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भारत
राजनीति
धर्मनिर्पेक्ष ढांचे को बदलने के लिए प्रयासरत है सरकार
सौजन्य: HilleleTV
11 Nov 2014

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश सावंत ने तीस्ता सीतलवाड़ से बात करते हुए इस बात पर अपने विचार रखे कि न्यायपालिका को किस तरह धर्मनिर्पेक्ष, लोकतांत्रिक एवं नैतिक होना चाहिए। धर्मनिर्पेक्षता के मुद्दे पर जस्टिस सावंत ने कहा कि  इसे संशोधन के जरिये संविधान के भूमिका में लाया गया था और अगर धर्मनिर्पेक्षता के प्रावधान को बदलने की कोशिश की गई तो इसका जोरदार विरोध किया जायेगा। जस्टिस सावंत के अनुसार हर धर्म में यह क्षमता होती है कि वह समाज और कानून, दोनों को प्रभावित कर सके। पर सत्ता में बैठे हुए लोगो को यह नहीं भूलना चाहिए कि वे उस संविधान और धर्मनिर्पेक्ष देश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं जहाँ विविधता के बावजूद सभी को समान अधिकार हैं। उनके अनुसार संविधान के मूल ढांचे को बदलने की कोशिश की जा रही है। 

                                                                                                                          

भाजपा
हिंदुत्व
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संविधान
सांप्रदायिक ताकतें
धर्मनिर्पेक्षता
तीस्ता सीतलवाड़
जस्टिस पी.बी.सावंत

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CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License