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फिल्म समीक्षा जॉली एलएलबी-2
मकीम कौन हुआ है मकाम किसका था
वीरेन्द्र जैन
01 Mar 2017
फिल्म समीक्षा जॉली एलएलबी-2
किसी भी फिल्म का सिक्विल बनने का एक मतलब यह भी होता है कि उससे पहले बनी फिल्म सफल रही थी और उसी सफलता की पूंछ से बँध कर नई फिल्म की वैतरिणी पार की जा सकती है। जौल्ली एलएलबी-2 भी ऐसी ही कोशिश की गई, जो रचनात्मक स्तर पर बड़ी लकीर नहीं खींच सकी। दोनों फिल्मों में एक ही चीज साझा है और वह है हमारी न्याय व्यवस्था का यथार्थवादी चित्रण। दोनों ही फिल्मों में न्यायाधीश की भूमिका सौरभ शुक्ला ने निभायी है। न्यायालयों के बारे में जो आदर्शवादी भ्रम व्यावसायिक फिल्मों ने रच दिया था उसे इन जैसी कुछ फिल्मों ने तोड़ दिया है।
 
अधिकारों और जिम्मेवारियों के विपरीत कम वेतन और सुविधाओं वाले न्यायाधीश बड़े बड़े पैसे और सुविधाओं वाले वाक्पटु वकीलों के आतंक में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं। इस फिल्म में तो न्यायाधीश [सौरभ शुक्ला], वकील प्रमोद माथुर [अन्नू कपूर] से कहते भी हैं कि अपनी बेटी की शाही शादी करने के लिए उन्हें उनके जैसा बनना होगा। उल्लेखनीय है कि हमारे देश की समकालीन राजनीति में भी जो वकील संसदीय राजनीति में आये हैं उन्हें निर्वाचन के समय अपनी आय का शपथपत्र देना पड़ता है। दो चुनावों के बीच उनके द्वारा दिये गये शपथपत्रों में जो उनकी आयवृद्धि प्रदर्शित होती है वह चौंकाने वाली होती है। यह आय केवल उनकी प्रतिभा के कारण ही नहीं होती अपितु इसमें उनकी राजनीतिक हैसियत की भूमिका भी होती है। इस फिल्म में यह सच भी जनता के सामने आया है कि न्याय में बार एसोशिएशन का दुरुपयोग भी सम्भव है। अपने मुकदमे के लिए न केवल गवाहों को ही धमकाया जाता है अपितु कुछ स्थानों पर तो वकीलों पर भी हमले करवाये जाते हैं।
 
न्याय व्यवस्था के साथ फिल्म की कहानी वकालत के कार्य में जूनियर वकीलों की दशा या कहें दुर्दशा भी बताती है जिसमें मुख्य पात्र जगदीश्वर मिश्रा [अक्षय कुमार] को वकालत की डिग्री होने के बावजूद मुंशीपुत्र होने के कारण मुंशी से अधिक नहीं समझा जाता और बड़े वकील रिज़वी साब आम तौर पर उससे बस्ता ढोने व उनकी अपनी दावतों में खानसामा का काम ही सौंपते हैं। न्याय व्यवस्था के साथ ही इस फिल्म का कथानक पूरी व्यवस्था की कमजोरियों को भी कई कोनों से छूता है। अपने प्रमोशन और धन के लिए पुलिस अधिकारी असली आतंकवादी को छोड़ देता है व उसके हमनाम को आरोपी बना देता है व राज खुलने से बचने के लिए उसे नकली एनकाउंटर में मार देता है। इस नकली एनकाउंटर को विश्वसनीय बनाने के लिए वह अपने ही एक कानिस्टबिल की जांघ में भी गोली मार देता है जो डायबिटीज का मरीज होने व ज्यादा खून बह जाने के कारण मर जाता है। [ ऐसा ही दृश्य फिल्म वेडनसडे में भी रचा गया था, जो नकली एनकाउंटरों में पुलिस वालों के घायल होने का राज खोलता है। नकली एनकाउंटर पर ‘अब तक 56’ जैसी फिल्में भी बनी हैं। परोक्ष में इनका सम्बन्ध भी न्याय व्यवस्था की कमजोरियों से है जिनके कारण पुलिस को दण्ड दिलाने में अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है और कुछ लोग नकली सबूत जुटाते जुटाते सौदागर बन जाते हैं ] पुलिस अधिकारी सूर्यवीर सिंह [कुमुद मिश्रा] सस्पेन्ड होने के बाद अपने वरिष्ठ अधिकारी को भी धमकाता है कि उसने भी पैसठ नकली एनकाउंटर करके ही प्रमोशन पाया है तथा अगर वह फँसता है तो उसकी भी पोल खोल सकता है। सीबीआई अधिकारी भी वरिष्ठ अधिकारी के आश्वासन पर जाँच में समय दे देते हैं और उन्हें भी इसकी कोई चिंता नहीं होती कि इस बीच में आरोपी सबूतों के साथ छेड़छाड़ भी कर सकते हैं।
 
छठे दशक की फिल्मों तक देश में जो वातावरण बना था उसमें समाज सुधार के लिए भी कुछ होता था। जनता को मूर्ख बना कर धन ऎंठने वाले पंडित पुरोहित हास्य के पात्र होते थे और गाँव के साहुकारों का पतन दिखाया जाता था। राजकपूर की फिल्म में ऐसे गीत होते थे जिसमें कहा जाता था कि – देखे पंडित ज्ञानी ध्यानी दया धरम के वन्दे, राम नाम ले हजम कर गये गौशाला के चन्दे, अजी में झूठ बोल्यां, अजी में कुफ्र तौल्यां कुई ना, हो कुई ना, हो कुई ना........। बाद में चीन के साथ हुए सीमा विवाद के साथ ही फिल्मों में हालीवुड घुस आया व राजकपूर, गुरुदत्त, बलराज साहनी की जगह शम्मी कपूर, धर्मेन्द्र, मनोज कुमार, जाय मुखर्जी जितेन्द्र की फिल्में सतही संवेदना और क्षणिक उत्तेजना के सहारे से बाज़ार पर छा गयीं। श्याम बेनेगल आदि की फिल्मों के चर्चित और पुरस्कृत होने के बाद बाजारू फिल्मों को आइना दिखाया गया पर बेशर्म बाज़ार अपना काम करता रहा। अब जरूर ऐसा समय आ गया है कि हर फिल्म में सामंती अवशेषों पर चुटकियां ली जाती हैं, भले ही मुक्का न मारा जाता हो।
 
जगदीश्वर मिश्रा भी माथे पर तिलक लगाता है पर रिजवी साहब के यहाँ कबाब भी बनाता है तथा शराब पिला कर अपनी रूठी पत्नी को मनाता है। इसके साथ साथ अपने छोटे बच्चे को भी जनेऊ पहनाता है और पेशाब कराते समय उसके कान पर लपेट भी देता है। न्यायाधीश महोदय अपनी मेज पर तुलसी का पौधा रखते हैं और उसमें पानी डालते रहते हैं। उन्हें पता है कि अदालत से बाहर वकील उन्हें टैडी बियर कह कर बुलाते हैं।
 
न्याय व्यवस्था की कमजोरियों को इसी नाम की पहली फिल्म में दिखाया जा चुका है, और उसमें कुछ भी नया नहीं जोड़ा जा सका है जबकि इससे अधिक तो शाहिद नामक फिल्म अधिक स्पष्ट थी। सच तो यह है कि यह कलात्मक फिल्म के कथानक पर बनी व्यावसायिक फिल्म है। अक्षय कुमार केवल टार्जन जैसी फिल्मों के नायक हैं, उन्हें छलांगें लगाना आता है पर अभिनय नहीं आता। हुमा कुरेशी की भूमिका केवल सौन्दर्य प्रदर्शन के लिए जोड़ी गई लगती है। चींटी की तरह रेंगते न्याय की यात्रा को व्यावसायिक फिल्मों की तरह फास्ट फूड बना दिया है जो इसको यथार्थवादी फिल्म होने से रोकता है। एक लम्पट, लालची और महात्वाकांक्षी वकील का इतनी जल्दी एक्टविस्ट के रूप में बदल जाना भी अस्वाभाविक लगता है। फिल्म के स्वरूप के अनुसार गाने अनावश्यक हैं और मेल नहीं खाते।
व्यावसायिक फिल्मों के बीच यह अपेक्षाकृत एक बेहतर फिल्म है व इसके कथानक में और अच्छी फिल्म हो सकने की सम्भावनाएं थीं। अच्छा रहा कि फिल्म व्यावसायिक रूप से सफल रही है जिससे सुधार की सम्भावनाएं बची रह गयी हैं। 
जॉली एल एलबी

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