड़ रूपये तो नही ही है । सवाल यह उठता है कि क्या यह सारी कवायद काले धन को सफेद करने के लिए ही तो नही थी । नोटबन्दी के बाद गुजरात की अमितशाह से जुड़ी कुछ सहकारी बैंकों और कुछ व्यक्तियों के हजारों हजार करोड़ रुपयों के पुराने के बदले नए नोटों के लेन देन की सार्वजनिक हुई जानकारी के बाद यह कयास सिर्फ आशंका भर नही रह जाता ।

एक और सवाल है और वह कि नकदी में कालेधन की जमाखोरी के लिए प्रचलन में अधिक मुद्रा और बड़े नोट जरूरी होते हैं । 1977 में हुई नोटबन्दी ने एक और दस हजार के नोट बन्द किये थे । फिर उतने बड़े छापे नही थे । नवम्बर 16 की नोटबन्दी के बाद 2000 के नोट जारी किए गए और कुल मुद्रा बढ़कर पहले से अधिक हो गई । यह किस तरह की आर्थिक बुध्दिमत्ता है ?

एक और इसी से जुड़ा जरूरी सवाल है और वह यह कि नोटबन्दी के बाद डिजिटल लेनदेन की मजबूरी का फायदा उठाकर पेटीएम, वीसा और मास्टर कार्ड जैसी विदेशी कम्पनियों ने कितने हजार करोड़ रुपये कमीशन में कमाये ? आखिर ये उनके बाबा जी की कमाई तो नही थी - भारत की जनता द्वारा हाड़तोड़ मेहनत से जुटाया गया धन था । इस सवाल की जवाबदेही सीधे उनकी बनती है जिन्होंने नोटबन्दी के अगले ही दिन चीन के धनकुबेर जैक मा की पेटीएम के विज्ञापन पर अपना फ़ोटो चिपकाया था ।

इन सवालों के जवाब जरूरी हैं क्योंकि इस नोटबन्दी के  तुगलकी फैसले ने भारतीय अर्थव्यवस्था को जो धक्का दिया था उससे वह 21 महीने बाद भी उबर नही पाई है । कोई 15 करोड़ दिहाड़ी मजदूर महीनों तक बेरोजगार रहे, कुछ लाख छोटे संस्थान , औद्योगिक तथा उत्पादन इकाइयां बन्द हो गईं जो फिर खुली ही नही , किसानों की दो फसलों को उनकी कीमत नही मिली । न जाने कितनी शादियों के कार्ड छपे रह गए । लाखों लोगों के - असल मे करोड़ों - मानव दिवस दो महीनों तक बैंक की लाइनों में खड़े खड़े खर्च हो गए जिनमे एक सौ से अधिक लोग मर भी गये ।

इस तबाही, विनाश और मौतों का जिम्मा भी कोई लेगा क्या ? या इसे भी एक जुमला - इस मर्तबा जानलेवा जुमला - करार दे दिया जाएगा। 

RBI
Modi government
notebandi
demonitisation
demonitisation a failure

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