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तेल की क़ीमत से ज़्यादा यह बाज़ार में हिस्सेदारी की लड़ाई है
आपसी मतभेदों के बावजूद सऊदी और रूस के पारस्परिक हित इस बात से जुड़े हैं कि मौजूदा क़ीमतों के ज़मीन पर आ जाने से अमेरिकी शेल उत्पादक भारी नुक़सान में हैं। इस समय उनकी हालत काफ़ी नाज़ुक नज़र आती है।
एम. के. भद्रकुमार
18 Mar 2020
रेड क्रॉस मेडिकल कर्मी
रेड क्रॉस मेडिकल कर्मी कोरोनोवायरस जाँच के लिए 6 मार्च, 2020 को वियना में ओपेक+ बैठक में शामिल प्रतिभागियों के तापमान की जांच की प्रतीक्षा में। इनमें कोई भी संक्रमित नहीं पाया गया, लेकिन इस बैठक का अंत तनातनी के साथ संपन्न हुआ।

आम धारणा यही बनी है कि सऊदी अरब ने रूस के ख़िलाफ़ तेल युद्ध छेड़ दिया है, जिसमें पहले से कहीं अधिक उत्पादन करने के साथ तेल को कहीं अधिक रियायती दरों पर बेचने का खेल शामिल है। जबकि दूसरी ओर जलवायु परिवर्तन को लेकर चल रही कार्यवाही और वैश्विक वित्तीय प्रणाली पर कोरोनोवायरस के हमले ने माँग पर किसी भी प्रकार के दबाव को ही खत्म कर दिया है। इन सभी कारणों के चलते पिछले एक हफ्ते से तेल की क़ीमतें 30% तक लुढ़क चुकी हैं। 

लेकिन क्या सारा क़िस्सा यही है? या असली माजरा कुछ और भी है? जी हाँ, इसके पीछे कई जटिल कारक और भी हैं। 

संक्षेप में कहें तो ओपेक और रूस के बीच (जिसे OPEC+ के नाम से जाना जाता है) उत्पादन में कटौती को लेकर 3 साल का समझौता हुआ था। जिसे मास्को की ओर से 6 मार्च को खत्म कर दिया गया जब उसने सऊदी अरब की ओर से प्रस्तावित 15 लाख बैरल प्रतिदिन के हिसाब से अतिरिक्त उत्पादन में कटौती के प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया। इसमें 10 लाख ओपेक देशों को और 5 लाख बैरल गैर-ओपेक तेल उत्पादक देशों को कम करने की बात कही गई थी। 

रूस की ओर से ऐसा रुख क्यों अपनाया गया? क्रेमलिन प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने 10 मार्च को इस बारे में बताया कि मास्को ने बाज़ारों की इस स्थिति से निपटने के लिए ओपेक+ की वार्ता से तीन दिन पहले ही कई विकल्पों पर विचार किया था। और इस सम्बन्ध में “अग्रिम तौर पर विभिन्न विकल्पों पर गणना और सोच विचार किया जा चुका था।” 

मूलतः इस सम्बन्ध में मास्को की पोजीशन यह है कि तेल की माँग में कमी आने का अर्थ हर्जिग यह नहीं कि समाधान के तौर पर तेल के उत्पादन में भारी मात्रा में कमी लाकर इससे निपटा जाए। इस सम्बन्ध में पुतिन ने 1 मार्च को रुसी उर्जा क्षेत्र से जुड़े अधिकारियों और उत्पादकों की एक बैठक में कहा कि रूस के लिए वर्तमान में प्रचलित तेल की क़ीमतें [तकरीबन 50 डॉलर प्रति बैरल] स्वीकार्य हैं। क्योंकि देश में ब्रेंट कच्चे तेल उत्पादन की लागत औसतन 42.40 डॉलर प्रति बैरल आँकी गई है। 

उर्जा अधिकारियों के साथ अपनी 1 मार्च की बैठक में बोलते हुए पुतिन ने कहा “नेशनल वेल्थ फंड सहित हमारे पास कुल संचित भण्डार इतना पर्याप्त है कि स्थिति को काबू में रखा जा सकता है। यहाँ तक कि यदि संभावित वैश्विक आर्थिक हालात आगे जाकर बिगड़ते हैं तो भी बजट की सभी जरूरतों और सामाजिक दायित्वों का निर्वहन किया जा सकता है।” इसमें आगे जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि हालाँकि रूस को अहसास है कि इस सम्बन्ध में “विदेशी सहयोगियों के साथ मिलकर” कुछ निर्णय लिए जा सकते हैं। 

क्रेमलिन की ओर से जारी ट्रांसक्रिप्ट के अनुसार पुतिन ने बैठक को सम्बोधित करते हुए कहा कि ओपेक+ “वैश्विक उर्जा बाज़ार में दीर्घ कालीन स्थिरता को सुनिश्चित कराने का प्रभावी साधन साबित हुआ है। इसके चलते हमें अतिरिक्त बजट राजस्व प्राप्त हुआ है, जो काफी मायने रखता है। इसने हमें प्रतिकूल परिस्थितियों में काम कर रही कंपनियों को आत्मविश्वास के साथ विभिन्न विकास परियोजनाओं पर निवेश की सम्भावनाओं का आधार प्रदान किया है।”

इससे यह तो साफ़ हो चुका था कि 6 मार्च को वियना में होने वाली ओपेक+ की बैठक से मास्को बाहर निकलने का फैसला लेने नहीं जा रहा। मुद्दा ये है कि सऊदी ने रूस के सामंजस्य की स्थिति को नज़रअंदाज किया। रूस की ओर से ओपेक+ समझौते के मौजूदा कोटे को विस्तारित किये जाने को प्रस्तावित किया गया था, और इसके साथ ही लगातार अस्थिर होते बाज़ार की स्थिति पर सटीक निगरानी बनाये रखने के काम पर जोर दिया गया था।

अब सवाल यह है कि सऊदी अरब किसके हितों को साधने में लगा था? यह बात सबको मालूम है कि वियेना बैठक की पूर्व संध्या पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से फोन पर बात की थी।

रुसी जानकारों को शक है कि सऊदी अरब डबल गेम खेल रहा है। उसके अनुसार रियाद और वाशिंगटन आपस में मिलकर तेल के दामों में हेराफेरी कर रहे हैं (और विनिमय दरों में भी)। उनकी कोशिश इस बात को लेकर है कि मास्को को मुश्किल में डालकर वैश्विक उर्जा बाज़ार से बाहर फेंक दिया जाए और रूस में राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति को पैदा हो जाए।

हक़ीक़त में देखें तो भू-राजनीतिक क्षेत्र में सऊदी अरब की भूमिका ऐतिहासिक तौर पर अमेरिकी पक्ष में रही है। ओपेक+ सौदे में भी ऐसा ही कुछ हुआ है और ये दोनों देश इसके मुख्य लाभार्थी के रूप में सामने नज़र आते हैं।

ट्रंप ने बेहद शानदार तरीके से ओपेक+ सौदे को (जिसका मकसद हाइड्रोकार्बन की कम लागत की पृष्ठभूमि में तेल की क़ीमतों को स्थिर बनाए रखना था) अमेरिकन शेल कंपनियों के विस्तार में बखूबी इस्तेमाल में किया। तेल की ऊँची क़ीमतों (जिसके लिए ओपेक+ डील को धन्यवाद देना चाहिए) ने अमेरिकी शेल आयल के उत्पादन को लाभदायक स्थिति में पहुँचा दिया। अमेरिका ने इस अवसर का लाभ उठाते हुए एक विशाल निर्यात ढाँचे को खड़ा कर डाला है और नए-नए वृहद बाज़ार में अपनी पैठ (भारत जैसे देश) बना ली है।

इसके बारे में आंकड़े अपनी कहानी खुद बयां करते हैं। 2016 के बाद से जबसे ओपेक+ सौदा हुआ था, अमेरिकी तेल निर्यात में पांच गुना का इजाफा हो चुका है, और शेल उत्पादन 8.9 मिलियन बैरल प्रतिदिन से बढ़कर 13.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक का हो चुका है।

सऊदी अरब को भी ओपेक+ सौदे से जबर्दस्त मुनाफा हुआ है। जैसा कि इसके द्वारा सऊदी अरामको के आईपीओ को लेकर लिए गए क़दमों से यह जाहिर है जिसमें रूब्रिक विज़न 2030 के तहत सामाजिक और आर्थिक सुधारों के प्रिंस सलमान के महत्वाकांक्षी कार्यक्रम के लिए धन का प्रबन्धन करना शामिल है।

जबकि इसके विपरीत ओपेक+ सौदे का अनिवार्य रूप से मतलब था रूस का स्वेच्छा से बाज़ार से खुद की छंटनी कराना, जिसका सीधा अर्थ है अपनी संभावित आय से हाथ धोना। इस प्रकार एक बार फिर से सऊदी की ओर से उत्पादन में कटौती की माँग को वियेना बैठक में रुस की ओर से  “न्येत” बोलकर मास्को ने स्पष्ट तौर पर जता दिया है कि वह अब अमेरिकी शेल आयल के उत्पादन को और अधिक सब्सिडी प्रदान कराने नहीं जा रहा।

वहीँ दूसरी ओर इस ओर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है कि जब सारी दुनिया में तेल की माँग अपने सबसे निचले स्तर पर बनी हुई है तो बाज़ार में इसकी बाढ़ क्यों लाई जा रही है? मो. बिन सलमान ने इस बारे में जरुर कुछ सोच रखा होगा। शाही परिवार के भीतर उत्तराधिकार की लड़ाई भी उत्तरोत्तर तेज होता जा रही है। तेल के बाज़ार में संकट और शाही परिवार के भीतर की घबराहट ने सलमान के लिए एक कृत्रिम आवरण प्रदान करने में मदद की होगी ताकि किंग सलमान के स्पष्ट उत्तराधिकारी के रूप में अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए अपने राजनीतिक विरोधियों पर नकेल कासी जा सके। (और वास्तव में यह कार्यवाही जारी है।)

इस बीच रूसी प्रधान मंत्री मिखाइल मिशुस्तीन ने कहा है  “हमने समझौते [ओपेक+ सौदे] से वापसी की पहल नहीं की थी। इसके विपरीत हमने तो प्रस्तावित किया था कि मौजूदा शर्तों के आधार पर इस समझौते को विस्तारित किया जाए। जिसे कम से कम इस साल के दूसरी तिमाही के अंत तक या एक साल तक के लिए बढ़ाया जाए, ताकि कोरोनोवायरस के प्रसार के चलते जो स्थिति पैदा होने वाली है वह और जटिल न हो जाए।”  लेकिन इस बात को लेकर कोई संदेह नहीं कि क़ीमतों में होने वाले इस नुक़सान के लिए कहीं न कहीं रूस पहले से ही तैयार बैठा था। अप्रैल की शुरुआत से ही उत्पादन पर लगे सभी प्रतिबंध स्वतः हट जाने वाले हैं।

तेल की क़ीमतों के कमी के बावजूद रूस के पास लंबे समय के लिए पर्याप्त भंडार सुरक्षित है। मिशुस्टीन ने अपने वक्तव्य में कहा है  "हम कई वर्षों से मुद्रास्फ़ीति की दर में कमी की स्थिति में रहते आए हैं, इसलिए हमारे पास अपनी सुरक्षा के लिए भारी मात्रा में अधिशेष मौजूद है: बैंक ऑफ रूस के पास सोना और मुद्रा सम्पत्ति के रूप में 570 बिलियन डॉलर से अधिक की जमाराशि मौजूद है। नेशनल वेल्थ फंड की तरल संपत्ति का अनुमान भी 10 ट्रिलियन से अधिक का है। यहां तक कि यदि तेल की क़ीमतें इसी प्रकार लगातार निचले स्तर पर बनी रहीं तो भी इन जमानिधियों के ज़रिये कई वर्षों तक बजट घाटे की भरपाई पर्याप्त मात्रा में की जा सकती है।”

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इसके अलावा रूस ने उद्योगों और कृषि क्षेत्र में अतिरिक्त आयात प्रतिस्थापन के उपायों पर भी अपने काम को जारी रखा है।

कुल मिलाकर कहें तो ऐसा प्रतीत होता है कि रूस मानकर चल रहा है कि सऊदी अरब से जारी “क़ीमतों की लड़ाई” हाल-फिलहाल में खत्म होने नहीं जा रही। विशेषज्ञों के बीच इस बात पर आम सहमति है कि दोनों देश 30 डॉलर प्रति बैरल से भी कम क़ीमत पर भी अपना काम चला सकने में सक्षम हैं। वे इस स्थिति में हैं कि अपने विदेशी मुद्रा भंडार (लगभग आधे ट्रिलियन डॉलर के बराबर) तक को डुबो दें, फिर भी कोई खास फर्क पड़ने नहीं जा रहा, हालांकि रूस की स्थिति कहीं बेहतर है। रूस के लिए जहाँ राजकोषीय तेल की लागत 42 डॉलर प्रति बैरल के आसपास होने का अनुमान है, वहीँ सऊदी अरब के राजकोषीय संतुलन के लिए यह बिंदु 80 डॉलर पर जाकर बैठती है।

चूँकि सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था मुख्यतया तेल पर निर्भर है और तेल की क़ीमतों में अगर कमी बरकरार रहती है तो यह गंभीर बजट घाटे की वजह साबित हो सकती है। लेकिन यह अपने घाटे की भरपाई को संरक्षित मुद्रा भंडार, उधार, और यहां तक कि राष्ट्रीय मुद्रा के अवमूल्यन के ज़रिये कर सकता है। अगर सऊदी अरब चाहे तो कई वर्षों के लिए 30 डॉलर प्रति बैरल वाली क़ीमत को झेल सकने में सक्षम है। और जैसा कि एक सटीक अनुमान है कि सऊदी अरामको अपने क्षेत्र की विशिष्टताओं को देखते हुए बिना किसी तकलीफ के तेल का उत्पादन 15 डॉलर प्रति बैरल की लागत पर करने में सक्षम है। एक रुसी विशेषज्ञ ने दावा किया है कि सऊदी "न केवल लंबे समय तक, बल्कि लगभग हमेशा के लिए ” इस लागत पर उत्पादन करने में सक्षम है।

रूस के पास भी इस प्रकार के भंडार हैं जहाँ ट्रांसपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर की निकटता के चलते उत्पादन लागत काफी कम है। लेकिन दो सबसे बड़े तेल उत्पादकों की इस “क़ीमतों की लड़ाई” में अन्य देशों, खास तौर पर अमेरिका को नुक़सान झेलना पड़ सकता है। अगर समय रहते वॉशिंगटन ने कठोर रक्षात्मक उपाय नहीं अपनाए तो कुछ समय बाद शेल कंपनियों की बाज़ार में हिस्सेदारी कम होती जाएगी।

उत्पादन में लगातार बढ़ोत्तरी को लेकर रूस और सऊदी अरब के बीच में कहीं न कहीं आपस में हित जुड़े हुए हैं। इसके ज़रिये अमेरिकी शेल उत्पादकों को बाज़ार से खदेड़ने के लिए मजबूर करने ताकि अगले 2-3 वर्षों में बाज़ार ख़ुद-ब-ख़ुद अपने को संतुलित करने में सक्षम हो सके, जुड़ा हुआ है। असल में संकट की घड़ी अमेरिकी शेल उद्योग के लिए है क्योंकि मार्च के अंत तक उत्पादन पर लगे सभी प्रतिबंध समाप्त होने जा रहे हैं, और इसके बाद हर कोई अपनी मर्ज़ी से उत्पादन के लिए स्वतंत्र है।

जल्द ही वो समय भी नज़दीक आने वाला है जब तेल 20 डॉलर में उपलब्ध हो। सोमवार को ही ब्रेंट क्रूड ऑयल 2016 के बाद पहली बार 30 डॉलर से नीचे लुढ़क चुका था। तेल बाज़ार के टूटते ही टेक्सास, नॉर्थ डकोटा, अपलाचिया एंव अन्य स्थान मंदी के दौर में डूब सकते हैं। ब्लूमबर्ग न्यूज के मुख्य ऊर्जा संवाददाता जेवियर ब्लास ने अपने पिछले हफ्ते की ट्वीट में कहा था “अमेरिकी शेल सेक्टर को पूरी तरह से मार डाला जा रहा है। पूरी तरह से खून से नहाया हुआ। इक्विटी में लगे अरबों डॉलर का एक झटके में सफाया हो चुका है। ”

इस सम्बन्ध में पहले से ही हेरोल्ड हैम ने जो कि कॉन्टिनेंटल रिसोर्स इंक के संस्थापक और कुछ समय के लिए राष्ट्रपति के ऊर्जा सलाहकार रहे हैं, ने अमेरिकी तेल और गैस उत्पादकों के लिए किसी तरह के संघीय खैरात का विचार व्हाइट हाउस के समक्ष रखा है। इसमें ट्रंप प्रशासन से घरेलू दरारों को कम क़ीमत वाले बैरल से लड़ने में मदद की गुहार लगाई गई है।

आपसी मतभेदों के बावजूद सऊदी और रूस के बीच जो चीज निकलकर आ रही है वह यह है कि तेल की क़ीमतों में मौजूदा गिरावट अमेरिकी शेल उत्पादकों को भारी नुक़सान पहुंचा रहे हैं, और उनकी हालत दयनीय है। शुक्रवार देर रात ट्रंप ने घोषणा की है कि संघीय सरकार ऊर्जा उद्योग को अपना समर्थन और मदद पहुँचाने के लिए स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व को "शीर्ष" तक भरने का काम करेगी। लेकिन इस मामले में राष्ट्रपति के हस्तक्षेप के बावजूद, कोरोनवायरस महामारी के चलते बाज़ार से तेल की मांग ही खत्म हो चुकी है। एयरलाइंस ने अपनी उड़ानें रद्द कर दी हैं और वैश्विक व्यापार भी काफी हद तक सिकुड़ चुका है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी ने 9 मार्च के अपने अनुमान में घोषणा की है कि 2020 में साल भर माँग में 90,000 b/d की कमी रहने वाली है।

इस सबके अलावा भी महामारी के चलते अमेरिकी अर्थव्यवस्था मंदी के दौर में प्रवेश कर रही है और यह संकट अपने आप में विशाल परिणाम का होने जा रहा है। जैसा कि पोलिटिको ने सोमवार को लिखा है "ग्रेट डिप्रेशन के बाद से कभी भी आज तक देश भर में आर्थिक गतिविधियों में अचानक से गिरावट और बाज़ार में तेज रफ़्तार में झटके की स्थिति देखने को नहीं मिली थी। " 

इतना कहना पर्याप्त होगा कि जैसा दिख रहा है, यह ठीक-ठीक सऊदी-रूसी तेल की क़ीमतों वाला युद्ध नहीं है। यह अपने भ्रामक रूप में है और यहां तक प्रतीत होता है कि यह एक सऊदी-रूसी परियोजना है। यह अमेरिकी लुटेरे उद्योग के विस्फोटक प्रवेश से आहत है, और उसके हाथ गँवा चुके अपने बाज़ार पर अपनी हिस्सेदारी को एक बार फिर से हथियाने के लिए कृत संकल्प है।

हर तरफ काफी कड़वाहट भी फैली हुई है। ब्लूमबर्ग विश्लेषण में इस ओर इशारा किया गया है कि "रूस इस बात को लेकर काफी गुस्से में था कि ट्रंप प्रशासन ऊर्जा के क्षेत्र को अपने राजनीतिक और आर्थिक औज़ार के रूप में इस्तेमाल को लेकर उत्सुक था। रूस विशेष रूप से जर्मनी और साइबेरिया के गैस क्षेत्र को नॉर्ड स्ट्रीम 2 के रूप विख्यात प्रोजेक्ट से जोड़ने वाली पाइपलाइन को पूरा करने से रोकने के लिए अमेरिकी प्रतिबंधों के इस्तेमाल से बुरी तरह से उखड़ा हुआ था। इसके अलावा व्हाइट हाउस ने रूस के राज्य तेल उत्पादक प्रतिष्ठान रोजनेफ्ट के वेनेजुएला के कारोबार पर भी अपना निशाना बना रखा है।"

मॉस्को में स्थित विश्वस्तरीय थिंक टैंक इंस्टीट्यूट ऑफ वर्ल्ड इकोनॉमी एंड इंटरनेशनल रिलेशंस के अध्यक्ष अलेक्जेंडर डायकिन का कहना है  "क्रेमलिन ने फैसला किया है कि वह ओपेक+ की कुर्बानी के बदले में अमेरिकी शेल उत्पादकों को रोकने और नॉर्ड स्ट्रीम 2 परियोजना में अमेरिकी दादागिरी को दण्डित करके रहेगा। बेशक इस वजह से सऊदी अरब को नाराज़ करना जोखिम भरा हो सकता है, लेकिन फ़िलहाल रूस की रणनीति है -हितों की लचीली ज्योमेट्री।”

रूसी तेल उद्योग के भीतर काफी समय से ओपेक+ सौदे के तहत उत्पादन पर लागू प्रतिबंधों को लेकर काफी विरोध बना रहा है। इस बात की काफी संभावना है कि उस लॉबी के साथ हाल ही में क्रेमलिन की सऊदी निवेश की उम्मीद के धूमिल होने के चलते आई निराशा ने आग में घी का काम किया हो।

इस सबके बावजूद रूसी और सऊदी ऊर्जा मंत्रालय के बीच सौहार्दपूर्ण संबंध बने हुए हैं। इसके साथ ही ओपेक+ समूह के राजनयिक तंत्र भी अपनी जगह पर कायम हैं। दोनों पक्षों के लिए एक बार फिर से थिरकने के लिए दरवाज़े खुले हैं। निश्चित तौर पर OPEC+ भी अपनी जगह पर मौजूद है।

सौजन्य: Indian Punchline

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

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