NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
प्रधानमंत्री मोदी ने संसद में फिर दोहराए रोजगार वृद्धि के मिथक
नौकरियों के भयंकर संकट के बावजूद, मोदी सबक हासिल करने से इंकार कर रहे हैं और 'इतने सारे ट्रकों' और 'इतने सारे डॉक्टरों' के बारे में परियों की कहानियों को दोहरा रहे हैं।
सुबोध वर्मा
09 Feb 2019
Translated by महेश कुमार
सांकेतिक तस्वीर

जब नेपोलियन के बाद फ्रांस के बोरबॉन राजवंश को बहाल किया गया, तो प्रसिद्ध रूप से यह कहा गया था कि उन्होंने कुछ भी नहीं सीखा है और न ही कुछ भूल पाए हैं। अल्बर्ट आइंस्टीन ने भी विक्षिप्तता के बारे में ऐसी ही समान बात कही थी- कि आप बार-बार एक ही तरह का काम करते हुए उसके अलग-अलग परिणामों की अपेक्षा करते रहते हैं। गुरुवार को संसद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भाषण भी कुछ ऐसा ही था। उनके भाषण से ये स्पष्ट है कि उन्होंने कुछ भी नहीं सीखा है और नौकरी पैदा करने के मामले में नकली डोडी संख्या का हवाला दिया है ताकि किसी भी तरह से देश में मौजूद सबसे गंभीर नौकरियों के संकट से मुंह मोड़ा जा सके जिसे पूरे देश ने हाल के दशकों में देखा है। याद रखें : सीएमआईई (CMIE) के नए आंकड़ों से पता चलता है कि फरवरी 2019 में भारत में बेरोजगारी की दर 8.2 प्रतिशत हो गयी है। हाल ही में, राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ-NSSO) द्वारा किए गए पहले वार्षिक रोजगार सर्वेक्षण की एक लीक रिपोर्ट में बताया गया है कि बेरोजगारी 45 साल के इतिहास में 2017-18 में  सबसे ऊपर है।

पिछली जुलाई में, अविश्वास प्रस्ताव का जवाब देते हुए, मोदी ने भविष्य निधि योजना और पेंशन योजना में नामित आँकड़ों को उद्धृत किया था, साथ ही डॉक्टरों, चार्टर्ड एकाउंटेंट, वकीलों और ट्रक या बस ऑपरेटरों की संख्या का दम भरते हुए कहा था कि देश में एक साल में एक करोड़ नौकरियों पैदा हुयी हैं। उस वक्त न्यूज़क्लिक ने अपने लेखों में आँकड़ों सहित गिरावट के बारे में बताया था। इस बार भी उन्होंने ऐसा ही किया, यह जानने से इंकार करते हुए कि इन आंकड़ों का मतलब कुछ भी नहीं है, और यह कुछ साबित नहीं करता है।

आइए देखें कि नौकरियों के मामले में गुरुवार, 7 फरवरी, 2019 को संसद में उन्होंने क्या कहा, और इसमें क्या गलत है।

मिथक # 1 : भविष्य निधि और पेंशन पंजीकरण

मोदी ने कहा कि सितंबर 2017 से नवंबर 2018 के बीच 1.8 करोड़ लोगों ने पहली बार ईपीएफ में योगदान देना शुरू किया। इन 1.8 करोड़ में से 65 लाख 28 साल से कम उम्र के थे। उन्होंने आगे कहा कि पेंशन योजना (एनपीएस) में नामांकन मार्च 2014 में 65 लाख से बढ़कर अक्टूबर 2018 में 1.2 करोड़ हो गया है।

ईपीएफओ द्वारा अपनी वेबसाइट पर डाले गए जो नए आँकड़े है। वे दर्शाते हैं कि सितंबर 2017 और नवंबर 2018 के बीच 1.8 करोड़ लोग इस योजना में शामिल हुए हैं। लेकिन ये यह भी दिखाता है कि हर महीने 1.4 करोड़ लोगों ने इस योजना को छोड़ भी दिया! यह उन व्यक्तियों (33 लाख) की संख्या भी बताता है, जिन्होंने नौकरी छोड़ दी थी और वे फिर से इसमें शामिल हो गए। मोदी शामिल होने वाली संख्या को गलत तरीके से बता रहे हैं और उन्हें नए रोजगार के रूप में पेश कर रहे हैं। लेकिन उनका क्या जो नौकरियों को  छोड़ रहे हैं? इस तर्क से तो उन्हें बेरोजगार होना चाहिए! इसके बारे में नीचे संक्षेप में दिया गया है :

EPFO.jpg

जैसा कि ऊपर दर्शाया गया है, कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) योजना में शुद्ध नया जोड़ केवल 74 लाख कर्मचारियों का है। सच्चाई यह है कि कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) नए रोजगार के आँकड़ों को दर्ज़ नहीं करता है और न ही उनका प्रतिनिधित्व करता है। इसे पीएम रोजगार प्रोत्साहन योजना द्वारा प्रोत्साहित किया गया, जो योजना कर्मचारियों को इसमें शामिल करने के लिए नियोक्ताओं को सब्सिडी देती है, इसलिए सब्सिडी पाने के लिए कई नियोक्ता अपने पुराने कर्मचारियों का नामांकन करवा रहे हैं। इसमें युवा भी शामिल हैं, जिनके बारे में मोदी गाल बजाही कर रहे हैं। संख्या में इस तरह का उतार-चढाव का कारण है – कि 1.8 करोड़ शामिल हो रहे हैं और 1.4 करोड़ छोड़ भी रहे हैं – यह इसलिए है शायद कि मालिक लोग इस व्यवस्था को धता बताने के लिए बस कर्मचारियों को अंदर और बाहर घुमा रहे हैं। जो भी हो, ये संख्या नई नौकरियों की तो कतई नहीं है।

पेंशन योजना में नामांकन के लिए भी यही बात लागू होती है। इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि जिन लोगों को नामांकित किया गया था, वे नौकरी के बाजार में नए थे।

मिथक # 2 : पेशेवर रोजगार

मोदी ने दावा किया कि 6.35 लाख नए पेशेवर रोजगार वाले जैसे कि डॉक्टर, गैर-कॉर्पोरेट कर दाता भी इस श्रेणी में जुड़ गए हैं, और उन्हें नए रोज़गार का नाम दे दिया। सभी लोग जो कर का भुगतान करना शुरू करते हैं, वे नए नौकरी वाले नहीं हैं। और, भले ही यह मामला हो भी फिर भी इस तरह की नौकरियों की कुल संख्या लगभग पांच वर्षों में 6.35 लाख ही है? यह मध्यम वर्ग के लिए दयनीय रिकॉर्ड है।

मिथक # 3 : परिवहन क्षेत्र

मोदी ने दावा किया कि 2014 के बाद से 36 लाख नए ट्रक या वाणिज्यिक वाहन, 1.5 करोड़ यात्री वाहन और 27 लाख ऑटो खरीदे गए हैं। इस आधार पर उन्होंने कहा कि ट्रांसपोर्ट सेक्टर में 1.25 करोड़ नौकरियां पैदा हुईं हैं। क्या कोई रिकॉर्ड या सबूत है कि जो व्यक्ति इन नए वाहनों को चला रहे हैं, वे उससे पहले कुछ नहीं कर रहे थे? हो सकता है कि वे पुराने वाहन चला रहे हों, हो सकता है कि वे खेतों में काम कर रहे हों या मैनुअल मजदूर हों या किसी दफ्तर में काम करते हों। यह मानने का कोई कारण मौजूद नहीं है कि उन्हें पहली बार नौकरी मिल रही है।

मिथक # 4 : पर्यटन

मोदी ने दावा किया कि होटलों के अनुमोदन में 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है और इस बात पर जोर दिया गया कि पर्यटन क्षेत्र में 1.5 करोड़ नए रोजगार सृजित हुए हैं। फिर, इसके साथ समस्या यह है – कि क्या वे नई नौकरियां हैं या लोग एक नौकरी से दूसरी नौकरी में जा रहे हैं? कोई नहीं जानता, कम से कम खुद मोदी यह बात नही जानते हैं। नए होटलों के लिए विनियामक अनुमोदन कुछ भी नहीं दिखाते हैं क्योंकि आपको यह दिखाने की आवश्यकता होगी कि रोजगार की तस्वीर पाने के लिए कितने होटल बंद हो गए हैं।

मिथ # 5 : मुद्रा ऋण

मोदी ने दावा किया कि पहली बार 4.25 करोड़ लोगों को कर्ज मिला, लेकिन उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इसके लिए नौकरी का कोई आंकड़ा नहीं है। फिर पहली बार वाले कहां से आए? जाहिर है, वह यह बताना चाहता हैं कि वे प्रवेश करने वाले नए लोग हैं। लेकिन सिर्फ इसलिए कि कोई पहली बार ऋण लेता है, इसका मतलब यह नहीं है कि वह पहली बार काम करना शुरू कर रहा है! वह पहले कुछ और काम कर रहा हो सकता है। वास्तव में, मुद्रा ऋण अपने आप में किसी भी रोजगार सृजन का संकेत नहीं देते हैं। प्रति ऋणदाता राशि भी कल्पना करने के लिए बहुत कम हैं। 25 जनवरी (राज्यसभा प्रश्न संख्या 170 और 189) पर सबसे हालिया आंकड़ों के अनुसार, कुल 15.59 करोड़ व्यक्तियों को 2.75 लाख करोड़ रुपये का ऋण दिया गया है। जो प्रति कर्मी मात्र 17,582 रुपये बैठता है। इस राशि से क्या कुछ करने की उम्मीद की जा सकती है!

इन मिथकों के अलावा, प्रधानमंत्री ने कैब एग्रीगेटर्स और कॉमन सर्विस सेंटरों की तरह "जॉब क्रिएटिंग" घटना को भी संदर्भित किया है। फिर, सवाल उठता है कि - क्या इन लोगों को पहली बार नौकरी मिल रही है?

मोदी का भाषण औद्योगिक या सेवा क्षेत्र की नौकरियों का उल्लेख करने में विफल रहा है जो सार्वजनिक निवेश से वृद्धि की नीति के माध्यम से बनाई जा सकती हैं। वास्तव में, निवेश कम हो रहा है, क्रेडिट की रफ्तार बढ़ रही है, निर्यात में कमी आ रही है और नौकरियों में किसी भी महत्वपूर्ण वृद्धि की उम्मीद करने के लिए क्षेत्रीय उत्पादन वृद्धि दर बहुत कम है। मोदी की दृष्टि में एक दोहरापन- एक नव-उदारवादी हठधर्मिता है जो बेरोजगारी बढ़ाने के लिए बाध्य है, और वास्तव में, जो इन नीतियों के लिए एक अच्छी बात है; और दूसरा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है जो वास्तविक अर्थव्यवस्था के बारे में अनभिज्ञता रखता है।

यही कारण है कि मोदी और उनकी सरकार रोजगार पैदा करने में बुरी तरह विफल रही है - और इसलिए हर रोज झूठ का सहारा लिया जा रहा है।

Narendra modi
Employment
unemployment
Job-Seekers
nsso data
Parliament
EPFO
PF

Related Stories

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

उत्तर प्रदेश: "सरकार हमें नियुक्ति दे या मुक्ति दे"  इच्छामृत्यु की माँग करते हजारों बेरोजगार युवा

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"


बाकी खबरें

  • उत्तर बंगाल को अलग राज्य बनाने की मांग क्यों है ग़लत?
    संदीप चक्रवर्ती
    उत्तर बंगाल को अलग राज्य बनाने की मांग क्यों है ग़लत?
    15 Jul 2021
    उत्तर बंगाल को अलग राज्य बनाने की मांग, प्रमुखत: भाजपा सांसद जॉन बारला उठा रहे हैं। याद रहे कि इस क्षेत्र में अलग राज्य की मांग को लेकर हिंसक आंदोलनों का इतिहास रहा है।
  • कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 41,806 नए मामले, 581 मरीज़ों की मौत
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 41,806 नए मामले, 581 मरीज़ों की मौत
    15 Jul 2021
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 41,806 नए मामले दर्ज किए गए हैं। देश में एक्टिव मामलों की संख्या बढ़कर 4 लाख 32 हज़ार 41 हो गयी है।
  • एमएसएमईज़ (MSMEs) के मदद के लिए अपनाई गई लोन की नीति रही बेअसर: सर्वे
    बी. सिवरामन
    एमएसएमईज़ (MSMEs) के मदद के लिए अपनाई गई लोन की नीति रही बेअसर: सर्वे
    15 Jul 2021
    बैंक जब अपना ही एनपीए नहीं संभाल पा रहे तो नए MSMEs को लोन कैसे देंगे? बैंक के बड़े अधिकारियों का कहना है कि MSMEs को देने में बड़ा ‘क्रेडिट रिस्क’ है।’
  • न्यायमूर्ति डीवाइ चंद्रचूड़ 
    संगम
    असहमति कुचलने के लिए आतंक-निरोधक क़ानून का दुरुपयोग हरगिज़ न हो : जस्टिस डीवाइ चंद्रचूड़
    15 Jul 2021
    हाल ही में, यूएपीए के तहत निरुद्ध किए गए और जेल में वर्षों से रह रहे अनेक लोगों को रिहा कर दिया गया है।
  • म्यांमार की पुरानी रिपोर्ट कोलकाता में रोहिंग्या मुसलमानों द्वारा हिंदुओं की हत्या के नाम पर शेयर की
    कलीम अहमद
    म्यांमार की पुरानी रिपोर्ट कोलकाता में रोहिंग्या मुसलमानों द्वारा हिंदुओं की हत्या के नाम पर शेयर की
    15 Jul 2021
    ज़ी न्यूज़ के प्राइम टाइम शो DNA के एक एपिसोड की क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल है. वायरल पोस्ट के अनुसार, ‘कोलकाता के एक छोटे से गांव से हज़ारों हिंदू गायब हैं और 45 हिंदू मार दिए गए’. साथ ही पोस्ट में…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License