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भारत
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नव-उदारवाद और असमानता को एक दुसरे से अलग नहीं किया जा सकता
वर्तमान समय में भारत में आय असमानता की सीमा पिछले सौ वर्षों में सबसे अधिक है।
प्रभात पटनायक
20 Dec 2017
neo liberalism

थॉमस पिकेट्टी और ल्यूकस चैंसल ने भारत में आय असमानता पर चर्चा करते हुए विश्व असमानता रिपोर्ट के लिए अपने कार्य के एक भाग के रूप में एक प्रपत्र लिखा है। और उनका निष्कर्ष यह है कि वर्तमान समय में भारत में आय असमानता की सीमा पिछले सौ वर्षों में सबसे अधिक है।उनका अनुमान 1922 की ओर इशारा करता है जब आयकर अधिनियम भारत में लागू हुआ था। उस वक़्त कुल आय में जनसंख्या का शीर्ष 1 प्रतिशत हिस्सा लगभग 13 प्रतिशत था। यह 1930 के दशक के अँत तक 21 प्रतिशत तक बढ़ा और फिर 1980 के दशक के शुरूआती दिनों में लगभग 6 प्रतिशत तक गिर गया जो 2014 में बढ़कर 22 प्रतिशत हो गया। ये उनके अध्ययन का अंतिम वर्ष था।

प्रपत्र की नतीजों के बारे में जो मर्मभेदी है वह असमानता के रुझानों में अँतराल और नियँत्रण से नव-उदारवाद तक के सँक्रमण के बीच लगभग सटीक समन्वयन है। 1951 और 1980 के बीच की अवधि के दौरान निचली 50 प्रतिशत आबादी का कुल आय में 28 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई जबकि शीर्ष 0.1 प्रतिशत आबादी ने वास्तव में अपनी आय में गिरावट देखी। वास्तव में इस अवधि के दौरान सँपूर्ण औसत के मुकाबले निचली 50% आबादी की आय में काफ़ी तेजी आई। 1980 और2014 के बीच निचली कुल 50 प्रतिशत आबादी (11%) की तुलना में शीर्ष 0.1 प्रतिशत ( 12%) की आय में हिस्सा अधिक रहा।

वास्तव में, आय असमानता के आँकड़ों पर हमेशा सवाल पूछे जा सकते हैं। शुरुआत से हमारे पास देश में कोई आय सर्वेक्षण नहीं है; हमारे पास उपभोक्ता व्यय से सम्बंधित नमूना सर्वेक्षण हैं और आय वितरण के लिए उपभोग व्यय के वितरण से प्राप्त करना समस्यापूर्ण है क्योंकि हम बचत के वितरण के बारे में नहीं जानते हैं, जो दोनों के बीच का अंतर है। दूसरे, सभी नमूना सर्वेक्षणों में, शीर्ष प्रतिशत वाले हमेशा अपर्याप्त रूप से प्रस्तुत किए जाते हैं, क्योंकि वे संख्या में बहुत कम हैं। इसलिए सांख्यिकीविद जनसँख्या के शीर्ष 1 प्रतिशत या शीर्ष 0.1 प्रतिशत के हिस्से तक पहुँचने के लिए शीर्ष दशमक के भीतर आय वितरण के बारे में सभी प्रकार की धारणाएँ बनाते हैं। और इन धारणाओं पर हमेशा सवाल उठाए जा सकते हैं।

यह आश्चर्य की बात नहीं है कि पिकेट्टी-चैंसल के अनुमान पर भी कुछ टिप्पणीकारों द्वारा प्रश्न उठाए गए हैं। लेकिन यह कोई बात नहीं है कि उनके सँपूर्ण आँकड़े को कोई कैसे देखता है, उनके द्वारा प्रकट किए गए प्रवृत्तियों पर मुश्किल से ही सवाल उठाया जा सकता है, क्योंकि क़रीब-क़रीब अनुमान के एक ही तरीके को समय-समय पर नियोजित किया जाता है। और यह प्रवृत्ति पूरी तरह से अन्य शोधकर्ताओं के अनुरूप है, और ये सैद्धाँतिक रूप से अपेक्षा करने वाले के भी अनुरूप है। उदाहरण के लिए क्रेडिट सुइस (Credit Suisse) धन वितरण आँकड़ा प्रदान करता है। इन आँकड़ों के मुताबिक वर्तमान समय में भारत के शीर्ष 1फीसदी परिवार कुल सँपत्ति के आधे से ज्यादा (57 फीसदी) सँपत्ति के मालिक हैं, और भारत में धन की असमानता बहुत तेज़ी से बढ़ रही है, यहाँ तक कि यूएस की तुलना में भी काफ़ी तेज़ी से बढ़ रही है।

असमानता की माप जिसे अकसर अपनाया जाता है वह है गिनी गुणांक जो पूर्ण समानता के आधार पर वास्तविक वितरण और आदर्श वितरण के बीच की दूरी को दर्शाता है। हालाँकि गिनी गुणाँक के साथ समस्या यह है कि वितरण के रूप में एक सँपूर्ण के रूप में देखते हुए यह शीर्ष प्रतिशतियों के शेयरों जैसे प्रश्नों पर ध्यान नहीं देता। उदाहरण स्वरूप जब कभी शीर्ष 1 प्रतिशत की हिस्सेदारी बढ़ सकती है, तब भी गिनी गुणाँक असमानता में गिरावट दिखा सकता है यदि कुछ पुनर्वितरण हो रहा है, नीचे के चौथे दशमक से निचले दशमक तक, अर्थात् " गरीब" से "बहुत गरीब" तक। पिकेट्टी और चैंसल इस तरह गिनी गुणाँक का उपयोग नहीं करते हैं, लेकिन शीर्ष के कुछ प्रतिशत लोगों के शेयरों पर विचार करते हैं, जो कि अधिक उपयोगी उपाय है (विशेषकर अगर हम आर्थिक शक्ति की बात कर रहे हैं)।

पिकेट्टी-चैंसल के आँकड़े बताते हैं कि 1983-84 शीर्ष एक प्रतिशत लोगों की आय में सबसे कम आय के शेयर का वर्ष था, जिसके बाद ये शेयर बढ़ता गया। यह याद किया जा सकता है कि नव-उदारवाद ने पहली बार इस समय के आसपास अपनी उपस्थिति दर्ज की और वर्ष 1985 में राजीव गाँधी सरकार के वित्त मँत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा प्रस्तुत बजट में इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम थे (जिसके विरुद्ध वास्तव में वाम दलों ने इस समय नई दिल्ली में एक सम्मेलन का आयोजन किया था)। असमानता में वृद्धि और नवउदारवाद के लक्ष्य के बीच सहयोग इस प्रकार काफी हद तक करीब है। और आश्चर्य की बात नहीं, असमानता में इस तरह की वृद्धि "वैश्वीकरण" की अवधि में दुनिया के लगभग हर देश का स्वभाव बन गया है, जो अँतरराष्ट्रीय वित्त पूंजी के सँचालन के तहत नव-उदार नीतियों के लगभग सार्वभौमिक प्रयासों की विशेषता है।।

लेखकों ने प्रपत्रों में और व्यक्तिगत रूप से साक्षात्कारों में भी, इस अवधि के दौरान भारत में आय की असमानता में वृद्धि को लेकर कई कारण बताते हैं। उच्चतम सीमाँत आयकर दर में 98% से 30% तक की गिरावट, भूमि स्वामित्व में असमानता में निरँतरता और ग़रीबों की शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा तक पहुँच में कमी ऐसे कुछ बिंदु हैं जो लेखकों द्वारा उठाए गए हैं।

ये सभी बेहद महत्वपूर्ण हैं। लेकिन और भी कारक हैं जिसे यहाँ उल्लेख किया जाना चाहिए, अर्थात् किसानों सहित लघु उत्पादन पर आक्षेप, जिसे नवउदारवाद ने जागृत किया है। यद्दपि किसानों की परिस्थितियों में सुधार कृषि श्रमिकों को स्वतः लाभ नहीं पहुँचाता है, उनकी परिस्थितियों में गिरावट आम तौर पर मजदूरों पर"थोप" दी जाती है। और यह कि, चूँकि इस तरह की गिरावट की स्थिति में बेसहारा किसान शहरी अर्थव्यवस्था में रोज़गार की तलाश करते हैं जहाँ बहुत कम अतिरिक्त नौकरियाँ पैदा हो रही हैं। इस तरह शहर में पहले से रह रहे मज़दूरों की संख्या में वृद्धि हो जाती है जो शहर के मज़दूरों की मज़दूरी और समग्र शहरी आय वितरण को भी प्रभावित करती है।

दूसरे शब्दों में चूँकि ग्रामीण भारत में शहरी भारत की तुलना में औसत आय कम है, ग्रामीण-शहरी अँतर में किसी प्रकार की वृद्धि का प्रभाव है, अन्य चीजें समान रूप से समग्र आय असमानता में वृद्धि करते हैं (पिकेट्टी-चैंसल माप द्वारा)। लेकिन शहरी क्षेत्र में आय असमानता को बढ़ाने का इसका अतिरिक्त प्रभाव भी है। यह शहरी अर्थव्यवस्था में बेरोज़गार किसानों के आव्रजन के माध्यम से मज़दूरों में वृद्धि के माध्यम से होता है। नव-उदारवाद द्वारा शुरू किए गए लघु उत्पादन पर हमला आय असमानता के वृद्धि के पीछे एक महत्वपूर्ण कारक है।

इन लेखकों के अनुसार चीन के मामले में पहले जहाँ आय असमानता तेज़ी से बढ़ रही थी वहीं वर्तमान सदी में विपरीत हो गई जो कि इस सँदर्भ में शिक्षाप्रद है। वास्तव में भारतीय और चीनी अर्थव्यवस्थाओं के बीच मूलभूत अँतर हैं; लेकिन चीन में बढ़ती असमानता के परिवर्तन के पीछे एक महत्वपूर्ण कारक एक नारा था"समाजवादी ग्राम की ओर"। इस नारे के तहत चीनी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा उक्त नीति अपनाई गई। इस नीति ने किसानों के कृषि पर कुछ अतिक्रमणों की जाँच की और उसे पलट दिया जो एक निरँतर निर्यात अभियान के ज़रिए औद्योगिक बनाने की कोशिश में लगे थे।

सँपत्ति कर को लागू करने, अमीरों पर आयकर दरों में वृद्धि, राज्य के अधीन सभी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का प्रावधान, और निश्चित रूप से भूमि पुनर्वितरण, निस्संदेह ये ऐसे कुछ कदम हैं जो बढ़ते आय असमानताओं को शिकस्त देने के लिए ज़रूरी हैं; और ये नव-उदारवाद के बोझ को कम करने के लिए अपरिहार्य है। लेकिन इसे मान्यता देने के दौरान, हमें यह भी पहचानना चाहिए, जो लेखकों ने स्पष्ट रूप से नहीं किया है, कि नवउदारवाद केवल पसंद की नीति नहीं है जिसे इच्छा पर छोड़ा जा सकता है। यह पूँजीवाद के एक चरण से मेल खाती है जहाँ अंतर्राष्ट्रीय वित्त पूँजी ने अधिपत्य हासिल कर ली है; इसलिए नव-उदारवाद पर क़ाबू पाने के लिए श्रमिकों और किसानों की व्यापक गतिविधियों के माध्यम से इस आधिपत्य के ख़िलाफ़ एक वर्ग सँघर्ष की आवश्यकता है।

हालांकि लेखकों ने ठीक ही नव-उदारवाद के समर्थकों को आड़े हाथों लिया है जो तर्क देते हैं कि भारत जैसे देशों में वास्तव में उच्च जीडीपी विकास को प्राप्त करने के लिए आय असमानता में इस प्रकार की वृद्धि आवश्यक है। आय असमानता में यह कमी पूँजीवाद के संचालन की वजह से नहीं बल्कि उन रियायतों की वजह से थी जो पूँजीवाद को उभरते हुए समाजवादी खतरे का मुक़ाबला करने के लिए मजबूर कर दिया गया था।

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