NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
'पीएम को मारने की साज़िश’ का क्या हुआ?
भीमा कोरेगांव हिंसा और एल्गार परिषद की दयनीय जांच के माध्यम से, पुणे पुलिस और महाराष्ट्र सरकार ने हमारे गणराज्य की आत्मा पर हमला किया है।
निखिल वाग्ले
08 Oct 2018
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फाइल फोटो)

प्रधानमंत्री को मारने की साजिश गंभीर चिंता का विषय है। हम जून के महीने से इसके बारे में सुन रहे हैं। छापे की दो वारदात में पुणे पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए 10 कार्यकर्ताओं पर इस षडयंत्र में शामिल होने का आरोप है।

पिछले हफ्ते, सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त में गिरफ्तार किए गए सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर एक फैसला दिया, जिसमें सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा और अन्य शामिल थे। इन कार्यकर्ताओं के पक्ष में बहस करने वाले वकीलों ने जांच के लिए एसआईटी की मांग की थी, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया था। न्यायमूर्ति मिश्रा और न्यायमूर्ति खानविल्कर ने बहुमत के फैसले में कहा कि आरोपी को यह तय करने का अधिकार नहीं है कि उनकी जांच कौन करेगा। लेकिन, न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने इससे अलग निर्णय दिया। यह बहुमत के फैसले से कहीं अधिक विस्तृत है, और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों को समझने के इच्छुक व्यक्ति को इसे विस्तार से पढ़ना चाहिए।

दुर्भाग्यवश, मीडिया इस पर कुछ खास उत्सुक नज़र नहीं आया, इसलिए मीडिया ने इस फैसले को "एक्टिविस्ट की हार" कहा और "पुणे पुलिस की जीत" को शीर्षक बना दिया। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि यह सरकार की जीत है। फडणवीस ने राज्य को गुमराह करने में एक कदम आगे बढ़कर कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने एक्टिविस्ट के संबंध में पुलिस दावों को राजद्रोह के रूप में स्वीकार कर लिया है।

लेकिन, निर्णय न तो सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के लिए हार है और न ही पुलिस के लिए एक जीत है। वास्तव में, निर्णय ने पुलिस को कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी को आगे बढ़ाने से रोका, और घर मैं नजरबंद करने का आदेश दे दिया। यहां तक कि जब इन कार्यकर्ताओं पर गंभीर अपराधों का आरोप लगाया गया, तब भी सुप्रीम कोर्ट ने चार सप्ताह के लिए उनकी घर मैं नजरबंदी को बढ़ा दिया था, ऐसा इसलिए किया गया ताकि कार्यकर्ता संबंधित निचली अदालतों में न्याय की मांग कर सकें।

शाह और फडणवीस बयान के विपरीत बहुमत का निर्णय जांच की प्रभावकारिता के बारे में बात नहीं करता है। हालांकि, असंतोषजनक निर्णय इसके बारे में ज्यादा विस्तार से बोलता है। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने पूछा है कि क्या जांच के बीच में पुलिस द्वारा आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस जैसे तरीके से पुणे पुलिस द्वारा निष्पक्ष जांच में भरोसा किया जा सकता है या नहीं। एक्टिविस्ट की गिरफ्तारी पर बोलते हुए चंद्रचूड़ ने नोट किया, कि पुलिस ने बुनियादी प्रोटोकॉल का भी पालन नहीं किया है। पूरे मामले का सबसे आश्चर्यजनक पहलू यह है कि पुलिस ने प्रधानमंत्री को मारने की साजिश के बारे में एक भी प्राथमिकी दर्ज नहीं की है। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा कि सरकारी पक्ष के वकीलों ने अदालतों में भी इसका पालन नहीं किया।

बहुमत के फैसले के अनुसार पुणे पुलिस ने जो किया है उसकी योग्यता तक से मेल नही खाता है। दोनों संबंधित न्यायाधीशों ने न तो इसे खारिज किया है और न ही पुलिस द्वारा दिए गए दावों और पत्रों की सत्यता का समर्थन किया है। लेकिन, अपने स्वयं के अवलोकन के विपरीत, उन्होंने कहा कि माओवादियों से जुड़े कार्यकर्ताओं के पहले सबूत स्पष्ट हैं।

चंद्रचूड़ ने उस दावे को नेस्तनाबूद कर दिया है। पुलिस के दावे के अनुसार एक माओवादी नेता कॉमरेड प्रकाश द्वारा लिखे पत्रों को बरामद किया गया है, जो असलियत में पुलिस के मुताबिक जीएन साईबाबा ने लिखे हैं। वह कुछ व़क्त से जेल में बंद है। सवाल उठता है कि उन्होंने ईमेल के ज़रिए जेल से संवाद कैसे किया? इसके अलावा, चंद्रचूड़ ने नोट किया कि सुधा भारद्वाज को दिए गए ईमेल में कुछ एक निश्चित मराठी शब्द हैं जिनसे भाषा के ज्ञान की कमी के कारण वे परिचित नहीं हो सकते हैं। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ के अवलोकनों को इसलिए तरज़ीह नहीं मिल रही है क्योंकि वह एक असहमतिपूर्ण निर्णय है। लेकिन, यह अभी भी पुणे पुलिस पर आरोप है, महाराष्ट्र सरकार को अभी या बाद में इन सवालों का जवाब देना होगा।

शाह और फडणवीस की प्रतिक्रियाएं प्रशासन की लापरवाही को रेखांकित करती हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को गलत तरीके से प्रस्तुत करने का यह एक दुस्साहिक प्रयास है। यह एक तरह से, उच्चतम न्यायालय का अपमान है। फैसले के दो दिन बाद ही, दिल्ली उच्च न्यायालय ने नवलखा की गिरफ्तारी को इनसे अलग कर दिया, जो पुणे पुलिस, शाह और फडणवीस के लिए भी एक जोरदार तमाचा है। मुझे उम्मीद है कि बाकी कार्यकर्ता भी न्याय प्राप्त करेंगे।

मामला यहां खत्म नहीं होता है। हमें जून में गिरफ्तार किए गए अन्य पांच कार्यकर्ताओं को नहीं भूलना चाहिए। वे अभी भी जेल में सड़ रहे जबकि पुलिस ने अभी तक किसी भी पुख्ता सबूत का एक भी टुकड़ा अदालत के सामने पेश नहीं किया है। यह पहली बार नहीं है जब कार्यकर्ताओं पर माओवादियों से जुड़े होने का आरोप लगाया गया है। यह पहले भी हुआ है, और वर्षों जेलों में बिताने के बाद अधिकांश आरोपी बरी हो गए हैं।

अपनी असहमत राय में, न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने नंबी नारायण के उदाहरण का हवाला दिया, जिनका एक वैज्ञानिक के रूप में अपना पूरा करियर बर्बाद हो गया था। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें केवल 50 लाख रुपये का मुआवजा दिया। यदि आज गिरफ्तार किए गए कार्यकर्ताओं को कल बरी कर दिया गया तो क्या महाराष्ट्र सरकार उन्हें क्षतिपूर्ति करेगी? उनके परिवारों की मानहानि और उनके उत्पीड़न के बारे में क्या? उत्तर प्रदेश में, क्या योगी सरकार भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर के चुराए गए एक वर्ष का भुगतान करेगी? तमिलनाडु में, स्टरलाइट के खिलाफ विरोध करने वाले कार्यकर्ताओं ने भी उसी यातना का सामना किया है।

इस तरह के उदाहरण से एक किताब तैयार की जा सकती हैं, और दुख की बात यह है कि कार्यकर्ताओं को हाशिये पर पड़े लोगों के लिए काम करने के लिए जुर्माना भरना पड़ता है। दुर्भाग्यवश, हमारी व्यवस्था जाने-माने कार्यकर्ताओं के मामलों में जल्दी ध्यान आकर्षित करती है जबकि दूरस्थ/ग्रामीण स्थानों के कार्यकर्ताओं को आमतौर पर अनदेखा किया जाता है। हमारा लोकतंत्र नागरिकों के अधिकारों की रक्षा और उसके असंतोष के बिना स्वतंत्र रूप से सांस नहीं ले सकती है। यदि नागरिकों को ठोस साक्ष्य के बिना जेल भेजा जाता है, तो इसे लोकतंत्र पर हमले के रूप में माना जाना चाहिए। दूसरे शब्दों में, भीमा कोरेगांव हिंसा और एल्गार परिषद की दयनीय जांच के माध्यम से, पुणे पुलिस और महाराष्ट्र सरकार ने हमारे गणराज्य की आत्मा पर हमला किया है। ऐसा कहने में हमें कोई घबराहट नही होनी चाहिए।

Bhima Koregaon Case
Supreme Court
Activists
Amit Shah
Devendra Fednavis
elgar parishad

Related Stories

ज्ञानवापी मस्जिद के ख़िलाफ़ दाख़िल सभी याचिकाएं एक दूसरे की कॉपी-पेस्ट!

आर्य समाज द्वारा जारी विवाह प्रमाणपत्र क़ानूनी मान्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

समलैंगिक साथ रहने के लिए 'आज़ाद’, केरल हाई कोर्ट का फैसला एक मिसाल

मायके और ससुराल दोनों घरों में महिलाओं को रहने का पूरा अधिकार

जब "आतंक" पर क्लीनचिट, तो उमर खालिद जेल में क्यों ?

विचार: सांप्रदायिकता से संघर्ष को स्थगित रखना घातक

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश : सेक्स वर्कर्स भी सम्मान की हकदार, सेक्स वर्क भी एक पेशा

तेलंगाना एनकाउंटर की गुत्थी तो सुलझ गई लेकिन अब दोषियों पर कार्रवाई कब होगी?

मलियाना कांडः 72 मौतें, क्रूर व्यवस्था से न्याय की आस हारते 35 साल


बाकी खबरें

  • workers
    रौनक छाबड़ा
    दिल्ली: ट्रेड यूनियन के साइकिल अभियान ने कामगारों के ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा शुरू करवाई
    18 Oct 2021
    ट्रेड यूनियनों की मुख्य मांग में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में 26000 न्यूनतम भत्ता और चार लेबर कोड की वापसी शामिल हैं।
  • cartoon
    आज का कार्टून
    कार्टून क्लिक: कहीं पे निगाहें, कहीं पर निशाना
    18 Oct 2021
    जैसे-जैसे देश में चुनाव आते हैं, अचानक कश्मीर आ जाता है, बांग्लादेश आ जाता है, पाकिस्तान तो बिना न्यौते के ही जाता है। फिर कैमरे के फ़ोकस में बाक़ी देश को हटाकर इन जगहों को सेट कर दिया जाता है ताकि…
  • mayawati
    लाल बहादुर सिंह
    सियासत: उत्तर प्रदेश चुनाव में दलित एजेंडा कहां है?
    18 Oct 2021
    तथ्य यह है कि  डबल इंजन  सरकार की चौतरफ़ा तबाही का जो तबका सबसे बदतरीन शिकार हुआ है,  सबसे बड़ी मार जिस तबके पर पड़ी है, वे दलित ही हैं।
  • covid
    ऋचा चिंतन
    टीबी के ख़िलाफ़ भारत की जंग: बदतर हालात, चुप्पी साधे सरकार, दवाओं के स्टॉक खाली
    18 Oct 2021
    टीबी के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में भारत का खराब प्रदर्शन जारी है, लेकिन डेलमानिड के स्टॉकआउट होने और परीक्षण किट्स की कमी के रूप में अतिरिक्त चुनौतियां सामने आ रही हैं। इन कमियों के बारे में…
  • mukesh
    राज वाल्मीकि
    मुकेश मानस; असमय स्मृति शेष : क्यों तुम चले गए!
    18 Oct 2021
    मुकेश जी आपका यूं अचानक चले जाना आपके सभी चाहने वालों के लिए, दलित साहित्य और दलित प्रगतिशील आंदोलन के लिए, हमसब के लिए गहरा सदमा है। हमें इस तरह का दुखद सरप्राइज देते हुए जाना नहीं था आपको!
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License