NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
ऑस्कर 2022: हर जीत के साथ इतिहास रच रही हैं महिला निर्देशक
काथरिन बिगेलो और कोल झाओ, फिर अब जेन कैंपियन? 94 साल के ऑस्कर के इतिहास में, सिर्फ़ दो महिलाओं ने ही “बेस्ट डॉयरेक्टर” का अवार्ड जीता है। क्या आगे बदलाव दिखाई दे रहा है?
रायना ब्रियूअर
26 Mar 2022
Jane Campion
कोल झाओ पहली एशियाई महिला हैं, जिन्होंने बेस्ट डॉयरेक्टर कैटेगरी का ऑस्कर अवार्ड (2021) जीता है।

जब 2010 के ऑस्कर अवार्ड में बारबरा स्ट्रेसेंड "बेस्ट डॉयरेक्टर" के नाम का उल्लेख करने वाला लिफ़ाफा खोल रही थीं, तब उन्होंने कहा था, "तो वक़्त आ गया है।"

एकेडमी अवार्ड के 81 साल के इतिहास में पहली बार एक महिला ने सबसे अहम वर्ग में ख़िताब जीता था। हैरान काथरिन बिगेलो ने जेम्स कैमरून और क्विंटेन टैरंटीनो को पछाड़ते हुए, अपनी फ़िल्म "द हर्ट लॉकर" के लिए प्रतिष्ठित पुरस्कार जीता था।

उस वक़्त तक सिर्फ़ चार महिला निर्देशक ही इस वर्ग में होने वाले चयन के लिए नामित हुई थीं: बिगेलो से पहले लीना वर्टमुलर (1977), जेन कैंपियन (1994) और सोफिया कोप्पोला (2004)।

ऑस्कर 2021 में भी महिलाओं ने इतिहास बनाया है। कोल झाओ और एमरल्ड फेनेल को 2021 में "बेस्ट डॉयरेक्टर" अवार्ड के लिए नामित किया गया था, जिसे झाओ ने अपनी फिल्म "नौमैडलैंड" के लिए जीता।

इस साल भी जेन कैंपियन पहली महिला बनी हैं, जिन्हें दूसरी बार "बेस्ट डॉयरेक्टर" वर्ग में नामित कर प्रत्याशी बनाया गया है। लेकिन क्या वाकई में एकेडमी अवार्ड में चीजें बदल रही हैं?

सान डियागो स्टेट यूनिवर्सिटी में "सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ वीमेन इन टेलिविजन एंड फिल्म" की निदेशक मार्था लाउज़ेन ने डीडब्ल्यू से बात करते हुए कहा, "मुझे इसे प्रगति कहने में संकोच है। इसे यह कहना ज़्यादा बेहतर होगा कि लगातार जिस बात पर आपत्ति लगाई जाती थी, मतलब साल दर साल जब किसी महिला को नामित नहीं किया जाता था, अब उस आपत्ति के सामने इन्होंने समर्पण कर दिया है।"

उन्होंने आगे कहा, "एकेडमी द्वारा लगातार एक प्रतिष्ठित वर्ग में महिलाओं को शामिल न किया जाना, न तो न्यायपूर्ण है और न ही यह आगे चल सकता है।"

फ़िल्म उद्योग में असंतुलन

एक-एक कदम बढ़ाकर महिलाएं फिल्म उद्योग में पुरुषों के प्रभुत्व वाले क्षेत्रों में अपनी जगह बना रही हैं। लेकिन हाल की "सेल्यूलॉयड सीलिंग रिपोर्ट" के मुताबिक़ यह प्रगति बहुत धीमी है और कई बार यह बिल्कुल थम ही जाती है। यह रिपोर्ट पिछले 24 सालों से हर साल प्रकाशित हो रही है, इसमें 250 सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली फ़िल्मों में महिलाओं के रोज़गार का अध्ययन किया जाता है।

2020 में सार्वकालिक ऊंचाई पर पहुंचने के बाद, सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली 250 और 100 फिल्मों में महिला निर्देशकों का अनुपात 2021 में कम हो गया। 250 सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली फ़िल्मों में 2020 में महिला निर्देशकों की हिस्सेदारी 18 फ़ीसदी थी, जो 2021 में घटकर 17 फ़ीसदी रह गई, जबकि सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली 100 फिल्मों में यह अनुपात 16 फ़ीसदी से घटकर 12 फ़ीसदी रह गया।

फिर दूसरे फिल्मी पेशों में भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत ही ज़्यादा कम है। 2021 में 250 सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली अमेरिकी फिल्मों में से 94 फ़ीसदी बिना किसी महिला सिनेमेटोग्राफ़र, 92 फ़ीसदी बिना किसी महिला संगीतज्ञ, 82 फ़ीसदी बिना किसी महिला निर्देशक, 73 फ़ीसदी बिना किसी महिला एडिटर और 72 फ़ीसदी बिना किसी महिला पटकथा लेखक के बनाई गईं।

लाउज़ेन कहती हैं, "एकेडमी कोई निर्वात में नहीं है। यह फिल्म समुदाय की मुख्यधारा के पूर्वाग्रहों, व्यवहारों और उनकी मान्यताओं को प्रदर्शित करता है।"

वे आगे कहती हैं, "जिन पूर्वाग्रहों से महिलाओं को नुकसान पहुंचता है, उनमें यह मान्यता शामिल है कि महिलाओं के पास एक बड़ी स्टूडियो फिल्म को बनाने का जरूरी दृष्टिकोण और क्षमता नहीं होती और वे ऐसी फिल्मों को बनाना पसंद नहीं करतीं।" शोधार्थियों ने यह भी पाया कि स्टूडियो और बड़े निवेशक नए नवेले पुरुष निर्देशकों पर "बड़ा जोख़िम" लगाने को तैयार रहते हैं, लेकिन "अच्छी संभावना वाली महिला निर्देशकों" पर पैसा लगाना वे "जोख़िम भरा" समझते हैं।

लाउज़ेन का मानना है कि यह पूर्वाग्रह "जुरासिक वर्ल्ड (2005)" को निर्देशित करने वाले कोलिन ट्रेवोर्रो जैसे पुरुष निर्देशकों को फायदा पहुंचाता है, कोलिन ने इतनी बड़ी फिल्म से पहले सिर्फ एक स्वतंत्र फीचर "सेफ़्टी नॉट गारंटीड (2012)" ही निर्देशित की थी।

वह कहती हैं, "कहानी ऐसी है कि ट्रेवोर्रो से स्टीवन स्पीलबर्ग को उनके खुद के युवा दिनों की याद दिलाई और स्पीलबर्ग ने उन्हें काम पर रख लिया।” लाउज़ेन कहती हैं कि “स्पीलबर्ग तुलनात्मक तौर पर एक ऐसे निर्देशक पर दांव लगा रहे थे, जिसने तब तक खुद को साबित नहीं किया था। लेकिन निर्देशन का काम करने वाली महिलाएं इस तरह के आंतरिक पूर्वाग्रह का लाभ नहीं ले पातीं।”

महिलाओं के लिए अहम मोड़

हाल के सालों में हॉलीवुड की सबसे कमाऊ फिल्मों में विविधता की कमी का मुद्दा प्रकाश में रहा है। इस दौरान #OscarsSoMale औक #OscarsSoWhite जैसे हैशटैग्स चलाए गए और महिलाओं व अल्पसंख्यक फिल्मी कुशलता की वंचना की निंदा की गई। विविधता पर फिल्मों में चर्चा चलती रही है, लेकिन असली बदलाव ‘मी टू मूवमेंट’ और ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ जैसे आंदोलनों से आया। ऑस्कर विजेताओं को चुनने वाले बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स में महिलाओं की संख्या 26 से बढ़ाकर 31 कर दी गई। बोर्ड में कुल सदस्यों की संख्या 54 है।

फिर बेस्ट फिल्म कैटेगरी में भी सुधार का ऐलान किया गया। इस वर्ग में नामित होने के लिए फिल्म को विविधता के चार पैमानों में से कम से कम दो पर खरा उतरना होता है। इनमें कम प्रतिनिधित्व वाले समूह से आने वाले अभिनेताओं को फिल्म में प्रतिनिधि भूमिकाओं में लेना या सभी किरदारों को मिलाकर, उनमें कम से कम 30 फ़ीसदी हिस्सेदारी देना शामिल है। यही पैमाना क्रिएटिव और प्रोडक्शन टीम के साथ अपनाया जाता है।

किसी फ़िल्म के विषय पर भी विविधता अंक दिए जाते हैं, अगर उसमें महिलाओं, LGBTQ लोगों, अल्पसंख्यक समूहों या विकलांगो से जुड़े मुद्दे शामिल हैं। एकेडमी अवार्ड सेरेमनी को लोगों के लिए खोलने के तरीकों पर भी विचार कर रही है, क्योंकि दर्शकों की संख्या में काफ़ी कमी आई है।

पिछले साल के कार्यक्रम को सिर्फ़ एक करोड़ लोगों ने ही देखा जो 2020 के टीवी दर्शकों की तुलना में आधा है। अब एकेडमी दर्शकों के पुरस्कार पर भी विचार कर रही है, जिसके लिए इंटरनेट पर वोटिंग की जा सकेगी।

जर्मनी में फ़िल्म उद्योग

जर्मनी में भी फिल्म उद्योग में महिलाओं के सामने आने वाली चुनौतियों और जरूरी सुधारों पर लंबे वक़्त से चर्चा चल रही है। हालांकि फिल्म स्कूलों से बड़ी संख्या में महिलाएं भी निकलती हैं, लेकिन फिल्म उद्योग की ऊंची नौकरियों पर पुरुषों को ही रखा जाता है।

जर्मन फेडरल फिल्म बोर्ड में प्रबंधन मंडल की उपाध्यक्षा डुवे-स्कमिड कहती हैं, “कुछ साल पहले की तुलना में अब महिला निर्देशकों को देखा जाना ज़्यादा आम हो गया है, लेकिन अभी उन्हें अपने पुरुष साथियों की तुलना में ज़्यादा चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। दृढ़ता, लचीला रवैया और अपनी बात मजबूती से रखना, उन कई बातों में शामिल है, जो निर्देशन के लिए जरूरी होती हैं। और इन चीजों तक आज भी पुरुषों की महिलाओं की तुलना में पहुंच ज़्यादा आसान है।”

“फ़िल्म उद्योग में काम का बहुत ज़्यादा दबाव, घर से लंबे वक़्त तक दूरी, फिर बच्चों की देखभाल के लिए जरूरी सुविधाओं की कमी और कम भुगतान ऐसी चीजें हैं, जिनके चलते महिलाएं अक्सर फिल्म स्कूल के बाद अपनी नौकरी छोड़ देती हैं या किसी दूसरे करियर को चुन लेती हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “जहां तक महिलाओं द्वारा निर्देशित फिल्मों में निवेश की बात है, तो एफएफए नियमित तौर पर ज़मा किए गए प्रोजेक्ट और निवेश प्रतिबद्धताओं पर निगरानी रखती है। पिछले कुछ सालों में महिला निर्देशकों वाले प्रोजेक्ट की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है; अच्छी सुविधाओं से निश्चित तौर पर ज़्यादा महिलाओं को फिल्म उद्योग में जगह बनाने में कामयाबी मिलेगी।”

लेख मूलत: जर्मन भाषा में लिखा गया था।

साभार: डीडब्ल्यू

इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

Oscars 2022: Female Directors Write History with Every Win

Oscars
Academy Awards
hollywood
Nomadland
film
Jane Campion
Chloe Zhao

Related Stories

ऑस्कर थप्पड़ विवाद: विल स्मिथ को ज़बरदस्त ऑनलाइन प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ा

भारतीय सिनेमा के एक युग का अंत : नहीं रहे हमारे शहज़ादे सलीम, नहीं रहे दिलीप कुमार

शैलेंद्र: किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार... जीना इसी का नाम है

जल-जंगल-ज़मीन पर बनी फ़िल्म “स्प्रिंग थंडर” के निर्देशक श्रीराम डाल्टन से एक मुलाक़ात

'छपाक’: क्या हिन्दू-मुस्लिम का झूठ फैलाने वाले अब माफ़ी मांगेंगे!

आर्टिकल 15 : एक आधी-अधूरी कोशिश!

गोडसे था आज़ाद भारत का पहला उग्रवादी : कमल हासन

पुलवामा हमले की ख़बरों के बीच प्रधानमंत्री मोदी डिस्कवरी चैनल की शूटिंग में व्यस्त रहे

समानांतर सिनेमा के जनक मृणाल सेन नहीं रहे

क्या होता यदि उत्तराखंड में केदारनाथ फिल्म रिलीज़ हुई होती?


बाकी खबरें

  • Nitish Kumar
    शशि शेखर
    मणिपुर के बहाने: आख़िर नीतीश कुमार की पॉलिटिक्स क्या है...
    07 Mar 2022
    यूपी के संभावित परिणाम और मणिपुर में गठबंधन तोड़ कर चुनावी मैदान में हुई लड़ाई को एक साथ मिला दे तो बहुत हद तक इस बात के संकेत मिलते है कि नीतीश कुमार एक बार फिर अपने निर्णय से लोगों को चौंका सकते हैं।
  • Sonbhadra District
    तारिक अनवर
    यूपी चुनाव: सोनभद्र के गांवों में घातक मलेरिया से 40 से ज़्यादा लोगों की मौत, मगर यहां के चुनाव में स्वास्थ्य सेवा कोई मुद्दा नहीं
    07 Mar 2022
    हाल ही में हुई इन मौतों और बेबसी की यह गाथा भी सरकार की अंतरात्मा को नहीं झकझोर पा रही है।
  • Russia Ukraine war
    एपी/भाषा
    रूस-यूक्रेन अपडेट: जेलेंस्की ने कहा रूस पर लगे प्रतिबंध पर्याप्त नहीं, पुतिन बोले रूस की मांगें पूरी होने तक मिलट्री ऑपरेशन जारी रहेगा
    07 Mar 2022
    एक तरफ रूस पर कड़े होते प्रतिबंधों के बीच नेटफ्लिक्स और अमेरिकन एक्सप्रेस ने रूस-बेलारूस में अपनी सेवाएं निलंबित कीं। दूसरी तरफ यूरोपीय संघ (ईयू) के नेता चार्ल्स मिशेल ने कहा कि यूक्रेन के हवाई…
  • International Women's Day
    नाइश हसन
    जंग और महिला दिवस : कुछ और कंफ़र्ट वुमेन सुनाएंगी अपनी दास्तान...
    07 Mar 2022
    जब भी जंग लड़ी जाती है हमेशा दो जंगें एक साथ लड़ी जाती है, एक किसी मुल्क की सरहद पर और दूसरी औरत की छाती पर। दोनो ही जंगें अपने गहरे निशान छोड़ जाती हैं।
  • Modi
    राज कुमार
    ‘दमदार’ नेता लोकतंत्र कमजोर करते हैं!
    07 Mar 2022
    हम यहां लोकतंत्र की स्थिति को दमदार नेता के संदर्भ में समझ रहे हैं। सवाल ये उठता है कि क्या दमदार नेता के शासनकाल में देश और लोकतंत्र भी दमदार हुआ है? इसे समझने के लिए हमें वी-डेम संस्थान की लोकतंत्र…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License