NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कानून
भारत
राजनीति
चर्चा नहीं, सिर्फ़ खुलासे : लोकतंत्र को ख़तरे में डालती केंद्र सरकार
अर्श रामपाल लिखते हैं कि, देश का संविधान भारत में प्रतिनिधि सरकार की स्थापना की इजाज़त देता है। जिसके चलते जन-भागीदारी का दायरा धीरे-धीरे बढ़ता है। एक सहभागी लोकतंत्र में, जनता सरकार के निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल होती है। सूचना का होना ऐसी ही प्रणाली का एक अन्य मानदंड है। हालांकि, शासन के मौजूदा रुझान सहभागी तत्व को बाधित करने के प्रयासों को उजागर करते हैं।
अर्श रामपाल
11 Aug 2021
Translated by महेश कुमार
चर्चा नहीं, सिर्फ़ खुलासे : लोकतंत्र को ख़तरे में डालती केंद्र सरकार

जनवरी में, सुप्रीम कोर्ट ने राजीव सूरी बनाम दिल्ली विकास प्राधिकरण, जिसे सेंट्रल विस्टा फैसले के रूप में भी जाना जाता है, में उल्लेख किया था कि भारत जन-भागीदारी लोकतंत्र के पहलुओं का प्रतिनिधित्व करने वाला लोकतंत्र है। इसमें सहभागी लोकतंत्र के दो अभिन्न तत्वों को नोट किया गया, अर्थात, निर्णय लेने में सार्वजनिक भागीदारी का होना और सरकारी निर्णयों से संबंधित सूचनाओं का पब्लिक डोमेन में मुहैया कराना।  

सहभागी लोकतंत्र के तत्व

भारत की संवैधानिक संरचना में, सार्वजनिक भागीदारी की सीमा और गुणवत्ता विषय वस्तु, प्रभावित व्यक्तियों की संख्या, स्थानीय परिस्थितियों आदि पर निर्भर करती है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जन-भागीदारी सरकार के विवेक के आधार पर नहीं चल सकती है, बल्कि हितधारकों से रचनात्मक सुझाव या आपत्तियां आमंत्रित कर सुनिश्चित की जा सकती है। 

अंतरराष्ट्रीय न्यायशास्त्र के संदर्भ में उल्लेख करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक मामलों में जन-भागीदारी का अधिकार नगरपालिका के कानूनों पर निर्भर करता है। सूचना का होना और जन-भागीदारी परस्पर जुड़े हुए पहलू हैं। इसलिए सरकार के फैसलों की पूरी जानकारी के बिना जनता के लिए किसी भी विषय से प्रभावी ढंग से जुड़ना असंभव होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले फैसले में इस बात को नोट किया था, जहां उसने कहा था, "लोकप्रिय जानकारी या उसे हासिल करने के साधनों के बिना एक लोकप्रिय सरकार किसी तमाशे या त्रासदी या शायद दोनों से कम नहीं है।"

अब, अदालत ने फिर से इस बात को दोहराया है कि लोकतंत्र में सूचना की खुली जानकारी होना कितना महत्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए, सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम, 2005, सहभागी लोकतंत्र के सार्वजनिक पहलू को लागू करता है।

विधायिका से पहले की परामर्श नीति

2014 में केंद्र सरकार द्वारा जारी की गई विधायिका से पहले की परामर्श नीति (पीएलसीपी) को सार्वजनिक डोमेन में प्रस्तावित कानून के रूप में प्रकाशित करने की जरूरत है। मसौदा के कानून बनने से पहले कम से कम तीस दिनों पहले किसी भी प्रतिकृया के लिए उपलब्ध होना चाहिए, जिससे जनता और हितधारकों को प्रतिक्रिया और टिप्पणियां जमा करने में सुविधा मिल सके।

जहां कानून एक खास समूह को प्रभावित करता है, तो उस कानून को प्रभावित व्यक्तियों तक पहुंचाने के लिए उसका व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए। सार्वजनिक रूप से जानकारी मुहैया कराने और सार्वजनिक भागीदारी को सुनिश्चित कर पीसीएलवी सहभागी लोकतंत्र और भागीदारी पहलुओं को आगे बढ़ाता है।

मौजूदा कोविड-19 महामारी के दौरान, सहभागी लोकतंत्र को सुविधाजनक बनाने की जरूरत और भी अधिक आन पड़ी है। हालाँकि, पीसीएलवी को विकृत करने और उसे दरकिनार करने का पैटर्न उभर रहा है।

ट्रैफिकिंग बिल का मसौदा

मानव तस्करी (रोकथाम, देखभाल और पुनर्वास) विधेयक, 2021 (मानव तस्करी विधेयक) के  मसौदा पर चल रहे मानसून सत्र के दौरान राज्यसभा में चर्चा होगी। केंद्र ने जनता को नीति पर आपत्तियां और सुझाव देने का सिर्फ दो सप्ताह का समय दिया है।

उपरोक्त विधेयक पर एक्टिविस्ट समूहों ने आवंटित समय को "किसी भी सार्थक या प्रभावी परामर्श के लिए अपर्याप्त" माना है और उसकी आलोचना की है। आवंटित अवधि पीएलसीपी में स्थापित 30 दिनों की जरूरत को अनदेखा करती है। इस प्रकार यह सार्वजनिक परामर्श की मौजूदा और अच्छी तरह से परिभाषित प्रक्रिया को उलटने का प्रयास करता है।

ट्रेफिकिंग बिल के रूप में केंद्र द्वारा पेश किए जाने वाला कानून एक और ऐसा उदाहरण है जो लोकतंत्र में सार्वजनिक भागीदारी को रोकता है या उसे कम करता है।

लक्षद्वीप विनियम मसौदा

लक्षद्वीप विनियम मसौदे में भूमि विकास, असामाजिक गतिविधियों और पशु क्रूरता के बारे में तीन नियम शामिल हैं। पहले दो नियमों पर हितधारकों से फीडबैक देने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया गया है, जबकि तीसरे नियम के लिए चार सप्ताह का समय दिया है। राष्ट्रपति ने इन कानूनों को अनुच्छेद 240 के तहत लागू कर दिया और पीसीएलपी में मौजूद मानदंडों को प्रभावी ढंग से समाप्त कर दिया।

यहाँ ध्यान देने की जरूरत है कि अनुच्छेद 240 के तहत लागू किए गए विनिमय के मसौदे में संसद के अधिनियम के समान शक्ति और प्रभाव हैं। इन विनियमों के स्थानीय संस्करण भी प्रकाशित नहीं किए गए हैं, जो स्थानीय समूहों को प्रभावित करने वाले कानूनों के मामले में  सामान्य अभ्यास के अनुरूप नहीं है, जिन्हें व्यापक रूप से प्रचारित किया जाना चाहिए था।

सरकार ने स्थानीय भाषा में मसौदे के न होने को यह कहते हुए उचित ठहराया है कि स्थानीय भाषा में संस्करण को प्रकाशित करना कोई कानूनी दायित्व नहीं है। इस तरह की प्रतिक्रिया जन-भागीदारी के मामले में सरकार की ओर घोर उपेक्षा को प्रदर्शित करती है।

दरअसल, सरकार ने जान-बूझकर सहभागी लोकतंत्र में मौजूद मूलभूत गारंटी देने से परहेज किया है। लक्षद्वीप जैसे केंद्र शासित प्रदेशों में विधानसभाएं नहीं हैं। संसद में भी उनका प्रतिनिधित्व न्यूनतम है।

जबकि सरकार को निर्णय लेने के लिए जनता की भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय पहल को बढ़ावा देना चाहिए। फिर भी, वास्तविकता स्पष्ट रूप से लोगों की जरूरत के विपरीत है। लक्षद्वीप पर कानून के मामले में, न तो जनता का प्रतिनिधित्व है और न ही सहभागी लोकतंत्र हासिल हुआ है।

पर्यावरण प्रभाव आंकलन नीति का मसौदा 

केंद्र सरकार द्वारा सहभागी लोकतंत्र के विकास को रोकने के प्रयास विधायी और कार्यकारी कार्रवाई तक फैले हुए हैं। सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण यह है कि इसने पर्यावरण प्रभाव आकलन नीति (ड्राफ्ट ईआईए नीति) का मसौदा कैसे तैयार किया है।

मार्च 2020 में, सरकार ने ईआईए नीति प्रकाशित करते हुए एक अधिसूचना जारी की थी जिसमें आम जनता से 60 दिनों के भीतर टिपणी देने की बात की थी जिसे बाद में बढ़ा दिया गया था। जैसा ही राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन की घोषणा हुई, उस मामले में समय सीमा अपर्याप्त थी, जिससे सार्वजनिक प्रतिक्रिया एकत्र करने की कवायद व्यर्थ हो गई।

उक्त नीति को स्थानीय भाषाओं में भी प्रकाशित नहीं किया गया था। एक रिट याचिका पर संज्ञान लेते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने जनता को प्रतिक्रिया देने के लिए समय-सीमा को  बढ़ा दिया था। फिर कोर्ट ने सरकार को अन्य भाषाओं, विशेष रूप से आठवीं अनुसूची की भाषाओं में ईआईए नीति पर जारी मसौदा को प्रकाशित करने का निर्देश दिया था। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने भी इसी तरह की टिप्पणी करते हुए अंतिम अधिसूचना के प्रकाशन पर रोक लगा दी थी।

सहभागी लोकतंत्र को बाधित करने का पैटर्न

ऐसा लगता है कि केंद्र सहभागी लोकतंत्र के दो महत्वपूर्ण पहलुओं पर हमला कर सार्वजनिक भागीदारी को सीमित करने के लिए ठोस प्रयास कर रहा है। जिसके माध्यम से सरकार ने जनता को नीतिगत निर्णयों पर प्रतिक्रिया देने के लिए अपर्याप्त समय दिया है।

कानून और नीतियों से जुड़े मसौदे को स्थानीय भाषाओं में प्रकाशित करने और उन्हें व्यापक रूप से प्रचार करने की सामान्य प्रथा से भटककर, इसने जनता को सूचना मुहैया कराने को विकृत कर दिया है। इसका सीधा प्रभाव जन-भागीदारी पर पड़ता है।

जब हम कोविड-19 महामारी के प्रभाव को देखते हैं तो प्रभाव और बढ़ जाता है। महामारी ने सार्वजनिक भागीदारी और सूचना मुहैया कराने के मानदंडों को कमजोर कर दिया है। न्यायपालिका ने भारतीय लोकतंत्र के सहभागी पहलुओं को बनाए रखने की कोशिश की है, लेकिन सहभागी लोकतंत्र को मुहैया कराना मुख्य रूप से सरकार की ज़िम्मेदारी है।

(लेखक क़ानून में स्नातक डिग्री धारक हैं। उनकी संवैधानिक और मानवाधिकार क़ानून में रुचि है। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।)

यह लेख मूल रूप से द लीफ़लेट में प्रकाशित हुआ था।

 

lok sabha
BJP
Union Govt
RSS

Related Stories

तमिलनाडु: छोटे बागानों के श्रमिकों को न्यूनतम मज़दूरी और कल्याणकारी योजनाओं से वंचित रखा जा रहा है

जहांगीरपुरी— बुलडोज़र ने तो ज़िंदगी की पटरी ही ध्वस्त कर दी

उत्तराखंड: एआरटीओ और पुलिस पर चुनाव के लिए गाड़ी न देने पर पत्रकारों से बदसलूकी और प्रताड़ना का आरोप

उत्तराखंड चुनाव: राज्य में बढ़ते दमन-शोषण के बीच मज़दूरों ने भाजपा को हराने के लिए संघर्ष तेज़ किया

कौन हैं ओवैसी पर गोली चलाने वाले दोनों युवक?, भाजपा के कई नेताओं संग तस्वीर वायरल

तमिलनाडु : किशोरी की मौत के बाद फिर उठी धर्मांतरण विरोधी क़ानून की आवाज़

हरदोई: क़ब्रिस्तान को भगवान ट्रस्ट की जमीन बता नहीं दफ़नाने दिया शव, 26 घंटे बाद दूसरी जगह सुपुर्द-ए-खाक़!

भाजपा ने फिर उठायी उपासना स्थल क़ानून को रद्द करने की मांग

मुद्दा: जम्मू-कश्मीर परिसीमन आयोग का प्रस्ताव आख़िर क्यों है विवादास्पद

नगालैंड व कश्मीर : बंदूक को खुली छूट


बाकी खबरें

  • govt employee
    अनिल जैन
    निजीकरण की आंच में झुलस रहे सरकारी कर्मचारियों के लिए भी सबक़ है यह किसान आंदोलन
    28 Nov 2021
    किसानों की यह जीत रेलवे, दूरसंचार, बैंक, बीमा आदि तमाम सार्वजनिक और संगठित क्षेत्र के उन कामगार संगठनों के लिए एक शानदार नज़ीर और सबक़ है, जो प्रतिरोध की भाषा तो खूब बोलते हैं लेकिन कॉरपोरेट से लड़ने…
  • poverty
    अजय कुमार
    ग़रीबी के आंकड़ों में उत्तर भारतीय राज्यों का हाल बेहाल, केरल बना मॉडल प्रदेश
    28 Nov 2021
    मल्टीडाइमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स के मुताबिक केरल के अलावा भारत का और कोई दूसरा राज्य नहीं है, जहां की बहुआयामी गरीबी 1% से कम हो। 
  • kisan andolan
    शंभूनाथ शुक्ल
    हड़ताल-आंदोलन की धार कुंद नहीं पड़ी
    28 Nov 2021
    एक ज़माने में मज़दूर-किसान यदि धरने पर बैठ जाते थे तो सत्ता झुकती थी। पर पिछले चार दशकों से लोग यह सब भूल चुके थे।
  • Hafte Ki Baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    संवैधानिक मानववाद या कारपोरेट-हिन्दुत्ववाद और यूपी में 'अपराध-राज'!
    27 Nov 2021
    संविधान दिवस के मौके पर भी सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोपों-प्रत्यारोपो की खूब बौछार हुई. क्या सच है-संविधानवाद और परिवारवाद का? क्या भारत की सरकारें सचमुच संविधान के विचार और संदेश के हिसाब से…
  • crypto
    न्यूज़क्लिक टीम
    क्या Crypto पर अंकुश ज़रूरी है?
    27 Nov 2021
    मोदी सरकार क्रिप्टोकरेंसी पर अंकुश लगा रही हैI लेकिन आखिर यह क्रिप्टोकरेंसी है क्या? क्या यह देश में मुद्रा की जगह ले सकती है?
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License