NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
'पद्मावत': अराजकता और वर्चस्व की राजनीति
आज दुनिया में, जब स्त्री की अस्मिता और अधिकारों का सवाल खुद को सभ्य और लोकतांत्रिक कहने वाली व्यवस्था के सामने चुनौती है, उसमें स्त्री के दमन और शोषण को व्यवस्थागत शक्ल देने वाली परंपराओं पर गर्व करने का आग्रह समाज और देश को किस ओर ले जाएगा?
अरविन्द शेष
19 Jan 2018
padmavat

उम्मीद थी और सुप्रीम कोर्ट ने 'पद्मावत' (पहले 'पद्मावती') फिल्म को देश भर में दिखाए जाने के पक्ष में फैसला सुना दिया। अब इस फिल्म का प्रदर्शन इस बात पर निर्भर है कि राज्य सरकारें सुरक्षा व्यवस्था के मोर्चे पर क्या करती हैं और सुप्रीम कोर्ट के फैसके के बावजूद मारकाट मचाने की धमकी देने वाली 'करणी सेना' या दूसरे उन्मादी तत्त्वों से कैसे निपटती है। खबरों के मुताबिक राजपूत करणी सेना के कार्यकर्ताओं ने मुजफ्फरपुर में एक सिनेमा हॉल के सामने हिंसक प्रदर्शन किया है। देश के अलग-अलग हिस्सों से इस मसले पर फिल्म बनाने वालों और उसके कलाकारों को मार डालने, दफ्न कर देने की धमकियां दी जा रही हैं। यहां तक कहा जा रहा है कि अगर 'पद्मावत' पर पाबंदी नहीं लगाई गई तो चित्तौड़गढ़ में सैकड़ों महिलाएं 'जौहर' करेंगी।

कुछ सालों के दौरान कई ऐसी फिल्में आईं, जिन पर अलग-अलग सामाजिक समूहों ने 'भावनाएं आहत होने' का आरोप लगाया और पाबंदी की मांग की। लेकिन अदालतों में इस तरह की आपत्तियां कानून और तर्क की कसौटी पर नहीं टिकीं और आखिर सिनेमा हॉलों में दिखाई गईं। हां, इस बहाने संबंधित फिल्म को ज्यादा प्रचार मिल गया यह बहस का एक अलग सवाल है। लेकिन इस तरह के विरोध से कला और अभिव्यक्ति की आजादी के अलावा सामाजिक सोच के विकास के सामने जो चुनौती खड़ी होती है, वह किसी भी देशकाल के लिए प्रतिगामी ही है।

भाजपा शासित कई राज्यों की सरकारों ने अपनी ओर से उन राज्यों में 'पद्मावत' के प्रदर्शन पर पाबंदी लगाए जाने की घोषणा की थी। लेकिन यह अपने आप में हैरानी की बात है कि जिस फिल्म को सेंसर बोर्ड ने प्रदर्शन के लिए प्रमाण पत्र दे दिया था, उसे दिखाए जाने पर इन सरकारों को क्या आपत्ति थी! क्या करणी सेना जैसा कोई संगठन इस कदर ताकतवर है कि उसके गैरकानूनी फरमान इस देश में संविधान और कानून के राज का शपथ लेकर राज करने वाली सरकारों पर हावी हैं? सवाल है कि संविधान और कानून का राज ये चुनी गई सरकारें कायम करेंगी या करणी सेना को अपने मध्ययुगीन विचारों को कानून की शक्ल में लागू करने की छूट दी जाएगी? अगर यह सिरा आगे बढ़ता है तो देश में अलग-अलग जातियों के समूहों के संगठनों को किस स्तर तक उनकी मर्जी और मनमानी व्याख्या के हिसाब से देश चलने दिया जाएगा?

मिथक बनाम इतिहास

किसी मिथक को इतिहास समझ लेने या उसे इतिहास के रूप में परोसने के खतरे इसी तरह के होते हैं। 'पद्मावती' को जायसी की रचना के मुताबिक एक काल्पनिक पात्र के रूप में देखा जाता रहा है। लेकिन करणी सेना का जोर उसे इतिहास मानने पर है। और चूंकि पद्मावती की जातिगत पृष्ठभूमि राजपूत मानी गई है, इसलिए उसके किसी मुसलिम शासक से प्रेम करने का संदर्भ भी बर्दाश्त करना संभव नहीं है। मगर जिस देश के मध्यकालीन इतिहास में ऐसे तमाम प्रसंग हैं, जिनमें किसी हिंदू शासक ने मुसलिम शासकों के साथ राजनीतिक और पारिवारिक संबंध भी कायम किए, उसमें कई मौकों पर शादियां भी हुईं, उसके समांतर जायसी की रचना में दर्ज काल्पनिक पात्र 'पद्मावती' के अल्लाउद्दीन खिलजी से प्रेम के संदर्भ को पचा पाना करणी सेना के लिए क्यों मुमकिन नहीं हो रहा है।

पृष्ठभूमि

दो-तीन दशकों के सांप्रदायिक राजनीति का सिरा यहीं पहुंचना था। भारत में सांप्रदायिक राजनीति दमित-वंचित जातियों के अधिकारों को दबाने का हथियार रही है। करणी सेना के रवैये से केवल यह नहीं हो रहा है कि कोई खास जाति किसी फिल्म की कहानी से खुद के अपमानित होने का भाव प्रदर्शित कर रही है, बल्कि उसके जरिए हिंदू ढांचे में मौजूद बाकी जातियों के बीच भी मुस्लिम विरोध की भावना का दोहन करने की यह सुनियोजित कोशिश है। जायसी की रचना में किसी काल्पनिक हिंदू और राजपूत स्त्री के पात्र का किसी मुसलिम शासक से प्रेम पर करणी सेना को आपत्ति है, लेकिन अतीत में समाज के कमजोर तबकों के प्रति राजपूत जाति के व्यवहार का यथार्थ क्या रहा है, उस पर सोचना उसे जरूरी नहीं लगेगा। तो क्या अतीत के उन्हीं ऐतिहासिक संदर्भों पर पर्दा डालने के लिए किसी फिल्म के विरोध के बहाने अपने सामाजिक वर्चस्व को आज भी कायम रखने की कोशिश की जा रही है?

पहले जब संजय लीला भंसाली की ही फिल्म 'बाजीराव मस्तानी' आई थी, तब कुछ दलित-वंचित जातियों के उन सवालों पर गौर करने की जरूरत किसी को नहीं लगी थी जो उन्होंने पेशवाई शासन के इतिहास के बारे में उठाए थे। कई हलकों से यह कहा गया कि बाजीराव पेशवा- दो के कार्यकाल में 'अछूत' समूह में मानी जानी जाने वाली जातियों के खिलाफ जो नियम बनाए गए, वे व्यवस्थागत जातिगत अत्याचार का मॉडल थे। लेकिन एक अंतरधार्मिक प्रेम कहानी के बहाने पेशवाई शासन के उन तमाम प्रसंगों पर पर्दा डालने की कोशिश की गई, जिनके उल्लेख से किसी सभ्य समाज को शर्मिंदगी उठानी पड़ सकती है।

समाजिक समूह बनाम कानून

समय-समय पर कई फिल्मों को लेकर ऐसे विवाद उठते रहे हैं। सामाजिक स्तर पर अलग-अलग समूहों ने अपनी आक्रामक आपत्तियों के साथ किसी फिल्म को प्रतिबंधित करने की मांग की। लेकिन अब तक कानूनी स्तर पर वे लड़ाइयां कमजोर साबित होती रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 'पद्मावत' को दिखाए जाने की इजाजत देते हुए कहा कि जब 'बैंडिट क्वीन' दिखाई जा सकती है, तो 'पद्मावत' क्यों नहीं! हालांकि 'बैंडिट क्वीन' और 'पद्मावत' की तुलना का क्या संदर्भ हो सकता है, यह समझना मुश्किल है, लेकिन किसी सामाजिक समूह की आपत्तियों के आधार पर किसी फिल्म पर पाबंदी लगाए जाने के विचार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी कई फैसले दिए हैं।

किसी लोकतांत्रिक समाज में किसी फिल्म के प्रति लोग क्या राय बनाते हैं, यह उनके विवेक पर छोड़ दिया जाना चाहिए। यह संविधान में दर्ज अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार के तहत भी आता है। करीब तीन दशक पहले 'ओरे ओरु ग्रामाथिले' फिल्म को लेकर आपत्तियां उठाई गईं और उस पर पाबंदी लगाने की मांग की गई थी, तब इस मसले पर 1989 में अपने एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर कहा था कि महज हिंसा और विरोध प्रदर्शनों की धमकी के आधार पर अभिव्यक्ति की आजादी को नहीं दबाया जा सकता। इस लिहाज से देखें तो अगर राज्य सरकारें किसी स्थिति में 'पद्मावत' के प्रदर्शन को रोकने में सहायक की भूमिका निबाहती हैं तो वह करणी सेना की धमकियों के सामने समर्पण होगा और निश्चित रूप से कानून के शासन को धता बताने जैसा होगा।

राजपूत करणी सेना के लड़ाकों को यह समझने की जरूरत है कि वे जाति के कथित गौरव के बखान और महिमामंडन की बुनियाद पर इस फिल्म का विरोध तो कर रहे हैं, लेकिन खुद को देशभक्त कहते हुए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का खयाल रखने के साथ-साथ संविधान और कानून का पालन करने जैसी उनकी कुछ राष्ट्रीय जिम्मेदारियां भी हैं। जातिगत परंपरा से जुड़ी आस्थाओं या भावनाओं के सामने उनकी नजर में अगर देश का संविधान और कानून कोई मायने नहीं रखते, तो वे खुद तय करें कि उन्हें देशभक्ति और देशद्रोह के किस पैमाने पर देखा जाए!

इस समूचे प्रसंग में एक अहम पहलू यह है कि किसी कहानी या फिर इतिहास के पात्र के रूप में रानी पद्मिनी के जीवन के उस पर हिस्से पर गर्व करने पर जोर दिया जा रहा है, जिसमें पद्मिनी ने सोलह हजार रानियों के साथ 'जौहर' यानी जिंदा आग में जल जाने का 'व्रत' पूरा किया था। आज दुनिया में, जब स्त्री की अस्मिता और अधिकारों का सवाल खुद को सभ्य और लोकतांत्रिक कहने वाली व्यवस्था के सामने चुनौती है, उसमें स्त्री के दमन और शोषण को व्यवस्थागत शक्ल देने वाली परंपराओं पर गर्व करने का आग्रह समाज और देश को किस ओर ले जाएगा? क्या आज की कोई भी वह स्त्री 'जौहर' जैसी परंपरा पर गर्व करने के पक्ष में खड़ी हो सकती है, जो अब पुरुष वर्चस्व वाले समाज और व्यवस्था से अपनी बराबरी के हक के लिए लड़ रही है?

Courtesy: द सिटिज़न
padmavati
sensor board
karni Sena
BJP
Supreme Court

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

ज्ञानवापी मस्जिद के ख़िलाफ़ दाख़िल सभी याचिकाएं एक दूसरे की कॉपी-पेस्ट!

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

आर्य समाज द्वारा जारी विवाह प्रमाणपत्र क़ानूनी मान्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 


बाकी खबरें

  • एम. के. भद्रकुमार
    डोनबास में हार के बाद अमेरिकी कहानी ज़िंदा नहीं रहेगी 
    26 Apr 2022
    ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने शुक्रवार को नई दिल्ली में अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस को बेहद अहम बताया है।
  • दमयन्ती धर
    गुजरात : विधायक जिग्नेश मेवानी की गिरफ़्तारी का पूरे राज्य में विरोध
    26 Apr 2022
    2016 में ऊना की घटना का विरोध करने के लिए गुजरात के दलित सड़क पर आ गए थे। ऐसा ही कुछ इस बार हो सकता है।
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    पिछले 5 साल में भारत में 2 करोड़ महिलाएं नौकरियों से हुईं अलग- रिपोर्ट
    26 Apr 2022
    क़ानूनी कामकाजी उम्र के 50% से भी अधिक भारतवासी मनमाफिक रोजगार के अभाव के चलते नौकरी नहीं करना चाहते हैं: सीएमआईई 
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के बढ़ते मामलों को देखते हुए राज्य सरकारें अलर्ट 
    26 Apr 2022
    देश में पिछले 24 घंटों में कोरोना के 2,483 नए मामले सामने आए हैं। देश में अब कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 4 करोड़ 30 लाख 62 हज़ार 569 हो गयी है।
  • श्रिया सिंह
    कौन हैं गोटाबाया राजपक्षे, जिसने पूरे श्रीलंका को सड़क पर उतरने को मजबूर कर दिया है
    26 Apr 2022
    सैनिक से नेता बने गोटाबाया राजपक्षे की मौजूदा सरकार इसलिए ज़बरदस्त आलोचना की ज़द में है, क्योंकि देश का आर्थिक संकट अब मानवीय संकट का रूप लेने लगा है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License