NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
पुलवामा हमले ने बलपूर्वक नियंत्रण की नीति की नाकामयाबी को किया उजागर
मोदी सरकार की हार्डलाइन नीति न केवल निरर्थक साबित हुई है, बल्कि तेजी से हालात के प्रति प्रतिकूल भी रही है। दरअसल, जम्मू-कश्मीर में संकट पिछले 3-4 सालों में ओर गहरा हो गया है..।
एम. के. भद्रकुमार
19 Feb 2019
Translated by महेश कुमार
KASHMIR
Image Courtesy : Kamran Yousuf

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में गुरुवार को हुए हमले में 40 से ज़्यादा अर्धसैनिक बल के जवानों की मौत हो गई और कई अन्य लोग घायल हो गए।

यह स्पष्ट है कि देश मोदी सरकार की कश्मीर नीतियों की वजह से बहुत भारी कीमत चुका रहा है – देश में अलग-थलग पड़े लोग राज्य के भारी दमन का शिकार हैं - और उसकी बलपूर्वक नियंत्रण की नीति तथा  पाकिस्तान के प्रति एक ही तरह की सोच या दृष्टिकोण – जिसमें वह सुरक्षा एजेंसियों को हालात से निबटने की “खुली छूट” देने और उसी लहज़े में जवाब देने की बात करता है।

मोदी सरकार की हार्डलाइन नीति न केवल निरर्थक साबित हुई है, बल्कि तेजी से हालात के प्रति प्रतिकूल भी रही है। दरअसल, जम्मू-कश्मीर में संकट पिछले 3-4 सालों में ओर गहरा हो गया है, जबकि सुरक्षा एजेंसियों के पास पाकिस्तान से निबटने के लिए कोई पीछे का रास्ता अब नहीं है।

सभी संभावना के तहत, मसूद अजहर के नेतृत्व में जैश-ए-मोहम्मद पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों के संरक्षण का आनंद लेना जारी रखे हुए है। लेकिन इस्लामाबाद ने भी तेजी से जवाब दिया है कि "हम भारतीय मीडिया और सरकार में ऐसे तत्वों की किसी भी तरह की जिद को अस्वीकार करते हैं जो बिना जांच के पाकिस्तान को हमले से जोड़ना चाहते हैं।"

लेकिन लब्बोलुआब यह है कि पुलवामा में नरसंहार की भविष्यवाणी को समझा जा सकता था। पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा की स्थिति में काफी सुधार हुआ है और अफगानिस्तान से सीमा पार से आतंकवाद को बढ़ावा मिला है। इन हालत में यह स्थिति को व्यवस्थित करने के जोश को और एक बेचैनी की भावना पैदा कर सकता है।

बहरहाल, एक बात का ध्यान रखना चाहिए – वह है समय। 2019 के संसदीय चुनावों के लिए अभियान तेज़ गति पकड़ रहा है। यह हमला सुनिश्चित करता है कि इस हमले के समय सरकार और पीएम मोदी बहुत खराब स्थिति में हैं।

गौरतलब है कि 18 फरवरी को इस्लामाबाद में अमेरिका और तालिबान के बीच अगले दौर की बातचीत के चार दिन पहले और हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में कुलभूषण जाधव के कथित आर एंड एडब्ल्यू ऑपरेटिव कुलभूषण जाधव के मामले पर अंतिम सुनवाई के दौरान यह संकट खड़ा हो गया है। क्या यह महज इत्तफाक  है?

पाकिस्तानी पीएम इमरान खान अमेरिकी अधिकारियों और तालिबान नेतृत्व के बीच व्यक्तिगत रूप से मध्यस्थता कर रहे हैं। यह सुनिश्चित करने के लिए कि राष्ट्रपति ट्रम्प के लिए व्यक्तिगत रूप से जो भी नतीज़े सामने आएंगे, उसका नतीजा व्यक्तिगत होगा, जिसका अफगानिस्तान में 'अंतहीन युद्ध' समाप्त करने का निर्णय का सीधा असर 2020 में फिर से चुनाव में उतरने के लिए पड़ेगा।

मौलिक रूप से, हालांकि, पुलवामा हमले को अर्धसैनिक बलों पर निर्देशित किया गया है - भारतीय सेना पर नहीं। इस हमले का उद्देश्य हमारे सुरक्षा के रहनुमाओं को गहरी चोट पहुंचाने के लिए किया गया है और उन्हें अयोग्य और बेकार साबित करने के लिए किया गया है।

18 फरवरी को आईसीजे की सुनवाई पुलवामा हमले की पृष्ठभूमि प्रदान करती है। हेग में, भारत को सीमा पार आतंकवाद के पाकिस्तानी आरोपों से बचाव करना है। भारत को अस्थिर करने के लिए पाकिस्तान उस स्तर के आरोप लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा, जो भारत गुप्त अभियान के जरिये चला रहा है। भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के लिए इस सब में एक संदेश है।

बेशक, अंतिम विश्लेषण में, बात मोदी की मेज पर आकर रुक जाती है। समझदार बात यह होनी चाहिए कि घाटी में शांति प्रक्रिया को बाहाल करने के लिए तालमेल बनाने के लिए राजनीतिक पहल के साथ श्रीनगर में गठबंधन सरकार बनाने के लिए पीडीपी के साथ भाजपा को गठजोड़ का पालन करना चाहिए।

इसी तरह, वार्ता में पाकिस्तान को उलझाए रखने में खोने को कुछ नहीं था। अच्छे राज्य का काम होता है कि वह देश के सार्वजनिक माहौल को बिगाड़े बिना, अर्थहीन ड्रामेबाज़ी का सहारा लेने के बजाय मतभेदों और विवादों के मुख्य मुद्दों पर अपने विरोधियों से बात करने को तरजीह देता है।

तर्क यह है कि, पाकिस्तान के साथ हमारे संबंधों के लिए एक नया अध्याय खोलने के लिए स्थितियां अनुकूल थीं। इमरान खान के चुनाव और उनके द्वारा (साथ ही सेना प्रमुख क़मर बाजवा) द्वारा दिए गए रुझान ने अवसर की एक खिड़की खोली थी।

लेकिन हमारी सुरक्षा एजेंसियां, अपनी उलझी हुई शून्य मानसिकता के साथ, जिज्ञासु होने और इमरान खान के साथ बात नही करने के लिए बेकार कारणों की तलाश करना पसंद करती रही – और कहा गया कि वह सेना का एक रबर स्टैम्प है, और वह इस्लामी समूहों के साथ मिला हुआ है, कि वह इसी राह का एक पक्षी है वगैरह। मोदी कर सकते थे – और ऐसा होना चाहिए था – इस पर जोर दिया गया है।

अंत में, यह निष्कर्ष अपरिहार्य हो जाता है कि बलपूर्वक नीति में लचीलेपन की भारत-पाकिस्तान को बुरी तरह से आवश्यकता है। इस प्राचीन टकराव को विराम देने के लिए यह जरूरी है - और साथ ही राडार के नीचे जाने वाले आतंकियों को निर्णायक रूप से समाप्त किया जाना चाहिए। इसमें आसमान में भीड़ बढ़ाने वाले बाजों पर लगाम लगाने के लिए राजकीय दॄष्टि शामिल है। बेशक, सबसे आसान बात हमेशा अंध राष्ट्रवाद को बढ़ावा देना न होता है।

अफगान में जब सत्ता स्थानांतरण हो रहा है, एक नई शुरुआत संभव है। विचार की बात है कि मसूद अजहर, जो कि कंधार में हर समय अलग अंदाज़ में रहता है, ने 20 साल की अनुपस्थिति के बाद घाटी में दखल दी है।

और इस्लामाबाद में गंभीर वार्ता शुरू होने से ठीक 4 दिन पहले पुलवामा हमला हुआ, आखिरकार, तालिबान को मुख्यधारा की राजनीतिक ताकत के रूप में फिर से स्थापित करने के लिए यह वार्ता हो रही है और उधर भारत हेग में अपनी प्रतिष्ठा का बचाव कर रहा है। हमें हालात का जायजा सही तरीके से लेना चाहिए।

इस बीच, राजनीतिक दृष्टि से, पुलवामा में अनंत त्रासदी के सामने, सरकार को जम्मू-कश्मीर में संकट के समाधान के लिए देश में आम सहमति बनाने की कोशिश करनी चाहिए, जो आतंकवाद का मूल कारण है।

लेकिन मोदी सरकार से इस तरह की अपेक्षा कुछ ज्यादा ही हो सकती है, जिसका ध्यान राजनीतिक विरोधियों को नीचा दिखाने और उन्हें परेशान करने, या राष्ट्रीय राय का ध्रुवीकरण करने पर ज्यादा है।

 

(प्रथम प्रकाशन : 15 फरवरी, 2019, सौजन्य: Indian Punchline )

 

Jammu and Kashmir
pulwama attack
CRPF Jawan Killed
Kashmir crises
Kashmir conflict
Kashmir Politics
Modi government
BJP
India and Pakistan

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

कश्मीर में हिंसा का नया दौर, शासकीय नीति की विफलता

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल


बाकी खबरें

  • rakeh tikait
    लाल बहादुर सिंह
    यूपी चुनाव: किसान-आंदोलन के गढ़ से चली परिवर्तन की पछुआ बयार
    11 Feb 2022
    पहले चरण के मतदान की रपटों से साफ़ है कि साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण वोटिंग पैटर्न का निर्धारक तत्व नहीं रहा, बल्कि किसान-आंदोलन और मोदी-योगी का दमन, कुशासन, बेरोजगारी, महंगाई ही गेम-चेंजर रहे।
  • BJP
    वर्षा सिंह
    उत्तराखंड चुनाव: भाजपा के घोषणा पत्र में लव-लैंड जिहाद का मुद्दा तो कांग्रेस में सत्ता से दूर रहने की टीस
    11 Feb 2022
    “बीजेपी के घोषणा पत्र का मुख्य आकर्षण कथित लव जिहाद और लैंड जिहाद है। इसी पर उन्हें वोटों का ध्रुवीकरण करना है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी घोषणा पत्र पर अपनी प्रतिक्रिया में लव-लैड जिहाद को…
  • LIC
    वी. श्रीधर
    LIC आईपीओ: सोने की मुर्गी कौड़ी के भाव लगाना
    11 Feb 2022
    जैसा कि मोदी सरकार एलआईसी के आईपीओ को लांच करने की तैयारी में लगी है, जो कि भारत में निजीकरण की अब तक की सबसे बड़ी कवायद है। ऐसे में आशंका है कि इस बेशक़ीमती संस्थान की कीमत को इसके वास्तविक मूल्य से…
  • china olampic
    चार्ल्स जू
    कैसे चीन पश्चिम के लिए ओलंपिक दैत्य बना
    11 Feb 2022
    ओलंपिक का इतिहास, चीन और वैश्विक दक्षिण के संघर्ष को बताता है। यह संघर्ष अमेरिका और दूसरे साम्राज्यवादी देशों द्वारा उन्हें और उनके तंत्र को वैक्लपिक तंत्र की मान्यता देने के बारे में था। 
  • Uttarakhand
    मुकुंद झा
    उत्तराखंड चुनाव : जंगली जानवरों से मुश्किल में किसान, सरकार से भारी नाराज़गी
    11 Feb 2022
    पूरे राज्य के किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य, मंडी, बढ़ती खेती लागत के साथ ही पहाड़ों में जंगली जानवरों का प्रकोप और लगातार बंजर होती खेती की ज़मीन जैसे तमाम मुद्दे लिए अहम हैं, जिन्हें इस सरकार ने…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License