NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कोविड-19
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
महामारी से नहीं ली सीख, दावों के विपरीत स्वास्थ्य बजट में कटौती नज़र आ रही है
इस बार स्वास्थ्य पर बजट में 86,200.65 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जो पिछले वर्ष की तुलना में 16 प्रतिशत की वृद्धि है। हालांकि, अगर ध्यान दें तो यह 2021-22 के संशोधित बजट के मुकाबले सिर्फ 0.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी है। और यदि इसमें हम पिछले वर्ष के मुकाबले बढ़ी 4.8% की महंगाई दर को जोड़ लें, तो हमें स्वास्थ्य बजट में सीधे तौर पर कटौती नजर आएगी।
विकास भदौरिया
02 Feb 2022
health budget
health budget

कल से पूरे देश में लोकसभा में पेश हुए 2022-2023 बजट की चर्चा हो रही है। एक ओर बेरोज़गारी और गरीबी से त्रस्त देश की आम जनता की सारी उम्मीदें धराशायी हो गईं हैं, तो दूसरी ओर बजट में किए गए लंबे-चौड़े, पर खोखले वादों के जरिए सरकार वाहवाही बटोरने की कोशिश कर रही है। यह महामारी के बीच लगातार दूसरा बजट था। इस बार भी बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र संबंधित कई घोषणाएं की गईं हैं। इन घोषणाओं और योजनाओं पर हम बारीकी से चर्चा करेंगे।

पिछले दो वर्षों के बजट में हमें महामारी के असर की झलक देखने को मिलती है, क्योंकि दोनों ही वर्षों में स्वास्थ्य को बजट में, उसके भाषण में ही सही, अहम प्राथमिकता दी गई है। जहां 2020-2021 में स्वास्थ्य के लिए 67,484 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, वहीं पिछले साल यानी 2021-2022 में इस आवंटन को बढ़ा कर 73,931.77 करोड़ कर दिया गया था। इस वर्ष भी बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने दावा किया गया कि, "हमारे टीकाकरण अभियान की गति और कवरेज ने महामारी से लड़ने में काफी मदद की है। मैं आश्‍वस्‍त हूं, कि सबके प्रयास से हम मजबूत वृद्धि की अपनी इस यात्रा को जारी रखेंगे।’’ अब सरकार के इन वृद्धियों के दावों पर नजर डालते हैं।

इस बार भी पिछले बजट की तरह, वित्त मंत्री ने दावा किया कि स्वास्थ्य बजट में 135 प्रतिशत का इजाफा किया गया है। पिछले वर्ष भी उन्होंने दावा किया था कि कोरोना महामारी के बीच सरकार ने 2021-22 के लिए स्वास्थ्य और कल्याण के क्षेत्र में पिछले वर्ष (2020-201) की तुलना में 137% की वृद्धि की थी। हालांकि, इस दावे की हवा निकलने में ज्यादा समय नहीं लगा। सरकार ने यह नहीं बताने की जहमत की कि बजट के इस खर्च में वह खर्च भी समायोजित हैं जिसका स्वास्थ्य क्षेत्र से सीधा संबंध नहीं हैं। इसमें पोषण, पानी और स्वच्छता के बड़े खर्च को भी जोड़ दिया गया, जिससे इजाफा 137% दिखने लगा। इसी में कोविड के टीके पर होने वाले एक बार के 35,000 करोड़ के खर्च को भी जोड़ा गया, जिसे नियमित स्वास्थ्य बजट के हिस्से के रूप में नहीं देखा जा सकता है। इस बार का इजाफा भी शायद कुछ इसी तर्ज पर है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि बजट में सरकारी खर्च पिछले दो वर्षों में बढ़ा है, लेकिन यह बढ़त महामारी के मद्देनजर की गई थी। इसके बावजूद, महामारी का दो वर्ष का अनुभव यह बताने के लिए काफी है कि यह खर्च उससे निबटने में बेहद अपर्याप्त था। इस बार स्वास्थ्य पर बजट में 86,200.65 करोड़ रुपये आवंटित किए  गए हैं, जो पिछले वर्ष की तुलना में 16 प्रतिशत की वृद्धि है। हालांकि, अगर ध्यान दें तो यह 2021-22 के संशोधित बजट के मुकाबले सिर्फ 0.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी है। और यदि इसमें हम पिछले वर्ष के मुकाबले औसतन बढ़ी 5% की महंगाई दर को जोड़ लें, तो हमें स्वास्थ्य बजट में सीधे तौर पर कटौती नजर आएगी।

इस 86,200.65 करोड़ रुपये में से 83,000 करोड़ रुपये स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग को आवंटित किए गए हैं, जबकि 3,200 करोड़ रुपये स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग को आवंटित किए गए हैं।

हालांकि, अब भी यह जीडीपीपी (सकल घरेलू उत्पाद) का 0.4% खर्च ही है, जो पिछले वर्ष (0.34%) के मुकाबले एक मामूली वृद्धि है। यह स्वयं सरकार द्वारा तैयार की गयी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (NHP) 2017 के स्वास्थ्य पर खर्च को 2025 तक जीडीपी के 2.5% तक बढ़ाने के सुझाव से भी कोसों दूर है। एक तरफ कई देश स्वास्थ्य पर जीडीपी का 10 फीसदी खर्च कर रहे हैं, उदाहरण के तौर पर लातिन अमेरिका का छोटा से देश क्यूबा स्वास्थ्य पर जीडीपी का 11 प्रतिशत खर्च करता है, तो वहीं भारत को अभी तक 1 प्रतिशत के लक्ष्य को छूने में भी मशक्कत करनी पड़ रही है। यही वजह है कि कोरोना की दूसरी लहर में, सरकार के दावों के विपरीत, देश की स्वास्थ्य व्ययस्था पूरी तरह से बैठ गई थी।  

स्वास्थ्य पर ज्यादा खर्च बढ़ता हुए दिखे और जीडीपी में उसके प्रतिशत में भी वृद्धि दिखाई दे, इसके लिए पिछले साल ही वित्त मंत्री ने 2021 के अपने बजट भाषण में स्वास्थ्य की  पारंपरिक परिभाषा का विस्तार कर जल, स्वच्छता, पोषण, प्रदूषण नियंत्रण आदि के खर्च को इसमें जोड़ दिया था। इस बार के बजट से पहले जारी किए गए आर्थिक सर्वेक्षण में दावा किया गया है कि स्वास्थ्य पर खर्च पिछले दो वर्षों में 0.4% की वार्षिक वृद्धि के साथ जीडीपी के 2.1% तक पहुंच गया है और इसी के साथ हम 2025 तक सरकार के 2.5% के लक्ष्य तक पहुंचने की राह पर हैं। हालांकि यह एक झूठा दावा है क्योंकि इस 2.1% का एक बहद बड़ा हिस्सा जल, पोषण और स्वच्छता का है, जिससे पारंपरिक स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च (सरकार के दावे से उलट) काफी कम मालूम होता है।

महामारी के भयंकर प्रकोप के बीच सरकार की प्राथमिकता कहीं भटकती हुई सी नजर आती है। एक ओर, केंन्द्र सरकार ने आयुष में 14.5% की वृद्धि की है, वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग में महज 3.9% की वृद्धि देखने को मिलती है। जहां लगातार कोरोनावायरस के बदलते वेरिअन्ट के बीच हमें लगातार अपने टीके और बूस्टर शॉट्स को बदलने और बेहतर बनाने की आवश्यकता होगी, वहीं पर यह पारंपरिक, प्राकृतिक और गैर-एलोपैथिक स्वास्थ्य पर इतना बड़ा खर्च और विशाल वृद्धि हास्यास्पद है।

एक और चौंकाने वाला तथ्य, जो सरकार की महामारी के प्रति आपराधिक अनदेखी जाहिर करता है, वह यह है कि आने वाले वित्त वर्ष में चिकित्सा और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर सरकार के प्रस्तावित खर्च में 2021-22 के संशोधित बजट के मुकाबले 45 प्रतिशत से अधिक की भारी गिरावट देखने को मिल रही है। केंद्र ने 2022-23 में चिकित्सा और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर एक ओर जहां 41,011 करोड़ रुपये खर्च करने का प्रस्ताव रखा है, तो वहीं दूसरी ओर यह मौजूदा वित्त वर्ष में खर्च 74,820 रुपये है। दस्तावेज़ में इसका कारण COVID टीकाकरण की कम आवश्यकता बताया गया है। ऐसा लगता है कि सरकार ने परिकल्पना कर ली है कि मौजूदा टीके कोविड के सभी वरिएंट्स के खिलाफ़ बराबर असरदार होंगे।

सरकार ने आयुष्मान भारत योजना का विस्तार इस बार भी जारी रखा है, जबकि प्राथमिक और माध्यमिक स्वास्थ्य सेवा और अस्पताल के बुनियादी ढांचे पर सरकार ने इस बार भी कोई रुचि नहीं दिखाई है। टियर 2, टियर-3 शहरों व ग्रामीण क्षेत्रों में बिना स्वास्थ्य सेवाओं और पर्याप्त हेल्थकेयर वर्करों के आयुष्मान भारत योजना एक विफल कार्यक्रम साबित होगी।

हैरानी की बात यह है कि इस योजना के लिए 2021-22 का बजट अनुमान 6,400 करोड़ रुपये था। हालांकि, आवंटन मौजूदा वित्त वर्ष के दौरान संशोधित कर आधा यानी केवल 3,199 करोड़ रुपये कर दिया गया था। इसका मतलब साफ है कि योजना अपने निर्धारित स्तर से काफी खराब प्रदर्शन कर रही है क्योंकि सरकार इस योजना के तहत आवंटित पैसे खर्च करने में नाकाम रही थी। इसके बावजूद सरकार ने इस बार भी इसका आवंटन मामूली बढ़त के साथ 6,412 करोड़ पर बरकरार रखा है।

दूसरी ओर, एनएचएम (NHM), जो एक प्रमुख स्वास्थ्य कार्यक्रम है, उसमें वास्तविक रूप से (यदि महंगाई दर को ध्यान में रखा जाए) गिरावट देखने को मिली है, 2020-21 में जहां उसे 37,478 करोड़ रुपये आवंटित किया गया था, वहीं उसे इस बार  37,800 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया।

महामारी के बीच जहां सरकार की प्राथमिकता गुणवत्तापूर्ण बुनियादी स्वास्थ्य ढांचे पर अधिक से अधिक खर्च की होनी चाहिए थी, वहीं सरकार ने अपना सारा ध्यान, स्वास्थ्य डिजिटल सेवाओं पर केंद्रित किया हुआ है, चाहे फिर वो नेशनल डिजिटल हेल्थ मिशन (एनडीएचएम) हो या फिर इस बार बजट में लॉन्च की गई टेलीमेंटल हेल्थ की योजना हो। इस बार, नैशनल डिजिटल हेल्थ मिशन, जो हर नागरिक के स्वास्थ्य के लेखा-जोखा को हेल्थ आइडी के जरिए डिजिटलीकरण करने का काम कर रही है, उसका बजट पिछले वर्ष के मुकाबले 75 करोड़ रुपये से बढ़ा कर 200 करोड़ रुपये कर दिया गया है।

हालांकि, इस बजट की जिस एक बात पर थोड़ी सरहाना हो रही है, उनमें से एक चीज राष्‍ट्रीय टेली मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य कार्यक्रम है। केन्‍द्रीय वित्‍त मंत्री ने अपने बजट के भाषण में माना कि महामारी ने लोगों में मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य की समस्‍याएं पैदा की हैं, जिससे निपटने की ज़रूरत है। इसके गुणवत्‍तापूर्ण उपचार और मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य काउंसलिंग की सभी लोगों तक बहतर पहुँच बनाने के लिए उन्होंने ‘राष्‍ट्रीय टेली मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य कार्यक्रम’ की घोषणा की। इस कार्यक्रम के तहत 23 टेली-मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य उत्‍कृष्‍टता केन्‍द्रों का एक नेटवर्क शामिल होगा, जिसमें निमहंस नोडल केन्‍द्र के रूप में काम करेगा तथा अंतरराष्‍ट्रीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्‍थान, बेंगलुरू (आईआईआईटीबी) इसके लिए तकनीकी सहायता प्रदान करेगा।    

मानसिक बीमारियों के उपचार के लिए दूरसंचार या वीडियोकांफ्रेंसिंग तकनीक के जरिए काउंसलिंग को टेलीमेंटल हेल्थ कहा जाता है। कोविड के दौरान जब मानसिक समस्या खुद एक महामारी बन के उभरी है, ऐसे समय में  इस सर्विस का महत्व कहीं अधिक बढ़ गया है। लेकिन, देखने वाली बात यह होगी कि ग्रामीण क्षेत्रों में मानसिक तनाव और समस्याओं से जूझ रहे लोगों तक इसकी पहुँच कैसे सुनिश्चित की जाएगी।

इस बजट में वित्त मंत्री ने 5 नए राष्ट्रीय संस्थान के स्थापना की भी घोषणा की है, जिनमें 4 नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वाइरोलॉजी और एक नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वर्ल्ड हेल्थ शामिल हैं।

1946 में घटित भोरे कमिटी ने यह सुझाव दिया था कि स्वास्थ्य सेवा के बुनियादी ढांचे को देश की आबादी के अनुकूल विकसित करने के लिए देश को जीडीपी का 12 प्रतिशत स्वास्थ्य प्रणाली के निर्माण पर खर्च करना होगा। इन सुझावों के आज 75 से ज्यादा वर्ष बाद भी हम इस लक्ष्य के आधे रस्ते भी नहीं पहुँच सके हैं। पिछले एक दशक के रुझानों के अनुसार ऐसा ही प्रतीत होता है कि हम इस लक्ष्य को शायद इस सदी में भी न छूँ पाएँ, चाहे फिर कोरोना जैसी कितनी ही आपदा एक साथ हमें अपनी चपेट में ले ले।

Health Budget
Union Health Budget 2022
union budget
Nirmala Sitharaman
COVID-19

Related Stories

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना ने फिर पकड़ी रफ़्तार, 24 घंटों में 4,518 दर्ज़ किए गए 

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 3,962 नए मामले, 26 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 84 दिन बाद 4 हज़ार से ज़्यादा नए मामले दर्ज 

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के मामलों में 35 फ़ीसदी की बढ़ोतरी, 24 घंटों में दर्ज हुए 3,712 मामले 

कोरोना अपडेट: देश में नए मामलों में करीब 16 फ़ीसदी की गिरावट

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2,706 नए मामले, 25 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 2,685 नए मामले दर्ज

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में कोरोना के 2,710 नए मामले, 14 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: केरल, महाराष्ट्र और दिल्ली में फिर से बढ़ रहा कोरोना का ख़तरा

महामारी में लोग झेल रहे थे दर्द, बंपर कमाई करती रहीं- फार्मा, ऑयल और टेक्नोलोजी की कंपनियां


बाकी खबरें

  • साइगॉन की यादों से वाबस्ता क्वाड
    एम. के. भद्रकुमार
    साइगॉन की यादों से वाबस्ता क्वाड
    28 Aug 2021
    किसी महाशक्ति की विश्वसनीयता अपने सहयोगियों के छोड़ देने से घट जाती है, शायद यही वजह है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र को लेकर चीन के ख़िलाफ़ कमला हैरिस की टिप्पणी में सख़्त आक्रामकता नहीं थी।
  • Mohammed Yousuf Tarigami
    भाषा
    माकपा नेता तारिगामी ने अनुच्छेद 370 से संबंधित याचिका पर जल्द सुनवाई के लिए अर्जी दी
    28 Aug 2021
    माकपा नेता ने कहा कि यदि मामलों की तत्काल सुनवाई नहीं की गई तो ‘‘आवेदक के साथ गंभीर अन्याय होगा।’’
  • 'प्रेस की स्वतंत्रता पर कोई बंधन नहीं' : अदालत ने पत्रकार आसिफ़ नाइक के ख़िलाफ़ एफ़आईआर को लताड़ा
    अनीस ज़रगर
    'प्रेस की स्वतंत्रता पर कोई बंधन नहीं' : अदालत ने पत्रकार आसिफ़ नाइक के ख़िलाफ़ एफ़आईआर पर लताड़ा
    28 Aug 2021
    कोर्ट ने कहा, 'इसमें कोई दो राय नहीं है कि याचिकाकर्ता पेशे से पत्रकार है और उसका काम जानकारी इकट्ठा करना और उसे समाचार पत्र या किसी अन्य मीडिया में प्रकाशित करना है।'
  • विधानसभा कूच करती आंगनबाड़ी कार्यकर्तीयां; फोटो-सत्यम कुमार
    सत्यम कुमार
    उत्तराखंड: आंगनबाड़ी कार्यकर्ती एवं सेविका कर्मचारी यूनियन का विधानसभा कूच 
    28 Aug 2021
    “उत्तराखंड में आंगनबाड़ी कार्यकर्ती को 7,500 रुपये, आंगनबाड़ी सहायिका को 3,750 रुपये और मिनी आंगनबाड़ी कार्यकर्ती को 4,500 रुपये प्रति माह मानदेय सरकार की ओर से मिलता है जो मंहगाई के इस दौर में बहुत ही…
  • इकॉनमी में मांग की भरपाई कौन करेगा ?
    न्यूज़क्लिक टीम
    इकॉनमी में मांग की भरपाई कौन करेगा ?
    27 Aug 2021
    पिछले 30 साल से देश में सूट-बूट की अर्थनीति चल रही है। अमीर और अमीर हो रहे हैं वहीँ गरीब खाने को मोहताज़ हैं। देश में निम्न और मध्यम वर्ग के हालात ख़राब ही होते जा रहे हैं जो देश की अर्थव्यवस्था के…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License