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विरोध का परचम बनता बुर्का : अपनी पसन्द और बदलाव की चाहत का प्रतीक
सीएए के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों में शामिल नकाबपोश महिलाएं एक उद्घोषणा कर रही हैं। वह यह कि उन्होंने अपनी पसन्द के जो भी वस्त्र धारण किये हुए हैं, उनसे कोई यह तय नहीं कर सकता कि वे किस प्रकार की सोच रखती हैं।
सुरूर अहमद
04 Feb 2020
Burqas as symbol of protest
प्रतिनिधि छवि। चित्र सौजन्य: पटनाडेली

25 जनवरी को पटना के जेडी वीमेंस कॉलेज ने बुर्के पर अपने प्रस्तावित प्रतिबंध को वापस ले लिया है, जिसे उसने  एक नए ड्रेस कोड के तहत थोपने की कोशिश की थी। कॉलेज का कहना है कि इसको लेकर जो हंगामा चारों और मचा था उसके चलते "भ्रम" की स्थिति की वजह से ऐसा हो गया, और मुस्लिम छात्राओं को प्रताड़ित करने का उनका कोई इरादा नहीं था।

सदियों से सारी दुनिया में किसी न किसी प्रकार के पर्देदारी की प्रथा का चलन अस्तित्व में रहता आया है। इसके बावजूद आज के दिन इसे काफी हद तक मुसलमानों के साथ जोड़कर देखा जाता है। कुछ सिख और हिंदू महिलाएं, विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की पहाड़ियों में किसी न किसी रूप में पर्दा प्रथा के चलन को जारी रखे हुए हैं।

कई बार मीडिया इस प्रथा को रूढ़िवादी मान्यता के रूप में व्याख्यायित करती आई है और इसकी तुलना मुस्लिम समाज के तालिबानीकरण के साथ करती रही है। लेकिन सच्चाई तो यह है कि सितंबर 1996 में अफगानिस्तान में तालिबान के गठन से सैकड़ों वर्षों पहले से पर्दा प्रथा प्रचलन में है।

भारत में ही कई नौजवान लड़कियां फैशन स्टेटमेंट के रूप में अपने सिर या सिर और चेहरे दोनों को ढंकने के लिए किसी न किसी तरह के दुपट्टे का इस्तेमाल करती हैं। इसकी शुरुआत के बारे में कहा जाता है कि करीब दो दशक पहले पुणे में शुरू हुई थी, और इसके बारे में कहा जा सकता है कि धर्म से इसका कोई लेना-देना नहीं रहा है।

हालाँकि अबाया, चादर या बुर्का पहनने की प्रथा सऊदी अरब की सभी महिलाओं के लिए अनिवार्य है (हाल के दिनों में इसमें कुछ छूट भी दी गई है)। इसके अलावा तालिबान नियंत्रित अफगानिस्तान के साथ यह ईरान ही है, जिसने विरोध के प्रतीक के रूप में इसे निर्मित करने में अपनी अमिट छाप छोड़ी है।

अफगानिस्तान और सऊदी अरब के विपरीत, ईरान में आदिवासी समाज का कोई अस्तित्व नहीं रहा है, और क्रांति से पहले तक ईरान में रज़ा शाह के शासनकाल के दौरान भी आधुनिक विचारों के विभिन्न रूप यहाँ पर विद्यमान थे। अभी हाल ही में महिलाओं ने ईरान में सिर के ढके रहने की अनिवार्यता के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किये थे, और रुढ़िवादियों को चुनौती देने के रूप में उसे उतार डाला था। यह हमें पर्दा करने के बारे में चर्चा के दौरान उनकी पसन्द या नापसंद जैसे महत्वपूर्ण तत्व को शामिल करता है, और यह एक ऐसा पहलू है जिसके बारे में मीडिया अक्सर ही इसे नजरअंदाज कर देता है। इसे लेकर होने वाले विरोध, अपनी अस्मिता का दावा, रुढ़िवादी परंपरा, पहचान, गोपनीयता और प्रतिरोध के अलग अलग पहचानों के साथ परदे के अनेकों अर्थ हैं, जो अपने-अपने सन्दर्भों में अलग अर्थ धारण किये हुए हैं।

वुड्रो विल्सन सेंटर के रेडियो कार्यक्रम के लिए जॉर्ज लिस्टन सी के साथ एक साक्षात्कार में, ईरानी लेखिका हलेह एस्फंदीआरी ने उन परिस्थितियों के बारे में जिक्र किया है, जिसके तहत शाह के शासनकाल में पर्दा प्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। उन्होंने बताया कि लम्बे समय से शाह महिलाओं के बुर्के पहनने को ख़ारिज किये जाने की वकालत कर रहे थे। हालाँकि इसे खत्म करने के भी वही परिणाम हासिल होने वाले थे जो कि इसे लागू रखे जाने के थे, और वह यह था कि हम क्या पसन्द करते हैं इसे चुनने की आजादी का छिन जाना।

एस्फंदीआरी आगे कहती हैं “जब अंततः पर्दा प्रथा को आधिकारिक तौर पर समाप्त कर दिया गया था, तो यह निश्चित रूप से महिलाओं के लिए एक जीत के साथ ही एक त्रासदी भी थी, क्योंकि चुनने का अधिकार महिलाओं से छीन लिया गया था। और जैसा कि इस्लामिक गणराज्य के दौरान हुआ, जब 1979 में आधिकारिक तौर पर पर्दा प्रथा एक बार फिर से लागू कर दिया गया।”

एक बार जब यह आन्दोलन शाह के खिलाफ खड़ा होना शुरू हुआ, और 1977- 78 में अपने उठान पर पहुँच चुका था, तो इसके साथ ही ईरानी समाज में बदलाव की प्रक्रिया भी दिखनी शुरू हो गई थी। जो युवा पीढ़ी थी उनमें से कईयों ने दाढ़ी रखनी शुरू कर दी, और महिलाओं और लड़कियों में, यहाँ तक कि फैशनपरस्त युवतियों में भी बुर्के का चलन तेहरान, इसफाहन, शिराज़, अहवाज़ जैसे क्षेत्रों में फैलना शुरू हो गया था। शाह शासन के खिलाफ पुरुषों के साथ लाखों महिलाओं ने सड़कों पर उतरकर अपनी भागीदारी निभाई थी। इस बीच 11 फरवरी, 1979 को जब शाह के शासन को उखाड़ फेंका गया, तब जाकर कहीं वैश्विक मीडिया का ध्यान इस क्रांति की ओर आकर्षित हुआ।

ये उस दौर की बात है जब इस प्रकार के लोकप्रिय आँदोलनों में महिलाओं की भागेदारी सारी दुनिया में आम प्रचलन में नहीं थी, सिवाय संयुक्त राज्य अमेरिका के खिलाफ 1960 और 1970 के दशक के दौरान वियतनाम और कंबोडिया में साम्राज्यवाद विरोध में भाग लेने वाली महिलाओं के विरोध प्रदर्शनों में शामिल होने के।

लेकिन मुस्लिम दुनिया में, किसी ने कभी भी किसी बुर्का ओढ़े महिला को, एके-47 हाथ में लिए हुए नहीं देखा होगा। यह महिला, युद्ध के दौरान आक्रमणकारी इराकी सेना से ईरान के खुर्रमशहर, कासर-ऐ-शिरीन या दूसरे सीमावर्ती इलाकों और शहरों में लोहा ले रही थी। यह अपनी ही तरह का एक आन्दोलन था जिस्किर शुरुआत 22 सितंबर 1980 को हुई, और जो अगले आठ सालों तक जारी रहा। महिलाएं न सिर्फ पुरुषों की मदद कर रही थीं, बल्कि उनके साथ पूरी तरह से इस युद्ध में भागीदारी कर रही थीं। ईरानी प्रचार तंत्र ने इस पूरे घटनाचक्र का बखूबी अपने पक्ष में इस्तेमाल किया। हालाँकि दुनिया के इस हिस्से में उस दौर में इंटरनेट या प्राइवेट टेलीविजन चैनलों का चलन नहीं था, लेकिन इसके बावजूद ईरानियों ने पत्र-पत्रिकाओं, किताबों और पर्चों के माध्यम से इस युद्ध में भाग ले रही ईरानी महिलाओं की भूमिका का जमकर प्रचार किया।

कई युवा ईरानी महिलाएं अपनी आगे की पढाई लिखाई के लिए भारतीय उपमहाद्वीप और पश्चिम के विश्विद्यालयों में गईं, और वहाँ पर भी उन्होंने अपने बुर्के को पहनना जारी रखा था। इससे उनके साथ पढ़ने वाली कई युवा मुस्लिम लड़कियों के मन में भी इसके प्रति उत्सुकता पैदा हुई। इन युवाओं के अवेचतन मन में भी यह धारणा बनने लगी, कि जिस प्रकार से पश्चिमी प्रेस ने बुर्के को लेकर दकियानूसी छवि बना दी है, जबकि वास्तविकता इससे अलग है। और इस प्रकार इस्लामीकरण की लहर धीरे-धीरे फैलनी शुरू हो गई।

इसके एक और अधिक स्पष्ट उदाहरणों के तौर पर अगर मिसाल देखनी हो तो अपेक्षाक्रत कहीं अधिक कट्टरपंथी पाकिस्तान में यह देखने को मिलती है, जहां पर ऑक्सफोर्ड-शिक्षित राजनीतिज्ञ और पूर्व प्रधान मंत्री बेनजीर भुट्टो ने अपने पश्चिमी तौर-तरीकों का परित्याग कर अपने सिर को ढंकने के लिए दुपट्टे के विकल्प को चुनना पसन्द किया। पहचान की यह दावेदारी धीरे-धीरे पश्चिम तक फ़ैल गई कि बुर्के को लेकर सवाल उतना अनिवार्य रूप से लागू नहीं था, जितना कि इसे प्रोजेक्ट किया जाता रहा है।

इस बात को लम्बा अरसा बीत चुका है जब हमारे देश में बुर्के को लेकर तीखी बहसें चल रही थीं, उस दौरान मशहूर लेखिका सादिया देहलवी को जब टेलीविजन स्टूडियो में आमंत्रित किया गया था, तो उन्होंने बुर्के के साथ स्टूडियो में प्रवेश किया। उस समय जो सज्जना शो की एंकरिंग कर रहे थे, वे इसे देख हक्का बक्का रह गये थे। देहलवी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा था कि जिस प्रकार से वेशभूषा और पहनावे को लेकर छींटाकशी और बदनामी की जा रही है, वे इसके खिलाफ हैं। उनका कहना था कि किसी को किस प्रकार के कपडे पहनने हैं, यह उसकी व्यक्तिगत पसन्द पर निर्भर करता है, और इस विषय में किसी को भी आलोचना करने का कोई अधिकार नहीं बनता। वे यूरोप में पर्दे के संबंध में हाल के घटनाक्रमों को लेकर भी काफी आलोचनात्मक रुख रखती आई हैं।

1980 के दशक तक भारत में भी मुस्लिम समाज में तब्दीली आने लगी थी। स्कूलों और कॉलेजों में लड़कियों के नामांकन में तेजी से बदलाव देखने को मिले हैं। और इस परिघटना में इजाफ़ा ही हुआ है, आज कई राज्यों में स्थिति ये है कि मुस्लिम लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या कहीं अधिक है। बढ़ते शहरीकरण और दूसरे देशों में जाकर बसने में भी भारी बढ़ोत्तरी हुई है।

आईटी के क्षेत्र में क्रांति ने भी ज्ञान प्राप्ति के क्षेत्र में बड़ा योगदान दिया है, खासकर जो लोग अपने घरों में ही रहते हैं। इस प्रचार-प्रसार सबसे अधिक फायदा मुस्लिम समाज के मध्यम और निम्न-मध्य वर्ग में देखने को मिला है, जहाँ पर आम तौर पर मुस्लिम महिलाएं बुर्के में रहती हैं।

इसे विडंबना कहें या सोची-समझी रणनीति के तहत इसे कहा जाये, कि मुस्लिम समाज के भीतर हो रहे इस सामाजिक परिवर्तनों पर हमारी मीडिया का ध्यान न के बराबर गया है। आज के दिन मुस्लिम महिलाओं का दखल कई सारे व्यवसायों में है। भारतीय लिबरल तबके ने भी हिंदू और मुस्लिम दोनों के अधिकारों के बारे में ठोस तौर पर अध्ययन करने के बजाय, अभी तक बुर्का या हिजाब के किसी भी रूप को तिरस्कार और संदेह से ही देखा है। और इसी वजह से ये मीडिया कर्मी और ओपिनियन-मेकर विद्वानों ने जिस प्रकार की परिपक्व पर्तिक्रिया न केवल शाहीन बाग, मुंबई या कोलकाता से देखी है बल्कि उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद और बिहार के गया, अररिया और किशनगंज से बुर्का-पहने महिलाओं से देखने को मिल रही है, उससे वे सभी पूरी तरह आश्चर्यचकित हैं।

अब करीब दो महीने होने को आये हैं, जब 16 दिसम्बर 2019 के दिन पहली बार शाहीन बाग़ में महिलाओं ने सड़कों पर उतर कर धरने पर बैठने का अपना मन बनाया था। उन्होंने बुर्के और सर पर ढकने के लिए रखे गए स्कार्फ को भी अपने विरोध के प्रतीक के रूप में बदल दिया है। सारे देश में ऐसी ढेर सारी महिलाएं हैं जो आम तौर पर बुर्का या चादर नहीं पहनतीं, लेकिन जब कभी उन्हें धरने प्रदर्शन में शामिल होना होता है तो वे इसे अपने दोस्तों या बूढ़े रिश्तेदारों से उधार लेकर धरने प्रदर्शनों में शामिल होती हैं।

दिलचस्प बात यह है कि शाहीन बाग में कुछ हिंदू महिलाएं और लड़कियां भी अपने सिर को ढंक कर इस विरोध प्रदर्शन में शामिल हुईं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिढ़ाते हुए उन्हें सुना गया कि वे उन्हें उनके कपड़ों से पहचानकर जरा दिखायें। वो शायद ऐसा कर पाएं, चूँकि वे खुद जो कुर्ता पहनते हैं, उसका इतिहास भी मध्य एशियाई घुमंतू अंगरखे से निकलता है।
 
शाहीन बाग में एक प्लेकार्ड में जो चित्रित किया गया था, वह बरबस अपनी ओर ध्यान आकर्षित करता है। उसमें एक स्त्री को हिजाब और बिंदी दोनों को धारण किये हुए दिखाया गया है, और इसमें पीएम “पहचानों इस महिला को उसके कपड़ों से” को कहता है। इस प्रकार की तख्तियों के बारे में एक व्याख्या यह दी जा रही है कि यह एक नवीनतम प्राप्त  राजनीतिक समझदारी के उद्घोष की घोषणा है। जैसा कि रिपोर्टों में कहा गया है कि जब गृह मंत्री अमित शाह ने इस बात पर जोर देकर कहा कि सरकार सीएए पर एक इंच भी पीछे नहीं हटने जा रही है, तो महिलाओं ने गरज कर जवाब दिया है कि: "हम भी एक मिलीमीटर पीछे हटने वाली नहीं हैं।"

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

Of Choice and Change: Burqas as Symbols of Protest

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