NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
प्रियंका गांधी का सोनभद्र प्रयोग क्या कांग्रेस के पुनरुत्थान का सहारा बनेगा?
इस भव्य पुरानी पार्टी को राष्ट्रविरोधी और हिंदू विरोधी होने का डर हमेशा से रहा है। आख़िर एनआईए बिल के ख़िलाफ़ वोट न करना किस तरफ़ इशारा करता है, और यह भी तथ्य नोट करने की ज़रूरत है कि गांधी परिवार से कोई भी मुस्लिम लिंचिंग पीड़ितों के परिवारों का दौरा नहीं करता है।
एजाज़ अशरफ़
23 Jul 2019
Translated by महेश कुमार
Priyanka Gandhi in sonbhadra

कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी सोनभद्र ज़िले में एक पिछड़ी जाति के ज़मींदार द्वारा की गई गोलीबारी में मारे गए और घायल हुए आदिवासियों के परिवारों के साथ सहानुभूति प्रकट करने के लिए पूर्वी उत्तर प्रदेश में गईं जिससे लगता है कि उनकी पार्टी की योजना प्रदेश में कांग्रेस के पुनरुत्थान की है। बावजूद इसके उनकी इस रणनीति के सफल होने की संभावना कम है क्योंकि कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) द्वारा हिंदुत्व के ज़रिए मतदाताओं का सांप्रदायिक रूप से ध्रुवीकरण की अटूट क्षमता का मुक़ाबला नहीं कर पा रही है।

सोनभद्र हत्याकांड के मद्देनज़र घटना के प्रति प्रियंका की संवेदनशीलता कांग्रेस को पुनर्जीवित करने की रणनीति में कई तत्वों की पहचान की जा सकती है। यह 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली करारी हार को पीछे छोड़ते हुए, यह सुनिश्चित करना है ताकि उसके कार्यकर्ताओं का मनोबल न टूटे। वह अब शायद राज्य या राष्ट्रीय चुनाव से ठीक कुछ महीने पहले अपने ताबूत से बाहर निकलने की अपनी आदत से बचना चाहती है। ऐसा भी लगता है कि पार्टी ने शायद यह महसूस किया है कि पार्टी के पुनर्निर्माण के लिए सड़क की राजनीति सबसे उपयुक्त तरीक़ा है।

इससे यह स्पष्ट होता है कि कांग्रेस ने स्वीकार कर लिया है कि अगले पांच वर्षों तक भारतीय राजनीति में इसके एक नई वास्तविकता होने की संभावना है - कि भाजपा सत्ता की राजनीति पर हावी रहेगी; सांसदों और विधायकों को डराया जाएगा या विपक्ष को तबाह करने की कोशिश की जाएगी, जैसा कि कर्नाटक और गोवा में नाटकीय रूप से हुआ है, और अन्य राज्यों में भी चल रहा है। ये भगदड़ भाजपा के ख़िलाफ़ वैचारिक विरोध को बेअसर कर देंगे। इसके साथ ही, मोदी सरकार विपक्षी नेताओं के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के मामले दर्ज करेगी, जैसा कि पहले से ही कुछ के ख़िलाफ़ किया गया है, जो उनकी विश्वसनीयता को कम कर देगी।

प्रियंका के सोनभद्र के प्रयोग का एक वैचारिक आयाम भी है – वह यह बताना चहती हैं कि उनकी पार्टी ग़रीब और शोषित के साथ है और हावी होने वाले सामाजिक समूहों के ख़िलाफ़ है। प्रियंका को सोनभद्र जाने से रोककर, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने बड़ी ग़लती की और प्रियंका ने मिर्ज़ापुर में ही धरना दे दिया और वहां से हटने से इंकार कर दिया जिसकी वजह से उन्हें व्यापक मीडिया कवरेज मिला।

वृद्धावस्था में चल रहे कांग्रेस के नेता अभी भी राजनीतिक वास्तविकता के प्रति उदासीन हैं, उन्हें इंदिरा गांधी की बिहार के बेलची गांव की यात्रा की याद दिलाई जानी चाहिए, जहां 27 मई, 1977 को एक उच्च-जाति की हिंसक भीड़ ने सात दलितों को जला दिया गया था। इंदिरा की बेलची यात्रा के बारे में, इतिहासकार रामचंद्र गुहा इंडिया अफ़्टर गांधी में लिखते हैं: “बारिश में सड़कें धुल गईं थी; उन्हें कार से सवारी करनी पड़ी, फिर जीप से एक ट्रैक्टर पर सफर किया, फिर - जब कीचड़ बहुत बढ़ गया और गहरा होता गया – फिर वे एक हाथी पर सवार हुईं। परिवहन की इस विधा के माध्यम से पूर्व प्रधानमंत्री हिंसा में मारे गए लोगों के परिवारों को सांत्वना देने के लिए बेल्ची पहुंची थी।”

इंदिरा के हाथी पर बैठने ने जैसे कांग्रेस की क़िस्मत को बदल दिया और बेहतर छवि जनता में बनी, जो कि कुछ महीने पहले ही, मार्च 1977 में, जनता पार्टी से पहली बार केंद्र में सत्ता हार गई थी। जनता पार्टी के नेता मधु लिमये ने इंदिरा की हाथी की सवारी के प्रतीकात्मक महत्व को तब स्पष्ट किया था, जब उन्होंने जनता पार्टी एक्सपेरीमैट: एन इंसाईडरस अकाउंट ऑफ़ ओपोज़िशन पॉलिटिक्स, में लिखा था कि "इस घटना ने जनता पार्टी सरकार को ग़रीबों और हरिजनों के प्रति उदासीन रहने वाली सरकार साबित करने में मदद की। हाथी की सवारी ने इंदिरा गांधी की छवि को ग़रीबों और दबे कुचले लोगों के दोस्त के रूप में पुनर्निर्मित किया। इससे यह भी पता चलता है कि ... जो कांग्रेस पार्टी भी मानती थी कि इंदिरा गांधी कार्रवाई करने वाली महिला थीं और वे अपने अकेले दम पर लड़ाई लड़के सत्ता में वापस आने का माद्दा रखती थीं।

प्रियंका का सोनभद्र जाना और उनकी दादी की बेलची यात्रा के बीच एक समानता है, भले ही कम हो। दोनों कार्रवाई हाशिए के सामाजिक समूह के लिए उनकी प्रतीकात्मक समर्थन की कार्यवाही हैं। इंदिरा की तरह, प्रियंका भी कांग्रेस को, लिमये के शब्दों की तरह, "ग़रीबों और दबे कुचलों की दोस्त" के रूप में चित्रित करना चाहती है।

दुर्भाग्य से कांग्रेस के लिए, 2019 की सामाजिक-राजनीतिक ताना बाना उल्लेखनीय रूप से 1977 की तुलना में अलग है। 1977 में अपनी हार के बाद भी, कांग्रेस के पास लोकसभा में 150 से अधिक सीटें थीं। इसके परिणामस्वरूप पार्टी के पास हमेशा सत्ता में वापस लौटने का एक मज़बूत मौक़ा था। कांग्रेस के पास आज सिर्फ़ 52 सीटें हैं।

दूसरा, जनता पार्टी राजनीतिक संगठनों की एक मोर्चे के रुप में थी जो विभिन्न उद्देश्यों के लिए काम कर रही थी। इसके विपरीत, भाजपा एक सजातीय, और संगठनात्मक रूप से बेहतर पार्टी है, जिसका नियंत्रण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के हाथ में है। पार्टी के लिए अलग होना असंभव है, जैसा कि जनता पार्टी ने किया था।

शायद इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि आरएसएस के हिंदुत्व दर्शन का वर्चस्व जो हाल के दिनों में ने स्थापित हुआ है। हिंदुत्व को धार्मिक अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से मुसलमानों से; वह यह डर पैदा करने के लिए कि एक हिंदू भारत को पाकिस्तान और मुसलमानों से ख़तरा है। हिंदुत्व एक वह सामाजिक आधार है जो अक्सर विरोधाभासी हितों वाले सामाजिक समूहों के साथ तालमेल करने में भाजपा का साधन बनता है।

हिंदुत्व ने कांग्रेस के साथ-साथ अन्य दलों को भी अपने सामाजिक आधारों को फिर से संगठित करने से रोका है। 1970 के दशक में, कांग्रेस ने उच्च जातियों, विशेषकर ब्राह्मणों, दलितों और मुसलमानों के बीच एक सामाजिक गठबंधन बनाया था। इंदिरा बेल्ची की सवारी कर सकती थीं, वे गरीबों को उनके अपने समर्थन का संकेत दे सकती थीं और अभी तक अपने उच्च जाति समर्थकों को अलग भी नहीं कर सकती थीं।

हिन्दुत्व की धार को कुंद किए बिना कांग्रेस जाति और वर्ग में गठजोड़ कर सकती है या नहीं यह अभी स्पष्ट नहीं है। आख़िरकार, हिंदुत्व ने धीमी होती अर्थव्यवस्था, बढ़ती बेरोज़गारी, कृषि संबंधी संकट और नोटबंदी ने 2019 के चुनाव में भाजपा को शानदार जीत दिलायी है और उसकी बढ़ोतरी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

बावजूद इसके कांग्रेस हिंदुत्व के मुख्य विचार को चुनौती देने में अनिच्छुक बनी हुई है, क्योंकि उसे आशंका है कि उनका यह कदम हिंदुओं को पार्टी से अलग-थलग कर सकता है। एक महीने पहले, तबरेज़ अंसारी को झारखंड में हिंसा में मार दिया गया था। न तो प्रियंका और न ही राहुल गांधी ने अंसारी के परिवार का दौरा किया, और उन्होंने पिछले पांच वर्षों में उन मुस्लिम पीड़ितों के परिवार का भी दौरा नहीं किया जो लिंचिंग में मारे गए थे। कांग्रेस का नेतृत्व मुस्लिम समर्थक लेबल के साथ फंसना नहीं चाहता है। इस नीति की निरंतरता में, राहुल ने अपनी हिंदू पहचान को पुष्ट करने के लिए एक मंदिर से दूसरे मंदिर के चक्कर लगाए, फिर भी वे उत्तर भारत में भाजपा से हिंदुओं के एक बड़े हिस्से के समर्थन को पाने में असफल रहे।

हिंदुओं को अपने से अलग होने का डर कांग्रेस को डराता रहा है। उदाहरण के लिए, कांग्रेस ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (संशोधन) विधेयक के ख़िलाफ़ मतदान नहीं किया, जिसे पिछले सप्ताह लोकसभा में भारी बहुमत से पारित किया गया था। क्योंकि यह देश विरोधी और हिंदू विरोधी टैग से डरती है।

पार्टी हिंदुत्व की नफ़रत के विरोध में मोहब्बत की अस्पष्ट अवधारणा को चित्रित करती है, लेकिन इसे जीने से बचती है। भारत के प्रमुख विपक्षी दल के रूप में, कांग्रेस को नौ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मुद्दा उठाना चाहिए था, जिन्हें पिछले साल माओवादियों की सहायता के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था। इसने ऐसा नहीं किया, क्योंकि वह मानती है कि कार्यकर्ता या तो एक उपद्रव हैं या उन्हें देश-विरोधी करार दिए जाने का डर सताता है।

इस दृष्टिकोण के साथ, प्रियंका सोनभद्र में हत्या के ख़िलाफ़ विरोध कर सकती हैं क्योंकि यह हिंदू-मुस्लिम लड़ाई नहीं है। यह आदिवासियों और सवर्णों के बीच भी विवाद नहीं है, जिसे कांग्रेस अभी भी लुभाने की उम्मीद कर रही है।

जब तक कांग्रेस जमीनी स्तर पर हिंदुत्व को वैचारिक रूप से चुनौती देने का साहस नहीं करती है, तब तक इसे हिंदी हार्टलैंड में सीमित समर्थन मिलने की संभावना है, खासकर उन राज्यों में जहां दो पार्टियों के बीच में ध्रुवीकरण की राजनीति नहीं होती है। वे दिन बीत गए जब कांग्रेस शांति समितियों की स्थापना करती थी और सामुदायिक संबंधों को सुधारने के लिए मार्च करती थी, जब भी वे संबंध सांप्रदायिक दंगे के कारण टूट जाते थे। अब, पार्टी उम्मीद कर रही है कि हिंदुत्व की अपील किसी तरह अपने आप गायब हो जाएगी।

प्रियंका के सोनभद्र प्रयोग से अधिक, कांग्रेस को अपने पुनरुत्थान के लिए हिंदुओं से अपमानित होने के डर को छोड़ना होगा।

लेखक दिल्ली के एक स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।

PRIYANKA GANDHI VADRA
sonbhadra
sonbhadra carnage
sonbhadra killings
Yogi Adityanath
BJP
Congress

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

गुजरात: भाजपा के हुए हार्दिक पटेल… पाटीदार किसके होंगे?


बाकी खबरें

  • Newsletter
    ट्राईकोंटिनेंटल : सामाजिक शोध संस्थान
    यदि संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर पर आज वोट हो, तो क्या वो पास होगा?
    07 Oct 2021
    क्या संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रासंगिकता अब भी वही है जिस मकसद के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना की गई थी? या संयुक्त राष्ट्र संघ केवल ताकतवर देशों की कठपुतली बनकर रह गया है?
  •  David MacMillan,  Benjamin,
    भाषा
    अणुओं को बनाने का ‘हरित’ तरीका विकसित करने वाले लिस्ट, मैकमिलन को रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार
    07 Oct 2021
    आणविक निर्माण का एक ‘‘सरल’’ नया तरीका खोजने के लिए दो वैज्ञानिकों को रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार दिये जाने की बुधवार को घोषणा की गई
  • Lakhimpur Kheri
    सबरंग इंडिया
    लखीमपुर खीरी: पत्रकार की मौत सुर्खियों में क्यों नहीं आ पाई?
    07 Oct 2021
    रमन कश्यप का परिवार न्याय चाहता है, उन पर कथित तौर पर राजनीतिक दबाव था
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 22,431 नए मामले, 318 मरीज़ों की मौत
    07 Oct 2021
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.72 फ़ीसदी यानी 2 लाख 44 हज़ार 198 हुई | 
  • Lakhimpur Kheri
    डॉ. राजू पाण्डेय
    लखीमपुर खीरी की घटना में निहित चेतावनी को अनदेखा न करें!
    07 Oct 2021
    जब देश का शासन चला रहे महानुभाव प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से अपने आलोचकों के विरुद्ध हिंसा के लिए अपने समर्थकों को उकसाने लगें तो देश की जनता का चिंतित एवं भयभीत होना स्वाभाविक है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License