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'तत्काल तीन तलाक़' को अपराध मानने वाले विधेयक की क्या ज़रूरत है?
जो मामले हो रहे हैं वह देश के क़ानून का उल्लंघन हैं और मौजूदा क़ानूनों से निपटाया जा सकता है जिसे माननीय अदालत ने आदेश दिया है।
01 Jul 2019
Triple Talaq

जून 2019 में मोदी सरकार 2.0 द्वारा संसद में पेश इस विधेयक (तीन तलाक़ विधेयक) को लेकर बहस चल रही है। इस सरकार द्वारा संभवत: यह पहला बड़ा प्रयास है जो 'मुस्लिम बहनों' को लैंगिक न्याय देने के तर्क पर आधारित है। मोदी सरकार 1.0 ने इसी तरह का विधेयक पेश किया था लेकिन यह लोकसभा में पारित होने के बावजूद लागू नहीं हो सका। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) राज्यसभा में इसे पारित करवाने में नाकाम रही क्योंकि इस सदन में इसका बहुमत नहीं था। इस तरह मोदी सरकार 1.0 का ये विधेयक 2017 के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की पृष्ठभूमि में आया जिसने तत्काल तीन तलाक़ को अवैध माना। अब इस विधेयक को पारित कराने की जल्दबज़ी को लेकर सरकार का तर्क यह है कि चूंकि इसे पहली सरकार में पारित नहीं किया जा सका था जिसके बाद तीन तलाक़ (तत्काल) के लगभग 200 मामले सामने आए हैं।

पहला ये कि मुझे लगता है कि तीन तलाक़ और 'तत्काल' तीन तलाक़ के बारे में कुछ स्पष्टता की आवश्यकता है। क़ुरान के अनुसार तीन तलाक़ किसी व्यक्ति द्वारा अपनी पत्नी को तलाक़ देने की विधि है। इसमें एक बार तलाक़ कहना शामिल है लेकिन यह कुछ अवधि के लिए होता है, इस अवधि में दोनों पक्षों के मध्यस्थ सुलह के प्रयास करते हैं। यदि इसमें असफ़लता होती है तो दूसरी बार तलाक़ कहा जाता है। फिर ये भी कुछ अवधि के लिए होता है जिसमें दोनों पक्षों के लोगों द्वारा सुलह के प्रयास किए जाते हैं और यदि वे इसमें भी विफ़ल हो जाते हैं तो तीसरी बार अर्थात आख़िरी बार तलाक़ कहा जाता है जिसके बाद पति-पत्नी एक दूसरे से अलग हो जाते हैं। क़ुरान के अनुसार, "दो मध्यस्थों को नियुक्त किया जाए, एक पति की ओर से और दूसरा पत्नी की ओर से, अगर वे सुलह चाहेंगे तो अल्लाह उनके बीच सुलह कर देगा (4.35) ... जब वे अपनी इद्दत के ख़ात्मे पर पहुंच जाएं तो या तो उन्हें भले तरीक़े से रोक लो या उन्हें भले तरीके से रुख़सत कर दो और अपने लोगों में दो गवाह मुकर्रर करो और अल्लाह के सामने सबूत पेश करो(65.2)।"

अक्सर जिन चीज़ों का उल्लेख नहीं किया जाता है वह ये कि महिलाओं को भी अपनी इच्छा के अनुसार 'खुला' के ज़रिये विवाह विच्छेद का अधिकार है जो क़ुरान के अनुसार मान्य है।

भ्रष्ट मौलवी जिसका इस्लाम में कोई धार्मिक स्थान नहीं है और जो समाज में उभर गए हैं उन्होंने इस मुद्दे से समाज को परेशानी में डाल दिया है। इन मौलानाओं ने तत्काल तीन तलाक़ की प्रथा को मंज़ूरी दे दी है जिसका क़ुरान में कहीं कोई ज़िक्र ही नहीं है। ये प्रथा गहरा गई है जो मुस्लिम महिलाओं की परेशानी का कारण है।

तलाक़ (तीन तलाक़) की कुरान की प्रथा जो मुस्लिम पर्सनल लॉ का एक हिस्सा है उसको लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कहा: “पर्सनल लॉ’ का एक घटक होते हुए इस प्रथा (तीन तलाक़) को संविधान के अनुच्छेद 25 का संरक्षण है। धर्म आस्था का विषय है न कि तर्क का। किसी प्रथा को लेकर समतावादी दृष्टिकोण को स्वीकार करने के लिए अदालत खुला नहीं है जो धर्म का एक अभिन्न हिस्सा है।”

कुछ टिप्पणीकार 'तत्काल तीन तलाक' के स्थान पर 'तीन तलाक' शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसको लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने फ़ैसला दिया है और जिसे पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित कई मुस्लिम बहुल देशों में भी प्रतिबंधित किया गया है। भारत की शीर्ष अदालत ने भी इस पर प्रतिबंध लगा दिया है तो ये विधेयक क्यों? जो मामले हो रहे हैं वह देश के क़ानून का उल्लंघन हैं और मौजूदा क़ानूनों से निपटाया जा सकता है जिसे माननीय अदालत ने आदेश दिया है। इस विधेयक को सबसे ज़्यादा प्राथमिकता क्यों है, या यही विधेयक आख़िर क्यों?

मुस्लिम महिलाओं की दुर्दशा को लेकर मोदी सरकार का रुख मगरमच्छ के आंसू बहाने जैसा है। मुस्लिम महिलाओं के मुख्य मुद्दे क्या हैं? गोमांस ले जाने, खाने व व्यापार करने के शक में मुस्लिम लोगों को मारा जाता है। ट्रेन में यात्रा के दौरान टिफ़िन में गोमांस होने के संदेह में मुसलमानों को मारा जा सकता है। अब एक मुस्लिम को चोरी के संदेह में खंभे से बांध कर मारा जा सकता है और उन्हें जय श्री राम कहने के लिए मजबूर किया जा सकता है। भाजपा के कई शीर्ष नेता हैं जो गाय और गोमांस के मामले में हत्याओं के आरोपियों को सम्मानित करने को भी तैयार रहते हैं।

सामाजिक आम भावना को समाप्त कर दिया गया है और हिंदू राष्ट्रवादी के तथाकथित अनुषंगी समूह अब अल्पसंख्यकों को डराने और उन्हें दबाने के लिए एक नए सांप्रदायिक हथियार के रूप में जय श्री राम का सहारा ले रहे हैं। पवित्र गाय के कारण हमारी अर्थव्यवस्था में असंतुलन पैदा हुआ जो कई मुस्लिम परिवारों को प्रभावित किया है जो हमारी मुस्लिम बहनों के जीवन को भी प्रभावित कर रहा है। जब पहचान को लेकर हाय तौबा मचायी जाती है तो न केवल पुरुषों का नुकसान होता है बल्कि उनके घर की महिलाओं के लिए परेशानी होती है। सरकार चालाकी से मुस्लिम महिलाओं को तत्काल तीन तालक दिए जाने के आंकड़े तो दे रही है लेकिन क्या यह राम मंदिर, गाय-गोमांस, लव जिहाद, घर वापासी और हिंसा जैसे मुद्दों के कारण पीड़ित 'मुस्लिम बहनों' के आंकड़े भी दे सकती है?

और जब सरकार लैंगिक न्याय के बारे में बात करती है तो कोई भी इस मुद्दे की सराहना करते हुए आंकड़ों के साथ इसकी जांच करना चाहेगा कि वर्ष 2011 के आंकड़ों के अनुसार, 24 लाख महिलाओं को उनके पति ने छोड़ दिया है! क्या कोई ऐसा क़ानूनहै जो इन पापी पतियों को लेकर सख़्त है जिनके पास तलाक़की प्रक्रिया से गुज़रने और गुज़ारा भत्ता आदि से बचने का तरीक़ा नहीं है? क्या इन पापी पतियों को उनकी नैतिक ज़िम्मेदारियों के बारे में याद दिलाने के लिए कोई क़ानूनभी है? फिर यह पक्षपात क्यों? सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन करते हुए मासिक धर्म आयु वर्ग की हिंदू महिलाओं को परंपराओं के आधार पर सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करने से रोका जाता है तो लैंगिक न्याय में बाधा नहीं है!

मुस्लिम महिलाओं को लेकर ये मामला मुस्लिम पुरुषों के ख़तरे के बराबर है। मुस्लिम महिलाओं की समानता का पूरी तरह से सम्मान करते हुए कोई यह समझना चाहेगा कि पुरुष और महिला मिलकर ही एक परिवार बनते है। जब मुस्लिम पुरुषों पर हमला होगा और उन्हें अपराधी माना जाएगा (जैसा कि इस विधेयक में भी है) तो इसे मुस्लिम बहनों का पक्ष लेना नहीं कहा जाएगा।

एक तरफ़ इस मुद्दे पर जनता दल (यूनाइटेड) की तरह मोदी सरकार 2.0 असहमत है, लेकिन निश्चित रूप से मोदी 2.0 में केवल अड़ंगा लगाने वाले सत्ता के इर्द-गिर्द रहेंगे क्योंकि उनके मतभेद का प्रचंड बहुमत यानी बीजेपी के सामने कोई मायने नहीं।

राम पुनियानी लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। ये लेखक के निजी विचार हैं।

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