NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
पुलवामा के बाद... युद्ध नहीं, राजनीतिक समाधान चाहिए
तनाव के दौर में विवेक व संयम की अहमियत और बढ़ जाती है। युद्धोन्माद और अंधराष्ट्रवाद भारत को बर्बाद करने के औज़ार हैं।
अजय सिंह
17 Feb 2019
Photos By Kamran Yousuf

पुलवामा (जम्मू-कश्मीर) की घटना के संदर्भ में, जिसमें 14 फ़रवरी 2019 को केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (सीआरपीएफ़) के 40 सिपाही मारे गये, चार बातों पर ध्यान देना ज़रूरी है।

पहली बात : इस घटना की चौतरफ़ा निंदा हुई है। होनी भी चाहिए। यहां तक कि पाकिस्तान ने भी निंदा की है। लेकिन कश्मीर में भारत के सुरक्षा बलों पर आत्मघाती हमले की न तो यह पहली घटना है, न आख़िरी। और इसकी जड़ में बहुत लंबे समय से चली आ रही अनसुलझी कश्मीर समस्या है, जो राजनीतिक समाधान की लगातार मांग कर रही है। इसलिए कश्मीर में, कश्मीरी जनता को विश्वास में लेकर,राजनीतिक प्रक्रिया तेज़ की जानी चाहिए और भारतीय सेना को पीछे किया जाना चाहिए व उसकी गतिविधियों और कार्रवाइयों को सख़्ती से नियंत्रित किया जाना चाहिए। कश्मीर में सेना को ‘हर तरह की कार्रवाई करने की खुली छूट’ देने का मतलब है, और ज़्यादा विध्वंस, और ज़्यादा ख़ून-ख़राबा। कश्मीर राजनीतिक समाधान की मांग कर रहा है, सैनिक समाधान की नहीं। सेना व सैनिक कार्रवाई किसी भी समस्या को नहीं सुलझा सकती।

दूसरी बात : जो लोग पुलवामा की घटना के बाद पाकिस्तान से ‘बदला लेने’ और उसे ‘धूल में मिला देने’ का गलाफाड़ शोर मचा रहे हैं, वे एक सच्चाई को जानबूझकर नज़रअंदाज़ कर रहे हैं। वह यह कि भारत की तरह पाकिस्तान भी परमाणु शक्तिसंपन्न देश है। दोनों पड़ोसी देश परमाणु बमों से लैस हैं। परमाणु बमों से लैस दो देशों के बीच युद्ध के क्या भयावह नतीज़े हो सकते हैं, इसके बारे में ‘बदला लो-बदला लो’ का बेसुरा राग अलापने वालों को शायद पता नहीं। एक परमाणु बम अगर लाहौर (पाकिस्तान) पर गिरा, तो अमृतसर (भारत) भी मिट जायेगा, और अगर परमाणु बम अमृतसर पर गिरा, तो लाहौर का भी नामोनिशान नहीं रहेगा। तनाव के दौर में विवेक व संयम की अहमियत और बढ़ जाती है। युद्धोन्माद और अंधराष्ट्रवाद भारत को बर्बाद करने के औज़ार हैं। इन औज़ारों का इस्तेमाल हमेशा पाकिस्तान के ख़िलाफ़ और भारत के मुसलमानों के ख़िलाफ़ होता रहा है।

तीसरी बात : 14 फ़रवरी 2019 को दक्षिण कश्मीर में पुलवामा में सीआरपीएफ़ के काफ़िले पर जिसने आत्मघाती कार हमला किया, वह बीस साल का आदिल अहमद दार स्कूल की पढ़ाई बीच में छोड़ चुका था। वह कश्मीर का निवासी था, कहीं बाहर से नहीं आया था। वह कश्मीर के एक विद्रोही ग्रुप हिज़्बुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान मुज़फ़्फ़र वानी से बहुत प्रभावित था। वानी को कुछ साल पहले भारतीय सेना ने मार डाला था। कश्मीर में अब ज़्यादातर विद्रोही कश्मीर के बाशिंदे हैं। वे ‘आयातित’ नहीं हैं, जैसा कि समाचार माध्यम में प्रचारित किया जाता रहा है। दमन व आधिपत्य के ख़िलाफ़ कश्मीर की जनता का हथियारबंद विद्रोह कश्मीर की अपनी स्वतंत्र पहचान के सवाल से जुड़ गया है। इसलिए और भी ज़रूरी हो गया है कि भारत, पाकिस्तान व कश्मीरी जनता बातचीत की मेज़ पर आएं, बिना किसी पूर्वशर्त के।

चौथी बात : पुलवामा घटना के विरोध में, 15 फ़रवरी 2019 को जम्मू में बंद का आयोजन किया गया, जिसने ख़तरनाक मुस्लिम-विरोधी हिंसक रूप ले लिया। कई मोटरगाड़ियां जला दी गयीं और करोड़ों की संपत्ति स्वाहा हो गयी। शहर में कर्फ़्यू  लगाना पड़ा, सेना बुलानी पड़ी। फिर भी हिंसा जारी रही। और यह सब तिरंगा झंडा ले कर किया गया! यही नहीं, जो खबरें मिली हैं, उनसे लग रहा है कि जम्मू बंद के दौरान हिंसा को पुलिस और सेना का मौन समर्थन मिला हुआ था। जिन संगठनों ने बंद का आयोजन किया, वे राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ-भाजपा से किसी-न-किसी रूप में जुड़े हुए हैं। पूर्व-नियोजित तरीक़े से हिंदुत्व की ताक़तों का ऐसा हिंसक प्रदर्शन—जो अल्पसंख्यकों को निशाना बनाकर किया जाता है और जिसे राजसत्ता का समर्थन मिला होता है—कश्मीरी जनता को भारत से और गहरे अलगाव में डालता है। पुलवामा की घटना के बाद देश में जगह-जगह कश्मीरी छात्रों पर हिंदुत्ववादी संगठनों के हिंसक हमले हुए हैं, जो इस अलगाव को और बढ़ाएंगे।

सवाल है : कश्मीरी जनता के इस गहरे अलगाव को गहन संवेदनशील तरीक़े से समझने और उसे दूर करने की दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति क्या हमारे राजनीतिक नेताओं में है? पुलवामा की घटना ने यह सवाल फिर पेश किया है।

(लेखक वरिष्ठ कवि और राजनीतिक विश्लेषक हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

Jammu and Kashmir
Kashmir crises
pulwama attack
CRPF Jawan Killed
BJP government
Narendra modi
Pakistan
no war

Related Stories

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कश्मीर में हिंसा का नया दौर, शासकीय नीति की विफलता

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !


बाकी खबरें

  • तिरछी नज़र: सो सॉरी, सेल नहीं, रेंट
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    तिरछी नज़र: सो सॉरी, सेल नहीं, रेंट
    29 Aug 2021
    अब देश की संपत्तियां सेल पर हैं, बेची जा रही हैं, सॉरी! मतलब, किराये पर दी जा रही हैं। सरकार जी खुद ही दे रहे हैं। और हम भी उम्मीद से हैं कि कभी ना कभी हमारा भी मौका आएगा और हम भी कुछ खरीद पाएंगे।
  • गुजरात: धर्म-परिवर्तन क़ानून को लेकर हाईकोर्ट और सरकार के बीच क्या विवाद है?
    सोनिया यादव
    गुजरात: धर्म-परिवर्तन क़ानून को लेकर हाईकोर्ट और सरकार के बीच क्या विवाद है?
    29 Aug 2021
    धर्म-परिवर्तन के नए क़ानून पर हाईकोर्ट की सख़्ती से गुजरात सरकार सकते में है। कानून के कई प्रावधानों पर हाईकोर्ट की रोक के ख़िलाफ़ राज्य की विजय रुपाणी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट जाने की घोषणा की है।
  • 200 हल्ला हो: अत्याचार के ख़िलाफ़ दलित महिलाओं का हल्ला बोल
    रचना अग्रवाल
    200 हल्ला हो: अत्याचार के ख़िलाफ़ दलित महिलाओं का हल्ला बोल
    29 Aug 2021
    "जाति के बारे में क्यों ना बोलूं सर जब हर पल हमें हमारी औक़ात याद दिलाई जाती है..."
  • रोटी के लिए जद्दोजहद करते खाना पहुंचाने वाले हाथ
    समृद्धि साकुनिया
    रोटी के लिए जद्दोजहद करते खाना पहुंचाने वाले हाथ
    29 Aug 2021
    नई श्रम सुधार संहिता के दायरे में गिग वर्कर्स को लाए जाने और उन्हें सामाजिक सुरक्षा के लाभ प्रदान करने के बावजूद फुड डिलीवरी कर्मचारियों का शोषण बदस्तूर है, खासकर महामारी के बाद से। समृद्धि साकुनिया…
  • अफ़गानिस्तान: ‘ग्रेट गेम’  खेलने की सनक में अमेरिका ने एक देश को तबाह कर दिया
    जॉन पिलगर
    अफ़गानिस्तान: ‘ग्रेट गेम’  खेलने की सनक में अमेरिका ने एक देश को तबाह कर दिया
    29 Aug 2021
    कुछ दशक पहले अफ़गानिस्तान की अवाम ने अपनी आज़ादी ली थी, लेकिन अमेरिका, ब्रिटेन और उनके सहयोगी देशों की महत्वाकांक्षाओं ने उसे तबाह कर दिया
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License