NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
यूरोप
अर्थव्यवस्था
यूक्रेन में संघर्ष के चलते यूरोप में राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव 
यूरोपीय संघ के भीतर रुसी तेल के आयात पर प्रतिबंध लगाने के हालिया प्रयास का कई सदस्य देशों के द्वारा कड़ा विरोध किया गया, जिसमें हंगरी प्रमुख था। इसी प्रकार, ग्रीस में स्थित शिपिंग कंपनियों ने यूरोपीय संघ के बाहर के देशों में रुसी तेल के परिचालन के लिए अपने टैंकरों के इस्तेमाल पर यूरोपीय संघ के किसी भी प्रतिबंध पर वीटो कर दिया है।
सी. सरतचंद
16 May 2022
ukraine
चित्र उपयोग मात्र प्रतिनिधित्व के लिए। साभार: द इंडियन एक्सप्रेस 

यूक्रेन में संघर्ष का दुनिया की सभी अर्थव्यस्थाओं पर महत्वपूर्ण रूप से प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। इस हस्तांतरण प्रक्रिया में प्रमुख कड़ी रूस पर आर्थिक युद्ध रहा है, जिसे संयुक्त राज्य अमेरिका और इसके “सहयोगियों” जैसे कि यूरोपीय संघ के द्वारा शुरू किया गया है। संयुक्त राज्य अमेरिका एवं इसके “सहयोगियों” के द्वारा  रूस के विदेशी मुद्रा भंडार के आधे हिस्से के बलात समायोजन कर लेने और स्विफ्ट प्रणाली से कई रुसी बैंकों को अलग करने के परिणामस्वरूप भी रूस में वित्तीय पतन देखने को नहीं मिला है। और न ही इससे रुसी संघ की सरकार को यूक्रेन में संघर्ष के समाधान के लिए सहमत कराया जा सका है जो कि संयुक्तर राज्य अमेरिका के लिए स्वीकार्य हो। 

जिसके चलते, संयुक्त राज्य अमेरिका और इसके “सहयोगियों” के पास दो व्यवहार्य विकल्प थे: यूक्रेन में संघर्ष के समाधान के लिए एक समान कूटनीतिक प्रकिया में संलग्न होन या रूप पर आर्थिक युद्ध को थोपने की प्रकिया को तेज करना। यहाँ पर बाद वाले विकल्प को चुना गया है। लेकिन वृद्धि के इस विकल्प के साथ दो महत्वपूर्ण समस्याएं हैं। पहला, संयुक्त राज्य अमेरिका के “सहयोगियों” के अलावा अधिकाँश देशों ने रूस के खिलाफ आर्थिक युद्ध से खुद को अलग रखने का फैसला कर लिया है; और दूसरा, रूस अभी भी दुनिया को प्राथमिक वस्तुओं एवं रक्षा उपकरणों का अनिवार्य आपूर्तिकर्ता बना हुआ है। 

इसीलिए, रूस के खिलाफ चलाया जा रहा आर्थिक युद्ध का दूसरा दौर कम महत्वपूर्ण हो गया है। हालाँकि, यूरोपीय संघ के भीतर रुसी उर्जा आपूर्ति (तेल और प्राकृतिक गैस दोनों) में भारी कटौती करने को लेकर यूरोपीय संघ के बीच में सक्रिय चर्चा जारी है। यूरोपीय संघ ने पूर्व में घोषणा की थी कि रूस से इसके कोयले के आयात को चरणबद्ध तरीके से समाप्त किया जायेगा, लेकिन इसकी कट ऑफ डेट को को आगे बढ़ा दिया गया है। रुसी प्राकृतिक गैस का उपयोग बिजली का उत्पादन करने के लिए, औद्योगिक प्रकियाओं के लिए इनपुट के तौर पर और घरेलू उद्येश्यों (खाना पकाने, गर्म रखने इत्यादि) के लिए किया जाता है। ये सभी चीजें इस तथ्य के बावजूद हो रही हैं कि यदि यदि वास्तव में ऐसा होता है तो इसके यूरोपीय अर्थव्यस्थाओं पर इसका विनाशकारी प्रभाव पड़ सकता है, जिसमें आर्थिक गतिविधि में उल्लेखनीय गिरावट सहित मुद्रास्फीति में भारी बढ़ोत्तरी शामिल है। ऐसा इसलिए है क्योंकि, यूरोपीय संघ के देशों के पास अगले कुछ वर्षों तक रुसी उर्जा (प्राकृतिक गैस के मामले तो और भी ज्यादा)  का कोई वस्त्त्विक विकल्प मौजूद नहीं है। नतीजतन, रुसी प्राकृतिक गैस के ज्यादा से ज्यादा यूरोपीय खरीदारों ने या तो अपनी प्राकृतिक गैस की खरीद के लिए रूबल में भुगतान के लिए रुसी मांग को स्वीकार कर लिया है या स्वीकार करने की प्रकिया में जा रहे हैं। यूरोपीय संघ के देशों में यूक्रेनी शरणार्थियों के बड़े पैमाने पर आने से भी आर्थिक संकट के और बढ़ जाने की आशंका है।     

रुसी तेल के आयात को प्रतिबंधित किये जाने के हालिया कोशिश का यूरोपीय संघ के भीतर कई सदस्य देशों के द्वारा, विशेष रूप से हंगरी के द्वारा कड़ा विरोध किया गया है। इसी प्रकार, ग्रीस में स्थित शिपिंग कंपनियों ने यूरोपीय संघ के बाहर के देशों में रुसी तेल के परिचालन के लिए अपने टैंकरों के इस्तेमाल पर यूरोपीय संघ के किसी भी प्रतिबंध पर वीटो कर दिया है।  

भले ही कुछ अंतराल के बाद यूरोपीय देशों के लिए रुसी उर्जा के विकल्पों को तलाश कर लिया जाता है तो भी वे उसकी तुलना में अधिक महंगे होंगे। इससे यूरोपीय (और प्राथमिक तौर पर जर्मन) निर्यात की कीमतों में प्रतिस्पर्धा घट जायेगी। जर्मन निर्यातों की संख्या जो कि मूल्य लोचहीन हैं (अर्थात गुणवत्ता प्रतिस्पर्धात्मकता के आधार पर) और इसलिए कीमतों में इस वृद्धि के प्रति तुलनात्मक रूप से अछूते बने हुए हैं, यह कई कारकों पर निर्भर करेगा। पहला, रुसी उर्जा के रियायती दरों पर चीन की ओर पुनर्निर्देशित किये जाने की संभावना है, जो चीनी और जर्मन निर्यातों जे बीच में कीमतों के अंतर उल्लेखनीय रूप से इस हद तक बढ़ा सकता है कि जर्मन निर्यात की मूल्य लोचहीनता काफी हद तक घट सकती है। दूसरा, यदि चीन इस बीच अपने “तकनीकी क्रम” को उन्नत कर लेता है तो ऐसे कई जर्मन निर्मित वस्तुओं के निर्यात की संख्या, जिनकी मांग कीमतों के बदलाव के मामले में अभी तक लोचहीन बनी हुई थीं, समय के साथ इनकी मांग कम हो जायेगी। तीसरा, जापान, संयुक्त राज्य अमेरिका का “सहयोगी” होने के बावजूद, यूरोपीय संघ की तुलना में रूस के खिलाफ आर्थिक युद्ध में शामिल होने के प्रति कम इच्छुक रहा है। जिसका नतीजा यह होगा कि इसके निर्यात की कीमत प्रतिस्पर्धात्मक रूप से जर्मनी की तुलना में कम प्रतिकूल रूप से प्रभावित होगी। इस प्रकार, जापानी निर्यात जर्मन निर्यात को प्रतिस्पर्धा में पछाड़ना शुरू कर सकता है, विशेषकर ऐसे उच्च प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में जहाँ वे एक दूसरे के विकल्प के तौर पर बने हुए हैं। 

निर्यात की मूल्य प्रतिस्पर्धात्मकता में इस गिरावट को रोकने के लिए अपनी कोशिश में जर्मन व्यवसाय मजदूरी में कटौती करने के माध्यम को अपना सकते हैं। लेकिन यह दबाव उत्पादन, रोजगार, क्षमता उपयोग, निवेश और तकनीकी बदलाव में कमी ला सकता है, जब तक कि जर्मन निर्यात में मजदूरी की दर में कमी के चलते कोई विस्फोटक वृद्धि न हो। लेकिन मौजूदा वैश्विक अर्थव्यस्था को देखते हुए जर्मन निर्यात में इसी प्रकार की विस्फोटक वृद्धि के अमल में आने की संभावना नहीं नजर आती है, जो कोविड-19 महामारी एवं यूक्रेन में संघर्ष, दोनों वजहों से प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुई है। ऐसी स्थिति में उन आयातक देशों जिनका उत्पादन जर्मनी के लिए एक विकल्प है, उनके द्वारा ऐसे जर्मन निर्यातों पर तट-शुल्क एवं गैर-उत्पाद शुल्क जैसी बाधाएं खड़ी की जा सकती हैं। 

ठहराव एवं मुद्रास्फीति के ऐसे परिदृश्य में, यहाँ तक कि जर्मन सरकार की, सबसे भरोसेमंद यूरो-मूल्यवान सरकारी प्रतिभूतियां, जहाँ तक अंतर्राष्ट्रीय वित्त का संबंध है, वैकल्पिक वित्तीय परिसंपत्तियों की तुलना में कम आकर्षक हो जाएँगी। इसका कुल नतीजा संयुक्त राज्य अमेरिकी डॉलर एवं अन्य वित्तीय परिसंपत्तियों की तुलना में यूरो के अवमूल्यन की संभावना प्रबल है, जिन्हें तुलनात्मक रूप से अंतर्राष्ट्रीय वित्त के द्वारा अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित माना जाता है। अंतर्राष्ट्रीय वित्त के भरोसे को बनाये रखने के लिए इस प्रकार की जर्मन सरकारी प्रतिभूतियों पर ब्याज दरों में बढ़ोत्तरी की कोशिशें आर्थिक ठहराव को ही बढ़ाएगी।

लेकिन रूस पर आर्थिक युद्ध को तेज करने को लेकर की जाने वाली बयानबाजी, जो कि खुद में आत्म-घाती कदम है, लेकिन यूरोपीय संघ के कई हलकों से उत्पन्न होती हैं, जो कि कभी-कभी तो संयुक्त राज्य अमेरिका की तुलना में कहीं अधिक कर्कश स्वर में निकलती है। हालाँकि, यूक्रेन में सैन्य संघर्ष की “सहायता” के अल्पसंख्यक मुख्यधारा के द्वारा विरोध को संयुक्त राज्य अमेरिका में सनकी दक्षिणपंथी बतोलेबाजी के बारे में जानकारी है। यदि हम “यूक्रेन पर युद्ध समग्र रूप से यूरोप पर युद्ध है” जैसे “वैचारिक उद्येश्यों” को सुरक्षित रूप से ख़ारिज भी कर देते हैं तो भी यूरोपीय संघ में रूस पर आर्थिक युद्ध को तेज करने के ऐसे रुख को अभी स्पष्ट किये जाने की आवश्यकता बनी हुई है।

संयुक्त राज्य अमेरिका के अभिजात वर्ग के रणनीतिक हित यूरोपीय संघ के देशों, विशेष रूप से जर्मनी की अर्थव्यस्था को कमजोर करने में छिपे हुए हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस तरह से कमजोर होने से यूरोप के देशों की रणनीतिक स्वायत्तता कम हो जायेगी, और उन्हें संयुक्त राज्य अमेरिका के और भी ज्यादा “विश्वस्त सहयोगी” बनने के लिए मजबूर किया जा सकता है। एक ऐसी दुनिया में जहाँ पर चीन और रूस के बीच की रणनीतिक दरार लगातार कम होती जा रही है, ऐसे में संयुक्त राज्य अमेरिका को पहले से बड़ी संख्या में “भरोसेमंद सहयोगियों” की दरकार है।

उदाहरण के लिए, नॉर्डस्ट्रीम 2 पर संयुक्त राज्य अमेरिका का कड़ा एतराज, रूस और जर्मनी को जोड़ने वाली सीधी समुद्र के नीचे की प्राकृतिक गैस पाइपलाइन, इस प्रकार के रुख से उत्पन्न होती है। नॉर्डस्ट्रीम 2 ने पूर्वी यूरोप के उन देशों को दरकिनार कर देना था, जिनके उपर संयुक्त राज्य अमेरिका की अधिक “पकड़” है। इसके फलस्वरूप, जर्मनी को रणनीतिक रूप से प्रभावित करने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका की क्षमता में कुछ हद तक कमी आ जाती। इसी प्रकार, संयुक्त राज्य अमेरिका ने नोर्मंडी फॉर्मेट जिसमें (फ़्रांस, जर्मनी, रूस और यूक्रेन शामिल) हैं, को यूक्रेन में संघर्ष के कूटनीतिक समाधान पर पहुँचने की अनुमति नहीं दी, क्योंकि इस प्रकार के प्रस्ताव की परिणति इसके रणनीतिक रूप से दुर्बल होने में होती। इसने यूक्रेन में युद्ध के बीज बो दिए।

यूरोपीय संघ के देशों के भीतर ऐसी कई राजनीतिक संस्थाएं/व्यक्ति मौजूद हैं जो संयुक्त राज्य अमेरिका के रणनीतिक हितों का सक्रिय रूप से बढ़ावा देते हैं। इसमें सरकारें, राजनीतिक दल, यूरोपीय संघ की नौकरशाही और उत्तर अटलांटिक संधि संगठन और “बुद्धिजीवी” आदि शामिल हैं। मामला यहाँ तक है कि इनमें से कुछ लोग व्यक्तिगत तौर पर खुद को “पश्चिमी सभ्यता” के सिद्धांतों और प्रथाओं को बरकारर रखने के लिए जुटे हुए लोगों के तौर पर देखते हैं।

यूरोप के देशों की राजनीतिक अर्थव्यस्था की इस प्रकार की असंबद्ध प्रकृति ही इसकी प्रमुख वजह है जिससे आत्म-पराजय नीति प्रस्ताव लगभग-पूरी तरह से अधिपति बन सकते हैं। इसलिए यह इस बात का दावा करना सरासर झूठ होने के साथ-साथ पूरी तरह से गलत भी है कि इस प्रकार की नीतियों को इसलिए अपनाया या मांग की जा रही है क्योंकि यूरोप में सरकारें यूक्रेन में चल रहे संघर्ष के कारण कार्यवाही करने के लिए “नैतिक रूप से मजबूर” महसूस कर रही हैं। हालाँकि, यूक्रेन में संयुक्त राज्य अमेरिका के द्वारा ज़ेलेंस्की प्रशासन को दीक्षित किया गया है, लेकिन “यूरोपीय एकता” के संदर्भ में वह अपनी सार्वजनिक मुद्रा का पालन करता है। इस सार्वजनिक मुखौटे का, जिसका किसी भी यूरोपीय देश में सार्वजनिक तौर पर खंडन नहीं किया जा सकता है, ने वहां की बेतरतीब राजनीतिक अर्थव्यस्था को देखते हुए, यह वह जरिया है जिसके जरिये संयुक्त राज्य अमेरिका यूरोप में बची-खुची रणनीतिक स्वायत्तता पर अपना जबरन प्रभाव डालने में सक्षम है।  

हाल ही में, ज़ेलेंस्की प्रशासन ने रुसी प्राकृतिक गैस के मार्ग को अवरुद्ध कर दिया था, जिसकी पाइपलाइनों में से एक के जरिये रूस को यूरोप से जोड़ने वाली पाइपलाइन जुड़ी हुई है। संभव है कि यह फैसला संयुक्त राज्य अमेरिका के द्वारा प्रबंधित किया गया हो। इसके अलावा, रुसी सरकार ने रूस से यूरोप तक यमल पाइपलाइन के पोलिश हिस्से का प्रबंधन संभालने वाली कंपनी को प्रतिबंधित कर दिया है। इस प्रकार के तनाव को यदि बढ़ने से नहीं रोका गया और इस प्रकिया को उलटी दिशा में नहीं किया गया तो यूरोप की अर्थव्यस्था पर इसका बेहद प्रतिकूल असर पड़ेगा। हालाँकि, इसके लिए यूरोप में रणनीतिक स्वायत्तता के पुनरुत्थान की जरूरत है, और इसकी शुरुआत जर्मनी और फ़्रांस से की जानी चाहिए। यह पुनरुत्थान, आपस में बातचीत की एक प्रक्रिया को भी शुरू कर सकता है, जो यूक्रेन में संघर्ष के कूटनीतिक समाधान को भी सक्षम बना सकता है। लेकिन इसके लिए यूरोप के विभिन्न देशों की अव्यवस्थित राजनीतिक अर्थव्यस्था के साथ एक राजनीतिक हिसाब-किताब किये जाने की जरूरत है। इस प्रकार के पुनर्संयोजन की प्रकिया को इसी सूरत में सुदृढ़ किया जा सकता है यदि यूरोपीय देशों में वामपंथी सक्रिय रूप से इसकी रुपरेखा को आकार देने के लिए संगठित होते हैं। 

सी. सरतचंद ,सत्यवती कालेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र विभाग के प्रोफेसर हैं।

अंग्रेजी में मूल रूप से लिखे लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें

Political Economy Implications of the Conflict in Ukraine on Europe

Russia
ukraine
US
European Union
economic war on Russia
NATO
EU

Related Stories

यूक्रेन-रूस युद्ध का संदर्भ और उसके मायने

विकासशील देशों पर ग़ैरमुनासिब तरीक़े से चोट पहुंचाता नया वैश्विक कर समझौता

ईरान की एससीओ सदस्यता एक बेहद बड़ी बात है

मर्केल के अमेरिकी दौरे से रूस, भारत के लिए क्या है ख़ास

पेटेंट बनाम जनता

कार्टून क्लिक : कश्मीर और ईयू सांसदों का दौरा

इस ब्रेक्सिट की गुत्थी सुलझाए नहीं सुलझती


बाकी खबरें

  • Varun singh
    भाषा
    वायु सेना हेलीकॉप्टर दुर्घटना: घायल ग्रुप कैप्टन वरुण सिंह का निधन
    15 Dec 2021
    8 दिसंबर को हुए इस हादसे में प्रमुख रक्षा अध्यक्ष (सीडीएस) जनरल बिपिन रावत, उनकी पत्नी और 11 अन्य सैन्य कर्मियों की जान चली गई थी। हादसे में गंभीर रूप से घायल वरुण सिंह का उपचार जारी था।
  • cartoon
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    लखीमपुर खीरी कांड: गृह राज्य मंत्री टेनी दिल्ली तलब
    15 Dec 2021
    दिल्ली से लेकर यूपी तक, लोकसभा से लेकर विधानसभा तक आज इस मामले की गूंज रही और टेनी के बर्ख़ास्तगी/इस्तीफ़े की मांग की जाती रही। इसी दौरान मंत्री जी द्वारा मीडिया से बदसुलूकी का वीडियो भी वायरल हो गया…
  • gujarat
    आदित्य गुजराती
    गुजरात में आख़िर लाभ-साझाकरण वाली धनराशि कहां जा रही है?
    15 Dec 2021
    गुजरात जैव-विविधता बोर्ड के क्रूर शासन ने भारत की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के साथ-साथ जैविक विविधता अधिनियम, एवं 2014 के एबीएस नियम-कानूनों के पूरे उद्देश्य को ही विफल कर दिया है।
  • सोनिया यादव
    गुजरात: सरकारी आंकड़ों से कहीं ज़्यादा है कोरोना से मरने वालों की संख्या!
    15 Dec 2021
    सुप्रीम कोर्ट में गुजरात सरकार अपने ही हलफनामे से झूठी साबित हुई है। अब सरकार ने खुद आधिकारिक तौर पर इस बात को स्वीकार कर लिया है कि राज्य में कोरोना से मरने वालों की जितनी गिनती की गई थी, असली…
  • बिहारः कोरोना टीके से मौत का आरोप लगाकर चिकित्सा पदाधिकारी को बनाया बंधक
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बिहारः कोरोना टीके से मौत का आरोप लगाकर चिकित्सा पदाधिकारी को बनाया बंधक
    15 Dec 2021
    कोरोना टीके से मौत का आरोप लगाते हुए कटिहार में वैक्सीनेशन महाअभियान के तहत टीकाकरण के लिए मनसाही के छोटी बथना गांव गए चिकित्सा पदाधिकारी को ग्रामीणों ने दो घंटे तक बंधक बनाए रखा।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License