NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
पेप्सीको और मोनसेंटो का फ़र्जी केस भारतीय किसानों पर हमला है
मोनसेंटो और पेप्सीको के संघर्ष का मुख्य लक्ष्य एकाधिकार के साथ धन कमाने का प्रयास करना है जिस पर वास्तव में उनका कोई अधिकार नहीं है।
प्रबीर पुरकायस्थ
05 May 2019
पेप्सीको और मोनसेंटो का फ़र्जी केस भारतीय किसानों पर हमला है

प्रोटेक्शन ऑफ़ प्लांट वेराइटी एंड फ़ार्मर्स प्रोटेक्शन राइट्स (पीपीवी एंड एफ़आर) के तहत अपने बौद्धिक संपदा अधिकार के उल्लंघन को लेकर गुजरात में आलू उत्पादन करने वाले नौ किसानों के ख़िलाफ़ पेप्सिकों मामले ने भारतीय किसानों के सामने ख़तरा पैदा कर दिया है। पेप्सीको यूएस की बहुराष्ट्रीय कंपनी है। पेप्सीको प्रत्येक किसान से 1.05 करोड़ रुपये के नुकसान की मांग कर रही है। यह पिछले साल मई महीने में दिल्ली उच्च न्यायालय में पहले के एक मामले में आया है जहाँ मोनसेंटो ने अपने बीटी कॉटन बीज पर पेटेंट अधिकार का दावा किया है और तेलंगाना की बीज कंपनी पर मुक़दमा दायर किया है। इसके अलावा हमें चीन के साथ भारत के ख़तरे को जोड़ना चाहिए जो कि अमेरिका के तथाकथित बौद्धिक संपदा अधिकारों के लिए सबसे बड़े ख़तरे का हवाला देते हुए संयुक्त राज्य अमेरिका व्यापार प्रतिनिधियों (यूएसटीआर) द्वारा प्रस्तुत किया गया।

बीटी पेटेंट मामले की सुनवाई अब केंद्रीय मुद्दे पर होगी कि क्या मोनसेंटो का इन बीजों पर पेटेंट का दावा भारतीय पेटेंट कानून के तहत वैध है। लोगों के काफ़ी विरोध के बाद पेप्सीको ने गुरुवार 1 मई को किसानों के ख़िलाफ़ मामला वापस ले लिया है।

मोनसेंटो और पेप्सीको के संघर्ष का मुख्य लक्ष्य एकाधिकार के साथ धन कमाने का प्रयास करना है जिस पर वास्तव में उनका कोई अधिकार नहीं है। यह उस पूंजी का उपयोग है जिसे "बौद्धिक संपदा" कहा जाता है और जो वास्तव में सदियों और हज़ारों वर्षों में मानव ज्ञान तथा रचनात्मकता संचित किया है। ज्ञान या रचनात्मकता में एक छोटा सा मोड़ कुछ ऐसी चीज़ पैदा करता है जिसे हम नए या अभिनव के रूप में पहचानते हैं। इसे हम पहले की घटनाओं से अलग कैसे करते हैं? ऐसा क्यों है कि केवल अंतिम मील यानी नवीनतम मोड़ एकाधिकार होना चाहिए और ये नहीं जो किसानों ने हज़ारों वर्षों में उत्पादन किया है?

जब हम लाइफ़ फ़ॉर्म (पौधों के प्रकार) पर प्लांट ब्रीडर्स के अधिकारों या पेटेंट अधिकारों की बात करते हैं तो हम इस बारे में बात कर रहे हैं कि प्रकृति ने लाखों वर्षों के विकास में क्या कुछ पैदा किया है और किसानों ने नवपाषाण से लेकर अब तक हज़ारों वर्षों में चुनिंदा प्रजनन के माध्यम से कौन सी खेती की है और क्या सुधार किया है। अब हमारे पास बहुत सी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ हैं जिन्होंने मौजूदा कृषि-रासायनिक बाज़ारों से अपनी क्षमता समाप्त कर ली है, वे अब बीज के बाज़ार में स्थानांतरित होना चाहती हैं और बीज पर एकाधिकार करना चाहती हैं। इनमें पेप्सीको जैसी खाद्य कंपनियाँ हैं जो अपने स्रोत, उदाहरण स्वरूप आलू को सीमित करके अपने मुनाफ़े को बढ़ाना चाहती हैं ताकि किसान कुछ और उत्पादन न कर सकें। पौधे के प्रजनक अधिकार या पेटेंट अधिकार दोनों बौद्धिक संपदा अधिकारों के अलग-अलग रूप हैं। भले ही जिस क़ानून के तहत अधिकारों का दावा किया जा रहा है वह अलग-अलग हैं। मोनसेंटो पेटेंट अधिनियम का उपयोग करना चाहता है जबकि पेप्सीको पौधे की क़िस्मों के अधिनियम का उपयोग करना चाहता है।

हम में से ज़्यादातर लोगों ने सोचा कि विश्व व्यापार संगठन में शामिल होने के चलते 2004 में भारतीय पेटेंट अधिनियम में संशोधन और 2001 में प्रोटेक्शन ऑफ़ प्लांड वराइटीज एंड फ़ार्मर राइट्स (पीपीवी एंड एफ़आर) के साथ हमने ट्रेड-रिलेटेड अस्पेक्ट्स ऑफ़ इंटेलेक्चुअल प्रोपर्टी राइट्स (टीआरआईपीएस) पर समझौते के तहत अनुमति दिए गए उदारता का उपयोग किया और बौद्धिक संपदा व्यवस्था का निर्माण किया जो ज़्यादातर देशों में मौजूद व्यवस्था की तुलना में टीआरआईपीएस के तहत काफ़ी अनुकूल था। वामपंथ के दबाव में बड़े संशोधनों को शामिल करने के बाद इसे पारित किया गया था, इस प्रकार सस्ती दवा, बीज, और मुफ़्त तथा खुले स्रोत सॉफ़्टवेयर के लिए लोगों के अधिकारों की रक्षा करता है। मनमोहन सिंह सरकार को ये अधिनियम पारित करने के लिए वामपंथ के समर्थन की आवश्यकता थी और इसलिए इन संशोधनों को स्वीकार करने के लिए मजबूर होना पड़ा। जबकि इस पेटेंट अधिनियम में धारा 3 (डी) जो नवीन के रूप में साधारण संशोधनों की अनुमति नहीं देता है वह प्रसिद्ध है। इसी तरह लाइफ़ फ़ॉर्म (पौधों के प्राकर) तथा सॉफ़्टवेयर पेटेंट के अलावा अन्य प्रमुख खंड हैं। धारा 3 (जे) के तहत बीज सहित कोई भी लाइफ़ फ़ॉर्म पेटेंट योग्य नहीं है; और बीज स्पष्ट रूप से धारा 3 (जे) में उल्लिखित हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय में मोनसेंटो का मामला पूरी तरह से कल्पित है।

इसी तरह पीपीवी एंड एफ़आर किसानों के साथ साथ पौधे का प्रजनन करने वालों की रक्षा करने का एक प्रयास था। यह पौधों की क़िस्मों की विशेष रक्षा करने वाला एक अनूठा उदाहरण है। टीआरआईपीएस के अधीन भारत को नए पौधों की क़िस्मों को या तो पेटेंट या विशेष (सुई जेनरिस-अपनी तरह का) संरक्षण प्रदान करना था। अमेरिका ने पेटेंट संरक्षण के लिए तर्क दिया था लेकिन लाइफ़ फ़ॉर्म (पौधों के प्रकार) पेटेंटिंग के ख़िलाफ़ उस समय यूरोपीय संघ के साथ भारत ख़ुद के लिए कुछ स्थान पाने में सक्षम था और विशेष संरक्षण के रूप में लाइफ़ फ़ॉर्म के लिए पेटेंट संरक्षण का एक विकल्प प्राप्त कर लिया। भारत के अलावा पौधों की क़िस्मों का एकमात्र अन्य विशेष संरक्षण प्रोटेक्शन ऑफ़ न्यू वेरिएंट्स ऑफ़ प्लांट्स (यूपीओवी) के लिए इंटरनेशनल यूनियन से होता है जो पौधों के प्रजनन करने वालों की सुरक्षा करता है न कि किसानों की। भारतीय अधिनियम विशिष्ट था क्योंकि इसने दोनों अधिकारों की रक्षा की मांग की थी लेकिन खंड 39 (1) (iv) के प्रति सचेत था कि किसानों के अधिकार पौधे के प्रजनकों के अधिकारों को प्रभावित करेंगे। इसमें कहा गया है कि इस अधिनियम में और कुछ होने के बावजूद किसान संरक्षित क़िस्म के बीज सहित अपने खेत की उपज को संरक्षित कर सकते हैं, इस्तेमाल कर सकते हैं, बुआई सकते हैं, दोबारा बुआई सकते हैं, अदला बदली कर सकते हैं, साझा कर सकते हैं या बेच सकते हैं। यह एक व्यापक और अति महत्वपूर्ण प्रावधान है। किसान के बीजों का वर्गीकरण करना एकमात्र बाधा था जैसे कि एफ़सी 5 जिस पर पेप्सिको प्रजननकर्ता के अधिकार का दावा कर रहा है और इसे बाज़ार में बेच रहा है।

जबकि क़ानून स्पष्ट है जो इस लड़ाई को असमान बनाता है, वह है बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की शक्ति। पेप्सी, कोक, और मोनसेंटो मान रहे हैं कि उनके पहले के एकाधिकार पर्याप्त नहीं हैं, उन्हें और भी अधिक मुनाफ़े की आवश्यकता है। दोनों अब इस पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं कि कृषि को अपने नियंत्रण में कैसे लाया जाए। मोनसेंटो के साथ रासायनिक तथा फ़ार्मा का दिग्गज बेयर विलय कर रहा है ताकि दोनों एक साथ मिलकर बीज, कृषि-रसायन और उर्वरक बाजारों को नियंत्रित कर सकें। पेप्सीको को पूर्ववर्ती एकीकरण (बाज़ार से एक विशिष्ट प्रकार के टमाटर और आलू प्राप्त करना) में दिलचस्पी रही है ताकि इसके प्लांट को चालू रखा जा सके और इसके उत्पादों को आगे भी मानकीकृत किया जा सके। इस तरह वे उत्पादन के दोनों हिस्सों को हासिल कर सकते हैं। अपने उपभोक्ताओं के लिए एक एकाधिकार विक्रेता बन कर जो पहले से ही है और अपने आपूर्तिकर्ताओं के कच्चे माल का एकाधिकार बन कर हासिल कर सकते हैं। भारत में बड़ी संख्या में कच्चे माल के आपूर्तिकर्ता किसान हैं। आख़िरकार आलू को छोड़कर आलू के चिप्स के पैकेट में जो जाता है वह है हवा या ज़्यादा सही तरीक़े से कहें तो नाइट्रोज़न।

समस्या यह नहीं है कि यह मामला एक कल्पित है लेकिन यह क़ानून का इस्तेमाल किसानों को महंगी क़ानूनी लड़ाई में घसीटने के लिए कर सकता है। कंपनी के पास काफ़ी पैसे हैं लेकिन किसानों के पास बहुत कम हैं। अमेरिकी सरकार भारत पर कार्रवाई करने सहित विशेष 301 प्रावधानों का उपयोग करते हुए अपनी कंपनी पेप्सीको को कई तरीक़ों से सहायता करेगी। ट्रम्प प्रशासन ने अंतरराष्ट्रीय क़ानून के प्रति अपनी उपेक्षा को स्पष्ट कर दिया है: इसके संदेश को नकार दिया जाता है या और कुछ। क्या भारत अमेरिका के विरोधियों के साथ खड़ा होगा? क्या यह अपने पेटेंट क़ानूनों और पौधा संरक्षण क़ानूनों के लिए लड़ेगा? या फिर यह बड़े टेबल (संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सीट) पर एक सीट के वादों के लिए इसका विनिमय करेगा? किसी को "आतंकवादी" घोषित करना? और इसलिए भारत अपने किसानों के अधिकारों का समर्पण करता है?

ज़ाहिर है गुजरात के नौ किसान अपने दम पर पेप्सीको से नहीं लड़ सकते हैं। न ही तेलंगाना की बीज कंपनी नुजिवीडू सीड्स इस केस को अकेले लड़ सकती है। यदि यह मोनसेंटो के साथ समझौता करता है तो हमें बड़ा नुक़सान उठाना पड़ेगा। इन मामलों से लड़ने और सरकार पर दबाव बनाने के लिए नागरिक समाज और किसानों तथा किसानों के संगठनों को एक साथ आने का समय है।

यह हमारे लिए चुनौती है कि हम विभिन्न प्रकार के बौद्धिक संपदा अधिकारों का उपयोग करते हुए इस नए मामलों से कैसे लड़ें। देश अपनी खाद्य संप्रभुता को नहीं छोड़ सकता है और इसके किसानों की आजीविका वस्तु बन जाती है। गुजरात में सिर्फ़ 9 किसान या तेलंगाना की एक बीज कंपनी ही केवल नहीं हैं। कृषि में पूंजीवाद भूमि के घेराव से बढ़ा। आज का पूंजीवाद कहीं अधिक उग्र है। इसके उपकरण कानून हैं, इसके लक्ष्य: ज्ञान; किसानों के ज्ञान और इनके हज़ारों वर्षों से नई क़िस्मों के पोषण; प्रयोगशालाओं और विश्वविद्यालयों में वैज्ञानिकों का ज्ञान हैं। यह हमारे भविष्य की लड़ाई है: हमारी कृषि, हमारे भोजन, हमारे कपास और कपड़ों की लड़ाई है। यह नया उपनिवेशवाद है जिससे हमें लड़ना होगा।

PepsiCo vs Gujarat Potato Farmers
PepsiCo
Monsanto
Monsanto vs Telangana Seed Company
Gujarat
Bt Cotton Patent
Intellectual Property Rights under Protection of Plant Variety and Farmers’ Protection Rights
ATL
Nuziveedu Seeds
Agreement on Trade-Related Aspects of Intellectual Property Rights

Related Stories

गुजरात: भाजपा के हुए हार्दिक पटेल… पाटीदार किसके होंगे?

हार्दिक पटेल ने कांग्रेस से इस्तीफ़ा दिया

खंभात दंगों की निष्पक्ष जाँच की मांग करते हुए मुस्लिमों ने गुजरात उच्च न्यायालय का किया रुख

गुजरात: मेहसाणा कोर्ट ने विधायक जिग्नेश मेवानी और 11 अन्य लोगों को 2017 में ग़ैर-क़ानूनी सभा करने का दोषी ठहराया

ज़मानत मिलने के बाद विधायक जिग्नेश मेवानी एक अन्य मामले में फिर गिरफ़्तार

बैठे-ठाले: गोबर-धन को आने दो!

गुजरात : एबीजी शिपयार्ड ने 28 बैंकों को लगाया 22,842 करोड़ का चूना, एसबीआई बोला - शिकायत में नहीं की देरी

गुजरात में भय-त्रास और अवैधता से त्रस्त सूचना का अधिकार

गुजरात चुनाव: कांग्रेस की निगाहें जहां ओबीसी, आदिवासी वोट बैंक पर टिकी हैं, वहीं भाजपा पटेलों और आदिवासियों को लुभाने में जुटी 

गुजरात: सरकारी आंकड़ों से कहीं ज़्यादा है कोरोना से मरने वालों की संख्या!


बाकी खबरें

  • अनिल सिन्हा
    उत्तर प्रदेशः हम क्यों नहीं देख पा रहे हैं जनमत के अपहरण को!
    12 Mar 2022
    हालात के समग्र विश्लेषण की जगह सरलीकरण का सहारा लेकर हम उत्तर प्रदेश में 2024 के पूर्वाभ्यास को नहीं समझ सकते हैं।
  • uttarakhand
    एम.ओबैद
    उत्तराखंडः 5 सीटें ऐसी जिन पर 1 हज़ार से कम वोटों से हुई हार-जीत
    12 Mar 2022
    प्रदेश की पांच ऐसी सीटें हैं जहां एक हज़ार से कम वोटों के अंतर से प्रत्याशियों की जीत-हार का फ़ैसला हुआ। आइए जानते हैं कि कौन सी हैं ये सीटें—
  • ITI
    सौरव कुमार
    बेंगलुरु: बर्ख़ास्तगी के विरोध में ITI कर्मचारियों का धरना जारी, 100 दिन पार 
    12 Mar 2022
    एक फैक्ट-फाइंडिंग पैनल के मुतबिक, पहली कोविड-19 लहर के बाद ही आईटीआई ने ठेके पर कार्यरत श्रमिकों को ‘कुशल’ से ‘अकुशल’ की श्रेणी में पदावनत कर दिया था।
  • Caste in UP elections
    अजय कुमार
    CSDS पोस्ट पोल सर्वे: भाजपा का जातिगत गठबंधन समाजवादी पार्टी से ज़्यादा कामयाब
    12 Mar 2022
    सीएसडीएस के उत्तर प्रदेश के सर्वे के मुताबिक भाजपा और भाजपा के सहयोगी दलों ने यादव और मुस्लिमों को छोड़कर प्रदेश की तकरीबन हर जाति से अच्छा खासा वोट हासिल किया है।
  • app based wokers
    संदीप चक्रवर्ती
    पश्चिम बंगाल: डिलीवरी बॉयज का शोषण करती ऐप कंपनियां, सरकारी हस्तक्षेप की ज़रूरत 
    12 Mar 2022
    "हम चाहते हैं कि हमारे वास्तविक नियोक्ता, फ्लिपकार्ट या ई-कार्ट हमें नियुक्ति पत्र दें और हर महीने के लिए हमारा एक निश्चित भुगतान तय किया जाए। सरकार ने जैसा ओला और उबर के मामले में हस्तक्षेप किया,…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License