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फिर से छा रहे हैं मंदी के काले बादल
भारतीय अर्थव्यवस्था एक गहरी खाई में फँस गई है, क्योंकि नवउपनिवेशवाद अपनी सेमा के अंत तक पहुँच गया है और घरेलू बाज़ार पर आधारित कोई अन्य आर्थिक निज़ाम नहीं है जो इसकी जगह ले सके।
प्रभात पटनायक
29 May 2019
Translated by महेश कुमार
 फिर से छा रहे हैं मंदी के काले बादल

औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) जून 2013 के बाद पहली बार, एक साल पहले की तुलना में मार्च 2019 में 0.1 प्रतिशत तक पहुँच गया है। फ़रवरी में इसमें मात्र 0.07 प्रतिशत की वृद्धि, जनवरी में 1.7 प्रतिशत की वृद्धि, दिसंबर में 2.6 प्रतिशत की वृद्धि और नवंबर में 0.3 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई थी। संक्षेप में कहा जाए तो औद्योगिक विकास, पिछले कुछ समय से धीमा चल रहा है और इस संबंध में आए नए आंकड़े केवल इस प्रवृत्ति की सशक्त रूप से पुन: पुष्टि ही करते हैं।

औद्योगिक उत्पादन के भीतर, सबसे बड़ा भार विनिर्माण क्षेत्र के 77.6 प्रतिशत ने उठाया हुआ है, जो एक साल पहले की तुलना में इस मार्च में 0.4 प्रतिशत कम हो गया, यह इसलिए हुआ क्योंकि पूंजीगत वस्तुओं में 8.7 प्रतिशत की गिरावट और उपभोक्ता संबंधित टिकाऊ वस्तुओं में 5.1 प्रतिशत की गिरावट देखी गई, मध्यवर्ती वस्तुओं में 2.5 प्रतिशत की गिरावट और उपभोक्ता ग़ैर-टिकाऊ वस्तुओं में 0.3 प्रतिशत की वृद्धि है। वर्ष 2018-19 के पूरे साल के लिए, आईआईपी में वृद्धि महज़ 3.6 प्रतिशत थी, जो 2017-18 के 4.4 प्रतिशत से काफ़ी कम है; लेकिन इसने वित्तीय वर्ष के बाद के महीनों में आई मंदी के दौरान गति पकड़ ली थी।

देखा जाए तो एक अर्थ में यह मंदी अपरिहार्य है। यह उस तथ्य का एक लक्षण है कि भारतीय अर्थव्यवस्था, दुनिया की अन्य अर्थव्यवस्थाओं की तरह, एक गड्ढे में फँस गई है, ऐसी जगह जहाँ जाकर नवउदारवाद अपने आख़िरी अंत तक पहुँच गया है और घरेलू बाज़ार पर आधारित कोई अन्य आर्थिक निज़ाम नहीं जो इसकी जगह ले सके।

विश्व अर्थव्यवस्था में भी मंदी देखी जा रही है, और इसका ख़ासा असर निर्यात की कम होती विकास दर के माध्यम से भारत और चीन जैसी अर्थव्यवस्थाओं पर भी देखा जा सकता है। लेकिन निर्यात की नीचे जाती दर को घरेलू बाज़ार के विकास के साथ किसी भी तरह से आंशिक रूप से भी संतुलित करने की कोशिश नहीं की जा रही है। इसके विपरीत, ग्रामीण संकट के चलते घरेलू बाज़ार भी उसी समय सिकुड़ रहा है, क्योंकि निर्यात वृद्धि की गति धीमी होने के दूसरे क्रम के प्रभाव के कारण, और ग़ैर-निष्पादित संपत्तियों के बढ़ते वज़न के कारण भी औद्योगिक विकास धीमा पड़ रहा है, जो बड़े ख़र्च को पूरा करने के लिए ऋण की उपलब्धता को कम कर देता है। निर्यात वृद्धि की गति धीमी होने से, दूसरे शब्दों में, घरेलू बाज़ार के सिकुड़ने से और अधिक जटिलता आ गई है।

यह इस तथ्य से स्पष्ट है कि उपभोक्ता टिकाऊ क्षेत्र सिकुड़ गया है और उपभोक्ता ग़ैर-टिकाऊ क्षेत्र पिछले अप्रैल की तुलना में इस अप्रैल में लगभग स्थिर रहा है। और कैपिटल गुड्स उत्पादन में संकुचन आने से जो सभी तरह के संकुचन के ऊपर आता है जो फ़रवरी में ही आ चुका था, यह बताता है कि अर्थव्यवस्था में निवेश गिर रहा है।

भारतीय रिज़र्व बैंक ने पहले ही रेपो रेट में दो बार कटौती की घोषणा की है, जिसमें प्रत्येक के लिए 25 का आधार अंक है; लेकिन इससे बहुत अंतर पड़ने की संभावना नहीं है। क्रेडिट वितरण क्या है, इसकी उपलब्धता के अनुसार ऋण की लागत इतनी अधिक नहीं है, जो ग़ैर-निष्पादित परिसंपत्तियों में पड़ने से ख़राब हो गई है। बेशक, भले ही क्रेडिट आसानी से उपलब्ध होता लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि इससे कितना फ़र्क़ पड़ता, लेकिन क्रेडिट उपलब्धता में आई कुछ जकड़न के कारण, दरों के मात्र कम करने से ॠण वितरण में कोई ख़ास वृद्धि नहीं होगी।

ज़रूरत वित्तीय विस्तार करने की है, अब यहाँ हम इस मामले की जड़ तक जाते हैं। इस चुनावी मौसम में, विभिन्न राजनीतिक दल ग्रामीण ग़रीबों को बड़े धन के बड़े हस्तांतरण का वादा कर रहे हैं, जो निश्चित रूप से घरेलू बाज़ार का विस्तार करेगा और औद्योगिक उत्पादन में कुछ सुधार लाएगा। नरेंद्र मोदी सरकार के बजट में छोटे किसान परिवारों से जुड़े लगभग 12 करोड़ लोगों को प्रति व्यक्ति 6,000 रुपये सालाना देने का वादा किया गया था। कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में इससे कहीं आगे निकल गई। इसने अपनी न्याय (एनवाईएवाई) योजना के तहत प्रति माह 6,000 रुपये देने का वादा किया, यानी, प्रति वर्ष 72,000 रुपये उन घरों तक जो समाज के सबसे निचले पायदान पर हैं, ऐसे लगभग पाँच करोड़ घर हैं।

हालंकि ये योजनाएँ घरेलू बाज़ार का विस्तार करने में मदद करती हैं, सवाल यह उठता है कि संसाधनों का जुगाड़ कैसे किया जाए। इसके लिए अमीरों पर कर लगाना होगा, विशेष रूप से धन कराधान के माध्यम से, जो वास्तव में भारत में अनुपस्थित है और जो आसानी से पर्याप्त राजस्व पैदा कर उसे बढ़ा सकता है, संसाधनों को जुटाने का यह बड़ा ही स्पष्ट तरीक़ा है; लेकिन अंतरराष्ट्रीय वित्त पूंजी द्वारा इसका सख़्त विरोध किया जा रहा है।

इसी तरह अगर इन योजनाओं को बढ़ते राजकोषीय घाटे से वित्त पोषित किया जाता है, तो राजकोषीय घाटा जीडीपी के 3.4 प्रतिशत के लक्ष्य को भी पार कर जाएगा, और इससे भारत की क्रेडिट-रेटिंग में गिरावट आने की संभावना है, जिससे बैलेंस ऑफ़ पेमेंट की मद में चालू खाता घाटे के चलते भुगतान करना बेहद कठिन हो जाएगा। यह समस्या अब और भी विकट हो जाएगी क्योंकि भारत ने ईरान से तेल ख़रीदना बंद करने का फ़ैसला कर लिया है, जो कि दुनिया की बाज़ार की क़ीमतों की तुलना में सस्ता है और उधार भी मिलता जबकि भारत को दूसरों से ख़रीद पर नक़द भुगतान करना पड़ता है।

तेल की क़ीमतें पहले से ही बढ़ रही हैं, जो मौजूदा घाटे को और बढ़ाएगा; अगर ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिकी प्रतिबंधों को भी ध्यान में रखा जाता है, तो वर्तमान घाटा और अधिक बढ़ जाएगा। और अगर इसके अलावा राजकोषीय घाटे का आंकड़ा अपने लक्ष्य से अधिक जाता है, तो वित्त की आमद पूरी तरह सूख जाएगी, क्योंकि भारत की क्रेडिट रेटिंग में गिरावट आ जाएगी, और सामान्य स्तर पर इस घाटे को पूरा करने की उम्मीद कम हो जाएगी।

इसलिए, हम एक विचित्र स्थिति में हैं। अगर सरकार बढ़ती मंदी को दूर करने की कोशिश करती है, तो चालू खाते के घाटे को पूरा करना मुश्किल होगा; दूसरी तरफ़, अगर यह मंदी का मुक़ाबला करने के लिए कुछ नहीं करती है, तो बेरोज़गारी की स्थिति जो पहले से ही गंभीर है, और भी गंभीर हो जाएगी।

बेरोज़गारी की स्थिति की गंभीरता सार्वजनिक नज़रों से छिपी हुई है क्योंकि सरकार ने बेरोज़गारी पर किसी भी आंकड़े को दो साल के लिए प्रकाशित करने से मना कर दिया है। लेकिन सरकार के सांख्यिकी कार्यालय की एक लीक हुई रिपोर्ट में बेरोज़गारी की दर को 6.1 प्रतिशत बताया गया है, जो पिछले 45 वर्षों में सबसे अधिक है। भारतीय अर्थव्यवस्था निगरानी केंद्र (सीएमआईई) ने अप्रैल में बेरोज़गारी दर को 7.6 प्रतिशत बताया था। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि हालांकि बेरोज़गारी दर का यह चलन बेरोज़गारी के बढ़ने की दिशा का संकेत तो देता है, लेकिन यह समस्या की भयावहता को नहीं दिखा पाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि भारत में रोज़गार राशनिंग है और ज़्यादातर लोग केवल कुछ समय के लिए काम करते हैं, बजाय इसके कि वे दिखाएँ कि आप स्थायी रूप से कार्यरत हैं या फिर पूरी तरह से बेरोज़गार।

ज़ाहिर है, बेरोज़गारी को कम करने के लिए सरकार को कुछ करना होगा; लेकिन कुछ भी करने से नवउदारवाद निज़ाम में बैलेंस ऑफ़ पेमेंट के भुगतान को अस्थिर कर देगा। संक्षेप में नवउदारवादी मुर्गियाँ आख़िरकार अंडा देने घर आ रही हैं।

चूंकि नवउदारवाद स्वयं अपने अंत में पहुँच गया है, इसलिए व्यापार और पूंजी नियंत्रणों को लागू कर इसे समाप्त करने का एक आदर्श समय भी है। जैसा कि संयुक्त राज्य अमेरिका पहले से ही व्यापार नियंत्रण की नीति पेश कर रहा है, भारत भी अमेरिकी कार्रवाई की आड़ में ऐसे नियंत्रण पेश कर सकता था। और ऐसे नियंत्रण के साथ, यह एक धन कर (वेल्थ टैक्स), और एक विरासत कर पेश कर सकता था। तब यह ग़रीब घरों में धन स्थानांतरण के भुगतान करने के अपने वादे को पुरा कर सकता था, और इस तरह से घरेलू बाज़ार का विस्तार भी किया जा सकता है, और खाद्यान्न उत्पादन की वृद्धि दर को बढ़ाने के लिए क़दम उठाकर इसका पालन किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में वित्तीय प्रवाह के सूखने से देश के चालू खाते के घाटे को पूरा करने की देश की क्षमता पर बहुत अधिक फ़र्क़ नहीं पड़ता जो कि व्यापार नियंत्रण के कारण वैसे भी संकुचित हो जाता।

लेकिन मोदी सरकार को इस तथ्य के बारे में कम जानकारी है कि नवउदारवाद एक मृत अवस्था तक पहुँच गया है। इसलिए, औद्योगिक मंदी की संभावना बढ़ गयी है।

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