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प्याज़ की आसमान छूती क़ीमतों का राज़ क्या है?
प्याज़ की ऊंची क़ीमतों के पीछे 'कम आपूर्ति' से अधिक व्यापारियों की मुनाफ़ाखोरी की प्रवृति है। लेकिन स्थिति को तेज़ी से नियंत्रित करने के बजाए सरकार धूल में लठ क्यों चला रही है? 
सुबोध वर्मा
25 Sep 2019
Translated by महेश कुमार
onion farmer
Image courtesy: livemint

एक सप्ताह के भीतर ही या कहिए कुछ दिनों में ही देश भर में प्याज़ की क़ीमतों ने आसमान छू लिया है,  और इसने अतीत में प्याज़ की क़ीमतों में उछाल और उससे सरकार गिरने की याद को ताज़ा कर दिया है। उदाहरण के लिए, दिल्ली में स्थानीय सब्ज़ी वाला प्याज़ 60-80 रुपये प्रति किलोग्राम बेच रहा है, यानी पिछले कुछ महीनों के मुक़ाबले प्याज़ को तीन गुना दाम पर बेचा जा रहा है।

अब कहा यह जा रहा है कि जटिल फसल चक्र में बाधा पड़ने से यह स्थिति पैदा हुई है, जो पिछले साल महाराष्ट्र और कर्नाटक(दो प्रमुख प्याज़ उत्पादक राज्य) में पड़े सूखे के कारण पैदा हुई थी और अब उसके बाद दोनों राज्यों में आई भयानक बाढ़ ने इसे और बढ़ा दिया है। प्याज़ की फसल एक वर्ष में तीन बार बोई जाती है और प्याज़ का कुछ महीनों के लिए (विशेषकर सर्दियों में) उस दौर के लिए भंडारण किया जाता है जिनमें इनकी पैदावार या आपूर्ति कम होती है। इसमें कुछ सच्चाई है, जिसे पर हम बाद में ग़ौर करेंगे।

लेकिन पहले, एक अन्य पहलू पर एक नज़र डाल लेते हैं। उदाहरण के लिए, दिल्ली की बात करते हैं जहां प्याज़ को आज़ादपुर मंडी में थोक मूल्य 27.74 प्रति किलो में बेचा जा रहा है लेकिन बड़े व्यापारी और वितरक इसे छोटे खुदरा विक्रेताओं को 42 रुपये प्रति किलोग्राम के खुदरा मूल्य पर बेच रहे हैं। बदले में, वे इस माल को ख़रीदकर विभिन्न स्थानीय दुकानों तक पहुँचाते हैं, जो अन्ततः आम ग्राहक को औसतन 60 रुपए प्रति किलो के हिसाब से बेचा जाता हैं।

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दूसरे शब्दों में कहें तो पहले चरण में ही मूल्य की 51 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो गयी थी, उसके बाद दूसरे चरण में 48 प्रतिशत दाम बढ़ गए। संक्षेप में कहा जाए तो यही वह कारण है जिसकी वजह से प्याज़ की क़ीमत बढ़ रही है, चाहे वह दिल्ली हो या अन्य कोई जगह, सब जगह एक जैसा ही हाल है। बिचौलिए और ख़ास तौर से बड़े व्यापारी कुछ ही दिनों में भारी मुनाफ़ा बटोर रहे हैं।

इसके बाद आइये हम प्याज़ की समस्या को थोड़ी गहराई से जांचते हैं जो समय-समय पर हमारे सामने आती रहती है।

कृषि मंत्रालय की बिना पर जारी 2018-19 के होरटीकल्चर फसलों के तीसरे अग्रिम अनुमान के अनुसार, जून 2019 में समाप्त हुए कृषि वर्ष में प्याज़ का उत्पादन 23.28 मिलियन टन था। यह व्यावहारिक रूप से पिछले साल की तरह ही था। इसलिए, ऐसा नहीं हो सकता कि प्याज़ की आपूर्ति में कोई भारी गिरावट आई हो, जिससे आपूर्ति की समस्या बढ़ गई हो।

बावजूद इसके, राष्ट्रीय होरटीकल्चर बोर्ड (एनएचबी) के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, थोक बाज़ारों में प्याज़ की आवक में भारी गिरावट आई है। जैसा कि नीचे दिए गए चार्ट में जनवरी और सितंबर 2018 और 2019 के बीच प्याज़ के मासिक आगमन को दिखाया गया है, जिसमें देखा जा सकता है कि पिछले सितंबर में, 3.98 लाख टन प्याज़ मण्डी में आया था, जबकि इस साल 23 सितंबर तक, कुल 1.63 लाख टन से कम आया है।

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वास्तव में, इस चालू वर्ष में प्याज़ की आवक में लगातार गिरावट देखी गई है, जो पिछले साल के मुक़ाबले काफ़ी उलट है। इस तथ्य को देखते हुए कि पिछले वर्ष का उत्पादन व्यावहारिक रूप से इस वर्ष के समान था, प्याज़ की आवक का कम होना विचित्र बात है किंतु सत्य भी है।

इसकी सफ़ाई यह दी जा रही है कि दो प्रमुख उत्पादक राज्यों से प्याज़ की आपूर्ति कृत्रिम रूप से प्रतिबंधित है या कम हो गई है। यह कुछ ऐसी बात नहीं है जिससे लोग अनजान हैं – लेकिन हमने देखा है कि पहले भी मुंबई और बेंगलुरु के बड़े कालाबाज़ारी व्यापारियों के ख़िलाफ़ कई शिकायतें दर्ज़ की गई थीं कि उन्होंने क़ीमतों को बढ़ाने के लिए प्याज़ के बड़े भंडार को दबा कर रखा हुआ है।

इसके अलावा, बाढ़ की वजह से कुछ व्यवधान भी पैदा हुए हैं – इससे सर्दियों में संग्रहीत हुए प्याज़ को नुक़सान हुआ है और इसके परिवहन में भी कठिनाइयाँ आई हैं। लेकिन इनसे आपूर्ति कम हो सकती है, यह तुकबंदी भी सही नहीं है।

इस प्रतिबंधित आपूर्ति का प्रभाव [नीचे चार्ट देखें] नाटकीय रहा है। पिछले साल, प्याज़ की क़ीमतें मई तक गिर गईं थी, फिर जुलाई में सुधार हुआ या थोड़ी बढ़ी और फिर सितंबर में गिर गई थी। लेकिन इस साल, एनएचबी के अनुसार, पूरे साल क़ीमतों में लगातार वृद्धि हुई है।

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क़ीमतों के बारे में जो सबसे उल्लेखनीय बात है, और जिसे ऊपर दिए गए चार्ट में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, वह यह है कि खुदरा क़ीमतें थोक मूल्यों के मुक़ाबले लगातार 40 प्रतिशत से अधिक के अंतर पर हैं। इस प्रकार किसानों को बहुत कम क़ीमत मिल रही है जबकि उपभोक्ता इस कालाबाज़ारी का खामियाज़ा भुगत रहे हैं।

ये ऐसी चाल है जो हमें इस चक्रव्यूह में फंसा देती है। कमी के समय में, बड़े व्यापारियों द्वारा कमाया जाने वाला लाभ अभूतपूर्व रूप से बढ़ जाता है। वे किसानों (या उनके क़रीबी) को थोड़ी अधिक क़ीमत देते हैं, लेकिन सामान्य आपूर्ति की तुलना में उनके मुनाफ़े का प्रतिशत बहुत अधिक बढ़ जाता है। जैसा कि नीचे दिए गए चार्ट में दिखाया गया है, एनएचबी के आंकड़ों के अनुसार, खुदरा और थोक मूल्यों के बीच अंतर इस वर्ष जनवरी 2019 में लगभग 727 रुपये प्रति क्विंटल (यानी 7.27 रुपये प्रति किग्रा) से बढ़ कर सितंबर में 1373 रुपये प्रति क्विंटल(यानी 13.72 रुपये प्रति किग्रा) हुआ है। यह क़रीब-क़रीब दोगुना लाभ है जिसे व्यापारी प्याज़ के जरीए कमा रहे हैं।

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ध्यान दें कि पिछले सितंबर में मार्जिन 808 रुपये प्रति क्विंटल था, जो अब लगभग 70 प्रतिशत बढ़ कर अपने वर्तमान 1,372  रुपये प्रति क्विंटल के स्तर पर पहुंच गया है।

यह इस महान प्याज़ डकैती का असली लेकिन घिनौना चेहरा है। और सरकार इसके बारे में कर क्या रही है? क्या किसी ने सुना कि सरकार ने पुणे, मुंबई, नासिक या बेंगलुरु के गोदामों पर छापे मारे हैं, हालांकि कई टन प्याज़ की चोरी की ख़बर ज़रूर छपी है। आज तक की ख़बर के अनुसार, सरकार ने प्याज़ के निर्यात को रोकने के लिए न्यूनतम निर्यात मूल्य में बढ़ोतरी की है और आयात के लिए एक निविदा जारी की है (विरोध के बाद सूची में से पाकिस्तान का नाम वापस ले लिया गया है)।

ज़रूरत इस बात की थी कि सरकार क़ीमतों में कमी लाने के लिए बाज़ार में बैठे कालाबाज़ारियो, ज़माखोरो के ख़िलाफ़ मज़बूत कार्रवाई करती, छापे मारती। ऐसा करने से, अगली फसल आने तक प्याज़ को सस्ते दामों पर ख़रीदा और बेचा जा सकता है। इस सब के ज़रिये लोगों को अनावश्यक ख़र्च से बचाया जा सकता था और बचाया जा सकता है। ऐसी कई अटकलें लगाई जा रही हैं कि सरकार की निष्क्रियता (विशेष रूप से महाराष्ट्र में, जो प्याज़ उत्पादन का बड़ा केंद्र है) इसलिए है क्योंकि वहां विधानसभा चुनाव आने वाले हैं और वे बड़े व्यापारियों को छापे मार कर नाराज़ नहीं करना चाहते हैं।

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