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भारत
राजनीति
बढ़ती कीमतों पर सरकार लाचार, फिर बफर स्टॉक में प्याज सड़ने का कौन जिम्मेदार?
एक ओर जहां देश में प्याज़ के दाम आसमान छू रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सरकार के बफर स्टॉक में 50 फीसदी प्याज सड़ गई हैं। खाद्य एवं आपूर्ति मामले के मंत्री रामविलास पासवान इसका ठीकरा प्रकृति पर फोड़ रहे हैं।
सोनिया यादव
28 Nov 2019
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Image courtesy: BusinessStandard

बढ़ते दामों के कारण प्याज एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार दिल्ली समेत देश के कई राज्यों में इसकी कीमतें 100 रुपए प्रति किलोग्राम के पार पहुंच गई हैं। लोग सरकार से मदद की आस लगाए बैठे हैं लेकिन खाद्य एवं आपूर्ति मामले के मंत्री रामविलास पासवान इसका ठीकरा प्रकृति पर फोड़ रहे हैं।

उनका कहना है कि उनके हाथों में कुछ भी नहीं है। उधर विपक्ष इसे सरकार की नाकामी करार देने में लगा हुआ है। लेकिन प्याज पर हो रही सियासत के बीच बढ़ते दामों की असल वजह क्या है इसकी परत खोलने की कोई ज़हमत नहीं उठा रहा है।

बुधवार, 27 नवंबर को संसद में केंद्रीय उपभोक्ता मामले मंत्री रामविलास पासवान ने कहा कि इस साल बारिश और बाढ़ के चलते प्याज की पैदावार में 26 फीसदी तक गिरावट आई है। उन्होंने यह भी कहा कि 65,000 टन प्याज का बफर स्टॉक था, जिसमें 50 फीसदी प्याज सड़ गई है। अब सवाल ये उठता है कि जब देश में पिछले कई महीने से प्याज की समस्या लगातार गहरा रही थी तो ऐसे में किसकी लापरवाही से इतनी प्याज सड़ गई?

प्याज उत्पादन में भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है। इसके बावजूद अक्सर देश में प्याज की कीमतें लोगों के आंसू निकाल देती हैं। बीते एक सप्ताह में दिल्ली समेत देश के कई राज्यों में प्याज के दामों में तेजी से वृद्धि हुई है।

दिल्ली में प्याज के दामों में लगभग 45 फीसदी का इज़ाफा हुआ है। इसके दामों में लगातार हो रही वृद्धि से लोगों के बजट पर फर्क पड़ना शुरू हो गया है। सरकार इससे निपटने के लिए भले ही कई दावे कर रही हो लेकिन तमाम सरकारी दावे बेअसर ही नज़र आ रहे हैं।
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कृषि मंत्रालय के अनुसार उत्पादक राज्यों में बेमौसम बारिश और बाढ़ से प्याज की फसल को भारी नुकसान हुआ है तथा चालू खरीफ और लेट खरीफ में इसका उत्पादन घटकर 52.06 लाख टन ही होने का अनुमान है जबकि पिछले साल खरीफ और लेट खरीफ में उत्पादन 69.91 लाख टन का हुआ था।

मंत्रालय के अनुसार फसल सीजन 2018-19 में प्याज के उत्पादन का अनुमान 234.85 लाख टन का था जोकि इसके पिछले साल के 232.62 लाख टन से ज्यादा ही था। ये परिस्थिति पहली बार नहीं बनी है, इस संकट से कई बार हम और आप दो चार हो चुके हैं लेकिन सरकार जागती तब है जब समस्या विकट हो जाती है। उस समय समस्या का कोई तात्कालिक हल खोजा जाने लगता है।

बीते सितंबर माह में ही प्याज की कीमतों में ज़बरदस्त बढ़ोत्तरी देखने को मिली थी और सरकार ने हर बार की तरह इस बार भी इसके निर्यात पर तुरंत रोक लगा लगा कर प्याज कारोबार से जुड़े व्यापारियों व आढ़तियों के यहां छापेमारी शुरू कर दी थी।

सरकार के इन कदमों का असर दिखा और बाजार में प्याज पहले के मुकाबले ज्यादा उपलब्ध हुआ, तो कीमतें कुछ समय के लिए नीचे आती दिखाई देने लगी। इसके बाद सरकार इस मामले को ठंडे बस्ते में डालकर फुर्सत से बैठ गई और यह मान लिया गया कि अब देश में प्याज का संकट समाप्त हो चुका है।

सरकारी एजेंसियों को लगा कि जल्द ही प्याज की कीमतें गिरेंगी, क्योंकि नया प्याज बाज़ार में आ जाएगा। पर ऐसा नहीं हुआ, नया प्याज अभी बाज़ार तक नहीं पहुँचा है। हकीकत ये है कि प्याज की उपज कम है, ऊपर से नई फसल बारिश के चलते बर्बाद हो गई है इसलिए बाजार की आपूर्ति सिर्फ निर्यात पाबंदी से स्थाई तौर पर बढ़ने वाली नहीं थी, इसलिए यह संकट फिर लौट आया है।

सरकार ने घरेलू बाजार में प्याज की आपूर्ति सुधार के लिए धूम्र-उपचार (फ्यूमिगेशन) सहित कई नियमों को 30 नवंबर तक लचीला करने का ऐलान किया है। इसके साथ ही चार देशों अफगानिस्तान, इजिप्ट, तुर्की और ईरान से आयात करने का फैसला लिया गया। इसी बीच सरकार द्वारा पहले से मंगाई गई 2,500 टन प्याज की पहली खेप 12 नवंबर को भारत पहुंच जाएगी।

केंद्रीय खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्री राम विलास पासवान ने कहा कि सरकार हर संभव कोशिश कर रही है और नवंबर के अंत तक या दिसंबर की शुरुआत में कीमतें घट सकती हैं।

सवाल ये है कि जब अगस्त-सितंबर में ही प्याज की किल्लत शुरू होने लगी तो आखिर इसके बाद भी इसका निर्यात सरकार के प्रोत्साहन से क्यों जारी रहा और इस पर रोक अक्टूबर में मामला हाथ से बाहर निकलने के बाद क्यों लगी, क्या सरकार स्थिति से अवगत नहीं थी या और बिगड़ने का इंतजार कर रही थी।

प्याज के आयात का फैसला लेने में भी सरकार ने इतनी देरी क्यों की। यदि अगस्त में ही निर्णय ले लिया गया होता तो शायद न तो इतनी किल्लत होती न कीमतें बढ़तीं।
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एक सच्चाई ये भी है कि भारत में प्याज के भंडारण में भी दिक्कतें हैं। एक आंकड़े के मुताबिक भारत में सिर्फ 2 फीसदी प्याज के भंडारण की ही क्षमता है। 98 फीसदी प्याज खुले में रखा जाता है। बारिश के मौसम में नमी की वजह से प्याज सड़ने लगता है। भंडारण की समस्या की वजह से करीब 30 से 40 फीसदी प्याज सड़ जाता है। प्याज की बर्बादी की वजह से भी इसकी कीमतें बढ़ती हैं।

हमारे सामने सवाल यह उठता है कि सरकार ऐसी नीतियां क्यों नहीं बनाती, जिससे किसानों को उचित दाम मिले और उपभोक्ताओं को उचित कीमत पर प्याज उपलब्ध हो सके। यह संतुलन क्यों नहीं बनता, क्यों हम आग लगने के बाद कुआं खोदने लगते हैं?

भारत में 2.3 करोड़ टन प्याज का उत्पादन होता है। इसमें 36 फीसदी प्याज महाराष्ट्र से आता है। इसके बाद मध्य प्रदेश में करीब 16 फीसदी, कर्नाटक में करीब 13 फीसदी, बिहार में 6 फीसदी और राजस्थान में 5 फीसदी प्याज का उत्पादन होता है।

महाराष्ट्र जैसे प्याज उत्पादक राज्यों में भारी बारिश के बाद मंडियों में प्याज की आपूर्ति पर असर पड़ा है। जिसके कारण राजधानी दिल्ली में इसकी कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। आकंड़ों के मुताबिक, प्याज की कीमतों में पिछले साल की तुलना में करीब तीन गुना वृद्धि हुई है। नवंबर 2018 में खुदरा बाजार में प्याज का भाव 30-35 रुपये किलो था।

महाराष्ट्र के किसान होल्कर बताते हैं कि बारिश के कारण खरीफ की फसलों का नुकसान हुआ है। खेतों में प्याज सड़ गई हैं। कई जगह कटाई के बाद उनकी सही व्यवस्था ना होने के कारण ये मंडी तक पहुंच ही नहीं पा रही है। ऐसे में दाम बढ़ना लाज़मी है।

दिल्ली आजादपुर मंडी के कारोबारी और ऑनियन मर्चेंट एसोसिएशन के विकास शर्मा ने कहा कि दक्षिण भारत के राज्यों में भारी बारिश के कारण प्याज की फसल खराब होने व नई फसल की तैयारी में विलंब हो जाने की आशंकाओं से प्याज की कीमतों को और सपोर्ट मिल रहा है। शर्मा ने बताया कि इससे पहले 2015 में प्याज का भाव 50 रुपये किलो से ऊपर चला गया था। हालांकि सरकार बार-बार कह रही है कि प्याज़ का पूरा स्टॉक है।

बढ़ती कीमतों के संदर्भ में प्याज कारोबारियों का कहना है कि पिछली फसल में प्याज का उत्पादन बहुत कम हुआ था। इस बार की फसल बेमौसम बारिश का शिकार हो गई है। सरकार की नीतियां भी इसे लेकर प्रतिकूल ही रही हैं। जिसे लेकर कीमतों में उछाल देखने को मिल रहा है।

किसान आंदोलनों में सक्रिय राजेंद्र चौधरी ने न्यूज़क्लिक से बातचीत में कहा, 'प्याज के दाम बढ़ने का मुख्य कारण केंद्र सरकार की नीति है। सरकार महाराष्ट्र की मजबूत प्याज लॉबी के दबाव में आकर प्याज निर्यात पर कई तरह के प्रोत्साहन देती है। जिसकी वजह से प्याज का निर्यात बढ़ता है, घरेलू बाज़ार में उपलब्धता घटती है और कीमत बढ़ जाती है'।

उपभोक्ता मामले मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, ‘सरकार पूरी कोशिश कर रही है कीमतों को नियंत्रण में लाने की। महाराष्ट्र, राजस्थान और कर्नाटक में नई फसल की आवक शुरू हो गई है, इसलिए आने वाले दिनों में प्याज के दाम में कमी आएगी। हालांकि, बेमौसम बारिश की वजह से इन्हें उपभोक्ता क्षेत्रों तक लाने में दिक्कत हो सकती है।’

कई सालों से प्याज की खेती कर रहे किसान राम लाल ने न्यूज़क्लिक से कहा, 'जब प्याज के दाम बढ़ जाते हैं तो हम किसान अगली फसल में ज्यादा एकड़ ज़मीन पर प्याज उगाते हैं, प्याज की ज्यादा उपज हो जाए तो कीमत फिर गिर जाती है और हमें वाजीब दाम नहीं मिलता। इससे हमें ही नुकसान होता है। हमें बढ़ी कीमत का फ़ायदा तो नहीं मिलता, पर गिरी कीमतों का नुक़सान जरूर उठाना पड़ता है'।

जानकारों का मानना है कि इस पूरे मामले में सबसे दिलचस्प भूमिका निर्यातकों और बिचौलियों की होती है। वे अपने हिसाब से कीमतें घटाते-बढ़ाते हैं, उन्हें अधिक मुनाफ़ा होता है, लेकिन वह मुनाफ़ा उस अनुपात में किसानों तक नहीं पहुँच पाता है। किसानों को प्रकृति की मार भी सहनी होती है और बाजार की भी।

गौरतलब है कि बांग्लादेश, श्रीलंका और म्यांमार जैसे देशों को भारतीय प्याज का निर्यात होता था। भारत से प्याज की किल्लत होने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्याज की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं, यानी प्याज की उपज में कमी की जो हमारी एक घरेलू समस्या थी,वह अब एक अंतरराष्ट्रीय संकट के रूप में सामने आ खड़ी है। अगर यही हाल रहा, तो प्याज की आपूर्ति तो सुधर सकती है, लेकिन इसकी कीमत बहुत ज्यादा नीचे आने की संभावना नहीं बनेगी।

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