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भारत
राजनीति
NRC से जुड़ी अब तक की कहानी
असम से जुड़ा नागरिकता का मुद्दा मुख्य तौर पर दो तरह के सवाल खड़ा करता है। पहला स्थानीय लोगों के अधिकारों से जुड़ा और दूसरा है सार्वभौमिक मानवीय अधिकारों से जुड़ा कि पूरी दुनिया इंसानों के लिए ही है।
अजय कुमार
30 Aug 2019
NRC

31 अगस्त का दिन असम के बहुत सारे लोगों के लिए  बेचैन भरा रहेगा। इस दिन नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटीज़न(एनआरसी) की अंतिम लिस्ट जारी होने जा रही है।  इससे यह साफ़ होगा कि कौन भारत का नागरिक बना रहेगा और किसे विदेशी या बाहरी क़रार दे दिया जाएगा। फिर भी सरकार ने कहा है कि एनआरसी से बाहर किये गए हर व्यक्ति को 10 महीने  के अंदर अपनी नागरिकता साबित करने की छूट होगी और लोगों के बीच कल उभरने वाली बेचैनियों को सँभालने के लिए पुख्ता इंतज़ाम किया गया है। 

असम से जुड़ा नागरिकता का मुद्दा मुख्य तौर पर दो तरह के सवाल खड़ा करता है।  वहाँ की स्थानीय जनता कहती है कि उनके स्थानीयता, रोज़गार, सांस्कृतिक और सामाजिक क्षेत्रों पर बाहरियों का क़ब्ज़ा होते जा रहा है। इसलिए बाहरियों को बाहर करना ज़रूरी है। दूसरी तरफ़ मानवीय सिद्धांत से खड़ा हुआ सवाल पैदा होता है कि पूरी दुनिया में बसावट प्रवास की ज़रिये ही हुई है।  कोई भी मूल तौर पर वहीं से नहीं हैं जहां वह रह रहा है तो किसी को बाहरी क़रार देकर बाहर क्यों किया जाए! तो तीस- चालीस साल से असम का हिस्सा बन गए लोगों को बाहर क्यों किया जाए! 

फिर भी कल एनआरसी की फ़ाइनल लिस्ट आने से पहले एक बार संक्षिप्त में एनआरसी के इतिहास को समझने की कोशिश करते हैं। 

क्या है असम का मामला?

असम के लोगों के लिए नागरिकता का मुद्दा आज का नहीं बल्कि सदियों पुराना है। इतना पुराना कि संविधान बनाते समय संविधान सभा में इस पर अच्छी ख़ासी बहस भी हुई थी कि असम में पड़ोसी मुल्क से लोगों की आवाजाही होती रहती है, इसके साथ कैसे डील किया जाएगा। साल 1947 में ही बंटवारे के समय बांग्लादेश से बहुत सारे शरणार्थी असम में आए। इसलिए नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटिज़न बनाने की प्रक्रिया पहली जनगणना यानी साल 1951 के समय ही शुरू हो गयी थी। जिसका मक़सद था कि लोगों के बीच भारतीय नागरिक और अवैध प्रवासी (illegal migrant) की पहचान की जाए। तब से लेकर यह प्रक्रिया अभी तक पूरी नहीं हो पायी। 

इसके बाद साल 1971 में पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश बना। इस समय भी बांग्लादेश से बहुत सारे शरणार्थी और प्रवासी भारत आए। और इसके बाद लगातार इनकी आवाजाही बनी रही। इसका नतीजा यह हुआ कि असम के स्थानीय लोग बाहरी लोगों को अपने दुश्मन की तरह देखने लगे। बाहरी लोगों की वजह से असम की डेमोग्राफ़ी बदल गई। असम के लोग यह कहने लगे कि वह अपनी समाजिक सांस्कृतिक पहचान को गंवाने लगे है। उनके रोजगारों को बाहरी हड़पने लगे हैं। उनके संसाधनों पर बाहरी लोगों कब्ज़ा करने लगे हैं। बाहरी लोगों की आबादी बड़ने लगी है और स्थानीय लोग की आबादी  घटने लगी है। 

एनआरसी का इतिहास

यह स्थिति इतनी बदतर हुई कि साल 1970 के समय बाहरी लोगों के ख़िलाफ़ असम में आंदोलन होने लगे। इसी से ऑल असम स्टूडेंट फ़ेडरेशन जैसे आंदोलन का जन्म हुआ। जिनका कहना था कि असम के संसाधनों पर बाहरी लोगों का क़ब्ज़ा हो जाएगा। असम के स्थानीय लोग माइनॉरिटी बन जायेंगे। इसलिए बाहरी लोगों को वोटर लिस्ट से ख़ारिज किया जाए और उन्हें बाहर किया जाए। इस वजह से असम में उग्रवाद भी पनपा। यह उग्रता 1985 में जाकर शांत हुई, जब भारत सरकार और असम राज्य ने असम समझौते पर हस्ताक्षर किया। इस समझौते में भारतीय सरकार ने एनआरसी की प्रक्रिया फिर से शुरू करने की बात की।

इसके ज़रिये बाहरी लोगों की पहचान करने की बात की गई। विदेशी और अवैध लोगों को बाहर भेजने की बात कही गयी। इसी की तहत एनआरसी की प्रक्रिया में यह शर्त रखी गयी कि जो लोग 24 मार्च 1971 के मध्यरात्रि से पहले आए हैं, उन्हें भारत का नागरिक माना जाएगा। इस दिन के बाद से आए लोगों को बाहरी माना जाएगा। इसके बाद बहुत सारी सरकारें आईं लेकिन किसी भी सरकार ने एनआरसी को पूरा नहीं किया। सबने बाहर से आए लोगों को वोट बैंकों की तरह से इस्तेमाल किया।

साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने इस पर संज्ञान लिया। केंद्र सरकार को आदेश दिया कि नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटिज़न की प्रक्रिया पूरी की जाए। तब से सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में यह प्रक्रिया जारी है। इसके बाद सरकार द्वारा निर्धारित काग़ज़ात के आधार पर एनआरसी की प्रक्रिया शुरू हो गयी। जिसका मतलब यह है कि जिसके पास अपनी पहचान साबित करने के पर्याप्त काग़ज़ात हैं, वह भारत के नागरिक होंगे और जिनके पास नहीं हैं, उन्हें बाहरी माना जाएगा। इस प्रक्रिया के तहत पिछले साल एनआरसी का अंतिम ड्राफ़्ट जारी किया गया।

इसके तहत एनआरसी के पहले मसौदे से बाहर किये गए 3.29 करोड़ लोगों ने एनआरसी में शामिल होने के लिए आवेदन किया, जिसमें से तक़रीबन 40 लाख लोगों को एनआरसी में शामिल नहीं किया गया। अभी इसी साल 2019 के जून महीने में भी तक़रीबन एक लाख लोगों को एनआरसी से बाहर रखा गया। यानी तक़रीबन 41 लाख लोगों एनआरसी में शामिल नहीं किया गया है। अब 31 अगस्त यानी कल एनआरसी की फ़ाइनल सूची जारी की जाएगी।  

एनआरसी का पहला मसौदा जारी होने के बाद इस प्रक्रिया से जुड़ी गड़बड़ियां भी सामने आने लगी। साल 2019 में ये ख़बरें सामने आईं कि बहुत सारे लोग ऐसे थे जिनका नाम वोटर लिस्ट में तो था लेकिन एनआरसी में नहीं था और जिनका नाम एनआरसी में था लेकिन वोटर लिस्ट में नहीं था। 

इसी दौरान लोगों में डर का माहौल भी पैदा हुआ। उन्हें लगने लगा कि अगर उनका नाम एनआरसी में नहीं होगा तो क्या होगा? ऐसे में गृह मंत्रालय ने कहा कि जिन लोगों के नाम एनआरसी में नहीं होंगे उन्हें अपील करने का अधिकार होगा। उनकी अपील फॉरेन ट्रिब्यूनल में की जाएगी। इस दौरान राज्य और केंद्र सरकार की तरफ़ से  एनआरसी की रीवेरिफ़िकेशन यानी सत्यापन की बात कही गयी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एनआरसी की प्रक्रिया रोकी नहीं जायेगी। 

अभी तक इस प्रक्रिया में हो रही धांधलियों के खिलाफ केवल सामाजिक कार्यकर्ता ही बोल रहे थे लेकिन कोर्ट के इस कड़े रुख के ख़िलाफ़ अब भाजपा से जुड़े संगठन भी खुलकर बोलने लगे हैं। पिछले महीने राज्य सरकार के मंत्री चंद्र मोहन पटवारी ने एनआरसी से जुड़े ज़िलेवार आंकड़े विधानसभा के पटल पर प्रकाशित कर दिए। और बताया कि इसके रीवेरिफ़िकेशन की ज़रूरत है। इन आंकड़ों में बहुत सारी धांधलियां हैं। अब राज्य के बहुत सारे संगठन यह मांग करने लगे हैं कि जब तक एनआरसी की सूचि को गड़बड़ियों से पूरी तरह से मुक्त नहीं किया जाता है, तब तक इसका प्रकाशन नहीं किया जाना चाहिए। 

क़ानूनी विशेषज्ञ गौतम भाटिया ने इस मुद्दे पर न्यायालय की आलोचना करते हुए द हिन्दू में लिखा कि "नागरिकता जैसे मूलभूत और महत्वपूर्ण विषय को सारी प्रक्रियाओं को अपनाते हुए बहुत ही सावधानी से सुलझाना चाहिए। इसका महत्व तब समझ में आएगा जब हम यह समझ पाएंगे कि नागरिकता छीने जाने का अर्थ क्या होता है? राज्य द्वारा मिले अधिकारों को खो देना, राज्य विहीन हो जाना, राज्य के भूगोल से बाहर कर डिटेंशन सेंटर में रहने के लिए मजबूर हो जाना जैसी भयावह परेशानियों से गुज़रने के लिए बाध्य हो जाना।

किसी भी व्यक्ति को ऐसी भयावह प्रताड़नाएं सहन करने से पहले यह जरूरी है कि एक सभ्य समाज क़ानून के नियम से पैदा होने वाले प्रक्रियाओं को बहुत ही सावधानी से पालन करे। बहुत सारे मामलों में प्रक्रियाओं का ढंग से पालन नहीं किया जाता जैसा कि मोहम्मद सनाउल्लाह के मामले में किया गया है। प्रक्रियाओं का गलत पालन करने के बाद किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित करने के आधार पर पूरे परिवार को विदेशी घोषित कर दिया जाता है। पहचान से संबंधित काग़ज़ात में ग़लती होने के आधार पर किसी को विदेशी घोषित कर दिया जाता है। डॉक्यूमेंट में हुई स्पेलिंग की ग़लतियों, दो पहचान में पत्र में अलग-अलग उम्र होने के आधार पर और ऐसे ही छोटी-छोटी भूलों के आधार पर फॉरेन ट्रिब्यूनल द्वारा विदेशी घोषित कर दिया जाता है।

इन प्रक्रियाओं में की गई लापरवाही को देखकर ऐसा लगता है कि फॉरेन ट्रिब्यूनल विदेशी घोषित करने का आदि बन चुका है। सुप्रीम कोर्ट यह समझने में असफल रहा है कि जहां जीवन और मरण का सवाल हो, जहां पर एक छोटी सी ग़लती की वजह से किसी की पूरी जिंदगी ख़राब हो सकती है वहाँ ये बात मायने नहीं रखती कि एनआरसी का फ़ाइनल ड्राफ़्ट जल्दी तैयार हो जाए बल्कि अधिकारों का संरक्षण मायने रखता है। लेकिन कोर्ट ऐसा नहीं कर रहा है।"

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