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तख़्तापल्ट का एक वर्ष: म्यांमार का लोकतंत्र समर्थक प्रतिरोध आशाजनक, लेकिन अंतरराष्ट्रीय एकजुटता डगमग
आसियान, भारत और चीन ने म्यांमार में सैन्य तख्तापलट की न केवल निंदा की है, बल्कि अलग-अलग स्तर पर सैन्य सत्ता को वैधता भी प्रदान की है। इनकी प्रेस विज्ञप्तियों में वहां लोकतंत्र के प्रति सामान्य प्रतिबद्धता की रस्म अदायगी कर दी जाती है।
चेतन राणा
02 Feb 2022
myanmar
फोटो साभार: एपी

म्यांमार में नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (एनएलडी) सरकार का तख्तापलट कर सेना की सत्ता पर काबिज होने का एक साल पूरा हो गया है। सीनियर जनरल मिन आंग हलिंग (एमएएच) के तहत सेना (तत्माडॉ) ने एनएलडी के कई नेताओं पर चुनाव में धोखाधड़ी करने और यहां तक कि छोटे-मोटे अपराधों में संलिप्त होने का आरोप लगाते हुए उन्हें गिरफ्तार कर लिया था। इन गिरफ्तार नेताओं में आंग सान सू की भी शामिल हैं। इस परिघटना के बाद तो देश में लोकतंत्र के समर्थन में जनता के जबरदस्त विरोध-प्रतिरोध का एक सिलसिला पड़ा तो इसे दबाने-कुचलने के लिए सेना की तरफ से दमन का सिलसिला भी शुरू कर दिया गया। 

लेकिन इस बार का माहौल पिछले दशक से भिन्न है, जब पूरा अंतरराष्ट्रीय नागरिक समाज सू की के समर्थन में खड़ा हो जाता था। रोहिंग्या संकट में सू की की भूमिका एवं उनके आचार-व्यवहार को लेकर वह समर्थन मिलना जरा मुश्किल हो गया है। इस बीच, तातमाडॉ अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को खत्म कर रहा है और लोकप्रिय प्रतिरोधों का दमन कर रहा है। 

सू की से परे

पूर्व स्टेट काउंसलर सू की से जुड़े घटनाक्रम और उनके सजा होने के मामले में मीडिया का ध्यान उतार-चढ़ाव वाला है। नोबेल पुरस्कार विजेता को वॉकी-टॉकी के अवैध आयात और कोविड मानदंडों के उल्लंघन के आरोप में चार साल जेल की सजा सुनाई गई है। उनके साथ ही, सेना के राजनीतिक विरोधी, कार्यकर्ता और पत्रकार सभी के सभी दमन का सामना कर रहे हैं। लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्ता जिमी और एनएलडी के सांसद फ्यो ज़ायर थाव को मौत की सजा सुनाई गई है। आलम यह है कि आम जनता की तरफ से हल्का सा भी विरोध किए जाने पर तत्काल उसका बेरहमी से दमन कर दिया जाता है। 

देश के बड़े हिस्से में लोग बिजली, भोजन और पानी, इंटरनेट और स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। इसके अलावा, सेना किसी भी प्रतिरोध को दबाने के अपने प्रयास में गांव जला दे रही है। उसकी दमनात्मक कार्रवाइयों में हजारों लोग मारे गए हैं। वे अपनी जान बचाने के फेर में भारत और थाईलैंड जैसे पड़ोसियों से किसी भी तरह के स्वागत की उम्मीद किए बिना ही देश छोड़ कर भाग चुके हैं। सुरक्षा बलों ने कथित तौर पर सेव द चिल्ड्रन के दो सहायता कर्मियों को जिंदा जला दिया है। 

ऐसे हालात में, अंतरराष्ट्रीय समुदाय को म्यांमार में चल रहे सविनय अवज्ञा आंदोलन और सेना के प्रति लोगों के व्यापक प्रतिरोध पर ध्यान देने की आवश्यकता है। ईएओ, पीपल डिफेंस फोर्सेज (पीडीएफ), और असंगठित समूह जुंटा के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष में हैं। इरावदी घाटी (पारंपरिक गढ़) में तातमाडॉ की कमजोर पकड़ जन प्रतिरोध की सफलता को दर्शाती है। एमएएच शासन अपने पूर्ववर्ती शासनों की तरह मजबूत स्थिति में नहीं है। एनएलडी और अन्य राजनीतिक दलों के सदस्यों को मिलाकर बनी पायदाउंगसू ह्लुटाव (सीआरपीएच) और राष्ट्रीय एकता सरकार (एनयूजी) का प्रतिनिधित्व करने वाली समिति भी एक राजनीतिक विकल्प प्रदान करती है। इन मंचों की तरफ से रोहिंग्याओं को भी इसमें शामिल करने का वादा इस घटाटोप स्थिति में भी उम्मीद की एक लौ जगाती है। वर्तमान लोकतंत्र समर्थक विरोधों में अधिक समावेशी होने की अधिक संभावना है। 

क्षेत्रीय प्रतिक्रियाएं

ऐसे संकट में, क्षेत्रीय देशों में आम तौर पर अधिक महत्त्वपूर्ण दांव होते हैं, और उनमें घटनाओं को प्रभावित करने की क्षमता भी होती है। आसियान, भारत और चीन ने न केवल तख्तापलट की निंदा की है बल्कि अलग-अलग स्तर पर तख्तापलट शासन को एक मायने में वैधता भी प्रदान की है। लोकतंत्र के प्रति आम प्रतिबद्धता का प्रेस विज्ञप्तियों में उल्लेख कर रस्म अदाएगी कर दी जाती है। 

म्यामार में तख्तापलट के बाद आसियान ने सहमति के पांच सूत्र दिए हैं। एमएएच से बैठक के बाद, आम सहमति बनी, हिंसा को तत्काल समाप्त करने, राजनीतिक पार्टियों से बातचीत करने, और सबसे महत्त्वपूर्ण बात, म्यांमार में एक विशेष दूत और प्रतिनिधिमंडल भेजने की बात हुई। विशेष दूत के रूप में ब्रुनेई के एरीवान युसूफ की देर से नियुक्ति की गई औऱ इसके बावजूद इस दिशा में बहुत कम प्रगति हुई क्योंकि सेना ने उन्हें सू की जैसे पक्षकारों से मिलने ही नहीं दिया। कंबोडिया की अध्यक्षता में आसियान की पहल और कमजोर हुई है। कंबोडियाई प्रधानमंत्री हुन सेन ने एमएएच से जनवरी की शुरुआत में मुलाकात की थी। उनकी इस मुहिम को आसियान के अन्य सदस्यों ने जुंटा के लिए व्यावहारिक समर्थन जुटाना मानते हुए उनकी लानत-मलामत की। 

भारत ने इस मामले पर खुद को आसियान की स्थिति के साथ जोड़ रखा है। इसने म्यांमार के खिलाफ हथियारों पर प्रतिबंध लगाने के लिए बुलाए गए UNGA प्रस्ताव पर भी भाग नहीं लिया। विदेश सचिव श्रृंगला ने अपनी यात्रा के दौरान, एमएएच और एनएलडी सदस्यों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों के साथ मुलाकात की। भारत ने म्यांमार को अपनी सहायता जारी रखी है। वह इसे सेना के जरिए नहीं बल्कि नागरिक समाज के लोगों के माध्यम से अंजाम दे रहा है। हालांकि, म्यांमार को बीईएल द्वारा वायु रक्षा प्रणाली की आपूर्ति, शांति के लिए भारत की प्रतिबद्धता और जुंटा के तुष्टीकरण पर संदेह पैदा करती है। भारत की प्राथमिक चिंता अपनी सीमा सुरक्षा, शरणार्थियों की आमद रोकने और कलादान मल्टी-मोडल प्रोजेक्ट जैसे अपने निवेश को बचाने की है। 

चीन का म्यांमार में सेना के कई किरदारों, एनएलडी के कुछ हिस्सों और यहां तक कि कई ईएओ में भी गहरे संबंध हैं। भारत की तरह, चीन, सबसे पहले अपने प्रांत युन्नान को किसी भी तरह के स्पिलओवर प्रभाव से बचाने और चीन-म्यांमार आर्थिक गलियारे (सीएमईसी) जैसी अपनी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को जारी रखने के लिए चिंतित है। इसने तख्तापलट को केवल 'कैबिनेट फेरबदल' कहा है और हथियारों की आपूर्ति जारी रखी है और सीधे सेना को टीके उपलब्ध कराए हैं। अन्य क्षेत्रीय देशों की तरह ही, चीन ने भी म्यांमार में 'लोकतांत्रिक प्रक्रिया' को फिर से शुरू करने का आह्वान किया है-जो इस स्तर पर केवल राजनयिक प्रदर्शन है। 

भविष्य

हुन सेन ने क्षेत्रीय दबाव का अनुपालन करते हुए, म्यांमार की सेना को दक्षिण पूर्व एशियाई राज्यों की अगली बैठक में प्रतिनिधित्व करने के लिए आसियान की पांच सूत्री योजना पर काम करने के लिए कहा है। हालाँकि, देश में स्थिति इतनी जटिल है कि उसे किसी भी पाँच-सूत्रीय योजनाओं से हल नहीं किया जा सकता है। अलग-अलग एजेंडा और क्षमता वाले कई हितधारक हैं। 

असल वजह यह है कि दुनिया के देश म्यांमार में अपने महत्त्वपूर्ण निवेश के कारण तख्तापलट के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने में हिचकिचा रहे हैं। हालांकि, टोटल एनर्जी, शेवरॉन, वुडसाइड और अदानी जैसी कंपनियां वहां व्यापक अराजकता के कारण निवेश से हाथ खींच रही हैं। यह इंगित करता है कि निवेश करने वाले देश में शांति और संघर्ष समाधान की दिशा में काम किए बिना अपने निवेश की रक्षा नहीं कर सकते हैं। म्यांमार पर सेना की पकड़ पहले से कहीं ज्यादा कमजोर हो गई है। उनसे जुड़ने से पहले सेना के आचरण के लिए रेडलाइन स्थापित की जानी चाहिए। 

इसके अलावा, जबकि देश राज्य, विशेष रूप से क्षेत्रीय देश, जनता और सेना के बीच संघर्ष में हस्तक्षेप करने के लिए अनिच्छुक हो सकते हैं, वे सेना को एनयूजी, सीआरपीएच, ईएओज जैसे अधिक दलों को मान्यता देने और उनके साथ बातचीत शुरू करने के लिए राजी कर सकते हैं। जो भी मार्ग अपनाया जाए, उसे एक समावेशी समाज और एक संघीय राजनीति का निर्माण करते हुए लोकतांत्रिक संक्रमण की ओर बढ़ना चाहिए। 

(चेतन राणा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय राजनीति, संगठन और निरस्त्रीकरण केंद्र (CIPOD) में कूटनीति और निरस्त्रीकरण के रिसर्च स्कालर हैं। उन्हें @ChetanRana96 पर ट्वीट किया​ जा सकता है। आलेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं।)

अंग्रेजी में मूल रूप से लिखे लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें

https://www.newsclick.in/one-year-coup-myanmar-pro-democracy-resistance-promising-international-solidarity-wavers

Myanmar
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