NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
साम्प्रदायिकता की चपेट में साझा गर्व
रजनीश साहिल
11 Nov 2014

फेसबुक पर भारतीय स्वतन्त्रता-संग्राम 1857 के नायकों में से एक मौलवी अहमदुल्लाह शाह के बारे में जानकारी देती एक पोस्ट देखी जिसे 700 लोग शेयर कर चुके हैं। इच्छा हुई कि देखूँ किस-किस ने शेयर किया है। जो सूची सामने आई उसमें 25-30 से अधिक हिन्दू नाम नहीं दिखे। ठीक ऐसी ही स्थिति हिन्दू व आदिवासी नायकों से जुड़ी कई पोस्ट्स पर दूसरे समुदायों की दिखी। भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, अशफाक़उल्ला खान, महात्मा गाँधी आदि कुछ नामों जिन्हें कि शुरू से ही पूरे मुल्क की मोहब्बत हासिल रही को छोड़ दें तो आज़ादी के कई नायकों, ख़ासकर जिनके बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है, के ज़िक्र वाली कई पोस्ट्स का सोशल मीडिया पर यही हाल है।

यह स्पष्ट है कि स्वतंत्रता संग्राम में हर मज़हब के लोगों ने अपना योगदान दिया, वह साझी लड़ाई थी। इस लिहाज़ से उसका गर्व सामूहिक होना चाहिए न कि हिन्दू-मुसलमान के खेमे में बंटा हुआ। सिद्धो-कान्हू से लेकर गाँधी तक किसी भी स्तर पर जंग-ए-आज़ादी जारी रखने वालों का ज़िक्र कम-ज़्यादा भले ही होता रहा हो, गर्व की बुनियाद साझा रही है जिसमें अब दरार नज़र आने लगी है। सोशल मीडिया की आभासी दुनिया हो या फिर हकीक़त, साझी संस्कृति और विरासत की हिमायत करने वालों की भरमार है। फिर क्यों है कि किसी एक मज़हब/क़ौम से संबधित नायकों से जुड़ी पोस्ट को शेयर करने वालों में दूसरे मज़हब/क़ौम के लोगों की संख्या ज़्यादा नहीं है?

कई लोग तर्क दे सकते हैं और देते भी हैं कि ऐसा इसलिए क्योंकि लोगों को अपनी क़ौम के नायकों पर गर्व होना स्वाभाविक है, इसलिए जो नायक जिस क़ौम से सम्बंधित था वह ज़्यादा शेयर करती है। लेकिन क्या वाक़ई बात सिर्फ़ इतनी ही है? इसे यूँ भी देखा, सोचा जाना चाहिये कि किसी शहीद से सम्बंधित पोस्ट को शेयर करने वाले कई लोगों के लिए वे पूरे मुल्क का गर्व नहीं रह जाते बल्कि यूपी, बिहार या किसी अन्य राज्य का गौरव हो जाते हैं, हिन्दू योद्धा या मुसलिम जांबाज़ हो जाते हैं, मराठा शान या राजपूत वीर हो जाते हैं। आख़िर क्यों?

दरअसल बीते कई सालों में अपने मज़हब व क़ौम से मोहब्बत जिस तेज़ी से बढ़ी और मुखर हुई है उसी अनुपात में दूसरे मज़हब व क़ौम से एक अदृश्य-सी दूरी, अस्पष्ट-से विरोध ने भी लोगों के ज़ेहन में अपनी जगह बनाई है। इसमें सांप्रदायिक ताक़तों की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसा करने के लिए उन्होंने एड़ी-चोटी का जोर लगाया है। वे हर दिल में दूसरे मज़हब के प्रति नफ़रत भरने में कामयाब भले ही न रही हों पर एक बड़े हिस्से के दिलों में सुनियोजित ढंग से ऐसी दूरी पैदा कर दी है जो ऊपरी तौर पर नहीं दिखती लेकिन अंदर कहीं मौजूद है। मौजूदा सामाजिक व्यवस्था के चलते अपने मज़हब व क़ौम से व्यक्ति को विरासत में हासिल सामीप्य व आत्मीयता को सांप्रदायिक ताक़तें भुनाती और हथियार की तरह इस्तेमाल करती रही हैं। इन्हें गर्व और श्रेष्ठता के साथ जोड़कर इस ढंग से प्रोत्साहित किया जाता है कि लोग अनजाने में ही हर चीज़ को अपने-पराये मज़हब के चश्मे से देखने और उसी के मुताबिक चीजों, घटनाओं से ख़ुद को जोड़ने लगता है। वह अनायास ही एक चीज़ को ज़्यादा और दूसरी को कम पसंद या नापसंद करने लगते हैं। ऐसा क्यों है, इसका उनके पास कोई तार्किक जवाब नहीं होता। देखा गया है कि सभी समुदायों की एकता चाहने वाले लोग भी अपनी क़ौम के नायक को शेयर करेंगे, दूसरे को लाइक मारकर निकल लेंगे। ज़ाहिर है कि वे जान-बूझकर ऐसा नहीं कर रहे हैं, बस किसी लम्हे में उनके भीतर छुपी बैठी यह दूरी निर्णय लेती है और वे ऐसा कर देते हैं। यह एक तरह से पहला चरण है।

                                                                                                                                  

जब यह भावनाएँ और भुना ली जाती हैं तो लोग अपनी, अपने मज़हब की आलोचना न सुनने व दूसरे की खामियों का ज़िक्र कर अपने अहं को तुष्टि पहुँचाने के स्तर तक पहुँच जाते हैं। सोशल मीडिया पर कई बार यह बहुत साफ़ दिखाई देता है। कभी ऐसी पोस्ट्स के लाइक्स, कमेंट्स और शेयर्स को गौर से देखिएगा जो किसी धर्म की ख़ामियों/विरोधाभास पर लिखी गई हैं। अगर हिन्दू धर्म के बारे में लिखा गया है तो मुसलिम समर्थन का प्रतिशत ज्यादा होगा, ज़्यादातर हिन्दू बुरा-भला कह रहे होंगे और अगर बात इस्लाम की है तो हिन्दू-मुसलमानों की जगह बदली हुई होगी। इन दिनों आदिवासी दर्शन और हिन्दू धर्म को लेकर जो बहस है उसमें भी तकरीबन ऐसा ही है। आगे यह स्थिति सिर्फ़ धर्म के दंभ व अपमान के स्तर पर पहुँचती है और नतीजा वह होता है जो बीते दिनों मुज़फ्फ़रनगर, सहारनपुर और त्रिलोकपुरी में दिखाई दिया।

ऐसी घटनाएँ साफ़ इशारा हैं कि सांप्रदायिक ताक़तें लोगों के दिमाग को किस हद तक अपने कब्ज़े में ले रही हैं। वे लोगों को अपने मज़हब व क़ौम से प्रेम करना नहीं सिखा रहीं बल्कि दूसरों के प्रति नफ़रत और असहिष्णुता के बीज बो रही हैं। लोगों को पता भी नहीं चलता और चुपके से कोई पूर्वाग्रह उनके भीतर बिठा दिया जाता है। नतीजतन एक-दूसरे से दूरी बढ़ रही है और यही तो ये ताक़तें चाहती हैं। इसके बिना उनकी वह इमारत खड़ी नहीं हो सकती, जिसमे ज़ात, पंथ, वर्ण, क्षेत्र और शुद्ध-अशुद्ध के तमाम तरह के कमरे मौजूद हैं, जहाँ मुल्क के लिए शहीद होने वाला भी किसी एक क़ौम के लिए गौरव हो जाता है, और दूसरी क़ौम उसे अनदेखा करके गुज़रने लगती है।

फ़िक्र की बात यह है कि लोगों की भावनाओं को भुनाकर हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने का अब कोई एक तरीका नहीं है। सांप्रदायिक ताक़तों ने अपने प्रतीकों और कार्यपद्धति में भी बदलाव किया है। भगत सिंह की पगड़ी का भगवा हो जाना, बिरसा मुंडा की जन्मस्थली पर ‘भगवान बिरसा मुंडा’ लिखा जाना, मसला सामाजिक या राजनीतिक ही क्यों न हो उसे इस्लाम से जोड़ दिया जाना, ‘इस्लाम के मुताबिक’ कहकर ज़ारी किये जा रहे उकसाऊ फतवे और हर हिन्दू के घर में तुलसी का पौधा लगाने जैसे अभियान, सब इसी दिशा में बढ़े कदम हैं। अब तो लोगों को अपने इतिहास से ही काट देने की क़वायद भी तेज़ हो चुकी है। ऐसे समय में साझी संस्कृति – साझी विरासत के ईमानदार पक्षधरों की ये एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी बन जाती है कि हर उस रास्ते पर नज़र रखी जाये जहाँ से सांप्रदायिक ताक़तें लोगों के ज़ेहन तक पहुँच सकती हैं। 

 

डिस्क्लेमर:- उपर्युक्त लेख मे व्यक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं, और आवश्यक तौर पर न्यूज़क्लिक के विचारो को नहीं दर्शाते ।

साम्प्रदायिकता
भगत सिंह
बिरसा मुंडा
हिन्दू
मुसलमान
मुज़फ्फरनगर दंगे
त्रिलोकपुरी
सांप्रदायिक ध्रुवीकरण

Related Stories

“हवा में रहेगी मेरे ख़्याल की बिजली...”

“हवा में रहेगी मेरे ख़्याल की बिजली...”

दिल्ली में अखंड भारत मोर्चा द्वारा सांप्रदायिक दंगे भड़काने की कोशिश

नीतीश कुमार BJP-RSS के राजनीतिक बंधक हैं : उर्मिलेश

ये दंगे सुनियोजित थे

क्या इस अंधेरे दौर में भगत सिंह के विचार राह दिखायेंगे ?

तमिलनाडु के विपक्षी दलों ने 'राम राज्य रथ यात्रा’ को अनुमति देने का विरोध किया

लेनिन की सिर्फ मूर्ति टूटी है, उनके विचार नहीं

कर्नाटक: क्या झूठ और सांप्रदायिक प्रचार से भाजपा चुनावों में जीत दिला सकती है?

देश में बढ़ती सांप्रदायिक घटनाओं के बीच, बीजेपी संसद ने कहा "मुसलमानों को भारत छोड़ देना चाहिए"


बाकी खबरें

  • किताबः ‘यह मिट्टी दस्तावेज़ हमारा’ के बारे में
    अजय सिंह
    किताबः ‘यह मिट्टी दस्तावेज़ हमारा’ के बारे में
    10 Sep 2021
    ‘यह मिट्टी दस्तावेज़ हमारा’ की कविताएं राजनीतिक परिपक्वता, गहन संवेदनशीलता, सघन बिंबात्मकता और प्रकृति के साथ लयात्मक व दोस्ताना रिश्ते की वजह से हमारा ध्यान खींचती हैं।
  • Rakesh Tikait
    बादल सरोज
    अल्ला हू अकबर और हर-हर महादेव के युग्म से इतना क्यों डर गए हुक्मरान ?
    10 Sep 2021
    हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई समुदायों की यह साझेदारी तो दिल्ली के सभी तरफ से लगी किसानो की मोर्चेबन्दियों में दिखती है फिर ऐसी क्या ख़ास बात थी कि इसे विशेष रूप से दर्ज किया जाए ?
  • नौ साल पहले तालिबान द्वारा एक नौजवान का किया गया अपहरण बना अंतहीन आघात
    विक्रम शर्मा
    नौ साल पहले तालिबान द्वारा एक नौजवान का किया गया अपहरण बना अंतहीन आघात
    10 Sep 2021
    वर्ष 2000 में तालिबान लड़ाकों ने एक किशोर का अपहरण किया था। जब यूनाइटेड किंगडम में डॉक्टरों की एक टीम ने उसका मानसिक मूल्यांकन किया, तो तालिबान शासन के तहत जीवन की एक परेशान करने वाली तस्वीर उभर कर…
  • कोरोना
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 34,973 नए मामले, 260 मरीज़ों की मौत
    10 Sep 2021
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 3 लाख 90 हज़ार 646 हो गयी है।
  • हड़ताल पर रोक लगने के बाद रक्षा कर्मचारी संघ ओएफबी के निगमीकरण के ख़िलाफ़ लड़ेंगे क़ानूनी लड़ाई
    रौनक छाबड़ा
    हड़ताल पर रोक लगने के बाद रक्षा कर्मचारी संघ ओएफबी के निगमीकरण के ख़िलाफ़ लड़ेंगे क़ानूनी लड़ाई
    10 Sep 2021
    एक अन्य कदम के बतौर 13 से 18 सितंबर के बीच एक जनमत-संग्रह आयोजित किया जाना है, जिसमें देश भर के आयुध कारखानों में मौजूद 76,000 रक्षा कर्मचारियों से केंद्र के कदम के बारे में अपना फैसला व्यक्त करने के…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License