NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
भारत
राजनीति
पौधरोपण हो या स्वच्छता; अभियान की नहीं, व्यवस्था की ज़रूरत
उत्तराखंड में पौधरोपण और स्वच्छता, दोनों अभियान के रूप में ज़ोर-शोर से चलाए जाते हैं। जिन पर हर वर्ष लाखों रुपये खर्च होते हैं। लेकिन इस अभियान के बाद स्थिति कितनी बदलती है, इसका आंकलन नहीं होता।
वर्षा सिंह
17 Jul 2019
पौधरोपण अभियान

उत्तराखंड राज्य में हरेला पर्व शुरू हो गया है। ये लोक संस्कृति, प्रकृति और पर्यावरण से जुड़ा पर्व है। पर्यावरण संरक्षण का संदेश देने वाला पर्व है। प्रकृति के इस पर्व पर राज्य में पिछले वर्ष 4.50 लाख पौधों का रोपण किया गया था। इस वर्ष 15 जुलाई से 16 अगस्त के हरेला महीने के दौरान 6.25 लाख पौधे रोपने का लक्ष्य रखा गया है। इसके साथ ही पूरे वर्ष में 1.89 करोड़ पौधरोपण का लक्ष्य तय किया गया है।

कहां गए रिस्पना किनारे के लाखों पौधे?

इसी पर्व के दौरान पिछले वर्ष देहरादून में रिस्पना नदी को पुनर्जीवित करने का अभियान छेड़ा गया। रिस्पना से ऋषिपर्णा नदी नाम के इस अभियान के तहत नदी किनारे करीब ढाई लाख पौधे लगाए गए। राज्य सरकार की कोशिश एक विश्व रिकॉर्ड कायम करने की थी। स्कूली बच्चों, स्थानीय लोगों और स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ मिलकर ये महा-आयोजन चला। पेड़-पौधों, नदी, पर्यावरण के संरक्षण के अभियान को कौन नहीं सराहेगा। इस वर्ष भी मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की मौजूदगी में रिस्पना किनारे पौधरोपण अभियान चलाया गया। जिसमें वन मंत्री हरक सिंह रावत, राज्य के वन प्रमुख जय राज समेत कई बड़े नेता और अधिकारी शामिल हुए।

CM Plantation 16 july.jpg

पौधरोपण करते मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत

लेकिन क्या पौधरोपण अभियान एक औपचारिक पर्व हो गया है? पिछले वर्ष रिस्पना नदी के किनारे ढाई लाख पौधे लगाने के अभियान का एक निश्चित बजट भी रहा होगा। इस एक साल में इन पौधों को फल-फूलकर कुछ बड़ा हो जाना था। ताकि नदी किनारे से गुज़रने वाले लोग उन्हें मुस्कुराते हुए देख सकें। सपना तो रिस्पना को लंदन की टेम्स नदी बनाने जैसा बुना गया था। लेकिन रिस्पना किनारे रोपे गए पौधे बमुश्किल दिखाई पड़ेंगे।

इस पूरे पौधरोपण की देखरेख की ज़िम्मेदारी इको टास्क फोर्स एजेंसी को सौंपी गई। हिमालय संरक्षण के उद्देश्य से गठित इस फोर्स में 200 पूर्व सैनिकों की भर्ती की गई थी। इन्हें ही रिस्पना के किनारे लगे पौधों की देखरेख का ज़िम्मा संभालना था। राज्य के प्रमुख मुख्य वन संरक्षक जयराज कहते हैं कि इको टास्क फोर्स किसी वजह से पौधों की देखरेख में सफल नहीं हो पाया। उन्होंने पौधों के किनारे घेरबाड़ नहीं बनायी। जबकि वन विभाग ने छोटे से क्षेत्र में लगाए गए पौधों की देखरेख की जिम्मेदारी ली थी। वहां पौधे अच्छी सेहत में हैं। जयराज कहते हैं कि इस वर्ष वन विभाग ने खुद ही इन पौधों की देखरेख की ज़िम्मेदारी ली है। उनके किनारे अच्छी फेन्सिंग की गई है। ये आंकड़ा कहीं उपलब्ध नहीं है कि सिर्फ रिस्पना किनारे लगाए गए ढाई लाख पौधे में से कितने बचे, कितने नहीं बचे। क्या वाकई ढाई लाख पौधे लगे?

पीसीसीएफ जयराज के मुताबिक पहाड़ों में जिन जगहों पर मुश्किल हालात हैं। मिट्टी की स्थिति अच्छी नहीं है या ऐसी ही अन्य प्राकृतिक वजहें हैं, वहां पौधरोपण अभियान का सफल होना मुश्किल होता है। जबकि तराई में मिट्टी, जलवायु अच्छा मिलने से पौधे फलते-फूलते हैं। यानी पौधरोपण कहां किया जाना चाहिए, इसके लिए भी माकूल जगह तय करनी चाहिए।

रिस्पना नदी के किनारे पौधरोपण अभियान में देहरादून की स्वयंसेवी संस्था मैड ने भी हिस्सा लिया। संस्था से जुड़े करन कपूर कहते हैं कि लाखों पौधे लगाने की जगह सौ पौधे ही लगाए जाएं, लेकिन उनकी पूरी देखभाल होनी चाहिए, इसके लिए उनका फॉलोअप करना होगा, ताकि वो पौधे जीवित रह सकें। पिछले वर्ष रोपे गए लाखों पौधे नष्ट होने पर वे कहते हैं कि इस बार हम भी अपनी तरफ से पौधरोपण की निगरानी करेंगे। यदि कहीं दिक्कत आ रही होगी तो देहरादून प्रशासन के अधिकारियों से बात करेंगे।

रिस्पना किनारे रहने वाला एक आम व्यक्ति हंसते हुए ये प्रतिक्रिया देता है कि यहां बरसात महीने में काग़ज़ों पर पौधे लगाए जाते हैं और गर्मियों के मौसम में वे काग़ज़ों में जल जाते हैं। बेनाम रहने की सूरत में उसके इस व्यंग में आप कुछ सच्चाई सूंघ सकते हैं, कुछ गुस्सा, कुछ लापरवाही भी। जैसे कि इको टास्क फोर्स, जो एक वर्ष में पौधों की देखरेख नहीं कर पायी और उस महाआयोजन में जो पैसे खर्च हुए होंगे, वो सूख चुकी रिस्पना के पानी में डूब गए।

राज्य के प्रमुख सचिव वन आनंद वर्धन ये मानने को तैयार नहीं कि रिस्पना के किनारे लगे पौधे मर गए। उनकी जानकारी के मुताबिक वन विभाग के लगाए पौधों में से अधिकांश जीवित हैं। उनकी कोशिश रहती है कि ज्यादा से ज्यादा पौधे बचाए जा सकें। वे बताते हैं कि प्लांटेशन के साथ ही पौधों की देखरेख के लिए भी बजट होता है।

इस वर्ष के आर्थिक सर्वेक्षण में बताया गया कि ईको टास्क फोर्स द्वारा वनीकरण के लिए वर्ष 2018-19 में 460.01 लाख रुपये शासन की वर्ष से अनुमोदित किये गये। 31 दिसंबर 2018 तक इसमें से 325 लाख रुपए खर्च किये गये।

इसी तरह “हमारा पेड़ हमारा धन” योजना के तहत निजी भूमि पर पौधे रोपने और तीन वर्ष बाद उस रोपित पौधे के स्वस्थ्य रहने की सूरत में 300 से 400 रुपये प्रति पौध दिए जाते हैं। इस योजना के तहत वर्ष 2018-19 में 103.50 लाख रुपये अनुमोदित किये गये। जिसमें से 31 दिसंबर 2018 तक 32.76 लाख रुपये खर्च किये गये।

ऐसी ही एक अन्य योजना है- हमारा स्कूल हमारा वृक्ष। इस योजना के तहत वर्ष 2018-19 में 41.50 लाख रुपये की तुलना में 31 दिसंबर 2018 तक शून्य व्यय किया गया। यानी एक भी रुपया नहीं लगा।

फायर सीजन में जंगल में आग की चपेट में बड़ी संख्या में पौधरोपण क्षेत्र के पौधे भी आए। 19 जून को  जारी की गई वन विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक 35 हेक्टेअर पौधरोपण क्षेत्र आग की चपेट में आकर खाक हो गए।

पौधरोपण अभियान यानी पौधा रोपते हुए एक मुस्कुराती हुई तस्वीर खिंचाना। फिर पर्यावरण संरक्षण का संदेश जारी करना। दरअसल हमें पौधरोपण अभियान की जगह पौधों की सुरक्षा का अभियान चलाना चाहिए। हमारा ज़ोर पौधों की सुरक्षा तय करने की व्यवस्था पर होना चाहिए और इसकी ज़िम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। पूरे साल हम लाखों का बजट लगाकर पौने दो करोड़ से अधिक पौधे रोप कर करेंगे क्या, यदि हमारे पास उन्हें बचाने की व्यवस्था ही नहीं होगी।

UTTARAKHAND
BJP government
Trivendra Singh Rawat
PLANTATION
पौधरोपण अभियान
वृक्षारोपण अभियान
स्वच्छता अभियान
हरेला
HARELA
Save environment

Related Stories

त्वरित टिप्पणी: जनता के मुद्दों पर राजनीति करना और जीतना होता जा रहा है मुश्किल

उत्तराखंड चुनाव: पहाड़ के अस्तित्व से जुड़े सवालों का नेपथ्य में चले जाना

कैसे भाजपा की डबल इंजन सरकार में बार-बार छले गए नौजवान!

गाय और जस्टिस शेखर: आख़िर गाय से ही प्रेम क्यों!

पर्यावरणीय पहलुओं को अनदेखा कर, विकास के विनाश के बोझ तले दबती पहाड़ों की रानी मसूरी

उत्तराखंड में बेरोज़गारी मात्र एक चुनावी मुद्दा है

प्रिय भाई नरेंद्र सिंह जी, काश… : कृषि मंत्री की चिट्ठी के जवाब में एक खुली चिट्ठी

पौड़ी, टिहरी, गैरसैंण की कैबिनेट बैठकों का क्या हासिल?

तो आईये पर्यावरण के लिए कुछ जवाबदेही हम भी तय करें...

येदियुरप्पा डायरीज़: फर्जी या भाजपा का स्याह पक्ष?


बाकी खबरें

  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    संसद में तीनों दिल्ली नगर निगम के एकीकरण का प्रस्ताव, AAP ने कहा- भाजपा को हार का डर
    26 Mar 2022
    संसद में दिल्ली के तीन नगर निगमों का एकीकरण करने संबंधी विधेयक पेश कर दिया गया है। विपक्षी दलों के सदस्यों ने इस विधेयक का विरोध किया। वहीं सत्ताधारी दल ने इसे एक बेहद ज़रूरी सुधार बताया।
  • रायना ब्रियूअर
    ऑस्कर 2022: हर जीत के साथ इतिहास रच रही हैं महिला निर्देशक
    26 Mar 2022
    काथरिन बिगेलो और कोल झाओ, फिर अब जेन कैंपियन? 94 साल के ऑस्कर के इतिहास में, सिर्फ़ दो महिलाओं ने ही “बेस्ट डॉयरेक्टर” का अवार्ड जीता है। क्या आगे बदलाव दिखाई दे रहा है?
  • सीमा शर्मा
    कैसे रूस-यूक्रेन युद्ध भारत की उर्वरक आपूर्ति में डालेगा बाधा? खेती-किसानी पर पड़ेगा भारी असर
    26 Mar 2022
    विशेषज्ञों का मानना है कि समय की तात्कालिक आवश्यकता यह है कि भारत सरकार उर्वरकों की वैकल्पिक आपूर्ति करने और किसानों को खनिज पोषक तत्वों की पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध कराने के लिए प्रयास करे। इसमें…
  • मोहम्मद इमरान खान
    बिहार: तीन विधायकों के बीजेपी में शामिल होने के बाद भी साहनी ने रखा संयम, बोले- निषाद कोटा के लिए करेंगे संघर्ष
    26 Mar 2022
    अब वीआईपी में कोई भी विधायक शेष नहीं बचा है। मुकेश साहनी ने बीजेपी पर अपनी पार्टी में फूट करवाने का आरोप लगाया है। साहनी ने कहा कि चूंकि उन्होंने निषाद जाति के लिए एससी-एसटी कोटे में आरक्षण और जातीय…
  • बी. सिवरामन
    महामारी भारत में अपर्याप्त स्वास्थ्य बीमा कवरेज को उजागर करती है
    26 Mar 2022
    जनरल बीमा परिषद के आंकड़ों के अनुसार, निजी अस्पतालों में कोविड-19 के इलाज की औसत लागत रु. 1.54 लाख है। इसके विपरीत, प्रति मामले का औसत दावा निपटान केवल रु.95,622 था। इसका मतलब है कि भारत में लगभग 40…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License