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बच्चे मिड-डे मील से और रसोइये मेहनताने से वंचित
देश का अन्न भंडार कहलाए जाने वाले राज्य पंजाब में गरीब वर्गों के विद्यार्थियों के लिए चलाई जा रही महत्वपूर्ण स्कीम का बंद होने की कगार पर पहुंचना दुर्भाग्यपूर्ण है।
शिव इंदर सिंह
15 Jul 2020
बच्चे मिड-डे मील से और रसोइये मेहनताने से वंचित
Image courtesy: India Today

केन्द्र सरकार की सहायता से स्कूलों में चल रही मिड-डे मील स्कीम पंजाब में संकट से घिरी हुई दिख रही है। केन्द्र व राज्य सरकार द्वारा इसके लिए आवश्यक फंड जारी नहीं किए जा रहा है। तालाबंदी यानी लॉकडाउन के चलते सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पंजाब शिक्षा विभाग ने स्कूलों में मिड-डे मील खाने वाले विद्यार्थियों के लिए घरों में राशन पहुंचाने व खाना पकाने पर आने वाली लागत का पैसा विद्यार्थियों के खातों में डालने का फैसला लिया था। बच्चों को राशन के पैकट व पैसे पहुंचाने के लिए अध्यापकों व दोपहर का खाना बनाने का काम करने वाली मिड-डे मिल कुक (रसोइयों) की 24 दिनों के लिए जिम्मेदारी लगाई गई थी लेकिन अब बच्चों को राशन पहुंचाया जाना भी बंद है और सरकार ने कुक को वेतन भी नहीं दिया है।

तालाबंदी के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 20 लाख करोड़ रुपये के पैकेज का ऐलान तो कर दिया लेकिन राशन व मेहनताना दोनों ही ज़रूरतमंद लोगों तक नहीं पहुंचे। पंजाब के शिक्षा विभाग ने 23 मार्च से 15 अप्रैल तक जो राशन के पैकेट विद्यार्थियों के घरों तक भेजने के आदेश दिए थे उसके तहत पहली कक्षा से पांचवीं तक के विद्यार्थियों के लिए रोजाना 1.2 किलोग्राम चावल या गेहूं, छठी से आठवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों के लिए रोजाना 1.8 किलोग्राम चावल या गेहूं के पैकेट भेजने के आदेश दिए गए थे। इसके साथ ही 24 दिनों की खाना पकाने की प्रतिदिन की प्रति विद्यार्थी लागत प्राइमरी की 4.48 रुपये, छठी से आठवीं तक की 6.71 रुपये बनती थी।

केन्द्र सरकार ने मई से कुकिंग लागत बढ़ाकर प्राइमरी के लिए प्रति विद्यार्थी 4.97 रुपये, अपर प्राइमरी के लिए 7.45 रुपये कर दी। तालाबंदी खुल जाने  के बावजूद स्कूल बंद हैं। केन्द्र सरकार ने तालाबंदी के दौरान पंजाब में पहली से आठवीं कक्षा तक सरकारी व सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में मिड-डे मील ले रहे लगभग 13 लाख बच्चों के लिए पैसा जारी किया। इस स्कीम के लिए अनाज केन्द्र सरकार की एजेंसी फूड कॉरपोरेशन द्वारा मुहैया करवाया जाता है जबकि प्रबंधकीय खर्चों के लिए फंड राज्य सरकार को मुहैया करवाने होते हैं। इस स्कीम में 60 फीसदी पैसा केन्द्र व 40 फीसदी राज्य सरकार को डालना होता है। पंजाब सरकार ने 15 अप्रैल के बाद न तो राशन दिया और न ही कुकिंग लागत बच्चों तक पहुंची। मिड-डे मील योजना लम्बी जद्दोजहद के बाद इसलिए लागू की गई थी कि गरीब परिवारों के बच्चों को पौष्टिक भोजन मिले।

राज्य सरकार द्वारा स्कीम के लिए आवश्यक फंड जारी न किए जाने के कारण अध्यापकों द्वारा इसे चलाया जाना मुश्किल हो गया क्योंकि उनके द्वारा खर्च किए गए लाखों रुपयों के बिलों की अदायगी नहीं हो रही। स्कीम के तहत खाना बनाने वाली औरतों के मासिक भत्ते का भुगतान भी पिछले पांच महीनों से नहीं हो रहा। किराना दुकानों के भी लाखों रुपयों के बिल बकाया पड़े हैं। बीते वित्तीय वर्ष के लिए पंजाब सरकार ने बेशक इस स्कीम के लिए 238 करोड़ रुपये का बजट रखा था लेकिन इसमें से बड़ा हिस्सा वित्तीय संकट के चलते जारी नहीं हुआ। सरकारी अधिकारी फंड जारी न हो सकने का कारण दफ्तरी कार्यवाही में रुकावट व अधिकारियों की अदला-बदली अथवा सेवानिवृत्ति बता रहे हैं।

पंजाब के शिक्षा मंत्री विजय इंद्र सिंगला का कहना है कि जितना राशन केन्द्र की तरफ से आया था वह बांटा जा चुका है, और आएगा तो वह भी बांट दिया जाएगा, राज्य सरकार की तरफ से कोई देरी नहीं हो रही। उनका आरोप है कि मिड-डे मील कुकों का जो रुपया नहीं दिया गया उसके लिए भी केन्द्र सरकार जिम्मेदार है।

प्राप्त जानकारी अनुसार अध्यापकों को शिक्षा विभाग ने पत्र जारी करके पूछा है कि कुकिंग लागत बच्चों के खातों में जमा क्यों नहीं करवायी गई? ज्यादातर अध्यापकों ने 107 रुपये जैसी मामूली राशि बैंकों में जमा करवाने की बजाय बच्चों के घर पहुंचा दी है। पहले ही 500 रुपये जन-धन के खातों में डालने के ऐलान से बैंकों के सामने भीड़ लगती है जो कोविड-19 के शारीरिक दूरी के नियम को भंग करती है। इस हालात में मात्र 100 रुपये लेने के लिए बैंक जाना भी बच्चों व उनके मां-बाप के लिए आसान नहीं है।

मिड-डे मिल कुक सरकारी तंत्र में शायद सबसे कम मेहनताना पाने वाला वर्ग है। पंजाब में इनकी गिनती 43,000 है। इन्हें 1700 रुपये महीना मिलता है, वह भी छुट्टियों वाले दो महीनों का मेहनताना काट लिया जाता है।

डैमोक्रेटिक मिड-डे मिल कुक फ्रंट की प्रधान हरजिन्द्र कौर लोपो का कहना है कि छुट्टियों के दौरान जब सरकारी कर्मचारियों को वेतन मिलता है तो कुकों को भी मिलना चाहिए। तालाबंदी के दौरान कुकों को अप्रैल व मई की तनख्वाह भी नहीं दी गई। उन्होंने बताया कि तालाबंदी में बड़े रोष-प्रदर्शन भी नहीं हो सके हालांकि मांग-पत्र ज़रूर भेजे गए लेकिन सरकार के कान पर जूं नहीं रेंगी।

मिड-डे मील स्कीम गरीब विद्यार्थियों के लिए बहुत लाभदायक है। पंजाब राज्य के 15,335 सरकारी व सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों के 21 लाख से अधिक विद्यार्थियों को इस स्कीम के तहत दोपहर का भोजन दिया जाता है। स्कीम का लाभ मूल रूप में गरीब व पिछड़े वर्ग के लोगों को ही मिल रहा है। सरकारी सर्वेक्षण अनुसार इस स्कीम के लाभार्थियों में 51 प्रतिशत बच्चे अनुसूचित जातियों से व 46 प्रतिशत बच्चे पिछडे़ वर्ग से हैं। अन्य वर्गों के 3 प्रतिशत बच्चे ही इस स्कीम से लाभ उठा रहे हैं। अध्ययन से यह तथ्य भी सामने आता है कि मिड-डे मील से फायदा उठाने वाले 70 प्रतिशत बच्चों के मां-बाप मज़दूर हैं व इनमें से 50 प्रतिशत से भी अधिक अनपढ़ हैं, 23.74 फीसदी पांचवीं पास हैं, केवल 15.68 फीसदी ही मिडल पास हैं। देश का अन्न भंडार कहलाया जाने वाले राज्य पंजाब में गरीब वर्गों के विद्यार्थियों के लिए चलाई जा रही महत्वपूर्ण स्कीम का बंद होने की कगार पर पहुंचना दुर्भाग्य है।

पंजाब के नामवर शिक्षाशास्त्री प्रोफेसर बावा सिंह का कहना है, “यह केवल गरीब वर्ग के विद्यार्थियों को खाने से महरूम रखने का मामला नहीं है बल्कि उनकी पढ़ाई में भी विघ्न डालने का मुद्दा भी है क्योंकि पढ़ाई का सीधा संबंध तंदरूस्ती के साथ है। कई गरीब लोग बच्चों को स्कूलों में दोपहर का खाना मिलने के लालच में ही भेजते हैं। सरकार को यह जान लेना चाहिए कि यदि विद्यार्थी भूखे रहेंगे तो पढ़ाई के लिए किए जाने वाले प्रयत्न भी असफल रहेंगे। मिड-डे मील स्कीम का जारी रहना गरीब वर्गों की भलाई के साथ-साथ शिक्षा व सेहत के मामले में राष्ट्रीय हितों के लिए भी महत्वपूर्ण है।”

(शिव इंदर सिंह वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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