NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
विज्ञान
भारत
ओडिशा में बढ़ती हाथियों की मौत
हाथियों के लिए ओडिशा भारत में शीर्ष पांच इलाके में से एक है. पर अफ़सोस की  बात यह है निरंतर  जमीन की बढ़ती खुदाई, औद्योगिकीकरण, खुले कुएं, जंगलो के पास से रेलवे  पटरियों का होना  हाथियों के लिए एक तरह का भूलभुलैय्या बनता जा रहा है .जिससे इनकी आबादी पर खतरा बढ़ता जा रहा है. इसलिए भारत जंगली हाथियों के आवास में पिछड़ता जा रहा है. पिछले दस वर्षों में  केवल बिजली की लाइनों में गिरने से ओडिशा में 150 से अधिक हाथियों की दर्दनाक मौतें हुई हैं.
प्रियांश मौर्य
22 Dec 2018
हाथियों की मौत
साभार -रेल न्यूज़

दो दिन पहले ही  वाइल्डलाइफ सोसाइटी ऑफ़ ओडिशा ( WSO ) ने  ओडिशा में हाथियों की मौत को लेकर आकड़े निकाले. आकड़े यह दिखाते है कि पिछले नौ महीनो में अप्रैल 2018 से लेकर दिसंबर 18 तक ओडीशा में 67 हाथियों की मौत हो चुकी है. इनके मरने के कारण अलग अलग है. प्राकृतिक वजहों से मरने वाले हाथियों की संख्या 18 है,अज्ञात कारणों से मरने वाले हाथियों की संख्या 19 है,  4 शिकारी घटनाओ में मारे गए हैं. गड्ढे में गिरने से या छोटे तालाब में डूबने से 11 हाथियों की मौत हुई, 9 हाथियों की मौत बिजली के तारो की चपेट में आने से हुई और 6 हाथी रेलवे ट्रैक पार करते समय ट्रैन की चपेट में आने से मारे गए. ये मौतें 1 अप्रैल, 2018 से 18 दिसंबर, 2018 के बीच बताई गईं .

यह अकड़े दर्शाते हैं कि 45 फीसदी  हाथियों की मौत अप्राकृतिक कारणों के कारण हुई.अप्राकृतिक कारणों से मौत होने का मतलब कि बाहरी कारणों से मौत होना जैसे रेलगाड़ी द्वारा कुचल देना. 28 फीसदी  मौत का कोई कारण पता ही नहीं चल पाया. इसमें से कुछ अप्राकृतिक कारणों से मौत भी हो सकती है .

हाथियों के लिए ओडिशा भारत में शीर्ष पांच इलाके में से एक है. पर अफ़सोस की  बात यह है निरंतर  जमीन की बढ़ती खुदाई, औद्योगिकीकरण, खुले कुएं, जंगलो के पास से रेलवे  पटरियों का होना  हाथियों के लिए एक तरह का भूलभुलैय्या बनता जा रहा है .जिससे इनकी आबादी पर खतरा बढ़ता जा रहा है. इसलिए भारत जंगली हाथियों के आवास में पिछड़ता जा रहा है. पिछले दस वर्षों में  केवल बिजली की लाइनों में गिरने से ओडिशा में 150 से अधिक हाथियों की दर्दनाक मौतें हुई हैं.

इंसानो की आबादी बढ़ने और इनके निवास स्थान में बढ़ोतरी  की वजह से जंगलो का एरिया कम हो रहा है. जिसकी वजह से हाथी भी इंसानी बस्तियों में घुसने के लिए मजबूर हुए हैं. इन्ही सब कारणों से इंसान और हाथियों में संघर्ष बड़ गया है. इस गड़बड़ी ने पूरे राज्य में मानव-पशु संघर्ष को बढ़ाया है। ओडिशा के गरीब किसानों को इस तरह के संघर्ष के परिणामस्वरूप भारी फसल और संपत्ति की क्षति होती है। हर साल हम इस बढ़ते संघर्ष के परिणामस्वरूप लगभग 50 हाथियों की मौत के साथ-साथ अनगिनत मानव जीवन की क्षति को दर्ज करते हैं.

यह परियोजना चल रहे मानव-हाथी संघर्ष मुद्दों को संबोधित करने और जंगली हाथियों के खतरे को कम करने और सात प्रमुख जिलों में उनके निवास स्थान को कम करने का प्रयास करती है, जिनमें राज्य की 50% से अधिक आबादी हाथियों की आबादी है.

ओडिशा जिसे भारत में हाथियों का घर माना जाता है. अभी यही ओडिशा हाथियों के लिए कब्रिस्तान में बदलता दिखाई दे रहा है .ओडिशा में 1990 से अब तक 1400 हाथियों की अप्राकृतिक मृत्यु हो चुकी है। पिछले आठ सालों में 618 हाथियों की मौत हो चुकी है.

1990 से 2000 के बीच सलाना तकरीबन 33 हाथियों की मृत्यु हुई. लेकिन यह आंकड़ा  2000 और 2010 के बीच बढ़कर सालाना तकरीबन  46  हाथियों के मौत में बदल गया.  इसके बाद यह 2010-11 से 2017-18  प्रति वर्ष 73 हाथियों के खतरनाक औसत तक पहुंच चूका है.

 रेलवे ट्रैक्स हाथियों के लिए ओडिशा में मौत का जाल बनता जा रहा है. इस साल अप्रैल 2018 से अभी तक रेलवे ट्रैक पार करते समय 6 हाथियों की मौत हो चुकी है . ईस्ट कोस्ट रेलवे के अधिकारी नीरकर दास, डाउन टू अर्थ से  बात करते हुए कहा कि " इन मौतों का जिम्मेदार रेलवे  को बताना अनुचित होगा क्योकि यह वन्य विभाग  की जिम्मेदारी बनती है कि वह स्टेशन मास्टर को सचेत करे कि ट्रैक के आस पास से हाथी गुजर रहे है ताकि  ड्राइवर गाड़ी की रफ़्तार को धीमे या रोक दे " कही न कही इसमें रेलवे विभाग की भी चूक है क्योकि जंगलो के जगहों से रेलगाड़ी गुजरना बिलकुल सही नहीं है. जब तक रेलवे ट्रैक्स जंगलो के बीच से गुजरते रहेंगे तब तक ऐसी घटनाये रुकना बंद नहीं होंगी .क्योकि हाथियों की आवाजाह को नहीं रोक सकते लेकिन रेलवे ट्रैक्स की दिशा हम बदल सकते है. ओडिशा के झारसुगुड़ा जिले में एक ट्रेन की चपेट में आने से 16 अप्रैल को चार हाथियों की मौत हो गई थी.इसके पीछे कारण कई हैं: लगातार बढ़ती हुई मानव जनसंख्या, निवास स्थान का विनाश, तेज रेलगाड़ियों की आवृत्ति में वृद्धि, और शायद सबसे महत्वपूर्ण - अधिकारियों की ओर से लापरवाही .

बिजली की तारे  हाथियों के लिए हानिकारक बनता जा रहा है. वाइल्डलाइफ सोसाइटी ऑफ़ ओडिशा ( wildlife society of  odisha ) द्वारा निकाले गए आकड़े बतलाते है की 2000 के बाद से बिजली की तारो से मरने के कारण ओडिशा ने अभी तक 179 हाथी खो दिए है . 2000 और 2010 के बीच 77 हाथियों के मरने के मामलें बिजली की तारो से करंट लगने के कारण आये थे. इस अवधि के दौरान सरकार ने इसके सन्दर्भ में कोई कदम नहीं उठाये थे. खुली बिजली की तारे कभी कभी शिकारियों द्वारा भी हाथियों के शिकार के लिए भी इस्तेमाल की जाती है . इस साल अवैध शिकार के 4 मामले सामने आ चुके है जिसमे सभी में हाथियों के सींग गायब है .1 अप्रैल, 2010 से 27 अक्टूबर, 2018 के बीच हालात और भी ख़राब हो गए. अब  तक राज्य में 102 हाथियों बिजली के तारो की चपेट में आ चुके है .

हाथियों का पर्यावरण में महत्व :

हाथियों को कीस्टोन प्राणी का जानवर कहा जाता है. शुष्क मौसम के दौरान हाथी पानी के लिए खुदाई करने के लिए अपनी सूंढ़ का उपयोग करते हैं। यह न केवल हाथियों को शुष्क वातावरण में जीवित रहने की अनुमति देता है  बल्कि अन्य जानवर जो साथ में जंगल साझा करते है , उनके लिए भी शुष्क मौसम में जीवित रहने में मदद करता है. जब वन हाथी घास खाते है तो वो पेड़-पौधों के बीच में गैप छोड़ देते है जिसकी वजह से नयी वनस्पति को उगने में मदद मिलता है और छोटे जानवरो को  चलने का रास्ता मिल जाता है. जहाँ भी हाथी रहते हैं  वहां हाथी गोबर छोड़ते हैं जो उनके द्वारा खाए जाने वाले कई पौधों के बीजों से भरा होता है, जिसकी मदद से  नयी जगहों पर भी नयी घास , पेड़, झाड़िया उग आती है जिससे पारिस्थितिकी तंत्र को काफी मदद मिलती है. और हाथियों का एक योगदान जंगल के विकास में भी है. अगर इनके अस्तित्व  को खतरा आया , जो एक तरह से आ भी रहा है, तो जल, जंगल, ज़मीन को काफी नुकसान होगा  और जंगलो का विकास होना बंद हो जायेगा और इसके साथ में मानव अस्तित्व पर भी खतरा आएगा .

वाइल्डलाइफ सोसाइटी ऑफ़ ओडिशा ने सरकार से  प्रत्येक हाथी की मौत के मामले की जांच की मांग की और हाथियों के लिए ओडिसा का कब्रिस्तान में तब्दील होने का मुख्य कारण सरकार की जवाबदेही का आभाव होना बतया .ओडिशा सरकार ने 2011 में एक सर्कुलर में कहा था ' प्रत्येक हाथी की मौत को लेकर एक अनिवार्य जांच होनी चाहिए. लापरवाही के लिए विभाग के अधिकारी में जिम्मेदारी तय करें'. लेकिन WSO के मुताबिक अभी तक कुछ गार्ड को ससपेंड करने क आलवा कोई और कदम नहीं उठाये गए .

अगर ऐसे ही चलता रहा तो फारेस्ट डिपार्टमेंट और रेलवे  डिपार्टमेंट एक  दूसरे पर  हाथी के मौत को लेकर इलज़ाम लगाते रहेंगे और  इसका कुछ भी  हल नहीं निकल पायेगा, इसी तरह हाथियों की मौत होती रहेगी जिसकी वजह से हाथी  एक दिन ये विलुप्त हो जायेंगे . इसलिए हमको अपनी विकास की गाड़ी थोड़ी धीमी करके देखना चाहिए की विकास का  पर्यावरण और उसके आस पास जानवरो पर  क्या प्रभाव पड़ रहा है . क्योकि जितना हम जंगलो के आस पास मानव बस्ती बसाएंगे उतना ही जानवरो और मानव में  टकराव बढ़ता जायेगा . और  जंगल नष्ट होने से जानवर मानव बस्ती में तो आएंगे ही !

 

 

Odisha
elephant
keystone
railway tracks
wildlife society of odisha
forest department
railway department
forest department

Related Stories

भारत ने परमाणु सक्षम मिसाइल अग्नि-प्राइम का सफल परीक्षण किया


बाकी खबरें

  • अजय कुमार
    मोदी जी की नोटबंदी को ग़लत साबित करती है पीयूष जैन के घर से मिली बक्सा भर रक़म!
    29 Dec 2021
    मोदी जी ग़लत हैं। पीयूष जैन के घर से मिला बक्से भर पैसा समाजवादी पार्टी के भ्रष्टाचार का इत्र नहीं बल्कि नोटबंदी के फ़ैसले को ग़लत साबित करने वाला एक और उदाहरण है।
  • 2021ः कोरोना का तांडव, किसानों ने थमाई मशाल, नफ़रत ने किया लहूलुहान
    न्यूज़क्लिक प्रोडक्शन
    2021ः कोरोना का तांडव, किसानों ने थमाई मशाल, नफ़रत ने किया लहूलुहान
    29 Dec 2021
    खोज ख़बर में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने साल 2021 के उन उजले-स्याह पलों का सफ़र तय किया, जिनसे बनती-खुलती है भारतीय लोकतंत्र के भविष्य की राह।
  • जानिए: अस्पताल छोड़कर सड़कों पर क्यों उतर आए भारतीय डॉक्टर्स?
    रवि शंकर दुबे
    जानिए: अस्पताल छोड़कर सड़कों पर क्यों उतर आए भारतीय डॉक्टर्स?
    29 Dec 2021
    यह हड़ताली रेजिडेंट डॉक्टर्स क्या चाहते हैं, क्यों चाहते हैं, अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरना इनके लिए क्यों ज़रूरी है। आइए, क्रमवार जानते हैं-
  • सोनिया यादव
    जेएनयू: ICC का नया फ़रमान पीड़ितों पर ही दोष मढ़ने जैसा क्यों लगता है?
    29 Dec 2021
    नए सर्कुलर में कहा गया कि यौन उत्पीड़न के मामले में महिलाओं को खुद ही अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। महिलाओं को यह पता होना चाहिए किए इस तरह के उत्पीड़न से बचने के लिए उन्हें अपने पुरुष दोस्तों के…
  • कश्मीरी अख़बारों के आर्काइव्ज को नष्ट करने वालों को पटखनी कैसे दें
    एजाज़ अशरफ़
    कश्मीरी अख़बारों के आर्काइव्ज को नष्ट करने वालों को पटखनी कैसे दें
    29 Dec 2021
    सेंसरशिप अतीत की हमारी स्मृतियों को नष्ट कर देता है और जिस भविष्य की हम कामना करते हैं उसके साथ समझौता करने के लिए विवश कर देता है। प्रलयकारी घटनाओं से घिरे हुए कश्मीर में, लुप्त होती जा रही खबरें…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License