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भारत
राजनीति
फ़ुटपाथ : चंद्रयान, कश्मीर और असम
...जाहिर है, जगह-जगह असम की तर्ज़ पर नज़रबंदी केंद्र बनेंगे और कश्मीर की तर्ज़ पर नाकाबंदी और बाड़ाबंदी होगी। देश के अंदर सरहदें बनायी जा रही हैं!
अजय सिंह
14 Sep 2019
kashmir
फोटो साभार : इंडियन एक्सप्रेस

चंद्रयान मिशन की विफलता पर आंसू व सांत्वना के बोल, और कश्मीर व असम की जनता पर थोप दी गयी भयानक ट्रेजडी के प्रति बेरूख़ी और बेपरवाही! यही है हक़ीक़त हमारे इस समय की। जैसे कई बार हमारी चुप्पी चुनी हुई (सेलेक्टिव) होती है, उसी तरह टेसुए बहाना और सांत्वना देना भी चुने हुए ढंग से किया जाता है।

भारत के चंद्रयान मिशन की विफलता पर जो लोग हाहाकारी आंसुओं का सैलाब लेकर आये, उन्हें इस बात की क़तई चिंता नहीं कि ठीक इसी समय कश्मीर घाटी की लगभग 80 लाख जनता पर, जो एक महीने से ज़्यादा समय से लोकतंत्र के न्यूनतम बुनियादी अधिकार से भी वंचित है और क़ैदख़ाने-जैसी हालत में है, क्या बीत रही है। उन्हें इस बात की क़तई परवाह नहीं कि असम की तीन करोड़ 30 लाख की आबादी में जो 19 लाख से ऊपर लोग राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) की अंतिम सूची से बाहर कर दिये गये हैं और इस तरह उन्हें बेवतनी व बेमुल्की घोषित कर दिया गया है, वे किस मानसिक यातना और ख़ौफ़ में रह रहे हैं।

चंद्रयान मिशन की विफलता को क़रीब-क़रीब ‘राष्ट्रीय विपत्ति’-जैसा बता दिया गया। लेकिन कश्मीर और असम के मौजूदा हालात को हम किस श्रेणी में रखेंगे? क्या उन्हें राष्ट्रीय विपत्ति नहीं कहा जाना चाहिए, जिस ओर देश को बर्बर बहुमत के नाम पर ठेला जा रहा है? दिल्ली में बैठे हुक्मरानों की घातक हिंदुत्ववादी व विभाजनकारी नीतियों की बदौलत ये हालात बने हैं। देश के अंदर सरहदें व दीवारें बनायी जा रही हैं। डोनाल्ड ट्रंप और नरेंद्र मोदी में कितनी समानता है!

समूची कश्मीर घाटी 5 अगस्त 2019 से हिंदुस्तानी फ़ौज के बल पर आतंककारी जेल में तब्दील कर दी गयी है। घाटी की लगभग 80 लाख आबादी के सारे मानवीय, नागरिक व लोकतांत्रिक अधिकार ख़त्म कर दिये गये हैं। इज़रायली यहूदीवाद ने जो हालत फ़िलिस्तीन की कर रखी है, वही हालत 5 अगस्त से कश्मीर घाटी की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व गृहमंत्री अमित शाह के नेतृत्व में केंद्र की भारतीय जनता पार्टी सरकार ने 5 अगस्त को जम्मू-कश्मीर राज्य को ‘विशेष हैसियत’ का दर्ज़ा देने वाले संवैधानिक अनुच्छेद 370 को एकतरफ़ा तौर पर ख़त्म कर दिया और राज्य को दो केंद्र-शासित इकाइयों में बांट दिया। इसी के साथ जनता पर दमन चक्र और लोकतंत्र व मानवाधिकार को तहस-नहस करने का ख़ौफ़नाक अभियान शुरू हुआ।

कश्मीर घाटी में हज़ारों लोगों को गिरफ़्तार किया गया है। गिरफ़्तार किये लोगों में राजनीतिक पार्टियों के नेता व कार्यकर्ता, मानवाधिकार कार्यकर्ता, वकील, अध्यापक, छात्र, पत्रकार, डॉक्टर, धर्म-प्रचारक, व्यापारी व दुकानदार शामिल हैं। बहुतेरे, नौजवान और बच्चे भी गिरफ़्तार किये गये हैं। गिरफ़्तार किये गये लोगों में ज़्यादातर की उम्र 16 से 45 साल के बीच है। गिरफ़्तार किये लोगों में से सैकड़ों लोगों को कश्मीर से सैकड़ों-हजारों किलोमीटर दूर देश की अन्य जेलों में रखा गया है। 285 कश्मीरी बंदी उत्तर प्रदेश की विभिन्न जेलों में बंद हैं—इनमें से 85 बंदी आगरा की केंद्रीय जेल में रखे गये हैं।

यह भी यातना देने का बेरहम तरीक़ा है। ऐसा इसलिए किया गया है कि कश्मीरी बंदियों से उनके सगे-संबंधी आसानी से न मिल सकें, न बंदियों को क़ानूनी सुविधा आसानी से मिल सके। ज़ाहिर है, मिलने के लिए हज़ारों किलोमीटर की दूरी तय करनी होगी, अच्छा-ख़ासा वक़्त लगेगा, और जाना-लौटना सब मिलाकर इसमें बीस-तीस हज़ार रुपये तो ख़र्च हो ही जायेंगे। फिर भी बंदी से मुलाक़ात हो पायेगी, इसकी गारंटी नहीं, क्योंकि जेल के दरवाज़े पर आपको बताया जायेगा कि आपके पास जम्मू-कश्मीर पुलिस का सत्यापन (वेरिफ़िकेशन) पत्र नहीं है!

मुलाकाती को इस बारे में पहले से नहीं बताया गया होता है। आपका आधार कार्ड-पैन कार्ड कोई काम नहीं आयेगा! वापस कश्मीर जाइये, काग़ज़ का यह टुकड़ा (वेरिफ़िकेशन लेटर) लाने के लिए! चूंकि कश्मीर में 5 अगस्त से ही टेलीफ़ोन-मोबाइल-इंटरनेट-फ़ैक्स आदि बंद कर दिये गये हैं—यहां तक कि डाक सेवा भी काफ़ी सीमित कर दी गयी है—इसलिए इनकी मदद ली ही नहीं जा सकती।

उधर, असम में बड़े पैमाने पर डिटेंशन सेंटर (नज़रबंदी केंद्र) बनाये जा रहे हैं। ऐसी चर्चा है कि एशिया का सबसे बड़ा डिटेंशन सेंटर असम में गुवाहाटी के पास बन रहा है, जो सितंबर के अंत तक तैयार हो जायेगा। नाज़ी जर्मनी ने आसविज़ (पौलैंड) में जिस तरह कंसंट्रेशन कैंप (यातना शिविर) बनाये थे, कुछ-कुछ उसी तर्ज पर असम में नज़रबंदी केंद्र बनाये जा रहे हैं।

इन नज़रबंदी केंद्रों में उन्हें रखा जायेगा, जिनके नाम असम एनआरसी (राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) में नहीं हैं और जिन्हें ग़ैर-वतनी व ग़ैर-मुल्की घोषित किया गया है। असम के ऐसे 19 लाख बाशिंदों को भारत की अपनी नागरिकता प्रमाणित करने के लिए अभी एक मौक़ा और दिया गया है। लेकिन नज़रबंदी केंद्र ऐसे लोगों का अपना जबड़ा खोले इंतज़ार कर रहे हैं!

नरेंद्र मोदी व अमित शाह कह चुके हैं कि पूरे देश में एनआरसी को लागू किया जायेगा। जाहिर है, जगह-जगह असम की तर्ज़ पर नज़रबंदी केंद्र बनेंगे और कश्मीर की तर्ज़ पर नाकाबंदी और बाड़ाबंदी होगी। देश के अंदर सरहदें बनायी जा रही हैं!


(लेखक वरिष्ठ कवि और राजनीतिक विश्लेषक हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

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