NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
फण्ड की कमी से मलेरिया के विरुद्ध लड़ाई हुयी प्रभावित
सरकार द्वारा मच्छरों से पैदा होने वाली बीमारियों की रोकथाम के लिए मौजूदा निजाम में आवंटित वित्त में 13 प्रतिशत की कमी हुयी है।
सुबोध वर्मा
26 Apr 2018
Translated by महेश कुमार
malaria

विश्व मलेरिया दिवस पर, ऐसा लगता है कि मलेरिया के खिलाफ वैश्विक लड़ाई दुर्बल हो गयी क्योंकि इसमें 50 लाख मरीज़ो की बढ़ोतरी हुयी है जो 2016 में 2 करोड़ 16 लाख पहुंच गयी है और विश्व मलेरिया रिपोर्ट 2017 के अनुसार वैश्विक मृत्यु दर लगभग 4,45,000 पर स्थिर है।यह इस तथ्य पर ज़ोर देता है कि धन की कमी के चलते मलेरिया को नियंत्रित करने के प्रयासों में कमी आई हैं और गति कम हुयी है।

भारत के बारे में यह स्थिति क्या है? गौर से देखें तो पायेंगे कि नीति निर्माताओं के बीच एक तरह का जश्न मनाने की मनोदशा रही है क्योंकि आधिकारिक तौर पर दर्ज मामलों और दर्ज की गई मौतों में लगातार गिरावट आई है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी शैली की तर्ज़ पर एक अंतरराष्ट्रीय मंच पर घोषित किया कि भारत 2030 तक मलेरिया को खत्म कर देगा। इसके लिए, फरवरी 2016 में एक 'नया' राष्ट्रीय ढांचा घोषित किया गया था। इसके बाद राष्ट्रीय रणनीतिक योजना, 2017-2022 और फिर भारत में मलेरिया उन्मूलन के लिए एक परिचालन मैनुअल भी जारी किया गया था।

मलेरिया उन्मूलन को दी गई प्राथमिकता की आवश्यकता है। तीन भारतीयों में से एक में मलेरिया संक्रमण का जोखिम रहता हैं क्योंकि मच्छरों की तादाद पूरे देश में थोक के भाव है, विशेष रूप से मध्य भारत और उत्तर-पूर्व में यह संख्या ज्यादा है। लांसेट ने अनुमान लगाया था कि 2010 में भारत में मलेरिया से कम से कम 50,000 लोग मारे गए थे न कि आधिकारिक तौर पर रिपोर्ट किए गए हज़ार के आंकड़े के मुताबिक़। अनुमान लगाया जाता है कि मलेरिया के कारण हर साल करीब 2 अरब डॉलर का घटा होता हैं, मुख्य रूप से काम के दिनों में हानि के कारण।

लेकिन सरकार की भव्य योजनाओं में एक घातक विकलांगता है। मोदी सरकार कार्यक्रम को लागू करने पर पैसे खर्च करने को तैयार नहीं है। यदि सीमित वित्त पोषण है तो सबसे अच्छी योजनाओं की विफलता और उसकी बर्बादी के आसार बढ़ जाते हैं।

लोकसभा में एक हालिया प्रश्न (9 फरवरी 2018 को # 107) स्वास्थ्य मंत्रालय के तहत राष्ट्रीय वेक्टर बोर्न रोग नियंत्रण कार्यक्रम (एनवीबीडीसीपी) पर कितना खर्च किया गया, इस पर  स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा से प्रतिक्रिया मिली, और उन्होंने खुलासा किया कि 2014-15 और 2017-18 के बीच इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम के लिए वार्षिक निधि आवंटन 13 प्रतिशत घट गया था। 2014-15 में, जब वर्तमान मोदी सरकार ने इस कार्यक्रम के लिए 541 करोड़ रुपये आवंटित किए थे, जिसमें मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया, जापानी एन्सेफलाइटिस, फिलीरियास आदि सहित सभी वेक्टर (मछर) से पीड़ित बीमार बीमारियों के नियंत्रण आदि के लिए प्रावधान किया गया था। और 2017-18 में यह घटकर मात्र 468.5 करोड़ रुपये रह गया था।

malaria

 

अध्ययनों से पता चला है कि भारत में, मलेरिया नियंत्रण प्रयासों का खर्च मच्छर से बचने के लिए जाल, दवाइयों और कीटनाशक स्प्रे के बजाय प्रशासनिक लागत, वेतन और अन्य खर्चों के लिए समर्पित है। तो, कम खर्च अधिक अप्रभावी हो जाता है।

यह भी पाया गया है कि लंबी स्थायी कीटनाशक जाल (एलआईएल) का वितरण - मच्छरों के खिलाफ सुरक्षा के सबसे प्रभावी तरीकों में से एक माना जाता है – जो कि बहुत ही सीमित है। यूपीए सरकार के तहत, नीलामियों को दो बार रद्द कर दिया गया था और बिना किसी एलआईएल खरीदे 200 मिलियन डॉलर विश्व बैंक को वापस कर दिया गया था। अब, यह बताया गया है कि 2014 से, 2016 तक कुछ 12.4 मिलियन जाल खरीदे गए थे और खरीद के इंतज़ार में 5 मिलियन पाउंड खाते में रखे हुए थे। वैसे जाल की अनुमानित आवश्यकता लगभग 250 मिलियन है।

इस दृष्टिकोण के साथ, मलेरिया को खत्म करने की संभावना काफी मंद हो गई है और सभी घोषणाएं केवल आडम्बर बन कर रह गयी हैं।

malaria
world malaria day
Modi
मलेरिया
मलेरिया विरोधी अभ्यान

Related Stories

मोदी का ‘सिख प्रेम’, मुसलमानों के ख़िलाफ़ सिखों को उपयोग करने का पुराना एजेंडा है!

कटाक्ष: महंगाई, बेकारी भुलाओ, मस्जिद से मंदिर निकलवाओ! 

योगी कार्यकाल में चरमराती रही स्वास्थ्य व्यवस्था, नहीं हुआ कोई सुधार

टीकाकरण फ़र्जीवाड़ाः अब यूपी-झारखंड के सीएम को भी बिहार में लगाया गया टीका

EXCLUSIVE: सोनभद्र के सिंदूर मकरा में क़हर ढा रहा बुखार, मलेरिया से अब तक 40 आदिवासियों की मौत

कृषि क़ानूनों के वापस होने की यात्रा और MSP की लड़ाई

चुनावी मौसम में नये एक्सप्रेस-वे पर मिराज-सुखोई-जगुआर

महामारी का दर्द: साल 2020 में दिहाड़ी मज़दूरों ने  की सबसे ज़्यादा आत्महत्या

अबकी बार, मोदी जी के लिए ताली-थाली बजा मेरे यार!

माओवादियों के गढ़ में कुपोषण, मलेरिया से मरते आदिवासी


बाकी खबरें

  • Indian Economy
    न्यूज़क्लिक टीम
    पूंजी प्रवाह के संकेंद्रण (Concentration) ने असमानता को बढ़ाया है
    31 Jan 2022
    पिछले एक दशक में, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा उधार देने का तरीका बदल गया है, क्योंकि बड़े व्यापारिक घराने भारत से बाहर पूंजी जुटाने की कोशिश कर रहे हैं। रोहित चंद्रा, जो आईआईटी दिल्ली में…
  • unemployment
    सोनिया यादव
    देश में बढ़ती बेरोज़गारी सरकार की नीयत और नीति का नतीज़ा
    31 Jan 2022
    बेरोज़गारी के चलते देश में सबसे निचले तबके में रहने वाले लोगों की हालत दुनिया के अधिकतर देशों के मुक़ाबले और भी ख़राब हो गई। अमीर भले ही और अमीर हो गए, लेकिन गरीब और गरीब ही होते चले जा रहे हैं।
  •  Bina Palikal
    राज वाल्मीकि
    हर साल दलित और आदिवासियों की बुनियादी सुविधाओं के बजट में कटौती हो रही है :  बीना पालिकल
    31 Jan 2022
    काफी सालों से देखते आ रहे हैं कि हर साल सोशल सेक्टर बजट- जो शिक्षा का बजट है, जो स्वास्थ्य का बजट है या जो बजट लोगों के उद्योग के लिए है, इस बजट की कटौती हर साल हम लोग देखते आ रहे हैं। आशा है कि इस…
  • abhisar
    न्यूज़क्लिक टीम
    एक चुटकी गाँधी गिरी की कीमत तुम क्या जानो ?
    31 Jan 2022
    न्यूज़ चक्र में आज अभिसार शर्मा राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए बता रहे हैं कि कैसे गाँधी देश को प्रेरित करते रहेंगे।
  • nirmala sitharaman
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट/भाषा
    2022-23 में वृद्धि दर 8-8.5 प्रतिशत रहेगी : आर्थिक समीक्षा
    31 Jan 2022
    समीक्षा के मुताबिक, 2022-23 का वृद्धि अनुमान इस धारणा पर आधारित हैं कि आगे कोई महामारी संबंधी आर्थिक व्यवधान नहीं आएगा, मानसून सामान्य रहेगा, कच्चे तेल की कीमतें 70-75 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License