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अंतरराष्ट्रीय
अर्थव्यवस्था
नवउदारवाद और मुद्रास्फीति-विरोधी नीति
आम तौर पर नवउदारवादी व्यवस्था को प्रदत्त मानकर चला जाता है और इसी आधार पर खड़े होकर तर्क-वितर्क किए जाते हैं कि बेरोजगारी और मुद्रास्फीति में से किस पर अंकुश लगाने पर ध्यान केंद्रित किया जाना बेहतर है।
प्रभात पटनायक
01 Jun 2022
neoliberalism

सारी की सारी पूंजीवादी दुनिया में केंद्रीय बैंक इस समय चौतरफा फैली मुद्रास्फीति की काट करने के उपाय के तौर पर, अपने यहां ब्याज की दरें या तो बढ़ा रहे हैं या फिर बढ़ाने ही वाले हैं। इस कदम से विश्व अर्थव्यवस्था का, जो बड़ी मुश्किल से महामारी के धक्के से उबरने भर के करीब पहुंच रही थी, फिर से आर्थिक गतिरोध तथा बढ़ी हुई बेरोजगारी की ओर धकेल दिया जाना तय है।

अमरीका में मुद्रास्फीति क्यों?

बेशक, अमरीका का फैडरल रिजर्व, जो इस पहलू से दूसरे सभी केंद्रीय बैंकों के लिए उदाहरण कायम कर रहा है, इस संबंध में कुछ और ही दावा कर रहा है। उसकी दलील है कि वह तो ब्याज की दरों में जो बढ़ोतरी करा रहा है, उसका असली अर्थव्यवस्था पर बहुत ही कम या ज्यादा से ज्यादा बहुत ही अस्थायी असर पड़ेगा और महामारी के धक्के से बहाली बहुत हद तक सुरक्षित ही बनी रहेगी। लेकिन, यह दावा एक ऐसी तर्कप्रणाली के सहारे किया जा रहा है, जो बुनियादी तौर पर ही त्रुटिपूर्ण है। यह दलील इस प्रकार चलती है।

अमरीकी फैडरल रिजर्व के अध्यक्ष, जेरोम पॉवेल की दलील है कि वर्तमान मुद्रास्फीति तो मुद्रा-मजदूरी के धक्के से पैदा हुई है। और यह धक्का इसलिए पैदा हुआ है कि लोग मुद्रास्फीति आने की उम्मीद कर रहे हैं। इसलिए, ब्याज की दरों में बढ़ोतरी से चूंकि लोगों के बीच मुद्रास्फीति घटने की प्रत्याशा आएगी, इससे यह मुद्रा-मजदूरी धक्का खत्म हो जाएगा और इस तरह वास्तव में मुद्रास्फीति नीचे आ जाएगी। चूंकि इस तरह के तमाम समायोजन प्रत्याशित कीमतों के दायरे में ही सीमित रहेंगे तथा इसलिए वास्तविक कीमतों तक इसी रास्ते से पहुंचेंगे, वास्तविक अर्थव्यवस्था में उत्पाद तथा रोजगार में, शायद ही किसी मंदी का सामना होने की नौबत आएगी। लेकिन, यह पूरी की पूरी दलील ही एक साधारण से तथ्य के चलते गलत साबित होती है। यह तथ्य यह है कि मजदूरों की मुद्रा में मजदूरी तो, वास्तव में मुद्रास्फीति से पिछड़ती ही रही है और इसके चलते उन्हें वास्तविक मजदूरी में गिरावटों का ही सामना करना पड़ा है। इसलिए, यह दलील बिल्कुल गलत है कि अमरीका में मुद्रास्फीति मुद्रा-मजदूरी धक्के की वजह से है।

इसी प्रकार, आमतौर पर इस मुद्रास्फीति की वजह यह बतायी जा रही है कि रूस-यूक्रेन युद्घ के चलते विश्व बाजार में विभिन्न मालों की और खासतौर पर तेल तथा खाद्यान्नों की, तंगियां पैदा हो गयी हैं। लेकिन, वर्तमान मुद्रास्फीति की यह सफाई भी भरोसा पैदा करने वाली नहीं है। युद्ध से ऐसी तंगी पैदा हो तो सकती है, लेकिन अब तक ऐसी कोई मंदी पैदा नहीं हुई है। वास्तव में विश्व बाजार में ऐसे मालों की आपूर्तियों में किसी भी गिरावट के कोई साक्ष्य ही नहीं हैं। इसलिए, कम से कम अमरीका के संदर्भ में मुद्रास्फीति के लिए इस तरह की युद्ध से उत्पन्न तंगियों को जिम्मेदार बताने के लिए कोई साक्ष्य नहीं हैं।

सटोरियों का खेल

अमरीका में यह मुद्रास्फीति आने की वजह यह है कि मुनाफों के स्वायत्त रूप से बढऩे के परिणामस्वरूप, मजदूरियों के मुकाबले में कीमतें कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ रही हैं। मुनाफों के बढ़ने की अपेक्षा उस स्थिति में की जाती है, जब कुछ मालों की तंगी पैदा हो गयी हो। लेकिन, मौजूदा मामले में तो उन अनेकानेक मालों की बाजार में कोई तंगी तो है ही नहीं, जिनके मामले में मुद्रास्फीति का दबाव दिखाई दे रहा है। यहां तक कि अगर कुछ मालों के मामले में, महामारी के चलते आपूर्ति शृंखलाओं में खलल पड़ने के चलते फौरी तौर पर तंगी देखने में भी आयी है, उनके मामले में भी कीमतों मेें बढ़ोतरी, इस तंगी के अनुपात मेें कहीं ज्यादा है और तंगी के बिना भी बनी रही है। दूसरे शब्दों में, अमरीका की वर्तमान मुद्रास्फीति के पीछे मुनाफे के हिस्से में बढ़ोतरी का एक स्वायत्त दबाव काम कर रहा है, जो सट्टाबाजाराना आचरण का ही संकेतक है।

अक्सर यह माना जाता है कि ससट्टाबाजाराना आचरण तो व्यापारियों तथा बिचौलियों की ही निशानी होता है, न कि विनिर्माताओं की। लेकिन, इस धारणा का कोई आधार है नहीं। बहुराष्ट्रीय निगमों के मूल्य निर्धारण के आचरण के पीछे भी सटोरियापन काम करता है और अगर आज दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था सट्टाबाजार-उत्प्रेरित मुद्रास्फीति की मार झेल रही है, तो इसीलिए कि वहां अब तक चलती रही असाधारण रूप से नरम मुद्रा नीति के चलते, ऋण बहुत ही आसान शर्तों पर उपलब्ध रहे थे। परिमाणात्मक नरमी यानी फैडरल रिजर्व द्वारा अमरीकी अर्थव्यवस्था में ज्यादा से ज्यादा डालर डाले जाने तथा अल्पावधि तथा दीर्घावधि ऋणों के लिए लगभग शून्य ब्याज दर बनाए रखे जाने से, वहां की अर्थव्यवस्था में एक तरलता छज्जा जैसा (ओवरहैंग) बन गया है, जो मुनाफे बढ़ाने के स्वायत्त दबाव के लिए मददगार रहा है और जिसकी अभिव्यक्ति मुद्रास्फीति के रूप में हो रही है, जबकि उत्पादन अपनी पूर्ण क्षमता के स्तर पर पहुंचने के तो आस-पास तक भी नहीं पहुंचा है। पुन:, मुद्रा नीति के इस इतिहास से पैदा हुई इस मुद्रास्फीति के खिलाफ दो ही कदम उठाए जा सकते हैं--या तो च्राजकोषीय कमखर्ची को अपनाया जाए या फिर ब्याज की दरें बढ़ायी जाएं, जैसाकि इस समय हो रहा है। लेकिन, ये दोनों ही तरीके मंदी तथा बेरोजगारी पैदा करने वाले हैं।

यही समस्या का सार है। समकालीन पूंजीवाद के अंतर्गत आर्थिक व्यवस्था की प्रकृति ही ऐसी है कि अमरीका में बैठे मुट्ठीभर सटोरियों के आचरण के दुष्परिणामों से निपटने के लिए, न सिर्फ अमरीकी अर्थव्यवस्था में (हालांकि, उसी के मामले में ऐसा होना भी अपने आप में बहुत ही बेतुकी बात है) बल्कि दुनिया भर में, आम बेरोजगारी पैदा करने वाले कदम उठाने पड़ रहे हैं। दुनिया भर के लिए ऐसा होने की बाध्यता इसलिए पैदा होती है कि नव-उदारवाद के अंतर्गत, पूंजी की तथा खासतौर पर वित्तीय पूंजी की दुनिया भर में, देशों की सीमाओं के आर-पार आवाजाही के चलते, दुनिया भर में ब्याज की दरों को, अमरीका में ब्याज की दरों के ऊपर उठने के साथ-साथ बढ़ाना ही होता है, वर्ना संबंधित हाशियावर्ती देशों से वित्तीय पूंजी का अमरीका की ओर उत्प्रवाह होता रहेगा और डालर के साथ उनकी मुद्रा के विनिमय मूल्य में लगातार गिरावट चलती रहेगी। दूसरे शब्दों में, अमरीका में सटोरियावृत्ति से सीधे अन्य उपायों से निपटे जाने की जगह पर, वित्तीय दारीकरणज् की व्यवस्था के अंतर्गत उससे दुनिया भर में आम बेरोजगारी पैदा करने के जरिए ही निपटा जाता है। यह अतार्किकता की पराकाष्ठा है।

वित्त पर नियंत्रण की ज़रूरत

जॉन मेनार्ड केन्स, जिनका लेखन बोल्शेविक क्रांति की परछांई के नीचे तथा महामंदी के बीच हुआ था, इस अतार्किकता को बखूबी पहचानते थे। पूंजीवादी व्यवस्था को बचाने के लिए ही, जो कि उनका लक्ष्य था, वह उस रास्ते के अपनाए जाने के पक्ष में थे, जिसे वह निवेश का सामाजीकरण कहते थे। इसके लिए राज्य या शासन का राजकोषीय हस्तक्षेप उतना ही जरूरी था, जितना जरूरी उसका उपयुक्त मौद्रिक नीति अपनाना था। और इन दोनों का ही तकाजा होता है कि वित्तीय हितों को, समग्रता में समाज के हितों के आधीन रखा जाए।

इसी तरह के बौद्घिक माहौल में, तीसरी दुनिया के अनेक नव-स्वाधीन देशों ने ऐसे नवोन्मेषी वित्तीय ढांचे खड़े किए थे, जो आर्थिक गतिविधियों में कोई कमी तक पैदा किए बिना, फिर आम बेरोजगारी पैदा करने की तो बात ही कहां आती है, सीधे ही सटोरियापन पर अंकुश लगाते थे। मिसाल के तौर पर भारत में अनेकानेक विशेषीकृत वित्तीय संस्थाओं द्वारा निवेश के लिए दीर्घावधि वित्त ऐसी ब्याज दरों पर मुहैया कराया जाता था, जो आम तौर पर बैंकों द्वारा अल्पावधि ऋण पर वसूल की जाने वाली ब्याज की दरों से घटकर होती थीं। इसके अलावा सट्टाबाजारी पर अंकुश लगाने के लिए बैंकों द्वारा भी सिर्फ ब्याज की दरों का ही नहीं बल्कि दूसरे अनेकानेक औजारों का भी इस्तेमाल किया जाता था। इसके अलावा रिवर्स रेश्यो जैसे परंपरागत औजारों का इस्तेमाल तो खैर किया ही जाता था। ऐसा ही एक उपाय था, खास-खास सट्टïाबाजार-ग्रसित क्षेत्रों के लिए ऋण के प्रवाहों पर सीधे अंकुश लगाना या वह जिसे च्चुन-चुनकर ऋण नियंत्रणज् कहा जाता है। इस तरह, मुद्रास्फीति पर नियंत्रण सिर्फ राजकोषीय या मौद्रिक नीतियों के जरिए ही नहीं किया जाता था बल्कि वित्त की आपूर्ति के प्रबंधन और सार्वजनिक वितरण व राशनिंग की व्यवस्था कायम करने के जरिए भी किया जाता था। इस सब के जरिए यह सुनिश्चित किया जाता था कि निवेश, उत्पाद तथा रोजगार, सटोरियों की करनियों से बहुत हद तक अप्रभावित बने रहें।

वित्तीय उदारीकरण का उल्टा रास्ता

ब्रेटन वुड्स संस्थाएं और उनके प्रति वफादार, नवउदारवादी अर्थशास्त्री, इन सभी व्यवस्थाओं के बहुत ही खिलाफ थे। वे ऐसी वित्तीय व्यवस्थाओं को च्वित्तीय दमनज् बताते थे और उसकी जगह पर वित्तीय व्यवस्था के च्उदारीकरणज् की मांग करते थे, जिसमें वित्तीय बाजारों में ऐसे सभी प्रत्यक्ष हस्तक्षेपों से परहेज बरता जाए। वे तो सार्वजनिक वितरण व्यवस्था तथा राशनिंग की भी छुट्टी  कराना चाहते थे, जिन पर आधारित व्यवस्था खाद्यान्नों के मामले में भारत में अब भी बनी हुई है। उसी मकसद से तो उन्होंने मोदी सरकार से तीन कुख्यात कृषि कानून भी पारित करा लिए थे। वे सार्वजनिक वितरण प्रणाली तथा राशनिंग का त्याग कराने में तो कामयाब नहीं हुए, लेकिन उन्होंने नव-उदारवादी सुधारों के हिस्से के तौर पर, भारत में च्वित्तीय उदारीकरण को तो लागू करवा ही दिया।

च्वित्तीय उदारीकरणज् का मतलब होता है, मुद्रानीति के औजार के रूप में करीब-करीब पूरी तरह से ब्याज की दरों पर ही निर्भर हो जाना। और इस पहलू से भी, चूंकि अपेक्षाकृत आसान वित्तीय प्रवाहों की दुनिया में ब्याज की दरें (जैसाकि हम पीछे दर्ज कर आए हैं) अमरीकी दरों के साथ बंधी होती हैं, देश के पास कोई खास गुंजाइश रह ही नहीं जाती है। और चूंकि च्राजकोषीय जिम्मेदारीज् कानून का मतलब यह होता है कि सरकारी खर्चों को सरकार के राजस्व के साथ बांध दिया गया है तथा सरकार के राजस्व को संपन्न वर्ग पर ज्यादा कर लगाने के जरिए बढ़ाने का रास्ता भी बंद है (क्योंंकि ऐसा किया गया तब तो वे अपनी निवेश परियोजनाओं के साथ किसी और देश के लिए उड़ जाएंगे), ब्याज की जिस दर का उपयोग मुद्रास्फीति पर नियंत्रण के औजार के तौर पर किया जाना है, वही निवेश, उत्पाद, रोजगार तथा वृद्घि के कुंजीभूत निर्धारक का काम भी कर रही होगी।

इसका मतलब है, ऐसी दुनिया में लौटना जहां न सिर्फ मुठ्ठीभर घरेलू सटोरियों का आचरण देश विशेष में उत्पाद तथा रोजगार को तय कर रहा होगा बल्कि अमरीका में बैठे मुठ्ठीभर  सटोरियों का आचरण दुनिया के हरेक देश में यानी समूची विश्व अर्थव्यवस्था में, उत्पाद तथा रोजगार को तय कर रहा होगा।

सटोरियों के खेल पर अंकुश ज़रूरी

जाने-माने अर्थशास्त्री, डा. के एन राज ने एक बार, हमारे देश में नियंत्रणात्मक व्यवस्था के अंतर्गत कायम की गयी वित्तीय व्यवस्था की इसी आधार पर प्रशंसा की थी कि उसमें, मुठ्ठीभर सटोरियों की झखों को करोड़ों मजदूरों की रोजगार की संभावनाएं तय करने की इजाजत नहीं दी जाती थी। वित्तीय उदारीकरण ने ठीक इसी बचाव को खत्म कर दिया है और इससे भी बदतर यह कि इसने दुनिया के हरेक देश में रोजगार के स्तर को, मुठ्ठीभर अमरीकी सटोरियों की मनमर्जी के साथ बांध दिया है।

दुनिया भर में इस समय काफी कुछ लिखा जा रहा है जिसमें, मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने के लिए ब्याज की दरें बढ़ाने का सहारा लिए जाने के गुण-दोषों पर बहस की जा रही है। इस बहस में  आम तौर पर नवउदारवादी व्यवस्था को प्रदत्त मानकर चला जाता है और इसी आधार पर खड़े होकर इस पर तर्क-वितर्क किए जाते हैं कि बेरोजगारी और मुद्रास्फीति में से, किस पर अंकुश लगाने पर ध्यान केंद्रित किया जाना बेहतर है। लेकिन, इन दोनों में से किसी एक के चुनाव की जरूरत तो  इसलिए पड़ती है क्योंकि बहस के लिए हम, नव-उदारवादी व्यवस्था को प्रदत्त मान लेते हैं और यह ऐसी व्यवस्था है जो मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने के दूसरे अनेक औजार शासन के हाथों से पहले ही छीन लेती है। इसलिए,  नव-उदारवाद को ही लांघने के जरिए, उक्त दोनों के बीच से चुनाव की मजबूरी को ही खत्म किया जाना चाहिए। लेकिन, इसका तो इस बहस में शायद ही कभी जिक्र आता है

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